साहित्य, मीडिया और पाठक का बदलता रिश्ता

साहित्य, मीडिया और पाठक का बदलता रिश्ता

आपने अब तक पढ़ा, कथाकार, उपन्यासकार और पत्रकार में अंतर, अब आगे चलते हैं...


तो हिंदी में पत्रकारों का लेखक बनना कोई बिल्कुल नई घटना नहीं है। नई बात इसकी गति, दृश्यता और बाज़ार है।

आज कोई पत्रकार टीवी पर दिखता है, यूट्यूब पर बोलता है, अख़बार या डिजिटल पोर्टल में लिखता है, सोशल मीडिया पर बहस करता है, पॉडकास्ट में आता है, फिर उसी अनुभव को किताब में बदल देता है। पाठक उसे पहले से पहचानता है, प्रकाशक को बाज़ार दिखता है, और किताब को तुरंत एक सार्वजनिक चेहरा मिल जाता है।

यहीं से सवाल उठता है, क्या पत्रकार इसलिए लेखक बन रहे हैं कि उनके पास कहने को बहुत कुछ है? या इसलिए कि मीडिया की दृश्यता ने उन्हें लेखक बना दिया है? क्या यह हिंदी गद्य के लिए अच्छा है? या इससे साहित्य में जल्दबाज़ी, सनसनी और सतहीपन बढ़ रहा है?

इसका सीधा उत्तर नहीं है। पत्रकारिता ने हिंदी साहित्य को कई बार ऊर्जा दी है। लेकिन उसने कई बार भाषा को जल्दबाज़, निष्कर्षप्रिय और तात्कालिक भी बनाया है।


पहले यह भ्रम दूर कर लें कि पत्रकार का लेखक बनना कोई आधुनिक विचलन है। हिंदी साहित्य का बड़ा हिस्सा पत्र-पत्रिकाओं, संपादन और सार्वजनिक बहसों से बना है।

भारतेंदु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिंदी साहित्य और हिंदी पत्रकारिता दोनों के विकास में महत्त्वपूर्ण माना जाता है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में उनकी भूमिका केवल कवि या नाटककार की नहीं थी; वे हिंदी सार्वजनिकता के निर्माण से जुड़े व्यक्तित्व थे। हिंदी का आधुनिक गद्य, राष्ट्र, समाज-सुधार, भाषा-विवाद और पत्रकारिता, ये सब उनके समय में एक-दूसरे से अलग नहीं थे।

प्रेमचंद को भी केवल कथाकार और उपन्यासकार कह देना अधूरा होगा। उन्होंने 1930 में हंस पत्रिका शुरू की। हंस को हिंदी की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में गिना जाता है, और उसके शुरुआती उद्देश्य साहित्य को सामाजिक-राजनीतिक चेतना से जोड़ने वाले थे।

अज्ञेय ने भी साहित्य और पत्रकारिता के बीच पुल बनाया। दिनमान जैसी पत्रिका ने हिंदी पत्रकारिता को ऐसी भाषा दी जिसमें राजनीति, समाज, साहित्य, कला और विचार एक साथ आ सकते थे। 1965 में शुरू हुई दिनमान को अज्ञेय से जोड़ा जाता है, और बाद में रघुवीर सहाय जैसे साहित्यकार-पत्रकारों ने उसे आगे बढ़ाया।

रघुवीर सहाय स्वयं कवि, कथाकार, आलोचक, अनुवादक और पत्रकार थे। वे 1969 से 1982 तक दिनमान के प्रधान संपादक रहे और 1984 में उन्हें लोग भूल गये हैं के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला।

इसलिए बात यह नहीं कि पत्रकार साहित्य में क्यों आ गए। बात यह है कि आज वे किस तरह आ रहे हैं, किस तैयारी से आ रहे हैं, और उनके आने से हिंदी भाषा-साहित्य को क्या मिल रहा है या क्या छिन रहा है।


पत्रकार के पास जीवन की कच्ची सामग्री अधिक होती है

पत्रकार रोज़ उस भारत से टकराता है जिसे कई लेखक दूर से देखते हैं।


वह चुनावी मैदान में जाता है। अदालत की रिपोर्टिंग करता है। किसान आंदोलन, बेरोज़गारी, हिंसा, दंगे, संसद, विश्वविद्यालय, अपराध, प्रशासन, अस्पताल, पंचायत, कॉरपोरेट और मीडिया-उद्योग, इन सबके बीच उसका काम चलता है। वह उन जगहों पर पहुँचता है जहाँ साहित्यकार कल्पना से पहुँचता है, पत्रकार कई बार शरीर से पहुँचता है।

इसलिए पत्रकार के पास सामग्री बहुत होती है। चेहरे, आवाज़ें, संवाद, तनाव, तथ्य, दस्तावेज़, अफवाहें, आधे सच, छिपे हुए सच, सत्ता की भाषा, जनता की भाषा, सब उसके पास जमा होता रहता है।

किसी कथाकार को जीवन-सामग्री खोजनी पड़ती है; पत्रकार अक्सर जीवन-सामग्री के ढेर के बीच खड़ा होता है।

लेकिन यही सबसे बड़ा भ्रम भी है। सामग्री होना साहित्य होना नहीं है।

मान लीजिए एक रिपोर्टर ने एक दंगा देखा। यह अनुभव गंभीर है। पर क्या वह दंगे पर उपन्यास लिख सकता है? हाँ, लिख सकता है। लेकिन उसे दंगे की खबर से आगे जाना होगा। उसे यह समझना होगा कि हिंसा के बाद घरों में कैसी चुप्पी बचती है, बच्चों की भाषा कैसे बदलती है, पड़ोस किस तरह टूटता है, स्त्री की स्मृति में डर कैसे जमा रहता है, और शहर अपने अपराध को कैसे भूलता है।

पत्रकारिता घटना को पकड़ती है। साहित्य घटना के बाद मनुष्य में बची हुई टूटन, उस अनुभव, उस भावना को पकड़ता है।


डिजिटल युग ने पत्रकार को लेखक बनने के लिए नया मंच दिया

पहले पत्रकार का सार्वजनिक चेहरा सीमित था। अख़बार में नाम छपता था, पत्रिका में कॉलम आता था, रेडियो या टीवी पर कुछ लोग पहचाने जाते थे। अब पत्रकार का चेहरा बहु-माध्यमीय है।

वह टीवी पर भी है, यूट्यूब पर भी, ट्विटर/X पर भी, पॉडकास्ट में भी, न्यूज़लेटर में भी, इंस्टाग्राम रील में भी, लाइव स्ट्रीम में भी।


भारत में समाचार उपभोग तेजी से डिजिटल माध्यमों की ओर गया है। Reuters Institute की Digital News Report 2024 के अनुसार, भारत में उत्तरदाताओं के बीच YouTube और WhatsApp समाचार पाने के प्रमुख माध्यमों में हैं; रिपोर्ट में YouTube का साप्ताहिक समाचार उपयोग 54% और WhatsApp का 48% बताया गया।

इसका अर्थ है कि पत्रकार अब केवल रिपोर्ट नहीं करता; वह एक सार्वजनिक व्यक्तित्व भी है। जब उसका चेहरा, आवाज़ और विचार पाठक/दर्शक के मन में जगह बना लेते हैं, तो किताब उसके लिए स्वाभाविक अगला कदम बन जाती है।


दूसरा बड़ा कारण भारतीय भाषाओं का डिजिटल विस्तार है। IAMAI-Kantar की Internet in India 2024 रिपोर्ट के अनुसार 2024 में भारत में 870 मिलियन इंटरनेट उपयोगकर्ताओं ने Indic languages में इंटरनेट एक्सेस किया, और शहरी भारत के 57% इंटरनेट उपयोगकर्ताओं ने Indic language content को प्राथमिकता बताई।

इसका सीधा असर हिंदी पर पड़ा है। हिंदी में समाचार, व्याख्या, राजनीतिक टिप्पणी, सामाजिक विश्लेषण और नॉन-फिक्शन पढ़ने-सुनने वाला नया डिजिटल पाठक बना है। यह पाठक हमेशा पारंपरिक साहित्यिक पत्रिका से नहीं आता। वह यूट्यूब से आता है, न्यूज़ पोर्टल से आता है, सोशल मीडिया बहस से आता है। फिर वह उसी पत्रकार की किताब भी खरीद सकता है।

यानी पत्रकार के लेखक बनने के पीछे केवल लेखक की महत्वाकांक्षा नहीं है; पाठक की बदलती आदतें भी हैं।


मीडिया की दृश्यता और प्रकाशन बाज़ार का गठजोड़

एक प्रकाशक किसी भी लेखक में तीन चीजें देखता हैं, विषय, लेखन और पाठक तक पहुँच। पत्रकार के पास अक्सर ये तीनों कुछ न कुछ रूप में मौजूद होते हैं।


विषय उसके पास होते हैं, क्योंकि वह समकालीन मुद्दों से जुड़ा है।

लेखन का अभ्यास होता है, क्योंकि वह रोज़ लिखता-बोलता है।

पाठक तक पहुँच होती है, क्योंकि वह मीडिया या डिजिटल मंचों पर पहचाना जाता है।


इसलिए प्रकाशक के लिए पत्रकार एक अपेक्षाकृत सुरक्षित दाँव बन जाता है। किसी अज्ञात लेखक के पहले उपन्यास की तुलना में किसी पहचाने हुए पत्रकार की राजनीतिक, सामाजिक या संस्मरणात्मक किताब बेचना आसान हो सकता है।

यहाँ बाज़ार की भूमिका साफ दिखाई देती है। जिस पत्रकार के पास लाखों दर्शक या पाठक हैं, वह प्रकाशन के लिए “लेखक” ही नहीं, “डिस्ट्रिब्यूशन चैनल” भी है। वह अपने इंटरव्यू, पोस्ट, वीडियो और मंचीय उपस्थिति से किताब को आगे बढ़ा सकता है।

यह अच्छी बात भी हो सकती है। इससे गंभीर नॉन-फिक्शन को पाठक मिलते हैं।

लेकिन खतरा भी है।

कई बार किताब की गुणवत्ता से अधिक लेखक की दृश्यता बिकती है। पाठक नाम खरीदता है, किताब नहीं।

यहीं हिंदी पाठक को सावधान होना होगा।


पत्रकारिता से हिंदी गद्य को क्या मिला?

अब बात सकारात्मक पक्ष की।

पत्रकारिता ने हिंदी गद्य को कई महत्त्वपूर्ण चीजें दी हैं।


पहली, सार्वजनिकता

पत्रकारिता ने हिंदी को घर और कविता से निकालकर सड़क, संसद, अदालत, चुनाव, विश्वविद्यालय, बाजार और प्रशासन तक पहुँचाया। इससे हिंदी गद्य में सामाजिक तनाव आया। भाषा केवल भावुकता की जगह नहीं रही; वह सार्वजनिक बहस की भाषा बनी।

दूसरी, स्पष्टता

अच्छी पत्रकारिता में भाषा साफ होती है। बात को उलझाया नहीं जाता। हिंदी साहित्य की एक समस्या लंबे समय तक यह रही कि उसका एक हिस्सा अत्यधिक अलंकारिक या अकादमिक बोझ से भर गया। पत्रकारिता ने वाक्य को छोटा, चुस्त और पठनीय बनाया।

तीसरी, समकालीनता

कई साहित्यिक लेखक समाज को प्रतीक और स्मृति में देखते हैं। पत्रकार वर्तमान की धड़कन लाता है। बेरोज़गारी, चुनाव, सांप्रदायिकता, पलायन, डिजिटल निगरानी, मीडिया-ट्रायल, भाषा-राजनीति—इन मुद्दों को पत्रकार जल्दी पकड़ता है।

चौथी, दस्तावेज़ी दृष्टि

रिपोर्टाज, संस्मरण और राजनीतिक नॉन-फिक्शन में पत्रकारिता का योगदान बड़ा है। अगर लेखक ईमानदार है, तो उसका लेखन भविष्य के इतिहासकार और पाठकों के लिए दस्तावेज़ बन सकता है।

पाँचवी, जीवन की खुरदरी आवाज़

पत्रकार अक्सर सजावटी भाषा से दूर रहता है। उसके पास मैदान की आवाज़ होती है। यह आवाज़ साहित्य को कृत्रिम होने से बचा सकती है।


पत्रकारिता से साहित्य को क्या खतरा है?

अब कठिन हिस्सा।

पत्रकारिता से आए लेखन में कुछ गंभीर खतरे भी होते हैं।

पहला खतरा: तात्कालिकता को गहराई समझ लेना

जो आज बहुत बड़ा मुद्दा लगता है, वह पाँच साल बाद मामूली नोट बन सकता है। साहित्य को समय की परीक्षा झेलनी होती है। पत्रकार अगर हर वर्तमान घटना को “ऐतिहासिक” मान ले, तो लेखन जल्दी पुराना हो जाता है।

दूसरा खतरा: सनसनी

पत्रकारिता का एक हिस्सा ध्यान खींचने की कला पर चलता है। शीर्षक, खुलासा, विवाद, बहस, ये सब जरूरी हो सकते हैं। लेकिन साहित्य में सनसनी जल्दी थकाती है। पाठक पहले चौंकता है, फिर खालीपन महसूस करता है।

तीसरा खतरा: पात्रों को केस बना देना

पत्रकार अक्सर व्यक्ति को “मामले” के रूप में देखता है, पीड़ित, आरोपी, नेता, अधिकारी, गवाह, स्रोत। साहित्य में व्यक्ति को मनुष्य बनना पड़ता है। वह केवल जाति, धर्म, वर्ग, विचारधारा या घटना का प्रतिनिधि नहीं रह सकता।

चौथा खतरा: निष्कर्ष की जल्दबाज़ी

पत्रकारिता में कई बार निष्कर्ष देना पड़ता है। साहित्य में कई बार अच्छे लेखक निष्कर्ष रोक लेते हैं। वे पाठक को असुविधा में छोड़ते हैं। पत्रकार-लेखक अगर हर अध्याय के अंत में फैसला सुनाता है, तो कथा या नॉन-फिक्शन उपदेश बन जाता है।

पाँचवाँ खतरा: भाषा का समाचारकरण

हिंदी साहित्य में आज कई जगह समाचार-भाषा का प्रभाव दिखता है—छोटे वाक्य, तेज़ दावे, तुरंत निर्णय, नारे जैसी संरचना। इससे पठनीयता आती है, पर अगर यही एकमात्र शैली बन जाए तो भाषा की गहराई घटती है।


हिंदी में पत्रकार लेखक अधिक क्यों दिख रहे हैं?

अब मूल प्रश्न पर आते हैं। पिछले कुछ वर्षों में पत्रकार लेखक अधिक क्यों दिख रहे हैं?

1. उनके पास अनुभव की पूँजी है

पत्रकार अपने पेशे में समाज का कच्चा माल जमा करता है। वह ऐसी कहानियों, व्यक्तियों और घटनाओं से मिलता है जो किताब का आधार बन सकती हैं।

2. उनके पास सार्वजनिक पहचान है

डिजिटल मीडिया ने पत्रकारों को व्यक्तिगत ब्रांड बना दिया है। उनका चेहरा और भाषा पाठक पहले से जानता है।

3. हिंदी में नॉन-फिक्शन की माँग बढ़ी है

हिंदी पाठक अब केवल कहानी-उपन्यास नहीं पढ़ना चाहता। वह राजनीति, इतिहास, समाज, विचार, संस्मरण, यात्रा, अपराध, मीडिया और समकालीन भारत पर भी किताबें चाहता है।

4. प्रकाशकों को बिक्री की संभावना दिखती है

पत्रकार के पास विषय और दर्शक दोनों होते हैं। इसलिए प्रकाशक उसे जल्दी स्वीकार कर लेते हैं।

5. न्यूज़रूम की अस्थिरता

मीडिया उद्योग में अस्थिरता, वैचारिक दबाव, नौकरी की अनिश्चितता और डिजिटल बदलाव ने कई पत्रकारों को स्वतंत्र लेखन, किताब, न्यूज़लेटर और दीर्घ-लेखन की ओर भी धकेला है।

6. लंबे लेखन की भूख

कई पत्रकारों को महसूस होता है कि खबर या टीवी बहस में वे पूरी बात नहीं कह पाते। किताब उन्हें विस्तार देती है। वहाँ वे संदर्भ, स्मृति और निजी अनुभव जोड़ सकते हैं।

7. सोशल मीडिया ने पाठक से सीधा रिश्ता दिया

अब पत्रकार को पाठक तक पहुँचने के लिए केवल अख़बार या चैनल पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। वह अपनी किताब का पाठक खुद बना सकता है।


क्या पत्रकार साहित्यकार से अधिक प्रामाणिक होता है?

यह सवाल अक्सर पूछा जाता है। क्योंकि पत्रकार मैदान में होता है, क्या वह लेखक से अधिक प्रामाणिक है?

जरूरी नहीं।

मैदान में होना अनुभव देता है, पर दृष्टि नहीं।

पुस्तकालय में होना ज्ञान देता है, पर जीवन नहीं।

कथा लिखना संवेदना देता है, पर तथ्य की गारंटी नहीं।


अच्छे लेखक को तीनों चाहिए, मैदान, अध्ययन और संवेदना।

पत्रकार अगर केवल “मैंने देखा है” पर टिक जाए, तो वह सीमित हो जाएगा। देखने के बाद समझना भी पड़ता है। समझने के बाद भाषा में बदलना पड़ता है। भाषा में बदलते समय नैतिकता बचानी पड़ती है।

कई बार जो व्यक्ति घटना से दूर है, वह अधिक गहरी रचना लिख सकता है, क्योंकि उसके पास दूरी है। कई बार जो व्यक्ति घटना के बीच था, वह केवल शोर लिखता है, क्योंकि उसके भीतर अभी दूरी बनी ही नहीं।

इसलिए पत्रकार का अनुभव महत्त्वपूर्ण है, पर अंतिम प्रमाण नहीं।


पत्रकार को साहित्य में आते समय क्या करना चाहिए?

पत्रकार अगर कथाकार, उपन्यासकार या गंभीर नॉन-फिक्शन लेखक बनना चाहता है, तो उसे कुछ बातें याद रखनी चाहिए।

उसे धीमा होना सीखना होगा। न्यूज़रूम की गति किताब में हमेशा काम नहीं करती। किताब को साँस चाहिए।

उसे पात्रों को स्रोत की तरह नहीं, मनुष्य की तरह देखना होगा। कोई किसान केवल “कृषि संकट” नहीं है। कोई स्त्री केवल “पीड़िता” नहीं है। कोई मुसलमान केवल “अल्पसंख्यक प्रश्न” नहीं है। कोई दलित केवल “सामाजिक न्याय का केस” नहीं है। साहित्य में मनुष्य अपनी जटिलता के साथ आता है।

उसे भाषा के बयान से बचाना होगा। पत्रकारिता में बयान जरूरी है; साहित्य में संवाद, चुप्पी, दृश्य, स्मृति और प्रतीक भी उतने ही जरूरी हैं।

उसे अपने अहंकार से सावधान रहना होगा। “मैंने सत्ता देखी है”, “मैंने युद्ध देखा है”, “मैंने चुनाव समझे हैं”, यह सब उपयोगी है, पर लेखक को अपने अनुभव पर भी संदेह करना चाहिए।

उसे पढ़ना होगा। केवल रिपोर्टिंग से लेखक नहीं बना जा सकता। उसे प्रेमचंद, रेणु, कृष्णा सोबती, भीष्म साहनी, निर्मल वर्मा, मन्नू भंडारी, श्रीलाल शुक्ल, उदय प्रकाश, गीतांजलि श्री, विनोद कुमार शुक्ल, असगर वजाहत, मृदुला गर्ग, और भारतीय भाषाओं के लेखकों को पढ़ना होगा। पत्रकार को यह समझना होगा कि साहित्य में भाषा कितनी तरह से काम करती है।


पत्रकार-लेखक को कुछ चीजों से खास बचना चाहिए।

उसे अपनी रिपोर्टिंग डायरी को जस-का-तस उपन्यास नहीं मान लेना चाहिए।

उसे असली लोगों की त्रासदी को “कंटेंट” नहीं बनाना चाहिए। पीड़ा का सौंदर्यीकरण बहुत खतरनाक चीज है।

उसे हर पात्र के मुँह में अपना राजनीतिक विचार नहीं डालना चाहिए।

उसे यह नहीं मानना चाहिए कि लोकप्रियता साहित्यिक गुणवत्ता का प्रमाण है।

उसे यह भी नहीं भूलना चाहिए कि किताब में तथ्यात्मक गलती खबर से अधिक लंबी उम्र पाती है। खबर अगले दिन पुरानी हो सकती है, किताब सालों तक रहती है।

और सबसे जरूरी—उसे यह नहीं सोचना चाहिए कि पत्रकार होने से वह स्वतः लेखक हो गया। लेखक होना हर विधा में फिर से कमाना पड़ता है।


भाषा को लाभ भी, क्षति भी

पत्रकारों के लेखक बनने से हिंदी को कुछ लाभ हुए हैं। हिंदी में समकालीनता आई है। राजनीति और समाज पर नॉन-फिक्शन का पाठक बढ़ा है। भाषा अधिक सीधी हुई है। कई मुद्दे साहित्यिक और सार्वजनिक चर्चा में आए हैं।

लेकिन क्षति भी हुई है। कई बार गद्य में धैर्य घटा है। गंभीर साहित्यिक भाषा की जगह त्वरित टिप्पणी ने ले ली है। विचार की जगह पोज़िशनिंग आ गई है। जटिल प्रश्नों को टीवी बहस की तरह दो खेमों में बाँट देने की आदत बढ़ी है। कई बार लेखक “समझाने” से अधिक “प्रभावित” करना चाहता है।

भाषा तब कमजोर होती है जब वह सोचने की जगह केवल प्रतिक्रिया पैदा करे।

हिंदी को ऐसी पत्रकारिता चाहिए जो साहित्य से गहराई सीखे। और ऐसा साहित्य चाहिए जो पत्रकारिता से जीवन की धूल सीखे।


Rachnaye के संदर्भ में यह प्रश्न क्यों जरूरी है?

Rachnaye जैसे मंच के लिए यह विषय बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि भारतीय भाषाओं का भविष्य केवल महान लेखकों की स्मृति से नहीं बनेगा। वह अच्छे पाठकों, ईमानदार लेखकों, जिम्मेदार प्रकाशकों और विविध लेखकीय स्वभावों के संवाद से बनेगा।

आज पाठक को केवल यह नहीं जानना कि किताब किसने लिखी। उसे यह भी जानना है कि लेखक कहाँ से बोल रहा है—न्यूज़रूम से, विश्वविद्यालय से, गाँव से, आंदोलन से, स्मृति से, या कल्पना से। हर जगह की अपनी शक्ति है, अपनी सीमा है।

Rachnaye का काम भारतीय भाषा के पाठक को यह विकल्प देना है कि वह केवल चर्चित नामों तक सीमित न रहे। वह अलग-अलग भाषाओं, विधाओं, लेखकों और प्रकाशकों के बीच अपना रास्ता खोज सके।

जब पाठक विवेक से पढ़ता है, तब भाषा बचती है।


पत्रकार लेखक बने, पर लेखक की तरह

हिंदी में पत्रकारों का लेखक बनना न तो संकट है, न अपने आप उपलब्धि। यह एक संभावना है।

पत्रकार के पास समय की धूल है। उसने सड़क देखी है, सत्ता देखी है, जनता देखी है, झूठ और सच की लड़ाई देखी है। यह सब साहित्य के लिए बहुत मूल्यवान है। लेकिन किताब लिखते समय उसे यह समझना होगा कि खबर, कॉलम, टीवी बहस और साहित्य चार अलग चीजें हैं।

पत्रकार जब अपने अनुभव को अध्ययन, भाषा, संवेदना और आत्म-संशय से गुजारता है, तब वह अच्छा लेखक बन सकता है।

जब वह केवल अपनी दृश्यता, विचारधारा या सनसनी को किताब बना देता है, तब वह भाषा को क्षति पहुँचाता है।

हिंदी को पत्रकारों से डरने की जरूरत नहीं है। हिंदी को कमजोर लेखन से डरने की जरूरत है, चाहे वह पत्रकार लिखे, शिक्षक लिखे, कथाकार लिखे या कोई प्रसिद्ध चेहरा।

अच्छा लेखक वही है जो अपने समय को पकड़ता है, लेकिन समय की जल्दबाज़ी में फँसता नहीं।

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