शिक्षक लेखक क्यों बनते हैं?
May 05, 2026
आपने अब तक पढ़ा, कथाकार, उपन्यासकार और पत्रकार में अंतर, और हिंदी में पत्रकार लेखक क्यों बन रहे हैं? , अब और आगे चलते हैं…
हिंदी में एक परिचित दृश्य है। कॉलेज या उच्च विद्यालय के हिंदी विभाग में शिक्षक हैं। वे कविता पढ़ाते हैं, कहानी पढ़ाते हैं, आलोचना पढ़ाते हैं, शोध-निर्देशन करते हैं। धीरे-धीरे उनके नाम से लेख छपने लगते हैं। फिर शोध-पत्र, फिर संपादित किताब, फिर आलोचना-पुस्तक, फिर कभी-कभी कहानी-संग्रह या उपन्यास भी।
बाहर से देखने पर यह स्वाभाविक लगता है। जो साहित्य पढ़ाता है, वह साहित्य लिखे, इसमें आश्चर्य क्या है?
लेकिन यहाँ प्रश्न थोड़ा असुविधाजनक है। क्या शिक्षक इसलिए लिखते हैं कि उनके भीतर सचमुच रचना या शोध की बेचैनी है? या इसलिए कि विश्वविद्यालयी व्यवस्था ने लिखना नौकरी की शर्त बना दिया है? क्या यह लेखन हिंदी भाषा और साहित्य को संबल देता है? या कई बार कमजोर, बोझिल, औपचारिक और केवल अंक-प्रधान लेखन से भाषा को नुकसान पहुँचाता है?
इसका उत्तर एकतरफा नहीं हो सकता। हिंदी साहित्य को शिक्षकों ने बहुत कुछ दिया है। आलोचना, साहित्य-इतिहास, पाठ-संपादन, लोक-साहित्य, भाषा-विज्ञान, स्त्रीवादी अध्ययन, दलित साहित्य की गंभीर चर्चा, इनमें विश्वविद्यालयी विद्वानों की बड़ी भूमिका रही है। लेकिन उसी अकादमिक व्यवस्था ने कई बार लेखन को “विचार” से हटाकर “प्रमाणपत्र” में भी बदल दिया।
शिक्षक लेखक क्यों बनते हैं?
सबसे पहले यह समझें कि शिक्षक का लेखक बनना अस्वाभाविक नहीं है। शिक्षक रोज़ भाषा और साहित्य के बीच काम करता है। वह पाठों के साथ रहता है। वह कविता की पंक्ति, कहानी की संरचना, आलोचना की बहस, साहित्यिक इतिहास, लेखक-जीवन और सामाजिक संदर्भों पर रोज़ विचार करता है।
उसके पास समय भी हो सकता है, पुस्तकालय भी, विद्यार्थियों के प्रश्न भी, और पाठों को बार-बार पढ़ने का अवसर भी। यह सब मिलकर एक गंभीर लेखक या आलोचक बना सकता है।
लेकिन शिक्षक-लेखन के कम से कम तीन स्रोत होते हैं।
पहला, रचनात्मक स्रोत।
कुछ शिक्षक सचमुच भीतर से कवि, कथाकार या उपन्यासकार होते हैं। अध्यापन उनका पेशा है, लेखन उनका स्वभाव।
दूसरा, शोध-स्रोत।
कुछ शिक्षक आलोचक, इतिहासकार या शोधकर्ता होते हैं। वे साहित्य को व्यवस्थित रूप से पढ़ते, समझते और व्याख्यायित करते हैं।
तीसरा, प्रशासनिक स्रोत।
कुछ लेखन केवल पदोन्नति, सेवा-शर्त, API स्कोर, CAS, शोध-पत्र संख्या और अकादमिक फाइल पूरी करने के दबाव से जन्म लेता है।
समस्या तीसरे स्रोत से शुरू होती है। क्योंकि जब लिखना विचार की जरूरत नहीं, फाइल की जरूरत बन जाती है, तब भाषा पर बोझ बढ़ता है।
UGC, API, PBAS और पदोन्नति की पृष्ठभूमि
भारत में विश्वविद्यालय और कॉलेज शिक्षकों की नियुक्ति तथा पदोन्नति कई दशकों से नियमबद्ध ढाँचे में होती रही है। University Grants Commission यानी UGC उच्च शिक्षा में मानकों, योग्यताओं और सेवा-शर्तों से संबंधित विनियम बनाती है। 2010 के UGC Regulations में Career Advancement Scheme यानी CAS के तहत शिक्षकों के लिए Academic Performance Indicators, यानी API, और Performance Based Appraisal System, यानी PBAS, जैसे ढाँचे महत्त्वपूर्ण थे। इन मानदंडों में शिक्षण, शोध, प्रकाशन और अकादमिक योगदान को अंक-आधारित रूप में देखा गया।
2018 के UGC Regulations में भी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में शिक्षकों की नियुक्ति, न्यूनतम योग्यता और Career Advancement Scheme से जुड़ी व्यवस्था दी गई। इनमें शोध-प्रकाशन, शोध-निर्देशन, अकादमिक योगदान और अन्य मानदंडों की भूमिका बनी रही।
नियमों की मंशा खराब नहीं थी। उद्देश्य था कि शिक्षक केवल कक्षा लेकर न रह जाएँ, बल्कि शोध करें, नए ज्ञान का निर्माण करें, अकादमिक संवाद में हिस्सा लें और विद्यार्थियों को ताजा बौद्धिक वातावरण दें।
कागज़ पर यह बहुत अच्छा विचार है।
लेकिन भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था में जब कोई अच्छी चीज़ अंक-तालिका में बदलती है, तो उसका एक अनौपचारिक बाज़ार भी पैदा हो जाता है। यही हुआ। शोध-पत्र छापने हैं। किताबें दिखानी हैं। सेमिनार में पेपर पढ़ना है। प्रमाणपत्र चाहिए। संपादित पुस्तक में अध्याय चाहिए। और यह सब समय पर चाहिए, क्योंकि पदोन्नति की फाइल रुकी है।
यहाँ से “ज्ञान-सृजन” और “प्रकाशन-संग्रह” के बीच का फर्क धुंधला होने लगता है।
तो क्या पदोन्नति के लिए लिखना गलत है?
सीधा उत्तर: नहीं, अपने आप गलत नहीं है।
अगर कोई शिक्षक पदोन्नति की प्रक्रिया में अच्छा शोध करता है, गंभीर लेख लिखता है, दुर्लभ पाठों का संपादन करता है, लोक-साहित्य का संकलन करता है, विद्यार्थियों के लिए उपयोगी आलोचना लिखता है, तो इससे भाषा और साहित्य को लाभ ही होता है। संस्थागत प्रोत्साहन कई बार अच्छे काम को गति देता है।
दिक्कत तब है जब प्रेरणा केवल “प्रकाशन दिखाना” रह जाए।
मान लीजिए किसी शिक्षक ने तुलसीदास पर शोध-पत्र लिखा। अगर वह तुलसी की भाषा, समाज, भक्ति, काव्य-संरचना, लोक-स्मृति और आधुनिक पाठक के बीच कोई नया संबंध दिखाता है, तो वह उपयोगी है। लेकिन अगर वह पाँच पुराने लेखों को जोड़कर कठिन शब्दावली में “तुलसी का समग्र मूल्यांकन” जैसा शीर्षक दे देता है, तो यह न तुलसी की मदद करता है, न हिंदी की।
पदोन्नति के लिए लिखना समस्या नहीं है। पदोन्नति के लिए कमजोर लिखना समस्या है।
यह फर्क समझना जरूरी है।
शिक्षक-लेखन ने हिंदी को क्या दिया?
अब न्यायपूर्वक देखें। हिंदी साहित्य में शिक्षकों और विश्वविद्यालयी विद्वानों की भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता।
हिंदी आलोचना की बड़ी परंपरा विश्वविद्यालयों से जुड़ी रही है। रामचंद्र शुक्ल का हिंदी साहित्य का इतिहास आधुनिक हिंदी आलोचना और साहित्य-इतिहास की नींव रखने वाले ग्रंथों में माना जाता है। बाद में नंददुलारे वाजपेयी, हजारीप्रसाद द्विवेदी, नामवर सिंह, रामविलास शर्मा, नगेंद्र, मैनेजर पांडेय जैसे विद्वानों ने आलोचना और साहित्यिक विमर्श को गहराई दी।
हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कबीर, सूर, नाथ-संप्रदाय, मध्यकालीन भारतीय चिंतन और सांस्कृतिक इतिहास को जिस तरह पढ़ा, वह केवल अकादमिक अभ्यास नहीं था। उसमें साहित्य, इतिहास और भारतीय बौद्धिक परंपरा का जीवित संवाद था।
रामविलास शर्मा ने भाषा, इतिहास, मार्क्सवादी आलोचना, भारतेंदु, प्रेमचंद, निराला और भारतीय समाज पर व्यापक लेखन किया। नामवर सिंह ने आलोचना को सार्वजनिक बहस का रूप दिया; उनकी किताब कविता के नये प्रतिमान ने आधुनिक हिंदी कविता की समझ पर लंबे समय तक प्रभाव डाला।
यानी शिक्षक या अकादमिक लेखक अपने श्रेष्ठ रूप में भाषा को संबल देते हैं। वे पाठक को संदर्भ देते हैं। परंपरा को नए अर्थ में पढ़ते हैं। भूले हुए लेखकों को सामने लाते हैं। लोक और शास्त्र के बीच पुल बनाते हैं। पाठ-संपादन करते हैं। ग्रंथों की विश्वसनीय प्रतियाँ तैयार करते हैं। विद्यार्थियों को साहित्य की विधाओं से परिचित कराते हैं।
कहना चाहिए कि गंभीर शिक्षक-लेखन के बिना साहित्य की स्मृति कमजोर हो जाती है।
फिर समस्या कहाँ है?
समस्या वहाँ है जहाँ शिक्षक-लेखन जीवित पाठक से कट जाता है।
हिंदी अकादमिक लेखन की एक बड़ी बीमारी है, भाषा का कृत्रिम गंभीरपन। ऐसा लगता है मानो वाक्य जितना लंबा होगा, विचार उतना बड़ा माना जाएगा। कई शोध-पत्र ऐसे होते हैं जिनमें विषय कम, उद्धरण अधिक होते हैं। कई लेखों में भाषा इतनी भारी होती है कि पाठक दूसरे पैराग्राफ में ही आत्मसमर्पण कर दे।
जैसे:
“उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श की अंतर्वस्तुगत संरचना में स्त्री-अस्मिता का बहुलार्थी प्रतिपक्षीय पुनर्संयोजन...”
यह वाक्य शायद किसी सेमिनार में प्रभाव डाल दे, लेकिन पाठक से संवाद नहीं करता। हिंदी की समस्या यह नहीं कि उसमें कठिन विचार नहीं आ सकते। समस्या यह है कि कठिन विचार को अनावश्यक कठिन भाषा में बाँध दिया जाता है।
अच्छा अकादमिक लेखन कठिन विषय को स्पष्ट करता है। खराब अकादमिक लेखन सरल विषय को भी जटिल बना देता है।
शोध-पत्रों और पत्रिकाओं का संकट
भारत में शोध-प्रकाशन से जुड़ी गुणवत्ता की समस्या लंबे समय से चर्चा में रही है। UGC ने इसी पृष्ठभूमि में UGC-CARE यानी Consortium for Academic and Research Ethics की व्यवस्था शुरू की थी, जिसका उद्देश्य गुणवत्ता-युक्त शोध पत्रिकाओं की सूची बनाना, प्रकाशन नैतिकता को बढ़ावा देना और संदिग्ध या निम्नस्तरीय पत्रिकाओं से बचाव करना था। UGC के Quality Mandate दस्तावेज़ में CARE का उद्देश्य उच्च गुणवत्ता वाले प्रकाशनों को प्रोत्साहित करना और predatory, dubious तथा substandard journals को रोकना बताया गया था।
लेकिन यह व्यवस्था भी स्थायी समाधान नहीं बन सकी। फरवरी 2025 के UGC public notice में कहा गया कि आयोग ने 3 अक्टूबर 2024 की अपनी 584वीं बैठक में UGC-CARE listing of Journals को discontinue करने और peer-reviewed journals चुनने के लिए suggestive parameters विकसित करने का निर्णय लिया।
यह घटना अपने आप बहुत कुछ बताती है। जब गुणवत्ता की रक्षा के लिए बनी सूची ही विवादों, सीमाओं या व्यावहारिक समस्याओं से घिर जाए, तो समस्या केवल लेखक या शिक्षक की नहीं रह जाती। समस्या पूरी अकादमिक प्रकाशन-संस्कृति की हो जाती है।
हिंदी और भारतीय भाषाओं में यह संकट अधिक जटिल है। अंग्रेज़ी में शोध के लिए अंतरराष्ट्रीय डेटाबेस, उद्धरण-सूचकांक और जर्नल इकोसिस्टम अपेक्षाकृत अधिक विकसित हैं। भारतीय भाषाओं में गंभीर पत्रिकाएँ हैं, पर उनका संग्रहण, डिजिटलीकरण, peer review, visibility और citation ecosystem अभी भी कमजोर हैं। इससे अच्छा काम भी कम दिखता है और कमजोर काम भी कई बार आसानी से चल जाता है।
हिंदी विभागों की स्थिति और भाषा का संकट
यहाँ एक कठोर बात कहनी पड़ेगी। भारत के अनेक कॉलेजों में भाषा विभाग हाशिए पर हैं। छात्रों की प्राथमिकता रोजगारपरक विषयों की ओर बढ़ी है। अंग्रेज़ी, मैनेजमेंट, टेक्नोलॉजी, डेटा, कॉमर्स, लॉ और प्रोफेशनल कोर्सेज़ की सामाजिक प्रतिष्ठा अधिक है। हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं को कई जगह “कम स्कोर वाले” या “कम अवसर वाले” विषय की तरह देखा जाता है।
यह धारणा गलत भी है और दुखद भी, लेकिन यह मौजूद है।
National Education Policy 2020 भारतीय भाषाओं, बहुभाषिकता और मातृभाषा/स्थानीय भाषा में शिक्षा को महत्व देती है। NEP 2020 के अनुसार बहुभाषिकता के संज्ञानात्मक लाभ हैं और भारतीय भाषाओं को शिक्षा में मजबूत जगह मिलनी चाहिए।
फिर भी जमीनी स्थिति आसान नहीं है। भाषा विभागों में कई जगह संसाधन कम हैं, पुस्तकालय कमजोर हैं, नए पाठ्यक्रम धीमे हैं, डिजिटल सामग्री सीमित है, और विद्यार्थियों को भाषा-अध्ययन से करियर का स्पष्ट रास्ता नहीं दिखता।
इस स्थिति में शिक्षक की भूमिका और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है। अगर शिक्षक जीवंत पढ़ाता है, समकालीन संदर्भ लाता है, विद्यार्थियों को लेखन, अनुवाद, संपादन, प्रकाशन, डिजिटल कंटेंट, शोध और भाषा-टेक्नोलॉजी से जोड़ता है—तो भाषा विभाग नई ऊर्जा पा सकता है। लेकिन यदि कक्षा केवल नोट्स, परीक्षा और पुराने प्रश्नपत्रों तक सीमित रह जाए, तो भाषा का संसार सिकुड़ जाता है।
क्या शिक्षक को रचनाकार होना चाहिए?
हर शिक्षक को कथाकार, कवि या उपन्यासकार होना जरूरी नहीं। यह आग्रह गलत है।
एक अच्छा शिक्षक अच्छा पाठक हो सकता है। अच्छा आलोचक हो सकता है। अच्छा संपादक हो सकता है। अच्छा व्याख्याकार हो सकता है। अच्छा शोधकर्ता हो सकता है। इन सबकी अपनी गरिमा है।
समस्या तब होती है जब आलोचक बनने की तैयारी के बिना आलोचना लिखी जाती है, कवि बनने की तैयारी के बिना कविता छापी जाती है, कथाकार बनने की तैयारी के बिना कहानी-संग्रह प्रकाशित हो जाता है।
रचनात्मक लेखन और अकादमिक लेखन अलग स्वभाव माँगते हैं। शिक्षक का व्याख्यात्मक गद्य कहानी में आते ही बोझ बन सकता है। कक्षा में “अब हम इस बिंदु पर विचार करेंगे” चलता है। कहानी में यह वाक्य पात्रों की हत्या कर देगा।
अगर शिक्षक कथा लिखना चाहता है, तो उसे कुछ बातें सीखनी होंगी:
वह पाठक को विद्यार्थी न समझे।
वह पात्रों को सिद्धांत का उदाहरण न बनाए।
वह कहानी को शोध-पत्र न बनाए।
वह भाषा को प्राकृतिक रखे।
वह अनुभव के बिना विचार न लिखे।
शिक्षक जब अपनी विद्वत्ता को संयम से रचना में बदलता है, तो अद्भुत साहित्य पैदा हो सकता है। लेकिन जब वह कक्षा का मंच कहानी में ले आता है, तो कथा उपदेश बन जाती है।
शिक्षक-लेखन की सबसे बड़ी शक्ति: संदर्भ
पत्रकार वर्तमान लाता है। कथाकार अनुभव लाता है। शिक्षक का सबसे बड़ा योगदान है—संदर्भ।
अच्छा शिक्षक लेखक पाठक को बताता है कि कोई रचना कहाँ से आई, किस परंपरा से जुड़ी है, उसके पीछे कौन सा समाज है, किस बहस से उसका संबंध है, उसका भाषा-संस्कार क्या है।
मान लीजिए कोई पाठक कबीर पढ़ना चाहता है। वह दोहे पढ़ सकता है, आनंद ले सकता है। लेकिन अगर कोई गंभीर शिक्षक-लेखक उसे निर्गुण भक्ति, जाति-संरचना, मध्यकालीन धार्मिक बहस, लोकभाषा, साधु परंपरा और कबीर की वाणी की मौखिकता समझा दे, तो पाठक का अनुभव गहरा हो जाता है।
यह काम शिक्षक कर सकता है। यही शिक्षक-लेखन की ताकत है।
लेकिन यह तभी संभव है जब शिक्षक अपने विषय को जीवित बनाए, संग्रहालय की वस्तु न बनाए।
शिक्षक-लेखन की सबसे बड़ी कमजोरी: पाठक से दूरी
कई हिंदी अकादमिक पुस्तकों की समस्या यह है कि वे केवल परीक्षार्थी, शोधार्थी या पदोन्नति समिति के लिए लिखी लगती हैं। सामान्य पाठक उनके पास नहीं जाता। और सच कहें तो कई बार लेखक ने सामान्य पाठक की कल्पना की ही नहीं होती।
यह साहित्य के लिए नुकसानदायक है।
साहित्य अगर केवल विभागीय फाइलों में रह जाएगा तो उसकी सामाजिक ऊर्जा घटेगी। आलोचना अगर केवल शोधार्थियों के उद्धरण के लिए लिखी जाएगी तो उसका सार्वजनिक असर खत्म होगा। भाषा अगर केवल कठिन शब्दों की चादर ओढ़ लेगी तो पाठक उससे दूर जाएगा।
हिंदी को गंभीरता चाहिए, पर गंभीरता का अर्थ कठिनता नहीं है।
हिंदी को शोध चाहिए, पर शोध का अर्थ निर्जीवता नहीं है।
हिंदी को आलोचना चाहिए, पर आलोचना का अर्थ पाठक से दूरी नहीं है।
क्या इससे भाषा को क्षति हुई है?
हाँ, कुछ स्तरों पर हुई है।
पहली क्षति, भाषा की पठनीयता कम हुई।
जब अकादमिक हिंदी अत्यधिक बोझिल हुई, तो नए पाठकों ने उसे “मेरे काम की भाषा नहीं” मान लिया।
दूसरी क्षति, शोध पर भरोसा घटा।
जब कमजोर शोध-पत्र, जल्दबाज़ किताबें और औपचारिक प्रकाशन बढ़े, तो गंभीर शोध भी संदेह के घेरे में आया।
तीसरी क्षति, साहित्य पाठ्यक्रम तक सीमित हुआ।
बहुत से विद्यार्थियों ने साहित्य को परीक्षा-उत्तर, नोट्स और आलोचना-उद्धरण के रूप में देखा; आनंद और खोज की वस्तु के रूप में नहीं।
चौथी क्षति, लेखन का प्रमाणपत्रीकरण हुआ।
लेखन का मूल्य उसकी भाषा और विचार से नहीं, उसके “कहाँ छपा” और “कितने अंक मिलेंगे” से आँका जाने लगा।
पाँचवीं क्षति, पाठक और विभाग का रिश्ता टूटा।
हिंदी विभागों में जो चर्चा होती है, वह हिंदी के सामान्य पाठक तक कम पहुँचती है।
यह क्षति गंभीर है, क्योंकि भाषा की शक्ति केवल उसके साहित्यकारों से नहीं बनती; उसके पाठकों, शिक्षकों, आलोचकों, प्रकाशकों और संस्थानों के जीवित संबंध से बनती है।
लेकिन उम्मीद कहाँ है?
उम्मीद भी शिक्षक से ही है।
एक अच्छा शिक्षक भाषा का भाग्य बदल सकता है। वह कक्षा को साहित्यिक प्रयोगशाला बना सकता है। वह विद्यार्थियों को प्रेमचंद से लेकर गीतांजलि श्री, कबीर से लेकर ओमप्रकाश वाल्मीकि, महादेवी से लेकर अनामिका, रेणु से लेकर उदय प्रकाश, मन्नू भंडारी से लेकर कृष्णा सोबती तक जीवित संवाद में ला सकता है।
वह भारतीय भाषाओं के बीच पुल बना सकता है। हिंदी के विद्यार्थी को मराठी दलित आत्मकथा पढ़ा सकता है। बंगाली, तमिल, मलयालम, उड़िया, असमिया, कन्नड़ और उर्दू साहित्य के अनुवादों से परिचित करा सकता है। वह विद्यार्थियों को बता सकता है कि हिंदी कोई अकेली दीवार नहीं, भारतीय भाषाओं के घर का एक बड़ा कमरा है।
डिजिटल युग में शिक्षक ब्लॉग लिख सकता है, पॉडकास्ट कर सकता है, अच्छे पाठ-सूत्र बना सकता है, मुक्त पाठ्य सामग्री बना सकता है, छोटे वीडियो में कविता समझा सकता है, पाठक समूह बना सकता है, अनुवाद परियोजनाएँ चला सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब वह खुद को केवल “सिलेबस पूरा करने वाला” न समझे।
NEP 2020 और भारतीय भाषाओं पर बढ़ता ध्यान अवसर देते हैं, लेकिन नीति अपने आप भाषा को नहीं बचाती। भाषा को बचाते हैं, जीवित शिक्षक, अच्छे लेखक और सजग पाठक।
Rachnaye के संदर्भ में यह प्रश्न क्यों जरूरी है?
Rachnaye भारतीय भाषाओं के लेखक, प्रकाशक और पाठक को जोड़ने वाला मंच है। ऐसे मंचों के लिए यह समझना जरूरी है कि लेखक केवल एक प्रकार का नहीं होता। कोई पत्रकार से लेखक बनता है, कोई शिक्षक से, कोई लोक-स्मृति से, कोई डिजिटल लेखन से, कोई प्रकाशन-संघर्ष से।
भारतीय भाषाओं को मजबूत करने के लिए हमें शिक्षक-लेखकों की जरूरत है, लेकिन ऐसे शिक्षक-लेखक जो भाषा को जीवित रखें, पाठक को बराबर मानें और शोध को पठनीय बनाएँ। हमें ऐसे आलोचकों की जरूरत है जो किताबों को पाठक तक ले जाएँ, न कि केवल सेमिनार तक। हमें ऐसे विभाग चाहिए जो विद्यार्थियों को रोजगार और रचना दोनों से जोड़ें।
Rachnaye जैसे मंच इस दूरी को कम कर सकते हैं। यहाँ पाठक केवल प्रसिद्ध लेखक ही नहीं, अलग-अलग पृष्ठभूमियों से आने वाले लेखकों को खोज सकता है। यही भारतीय भाषा साहित्य का लोकतांत्रिक भविष्य है।
शिक्षक लिखे, पर भाषा के प्रति जवाबदेह होकर
कॉलेज के शिक्षक लेखक क्यों बनते हैं? इसका उत्तर कई परतों में है।
कुछ इसलिए लिखते हैं क्योंकि उनके भीतर रचना की आग है।
कुछ इसलिए लिखते हैं क्योंकि वे साहित्य को समझना और समझाना चाहते हैं।
कुछ इसलिए लिखते हैं क्योंकि शोध उनका बौद्धिक कर्म है।
और कुछ इसलिए लिखते हैं क्योंकि पदोन्नति की फाइल उनसे प्रकाशन माँगती है।
पहले तीन प्रकार हिंदी को मजबूत कर सकते हैं। चौथा प्रकार, अगर ईमानदार श्रम से न गुजरे, तो भाषा को कमजोर करता है।
शिक्षक-लेखन की गरिमा बहुत बड़ी है। वह परंपरा को बचा सकता है, नए अर्थ दे सकता है, पाठकों को गहरा बना सकता है, विद्यार्थियों में साहित्य के प्रति प्रेम जगा सकता है। लेकिन वही लेखन जब औपचारिक, अपठनीय, जल्दबाज़ और प्रमाणपत्र-प्रधान हो जाता है, तो हिंदी की ऊर्जा कम करता है।
हिंदी के ऐसे शिक्षक चाहिए जो केवल पाठ्यक्रम न पढ़ाएँ, पाठक पैदा करें।
ऐसे आलोचक चाहिए जो रचना को खोलें, बंद न करें।
ऐसे शोधकर्ता चाहिए जो भाषा को कठिन नहीं, गहरी बनाएँ।
और ऐसे लेखक चाहिए जो यह समझें कि किताब छप जाना उपलब्धि नहीं है; पाठक के भीतर जगह बना लेना उपलब्धि है।
भाषा को संस्थान भी बचाते हैं, पर अंतिम रूप से भाषा को जीवित रखते हैं, एक ईमानदार लेखक और कई सजग पाठक।
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