दोहा क्या है?

दोहा क्या है?

पिछले लेख छंद क्या है? में हमने मात्रा, यति और लघु–गुरु का आधार समझा था। अब देखेंगे कि इन्हीं से 2 पंक्तियों में एक पूरी बात कैसे बनती है। यदि आप सीधे यहाँ आए हैं, तो नीचे की गणना के साथ वह आधार-लेख भी पढ़ सकते हैं।


दोहा क्या है?

दोहा एक अर्धसम मात्रिक छंद है। इसके चार चरण होते हैं: पहले और तीसरे में 13–13, दूसरे और चौथे में 11–11 मात्राएँ होती हैं। सामान्यतः इसे दो पंक्तियों में लिखा जाता है; हर पंक्ति में दो चरण होते हैं। दूसरे और चौथे चरण के अंत में तुक तथा गुरु–लघु का क्रम रहता है।

अब इस परिभाषा को थोड़ी देर के लिए मेज़ पर रख दीजिए। पहले कविता के पास बैठते हैं।

कल्पना कीजिए, कोई युवा पूछता है, “इतने छोटे में गहरी बात कैसे कहें?” उत्तर में तुरंत दोहा लिख देना आसान है। कठिन काम है उसे यह समझाना कि छोटा लिखना और बात को सघन करने में फर्क होता है। छोटा संदेश अधूरा भी हो सकता है। अच्छा दोहा अपनी छोटी जगह में अनुभव की पूरी आकृति रखता है।

मोबाइल पर दो पंक्तियाँ लिखना हम सब जानते हैं। लेकिन ऐसी दो पंक्तियाँ लिखना, जिन्हें पढ़कर मन तीसरी पंक्ति अपने भीतर खोजने लगे, यह दोहे की कला है।


दो पंक्तियाँ, मगर चार चरण

छंद सीखते हुए पहली भूल यही होती है: पंक्ति और चरण को एक समझ लेना। दोहे में ऊपर की पूरी पंक्ति 13 मात्राओं की नहीं होती। उसके भीतर 13 और 11 मात्राओं के दो हिस्से होते हैं।

लिखी हुई पंक्तिपहला हिस्सादूसरा हिस्साकुल
पहली पंक्तिचरण 1: 13चरण 2: 1124
दूसरी पंक्तिचरण 3: 13चरण 4: 1124


दोहे में कुल 48 मात्राएँ होती हैं। लेकिन 48 का जोड़ ठीक हो जाना पर्याप्त नहीं है। चरणों का अलग-अलग विन्यास भी सही चाहिए। घर की चार दीवारों की कुल लंबाई बता देने से दरवाजा सही जगह नहीं बन जाता।

हर पंक्ति में पहले चरण के बाद ठहराव को यति कहते हैं। यह ठहराव अर्थ का भी होना चाहिए। किसी शब्द को बीच से काटकर 13 पूरी कर देना कविता के साथ अच्छा व्यवहार नहीं है।


तुलसीदास के दोहे में भीतर का दर्पण

तुलसीदास के रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड के आरंभ का दोहा देखिए:

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥

यहाँ गुरु के चरणों की धूल से मन का दर्पण साफ करने का बिंब है। कवि केवल यह नहीं कह रहा कि मुझे अच्छा लिखना है। वह लिखने से पहले अपने देखने के साधन को निर्मल कर रहा है। जो मन धुँधला है, वह विषय को भी धुँधला देखेगा।

अब इसका छंद-विधान देखिए:

चरणशब्दों की मात्रा-गणनायोग
श्रीगुरु चरन सरोज रजश्रीगुरु 4 + चरन 3 + सरोज 4 + रज 213
निज मनु मुकुरु सुधारिनिज 2 + मनु 2 + मुकुरु 3 + सुधारि 411
बरनउँ रघुबर बिमल जसुबरनउँ 4 + रघुबर 4 + बिमल 3 + जसु 213
जो दायकु फल चारिजो 2 + दायकु 4 + फल 2 + चारि 311


“मनु”, “मुकुरु” और “चारि” को बिना सोचे आधुनिक रूपों से बदल देना उचित नहीं। अवधी का शब्दरूप यहाँ अर्थ के साथ-साथ लय भी सँभालता है।


मात्रा कैसे गिनें?

यदि लघु–गुरु की संज्ञाएँ नई लग रही हों, तो छंद के आधार-लेख की मात्रा वाली तालिका पहले देख लें। ह्रस्व स्वर सामान्यतः एक मात्रा और दीर्घ स्वर दो मात्राओं का आधार देते हैं। लघु को 1, गुरु को 2 से दिखाते हैं। लेकिन छंद में केवल दिखाई देने वाली मात्रा-चिह्नों की गिनती नहीं होती। संयुक्त व्यंजन, अनुस्वार, उच्चारण और शब्द का पारंपरिक पाठ भी देखना पड़ता है।

“चरन” में च–र–न का लघु क्रम 1+1+1 है। “सरोज” में स–रो–ज: 1+2+1। “चारि” में चा–रि: 2+1।

यहीं एक सावधानी याद रखिए। रोजमर्रा की हिंदी में “बात” का अंतिम ‘अ’ बहुत हल्का या लुप्त सुनाई देता है; पारंपरिक मात्रिक विभाजन में बा–त का 2+1 लिया जाता है। इस लेख के उदाहरण पारंपरिक हिंदी मात्रिक पाठ में जाँचे गए हैं। उन्हें आधुनिक बोलचाल के बंद हिज्जों की गिनती से मिलाएँगे तो अंतर दिख सकता है। हिंदी छंद की गणना को उर्दू अरूज़ के हिज्जों की गणना पर ज्यों का त्यों आरोपित न करें। दोनों का लक्ष्य लय है, उनकी तकनीक एक नहीं।


दोहा लिखने के नियम क्या हैं?

13–11–13–11 उसका मूल ढाँचा है। दूसरे और चौथे चरण में तुक मिलाइए और उनके अंत में गुरु–लघु की चाल रखिए। पहले और तीसरे चरण के आरंभ में निषिद्ध जगण—लघु–गुरु–लघु, अर्थात 1–2–1 से बचना पारंपरिक निर्देश है। आरंभिक जगण के शब्द-सीमा संबंधी सूक्ष्म विवेचन उन्नत अभ्यास में आते हैं; शुरुआत के लिए निर्विवाद विन्यास चुनना बेहतर है।

मगर नियमों के आगे भी काम बचता है। पहली पंक्ति कोई स्थिति, अनुभव या प्रश्न रख सकती है; दूसरी पंक्ति उसका विस्तार, उलटाव या मर्म खोल सकती है। यह प्रभावी रचनात्मक पद्धति है, हर दोहे पर लागू होने वाला अनिवार्य कानून नहीं।

आज की पीढ़ी के लिए एक मौलिक दोहा

मान लीजिए, मित्र रात को संदेश भेजता है: “सब हैं, फिर भी अकेला लग रहा है।” उस अनुभव पर यह अभ्यास-दोहा पढ़िए:

मन की खिड़की खोलिए, सुनिए मन की बात।
कुछ पल रुककर देखिए, फिर कट जाए रात॥


चरणमात्रा-विभाजनयोग
मन की खिड़की खोलिएमन 2 + की 2 + खिड़की 4 + खोलिए 513
सुनिए मन की बातसुनिए 4 + मन 2 + की 2 + बात 311
कुछ पल रुककर देखिएकुछ 2 + पल 2 + रुककर 4 + देखिए 513
फिर कट जाए रातफिर 2 + कट 2 + जाए 4 + रात 311


“बात” और “रात” तुक देते हैं; दोनों के अंत में 2–1 की चाल है। “खिड़की” भीतर और बाहर के बीच एक दृश्य संबंध बनाती है। रात वास्तविक रात भी हो सकती है और मन की कठिन घड़ी भी।

यह अकेलेपन का कोई चमत्कारी उपचार नहीं बताता। कविता का काम कभी-कभी बस इतना होता है कि वह हमें किसी दूसरे के पास बैठने योग्य भाषा दे।

दोहा भाषा को सुंदर कैसे बनाता है?

उसकी सुंदरता संक्षेप, संतुलन और ध्वनि की वापसी में है। 13 मात्राओं का चरण बात खोलता है; 11 का चरण उसे अपेक्षाकृत जल्दी समेटता है। यह विस्तार और कसाव सुनने में अलग अनुभव देता है।

तुक लौटती है तो स्मृति को पकड़ मिलती है। लेकिन सच्चा आकर्षण अर्थ का है। “रात” केवल इसलिए न आए कि “बात” से मिलती है; उसे कविता के अनुभव में जरूरी होना चाहिए।

रहीम के “रहिमन पानी राखिए” वाले दोहे में पानी का बहुअर्थी प्रयोग इसी सघनता का दूसरा उदाहरण है—जल, चमक और मान की परतें छोटी जगह में खुलती हैं। दोहा ज्ञान की सूची नहीं देता; एक शब्द के सहारे जीवन के अलग-अलग प्रसंगों को बातचीत में ले आता है।

दोहा, ग़ज़ल का शेर और इज़ाफ़त: कहाँ मिलते हैं, कहाँ अलग हैं?

दोहा और शेर दोनों कम जगह में अर्थ सघन कर सकते हैं। फिर भी दोहा अपने मात्रिक विधान से पहचाना जाएगा; ग़ज़ल का शेर बह्र, क़ाफ़िया और ग़ज़ल की अन्य संरचनात्मक शर्तों से जुड़ता है। केवल दो पंक्तियाँ होने से दोनों एक नहीं हो जाते।

इस भेद को आगे समझने के लिए रचनायें का उर्दू ग़ज़ल में मीटर और बह्र पढ़िए। और शब्दों के बीच संबंध की बारीकी के लिए इज़ाफ़त—उर्दू ग़ज़लों की कारीगरी। इज़ाफ़त छंद नहीं है; वह व्याकरणिक जोड़ है, जिसकी बोली हुई ध्वनि वज़्न पर असर डाल सकती है।


दोहे पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या हर दो पंक्तियों की कविता दोहा है?

नहीं। दोहा होने के लिए 13–11–13–11 का चरण-विन्यास, संबंधित लय तथा अंत के नियम चाहिए।

क्या दोहा केवल उपदेश के लिए है?

नहीं। उसमें प्रेम, व्यंग्य, भक्ति, नीति, विरह और रोजमर्रा का अनुभव भी लिखा जा सकता है।

क्या तुक मिलाने से दोहा बन जाता है?

नहीं। तुक ध्वनि-साम्य है; छंद में मात्रा और चरण-विधान भी आवश्यक हैं। यह फर्क रचनायें के तुकांत और अतुकांत कविता वाले लेख में आगे खुलता है।

पहला दोहा कैसे लिखें?

एक सच्चा अनुभव चुनें, उसे साधारण वाक्य में लिखें, फिर चार चरणों में तराशें। अंत में मात्रा, तुक, उच्चारण और अर्थ—चारों की अलग जाँच करें।


दो पंक्तियाँ याद रह जाएँ, तो काम शुरू होता है

आज छोटा लिखने का खूब अभ्यास है; ठहरकर लिखने का कम। दोहा दोनों को जोड़ सकता है। उसे अपनी पोस्ट को छोटा करने की तरकीब में मत बदलिए। उससे पूछिए कि आपके अनुभव में कौन-सा शब्द अनिवार्य है और कौन-सा केवल जगह घेर रहा है।

एक अच्छा अभ्यास यह होगा: आज की किसी बातचीत को गद्य में लिखिए। कल उसी में से एक दोहा खोजिए। शायद कविता पहले से वहाँ बैठी हो, और आपने उसे बोलने की लय अभी न दी हो।


Featured in this blog

Seepiyaan

Seepiyaan

Javed Akhtar

₹315 ₹399
View details ›

Books in this blog

Doha-Vallari

Doha-Vallari

Dinesh Chandra Awasthi

₹240 ₹300

NEXT BLOG

छंद क्या है?

›
Cancel reply
Add a comment
Add a comment

Offers

Best Deal

Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit, sed do eiusmod tempor incididunt ut labore et dolore magna aliqua

Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit, sed do eiusmod tempor incididunt ut labore et dolore magna aliqua. Ut enim ad minim veniam, quis nostrud exercitation ullamco laboris nisi ut aliquip ex ea commodo consequat.

whatsapp