छंद क्या है?

October 11, 2026

छंद क्या है?

छंद क्या है?

छंद कविता की ध्वनि-रचना का व्यवस्थित विधान है। पारंपरिक छंदों में वर्णों या मात्राओं की संख्या, लघु–गुरु का क्रम, चरण और यति जैसे नियम होते हैं। अलग-अलग छंदों में अलग-अलग नियम लागू होते हैं। दोहा, चौपाई और सोरठा छंद के उदाहरण हैं; छंद के समानांतर कोई एक चौथी कविता-विधा नहीं है।

कविता की सुंदरता केवल अंतिम शब्दों (तुकबंदी) से नहीं होती। ठीक वैसे ही जैसे कोई व्यक्ति सुंदर कपड़े पहनकर आए, तो उससे उसकी चाल का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। तुक कविता का एक आकर्षण है; छंद उसकी गति का अधिक व्यापक विधान है।

अब आप कहेंगे, “गति को भी नियमों में बाँधना पड़ेगा?” आइए, बात यहीं से शुरू करें।


मात्रा, वर्ण और अक्षर में क्या फर्क है?

छंद में ‘वर्ण’ गिनने का अर्थ कंप्यूटर की तरह देवनागरी के चिह्न गिनना नहीं है। जिस अक्षर या ध्वनि-इकाई का पाठ हो रहा है, उसकी पहचान करनी होती है। मात्रा उस इकाई के लघु या गुरु भार से जुड़ती है।

सामान्य आधार यह है:

स्वर-प्रकारउदाहरणसामान्य छंद-भार
ह्रस्वअ, इ, उ, ऋ1, लघु
दीर्घआ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ2, गुरु


संयुक्त व्यंजन से पहले का ह्रस्व स्वर, अनुस्वार या विसर्ग की स्थिति जैसे प्रसंगों में गुरु-निर्णय बदल सकता है। हर आधे अक्षर को अलग एक मात्रा दे देना गलत है। चंद्रबिंदु से स्वर का अनुनासिक होना भी अपने-आप एक अतिरिक्त मात्रा नहीं जोड़ता।

“क” और “का” दोनों एक-एक उच्चरित वर्ण हैं; उनका सामान्य मात्राभार अलग है, 1 और 2। इसलिए आठ वर्णों का चरण अनिवार्यतः आठ मात्राओं का नहीं होगा। यही अंतर आगे मात्रिक और वर्णिक छंदों को समझने की कुंजी है।


मात्रिक और वर्णिक छंद में क्या अंतर है?

मात्रिक छंद में मात्रा-संख्या प्रधान आधार होती है। दोहा और चौपाई इसके परिचित उदाहरण हैं। यहाँ भी कुछ स्थानों पर लघु–गुरु या गति के विशेष नियम हो सकते हैं; कुल जोड़ ही सब कुछ नहीं है।

वर्णिक छंद में उच्चरित वर्णों की संख्या और, विशेषतः वर्णिक वृत्तों में, लघु–गुरु का निर्धारित क्रम महत्त्वपूर्ण होता है। किसी छंद के बारे में केवल “इतने वर्ण होते हैं” जानना पर्याप्त नहीं; उसका क्रम और यति भी सीखनी होती है।

दोनों को एक छोटे उदाहरण से समझें। दोहे के पहले चरण में 13 मात्राएँ चाहिए। यह जरूरी नहीं कि हर सही दोहे के उस चरण में वर्णों की संख्या भी बराबर हो। उधर वर्णिक वृत्त में वर्णों की संख्या बराबर रखकर भी गुरु–लघु का क्रम बिगाड़ दें तो छंद बिगड़ सकता है।


अनुष्टुप में शब्द और अर्थ का संग

कालिदास के रघुवंश का मंगलाचरण है:

वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥

कवि शब्द और अर्थ की तरह जुड़े पार्वती-परमेश्वर की वंदना करते हैं, शब्द और अर्थ की ठीक समझ के लिए। कविता की शुरुआत में ही भाषा के दोनों पक्ष साथ रख दिए गए हैं।

यह अनुष्टुप का उदाहरण है। इसके चार पादों में आठ-आठ वर्ण हैं। पहले पाद का उच्चरित विभाजन देखिए:

वा | गर् | था | वि | व | सम् | पृक् | तौ

आठ इकाइयाँ हुईं। लेकिन इनमें सब समान मात्राभार की नहीं हैं। और अनुष्टुप को केवल आठ की गिनती समझ लेना अधूरा है: उसके श्लोक-रूप में पादों के भीतर विशिष्ट स्थानों के लघु–गुरु और स्वीकृत विन्यास भी होते हैं।

इस उदाहरण का महत्व एक और है। पंक्तियों के अंत की तुक उसकी मूल पहचान नहीं बनाती।

छंद को केवल तुक से पहचानने वाला पाठक इसकी आंतरिक व्यवस्था समझने में असमर्थ हो सकता है।


छंद के अंग कौन-से हैं?

शब्दसीधा अर्थपढ़ते समय प्रश्न
चरण या पादछंद का नियत खंडकविता के हिस्से कहाँ बनते हैं?
मात्रालघु–गुरु से जुड़ा भारचरण में कितना मात्राभार है?
वर्णउच्चरित अक्षर-इकाईकितनी इकाइयाँ हैं, उनका क्रम क्या है?
यतिनियत या उपयुक्त विरामसाँस और अर्थ कहाँ ठहरते हैं?
गतिपाठ की चलने की रीतिशब्द किस चाल से आगे बढ़ते हैं?
तुकध्वनियों का साम्यकौन-सी अंतिम ध्वनि लौटती है?


‘लय’ इस सबका सुनने में अनुभव होने वाला प्रवाह है। छंद-विशेष उसका एक नियत ढाँचा देता है। हर सुरीली बात किसी नामित शास्त्रीय छंद में हो, यह जरूरी नहीं। और नामित छंद की गणना ठीक हो तो कविता सुंदर होगी ही, यह भी जरूरी नहीं है।


गण क्या हैं, और उन्हें क्यों सीखें?

गण तीन वर्णों के लघु–गुरु क्रम को नाम देते हैं। यह व्यवस्था विशेषतः वर्णिक छंदों के लंबे विन्यास को पहचानने में सहायक है। नीचे 1 लघु और 2 गुरु है:

गणक्रमध्वनि-विन्यास
यगण1–2–2लघु–गुरु–गुरु
मगण2–2–2गुरु–गुरु–गुरु
तगण2–2–1गुरु–गुरु–लघु
रगण2–1–2गुरु–लघु–गुरु
जगण1–2–1लघु–गुरु–लघु
भगण2–1–1गुरु–लघु–लघु
नगण1–1–1लघु–लघु–लघु
सगण1–1–2लघु–लघु–गुरु


इन नामों को याद करना पहला काम न बनाइए। पहले तीन-तीन इकाइयों की चाल सुनें। नाम बाद में उस पहचानी हुई चाल को याद रखने में मदद करेगा।

संगीत में किसी ताल का नाम जानना उपयोगी है; लेकिन ताल सुनाई ही न दे तो नाम अकेला क्या करेगा? छंद में भी ज्ञान और श्रवण साथ चलते हैं।


हिंदी के कुछ छंद कैसे अलग हैं?

यह तालिका पहचान का प्रारंभिक आधार देती है। इन्हें संपूर्ण रचना-नियम न मानें; संबंधित छंद के चरणांत, यति और गति-विधान अलग से पढ़ने होते हैं।

छंदमुख्य मात्रिक आधारप्रारंभिक पहचान
दोहा13–11–13–11विषम और सम चरण अलग
सोरठा11–13–11–13दोहे से उलटा मात्रा-क्रम
चौपाई16–16–16–16समान विस्तार वाले चरण
रोलाप्रत्येक चरण 24; सामान्य यति 11–1324 मात्रा का चरण और उसका आंतरिक विराम
बरवै12–7–12–7लंबे के बाद बहुत छोटा चरण
हरिगीतिकाप्रत्येक चरण 28; सामान्य यति 16–12अधिक विस्तृत चरण


रोला और सोरठा की तुलना करना उपयोगी है। दोनों में 11 और 13 का संबंध दिख सकता है, लेकिन चरण की परिभाषा, तुक और अन्य विधान अलग हैं। संख्याओं की सतही समानता से छंदों को एक न कर दीजिए।

सममात्रिक में चरणों की मात्रा समान होती है; अर्धसम में पहला-तीसरा और दूसरा-चौथा समान होते हैं। विषम या मिश्रित रचनाओं में अन्य विन्यास मिलते हैं। कुंडलिया में दोहा और रोला का संयोजन होता है। परंपरा केवल एक लय दोहराती नहीं; वह लयों को जोड़ने की कला भी विकसित करती है।


क्या नियम कविता की स्वतंत्रता घटाते हैं?

कभी-कभी घटा सकते हैं, यदि कवि अर्थ को नियम का मजदूर बना दे। पंक्ति में कुछ कहने को नहीं, पर मात्रा पूरी करने के लिए शब्द भरते जाएँ, तो छंद सुनाई देगा और कविता अनुपस्थित होगी।

लेकिन सीमा चयन भी सिखाती है। मान लीजिए, युवा कवि लिखता है: “तुमसे बात करके आज मुझे कुछ हल्का महसूस हुआ।” अब उससे कहिए कि इस अनुभव को सघन करे। वह पूछेगा: हल्कापन कहाँ अनुभव हुआ? छाती में? कमरे में? रात में? बातचीत ने किस वस्तु को बदला?

यहीं कविता का अभ्यास शुरू होता है। मात्रा की सीमा उसे अनुभव के अधिक स्पष्ट बिंब तक ले जा सकती है। नियम तब उपयोगी हुआ जब उसने अर्थ को साफ किया, केवल शब्द कम नहीं किए।


मुक्तछंद में लय होती है?

हो सकती है, और अच्छी मुक्तछंद कविता में उस पर गंभीर काम होता है। मुक्तछंद में किसी एक पारंपरिक मात्रा या वर्ण-योजना का समान रूप से निर्वाह आवश्यक नहीं। लेकिन पंक्ति कहाँ टूटेगी, शब्द कहाँ दोहराए जाएँगे और विराम किस अर्थ को खोलेगा, ये निर्णय फिर भी महत्त्वपूर्ण हैं।

यह मौलिक उदाहरण पढ़िए:

फोन मेज़ पर रख दिया।
कमरा चुप नहीं हुआ
पहली बार
अपनी साँस सुनाई दी।

इसे दोहा न कहें; इसकी कोई 13–11 योजना प्रस्तुत नहीं की गई है। लेकिन “पहली बार” को अलग रखने से अपेक्षाएँ ठहर जाती हैं। आखिरी पंक्ति तक पहुँचते-पहुँचते बाहरी मौन भीतर की आवाज़ में बदलता है। पंक्ति-विन्यास यहाँ अर्थ का हिस्सा है।

मुक्तछंद और अतुकांत भी समानार्थी नहीं हैं। कविता तुक के बिना निर्धारित छंद में हो सकती है; मुक्तछंद में कभी तुक भी आ सकती है। इस भेद पर रचनायें का एक और ब्लॉग, तुकांत और अतुकांत कविता में अंतर आगे पढ़ें।


हिंदी छंद, उर्दू बह्र और इज़ाफ़त का संबंध

उर्दू ग़ज़ल में मीटर और बह्र पढ़ते हुए अरकान और तक़्तीअ से परिचय होगा। हिंदी के गण और अरूज़ के अरकान को एक ही चीज़ के अलग-अलग नाम न मानें। ध्वनि-संरचना की चिंता दोनों में है, लेकिन उनके वर्गीकरण और स्वीकृत परिवर्तनों के नियम अलग हैं।

इसीलिए इज़ाफ़त—उर्दू ग़ज़लों की कारीगरी इस चर्चा की उपयोगी अगली कड़ी है। “दिल” और “दिल-ए-नादाँ” में शब्द-संबंध के साथ उच्चारण भी बदलता है। व्याकरण, अर्थ और ध्वनि के काम अलग-अलग पहचाने बिना लय की जाँच अधूरी होगी।


छंद पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या छंद और तुक एक हैं?

नहीं। तुक ध्वनि-साम्य है; छंद कविता की आंतरिक संरचना का विधान है।

क्या मात्रा जोड़ लेने से छंद सही हो जाता है?

नहीं। चरण-विन्यास, यति और संबंधित लघु–गुरु तथा गति के नियम भी जाँचे जाते हैं।

क्या नए विषय पुराने छंदों में लिख सकते हैं?

हाँ। छंद समय की विषय-सूची तय नहीं करता। डिजिटल जीवन, प्रवास, रिश्ते और पर्यावरण जैसे विषय भी शामिल किए जा सकते हैं।

क्या मुक्तछंद आसान है?

उसे लिखना शुरू करना आसान हो सकता है; प्रभावी कविता बनाना अलग चुनौती है। वहाँ तैयार मात्रा-योजना का सहारा कम मिलता है।

Cancel reply
Add a comment
Add a comment

Offers

Best Deal

Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit, sed do eiusmod tempor incididunt ut labore et dolore magna aliqua

Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit, sed do eiusmod tempor incididunt ut labore et dolore magna aliqua. Ut enim ad minim veniam, quis nostrud exercitation ullamco laboris nisi ut aliquip ex ea commodo consequat.

whatsapp