Lyrics Songs
Geet Gawai Bhojpuri folk songs in Mauritius
- Author Name:
Dr. Sarita Boodhoo
-
Book Type:

- Description:
Geet Gawai: Bhojpuri Folk Songs in Mauritius is a well-researched and documented scholarly work on the Bhojpuri Sanskar Geet as brought to the shores of Mauritius by the Girmitiyas from the Bhojpuri belts of India during the Indentured Labour Route Migration and handed down from generation to generation from Dadis and Nanis to the younger generation. The tradition bearers who have preserved this rich oral musical ensemble, which encapsulates a harmonious blending of the different aspects of the life cycle, rites of passage, and associated customs and traditions, are known as Geetharines. This book is an ode to the Geetharines for having safeguarded, promoted and preserved these precious songs over one and a half centuries against all odds and which establish a strong permanent dynamic bond between India and Mauritius, the Indian diaspora and the world at large, with its inscription at UNESCO as an Intangible Cultural Heritage of Humanity. This book, ‘Geet Gawai’, will prove useful not only to students of anthropology and ethnomusicology and to scholars but also to the general public at large.
Geet Gawai Bhojpuri folk songs in Mauritius
Dr. Sarita Boodhoo
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Madhukosh Tumhare Adhar
- Author Name:
Rameshraaj
-
Book Type:

- Description:
यह एक गीत संग्रह है। गीत केवल वो नहीं होते तो चलचित्रों में देखे या सुने जाते हैं, गीत उन भावों को संप्रेषित करते हैं जो अलग अलग सामयिक भावनावों के साथ जन्म लेते हैं। इस पुस्तक में, व्यवस्था-विरोध के गीत, सांप्रदायिक सद्भाव के गीत, प्रेम गीत, लोक गीत हैं। पढ़े, आनंद लें।
Madhukosh Tumhare Adhar
Rameshraaj
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Janapada Geethanjali
- Author Name:
Javare Gowda
-
Book Type:

- Description:
ಗುಣಗಾತ್ರಗಳಲ್ಲಿ ಕನ್ನಡ ಜನಪದಗೀತೆಗಳು ಜಗತ್ತಿನ ಯಾವ ಭಾಷೆಯ ಗೀತೆ ಗಳೊಡನೆಯಾದರೂ ಹೆಗಲೆಣೆಯಾಗಿ ನಿಲ್ಲಬಲ್ಲವು. ಗೀತೆಗಳಲ್ಲಿ ಅಭಿವ್ಯಕ್ತಗೊಳ್ಳುವ ಸಂಸಾರ ಧರ್ಮದಲ್ಲಿ, ಕರ್ಮಭಕ್ತಿ ಯೋಗಗಳಲ್ಲಿ ಸೌಂದಯ್ಯೋಪಾಸನೆಯಲ್ಲಿ, ಜೀವನಮೌಲ್ಯ ವಿವರಣೆ ಯಲ್ಲಿ, ಅಂತೆಯೇ ಅವರ ರಸಿಕತೆಯಲ್ಲಿ ಕರ್ಣಾಟಕ ಸಂಸ್ಕೃತಿಯ ಮಹೋನ್ನತಿ ಪ್ರಕಟವಾಗು ತ್ತದೆ. ಸಮಾಜದ ಭದ್ರತೆಗೆ ಸಂಸಾರದ ಸ್ವಾಸ್ಥ್ಯವೇ ಮೂಲ. ಸಾಮಾನ್ಯ ಜೀವನದಲ್ಲಿ ಕಾಣು ವಂಥ ಸ್ವಾಸ್ಥ್ಯವನ್ನು ಶಿಷ್ಟ ಜೀವನದಲ್ಲಿ ಕಾಣುವುದು ಕಷ್ಟ. ಕುಬೇರನ ಸಂಪತ್ತಾಗಲಿ, ದೇವೇಂದ್ರನ ಭೋಗ ವೈಭವವಾಗಲಿ, ದುದ್ಯೋಧನನ ಅಧಿಕಾರವಾಗಲಿ ನಿಶ್ಚಿಂತವಾದ ಜೀವನಕ್ಕೆ, ನಿರಾಮಯವಾದ ಸಂಸಾರಕ್ಕೆ ಸಾಧನವಾಗಲಾರವೆಂಬುದಕ್ಕೆ ಶ್ರೀಮಂತ ರಾಷ್ಟ್ರಗಳ ಜನಜೀವನವೇ ಸಾಕ್ಷಿಯಾಗಿದೆ. ಕನಿಷ್ಠ ಪ್ರಮಾಣದ ಬೇಕು ಬೇಡಗಳುಳ್ಳ ಕೃತಕ ಶೋಕಿಯನ್ನು ತೊರೆದ ಸಂಸಾರದಲ್ಲಿ ಅದು ನಿರಾಳವಾಗಿರುತ್ತದೆ; ತೃಪ್ತಿ ಪಡೆಯುತ್ತದೆ; ಅಲ್ಲಿ ಶಾಂತಿ ನೆಲಸುತ್ತದೆಂಬುದಕ್ಕೆ ಭಾರತೀಯ ಗ್ರಾಮೀಣ ಜನಜೀವನವೇ ಜ್ವಲಂತ ನಿದರ್ಶನವಾಗಿದೆ. ನಿಸರ್ಗ ಶಿಶುಗಳಾದ ಹಳ್ಳಿಗರಲ್ಲಿ ರಾಗಭಾವಗಳ ಸಂಸಾರಕ್ಕೆಡೆಯಲ್ಲದಿರುವುದರಿಂದ ಅವರು ಶೀಘ್ರದೇಕಕ್ಕೊಳಗಾಗುತ್ತಾರೆ; ಆ ಉದ್ರೇಕದ ಭರತ ಬಂದಷ್ಟೇ ತೀವ್ರವಾಗಿ ಇಳಿದು ಹೋಗುತ್ತದೆ. ಹಳ್ಳಿಗರ ಈ ಮನೋಧರ್ಮ ಮತ್ತು ವರ್ತನೆಗಳು ಅವರ ಎಲ್ಲ ವ್ಯವಹಾರಗಳಿಗೂ ಅನ್ವಯಿಸುತ್ತವೆ. ಅನೇಕ ವೇಳೆ ಭಾವಸಂಗೋಪನ ಕಪಟ ವರ್ತನೆಯಲ್ಲಿ ಕೊನೆಗೊಳ್ಳುವ ಸಂಭವವುಂಟು, ಕೋಪವುರಿದು ತಣ್ಣಗಾದ ಕೂಡಲೇ ಅವರ ಹೃದಯ ಪರಿಶುದ್ಧವಾಗುತ್ತದೆ. ಅವರ ಅಳುನಗುಗಳ ನಡುವೆ ಗಡಿರೇಖೆಯೇ ಇಲ್ಲ.
Janapada Geethanjali
Javare Gowda
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Zehen Ka Pairhan
- Author Name:
Umesh Pant
-
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Zehen Ka Pairhan
Umesh Pant
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Mohalla Assi
- Author Name:
Chandra Prakash Dwivedi +1
-
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साहित्य अकादेमी पुरस्कार से पुरस्कृत कथाकार काशीनाथ सिंह की औपन्यासिक कृति ‘काशी का अस्सी’ अपने प्रकाशन के बाद से लगातार हिन्दी के पाठकों को आकर्षित करती रही है। खिलंदड़ और सीधे आम आदमी से ली गई इसकी भाषा, इसके सजीव पात्र और बनारस के मुहल्लों-गलियों को चित्रों की तरह उपस्थति करती हुई यह कृति आज हर पाठक की प्रिय पुस्तकों में शामिल है। इसी उपन्यास के एक अध्यापन ‘पांड़े कौन कुमति तोहे लागी’ को लेकर प्रसद्धि फिल्म निर्देशक डॉ. चन्द्रप्रकाश द्विवेदी ने ‘मोहल्ला अस्सी’ नाम से एक फ़िल्म बनाई। इस पुस्तक में उसी पुस्तक की पटकथा और ‘काशी का अस्सी’ का सम्बन्धित अध्याय संकलित है। साथ ही डॉ. चन्द्रप्रकाश की एक भूमिका भी जिससे पता चलता है कि किसी साहित्यिक कृति को फिल्म के फॉर्म में ढालने की प्रक्रिया क्या होती है; और उन्होंने इस चुनौती को कैसे हल किया। एक सांस्कृतिक शहर में बाजारवाद कैसे आता है, और कैसे वह वहाँ के लोगों की सोच-समझ और प्राथमिकताओं को बदलता है, यह फ़िल्म इसी कथ्य को केन्द्र में रखती है। धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने और कुछ शब्दों के प्रयोग को लेकर यह फिल्म सेंसर बोर्ड में भी काफी समय तक अटकी रही। फिर मामला कोर्ट में पहुँचा। इस सबके चलते 2015 में तैयार हो चुकी फ़िल्म 2018 में दर्शकों तक पहुँची। इस किताब में अदालत का वह फैसला भी शामिल किया गया, जिसके बाद फ़िल्म रिलीज हो सकी।
Mohalla Assi
Chandra Prakash Dwivedi
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Neel
- Author Name:
Bhavesh Dilshad
-
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भवेश दिलशाद जदीद दौर के ऐसे ग़ाल गो शायरों में शामिल हैं, जिन्होंने सादगी और बेबाकी को अपना र्तो सुख़न बनाया है। छोटी-छोटी, मगर बहुत दिलपाीर बातें कह जाने वाली यह आवाा, बहुत सुरीली है, दिलकश और भली। अपने सपाट लहजे में जो कुछ वह कहना चाहते हैं, क़ारी (पाठक) के दिल पर सीधे असर अंदाा होता है।
Neel
Bhavesh Dilshad
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Tumhare Naam
- Author Name:
Naresh Nadeem
-
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Tumhare Naam Ghazal by Naresh Nadeem
Tumhare Naam
Naresh Nadeem
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Parde Par Sahitya : Sahityik Rachnaon Ke Cinemai Rupantaran Ka Adhyayan
- Author Name:
Jawarimal Parakh
-
Book Type:

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भारतीय सिनेमा में साहित्यिक कृतियों पर फ़िल्में बनाने की परम्परा बहुत समृद्ध नहीं रही है, फिर भी बीच-बीच में कुछ उत्कृष्ट फ़िल्मकारों ने उपन्यासों, कहानियों और नाटकों को लेकर फ़िल्में बनाई हैं। ‘परदे पर साहित्य’ पुस्तक में ऐसी सत्रह फ़िल्मों का विस्तृत विवेचन किया गया है। इनमें ‘देवदास’, जिस पर दो महत्त्वपूर्ण फ़िल्में बनीं, ‘आनन्दमठ’, ‘पथेर पांचाली’, ‘काबुलीवाला’, ‘चित्रलेखा’, ‘सारा आकाश’, ‘संस्कार’ और ‘तमस’ जैसी चर्चित कृतियों पर बनीं फ़िल्में शामिल हैं।
विख्यात फ़िल्म-समीक्षक जवरीमल्ल पारख अपनी विवेचना में न सिर्फ़ यहाँ मूल रचना का विस्तृत परिचय उसके ऐतिहासिक और साहित्यिक आयामों के साथ देते हैं, बल्कि उस पर बनी फ़िल्म के इतिहास और उसके तकनीकी पक्षों पर भी विस्तार से विचार करते हैं। फ़िल्मकारों ने क्या देखकर किस रचना को चुना, फिर कैसे उसे अपनी फ़िल्म के अनुकूल बनाया, उसमें से क्या छोड़ा और अपनी बात पूरी तरह कहने के लिए उसमें क्या जोड़ा, और अंततः फ़िल्म का क्या रूप बना और दर्शकों ने उसे कैसे लिया; वे यह सब बताते हैं; और इस तरह यह किताब फ़िल्मों की रचना-प्रक्रिया के बारे में जानने को उत्सुक पाठकों के लिए भी विशेष हो जाती है।
साहित्य और सिनेमा, दोनों पर उनकी समान पकड़ है जिसके चलते यह विश्लेषणात्मक पुस्तक साहित्य के अध्येताओं के लिए जितनी उपयोगी है, सिने जगत में प्रवेश के इच्छुक युवाओं के लिए, उनकी रचनात्मक तैयारी के लिए भी उतनी ही ज़रूरी है।
Parde Par Sahitya : Sahityik Rachnaon Ke Cinemai Rupantaran Ka Adhyayan
Jawarimal Parakh
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Siyah
- Author Name:
Bhavesh Dilshad
-
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भवेश दिलशाद की कुछ ग़ालें पढ़ने के बाद लगा कि मैंने उनका कलाम पहले क्यों नहीं देखा। हिंदोस्तानी ग़ाल में जो बहुत सार्थक और चुनौती भरी रचना हो रही है, उसका एक ज्वलंत उदाहरण दिलशाद हैं। दरअसल ग़ाल का मतलब छंद मिलाना नहीं है। दो पंक्तियों में व्यंग्य करना भी नहीं। किसी प्रकार का विवरण देना भी नहीं है। ग़ाल भाषा के जिस स्तर को छूकर भावनाओं का संसार रचती है, वह कठिन कार्य दिलशाद की ग़ालें करती हैं। दिलशाद बाह्य से अधिक आंतरिक संसार पसंद करते हैं और यही ग़ाल की एक ऐसी मंािल है, जहां पहुंचना हर ग़ाल लिखने वाले के लिए सरल नहीं है। दिलशाद के संग्रह के प्रकाशन पर मैं उन्हें बधाई देता हूं और आशा करता हूं कि हिंदोस्तानी ग़ाल के संसार में यह एक महत्वपूर्ण क़दम माना जाएगा। असग़र वजाहत
Siyah
Bhavesh Dilshad
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Geet Sanvidhan ke
- Author Name:
Jorawar Singh
-
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Geet Sanvidhan ke
Jorawar Singh
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Gulzar Ke Geet
- Author Name:
Gulzar +1
-
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गुलज़ार ने हिन्दी फ़िल्मों में गीतों की एक अलग रवायत शुरू की जो आज तक सिर्फ़ उन्हीं की है। कोई और गीतकार न उसकी नक़ल कर पाया, और न उसे कोई और शक्ल दे सका। गुलज़ार पर जो शुरू होता है, वह गुलज़ार पर ही ख़त्म होता है। ‘गुलज़ार के गीत’ में उनके वे गीत शामिल हैं जो दशकों से गाए-बजाए जाते रहे हैं और जितने लोकप्रिय वे तब थे, उतने ही आज भी हैं। ‘मोरा गोरा अंग लई ले’, ‘रोज़ अकेली आए’, ‘हमने देखी है उन आँखों की महकती ख़ुश्बू’ और इन जैसे अनेक गीत हैं जो फ़िल्मों से निकलकर हमारे भाव-जगत का अभिन्न हिस्सा हो गए। संकलन में शामिल गीतों को उनकी प्रकृति के अनुसार दो भागों में प्रस्तुत किया गया है—एक, ‘भाव-गीत’ और दूसरा, ‘रंगारंग’। दूसरे हिस्से में वे गीत हैं जो अपने खिलंदड़पने में भी ज़िन्दगी और दुनियादारी के बारे में गहरी फ़लसफ़ियाना बातें करते हैं, और शायरी को भी एक नई सूरत बख़्शते हैं। गीतों के साथ यहाँ पाठक भूषण बनमाली द्वारा लिखा गया गुलज़ार के बारे में एक आलेख और स्वयं गुलज़ार द्वारा लिखा गया एक दिलचस्प लेख ‘एक गीत का जन्म’ भी पाएँगे। इस लेख में ‘मोरा गोरा अंग लई ले’ गीत की कहानी बयान की गई है।
Gulzar Ke Geet
Gulzar
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Bhakti Sangeet
- Author Name:
Amal Dash Sharma +1
-
Book Type:

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भारतीय संगीत का इतिहास अत्यंत गौरवमय और महत्त्वपूर्ण है। सुविख्यात संगीत-मर्मज्ञ अमल दाश शर्मा की यह कृति यद्यपि कुछ संत-भक्तों के लोकप्रसिद्ध पदों और गीतों को संगीतबद्ध करके स्वरलिपि के साथ प्रस्तुत करती है, लेकिन ‘भजन की इतिकथा’ नामक अनुच्छेद में उन्होंने संक्षिप्त किंतु परिच्छन्न रूप में सांगीतिक इतिहास को भी प्रतिध्वनित किया है। उपयुक्त रागों एवं तालों में निबद्ध जो लोकप्रिय भजन इस पुस्तक में संग्रहीत हैं, विद्यार्थियों से लेकर साधारण संगीतप्रेमियों तक, सभी के लिए सहज ग्राह्य हैं। इसके अलावा श्री दाश ने छ: जनप्रिय भक्त कवियों अथवा गायकों की जीवनियाँ भी इस पुस्तक में शामिल की हैं, जिससे इसकी उपयोगिता में वृद्धि हुई है।
Bhakti Sangeet
Amal Dash Sharma
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Satyajit Rai: Pather Panchali Aur Film Jagat
- Author Name:
Mahendra Mishra
-
Book Type:

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‘सत्यजित राय : पथेर पांचाली और फ़िल्म जगत्’ यह पुस्तक ‘पथेर पांचाली’ जैसी कालजयी फ़िल्म के बहाने इस महान सिने-निर्देशक के कला-कर्म को जानने-समझने की सच्ची और गहरी कोशिश से पैदा हुई एक ऐसी कृति है, जिसे हिन्दी में एक नई शुरुआत की तरह देखा जा सकता है। इस पुस्तक को पढ़ना सिर्फ़ एक वैचारिक फ़िल्मी दस्तावेज़ से गुज़रना नहीं, बल्कि एक अनुभव-समृद्ध विवेकशील गाइड के साथ सत्यजित राय के रंगारंग कला-संसार के उन अनेक कोनों और गलियारों से गुज़रना है, जिन्हें बहुतों ने देखा नहीं और जिन्होंने देखा, वे लगभग भूल चुके हैं। अस्तु, यह कृति दोनों ही कार्यों को पूरा करती है—नए पाठकों को यहाँ एक महान कला-सर्जक से परिचित होने का सुख मिलेगा और पुरानों को अभिज्ञान का एक विलक्षण आनन्द।
इस पुस्तक के लेखक महेन्द्र मिश्र की पहली विशेषता तो यही है कि वे पेशेवर अर्थ में फ़िल्म-समीक्षक नहीं हैं। वस्तुतः वे प्रकृति से कवि-विचारक हैं, कर्म से एक अनुभव-सिद्ध पूर्व प्रशासक और रुचि से एक गहरे फ़िल्म-प्रेमी। इसीलिए पूरी पुस्तक की भाषा और व्याख्या-विश्लेषण में एक सहज अनौपचारिकता की गंध मिलेगी, जो इसे इस प्रकार के समस्त लेखन से भिन्न और विशिष्ट बनाती है। असल में यह पुस्तक सत्यजित राय के वृहत् कला-संसार की ओर खुलनेवाली एक खिड़की है—सम्भवतः हिन्दी की पहली ऐसी खिड़की, जिससे आती हुई रोशनी पर भरोसा किया जा सकता है। यह रोशनी पाठकों तक पहुँचेगी, ऐसा मेरा विश्वास है।
—केदारनाथ सिंह
Satyajit Rai: Pather Panchali Aur Film Jagat
Mahendra Mishra
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Rajkapoor : Aadhi Haqiqat Aadha Fasaana
- Author Name:
Prahlad Agarwal
-
Book Type:

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परदे पर राजकपूर की छवि यह सोचने को मजबूर करती है कि क्या कोई मनुष्य इतना निश्छल, कोमल और मासूम भी हो सकता है? ‘चार दिल चार राहें’ का वह निष्ठावान नवयुवक जो भंगिन को ब्याह लाने के लिए ढोल बजानेवाले लड़के के साथ अकेला ही निकल पड़ा है, ज़िन्दगी की चालाक सच्चाइयों से बेख़बर ‘अनाड़ी’, नंगी सच्चाई को देख लेने की सज़ा भुगतता ‘जागते रहो’ का माटीपुत्र, ईमानदारी से ज़िन्दा रहने की लालसा लिए ईमान बेचने को मजबूर ‘श्री 420’ का शिक्षित बेरोज़गार, तालियों की गड़गड़ाहट और दर्शकों की किलकारियों के बीच अपनी माँ की मौत का आँसुओं की नक़ली पच्कारी छोड़कर मातम मनाता जोकर—ये सब राजकपूर ही हैं। और रेणु की माटी के आदमी की आत्मा में प्रवेश कर जानेवाला तीसरी क़सम का हीरामन भी वही हैं। ये किरदार इसलिए अनोखे बन पड़े हैं, क्योंकि इनमें ज़िन्दगी का संगीत है। दु:खों और अभावों के बीच कराहती मानवता का मज़ाक़ नहीं उड़ाया गया है। तकलीफ़ों के बयान में महानता का मुलम्मा भी नहीं चढ़ाया गया है। ‘आह’ में वह अपनी नायिका से कहता है—‘जी हाँ, मैं सपने बहुत देखता हूँ।’ सपने जो नई दुनिया को रचने में मदद करते हैं। सपने जो न हों तो आदमी भले ही रहे, उसकी आँखों में उजाला और होंठों पर मुस्कान कभी न रहे। यही सपने राजकपूर की सबसे बड़ी मिल्कियत हैं। राजकपूर के रचनात्मक व्यक्तित्व को परत-दर-परत खोलनेवाली एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक।
Rajkapoor : Aadhi Haqiqat Aadha Fasaana
Prahlad Agarwal
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Bazar Ke Bazigar
- Author Name:
Prahlad Agarwal
-
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कहिए कि हिन्दी सिनेमा का नया सुनहरा दौर शुरू हो चुका है। एक बिलकुल नई जगमगाती पीढ़ी समूचे परिदृश्य पर क़ब्ज़ा जमा चुकी है। उसने तमाम शक-शुब्हा नेस्तनाबूद कर अपनी फ़िल्मों में लोकप्रिय चरित्रों की ऐसी बुनियादें डाली हैं जिसने बीसवीं शताब्दी के तमाम प्रतिमानों की चूलें हिला दी हैं। स्थापित प्रतिमानों को ख़ारिज करने की जहमत उठाने में इसकी कोई रुचि नहीं है। वह उन प्रतिमानों को अपने दौर के साथ खड़ा करती है। और उनसे एक क़दम आगे जाकर। कई मायनों में सौ क़दम पीछे रहते हुए भी। वह जिसे प्रथम पुरुष कहा जाता है, कोई चालीस साल बाद अपनी किताबी ज़ुबान की चौहद्दी से बाहर निकला है। आज आशुतोष गोवारीकर, संजय लीला भंसाली, मधुर भंडारकर, राजकुमार हीरानी, करन जौहर और आदित्य चोपड़ा उन फ़िल्मकारों के नाम हैं जिनकी फ़िल्में सिर्फ़ सितारों के नाम से नहीं पहचानी जातीं। आज फिर परिदृश्य सुनहरे दौर की तरह ही भरा-पूरा है। इसमें कोई शक नहीं कि यह एक नए सुनहरे दौर की शुरुआत है। लेकिन बस शुरुआत।
Bazar Ke Bazigar
Prahlad Agarwal
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Film Nirdeshan
- Author Name:
Kuldeep Sinha
-
Book Type:

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भारत विश्व के ऐसे देशों की श्रेणी में शुमार किया जाता है जहाँ सबसे अधिक फ़िल्मों का निर्माण होता है, लेकिन विडम्बना यह है कि फ़िल्म निर्देशन पर अब तक हिन्दी में कोई किताब नहीं थी। कुलदीप सिन्हा ने 'फ़िल्म निर्देशन' पुस्तक लिखकर यह कमी पूरी कर दी है, इसलिए उनकी यह पहल ऐतिहासिक है। श्री सिन्हा पुणे फ़िल्म इंस्टीट्यूट से प्रशिक्षित फ़िल्मकार हैं। राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त अनेक फ़िल्मों के वे निर्माता-निर्देशक रहे हैं। इसलिए उनकी इस पुस्तक में निर्देशन के सैद्धान्तिक विवेचन के साथ ही उसके व्यावहारिक पक्ष को सूक्ष्मता और विस्तार से विवेचित किया गया है। पुस्तक 11 दृश्यों में विभक्त है। प्रत्येक दृश्य में निर्देशन के अलग-अलग मुद्दों तथा तकनीकी प्रसंगों को सहजता के साथ स्पष्ट किया गया है। श्री सिन्हा पहले बताते हैं कि फ़िल्म को फ़्लोर पर ले जाने के पूर्व क्या तैयारी करनी चाहिए! फ़िल्म की निर्माण-योजना में सन्तुलन के लिए क्या सावधानी बरतें! इसके बाद उन्होंने संक्षेप में पटकथा-लेखन के प्रमुख बिन्दुओं की भी चर्चा की है। लाइटिंग और कम्पोजीशन के सिलसिले में व्यावहारिक सुझाव दिए हैं। फ़िल्म सेंसरशिप की कार्यप्रणाली तथा उसके विषय पर प्रकाश डाला है। और अन्त में 'निर्देशक' कुलदीप सिन्हा ने अपनी पसन्द के कुछ हिन्दी फ़िल्म निर्देशकों जैसे—शान्ताराम, विमल राय, गुरुदत्त और राजकपूर आदि के ऐतिहासिक योगदान का महत्त्वपूर्ण विश्लेषण किया है। इसी प्रसंग में भारत में सिनेमा के इतिहास का संक्षिप्त रेखांकन भी हो गया है। आम लोग इस पुस्तक से यह आसानी से जान सकते हैं कि जो सिनेमा वे इतने चाव से देखते हैं, वह बनता कैसे है? और जो लोग फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में जाना चाहते हैं, उनके लिए यह पुस्तक प्रवेशद्वार की तरह है। जो लोग फ़िल्म आलोचना से सम्बद्ध हैं, उनके सामने कुलदीप सिन्हा की यह पुस्तक अनेक अनुद्घाटित व्यावहारिक पक्षों को सामने लाती है। कुलदीप सिन्हा की इस बहुआयामी पुस्तक की उपयोगिता को देखते हुए मैं उन्हें इस नए दौर का 'सिनेमा गुरु' कहना चाहता हूँ। —सुरेश शर्मा, राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फ़िल्म आलोचक।
Film Nirdeshan
Kuldeep Sinha
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Uttal Umang
- Author Name:
Prahlad Agarwal
-
Book Type:

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सुभाष घई पिछले लगभग पाँच दशकों से सृजनरत हैं। एक नाचीज़ से शुरू हुई उनकी रचना-यात्रा शिखर-सन्धान करते हुए आज भी जारी है। ‘कालीचरण’ की शुरुआत का अनजाना व्यक्तित्व हिन्दी सिनेमा में एक प्रतिमान की तरह स्थापित हो चुका है। इस तरह कि उसकी कठोरतम आलोचना भी की जा सकती है लेकिन उपेक्षा नहीं। आज सुभाष घई एक विशाल कॉरपोरेट साम्राज्य के शीर्षपुरुष हैं। उनकी निर्माण संस्था के अन्तर्गत अनेक फ़िल्मकार फ़िल्में बना रहे हैं। फ़िल्म निर्माण से सम्बन्धित अनेक उपक्रमों के वे मालिक हैं। उन्होंने अपनी पिछली कई फ़िल्में ख़ुद ही प्रदर्शित की हैं और अब वितरण व्यवसाय में भी प्रवेश कर चुके हैं। उनका इरादा फ़िल्म निर्माण से सम्बन्धित प्रशिक्षण देनेवाला एक विराट संस्थान भी आरम्भ करने का है, कहा जाता है कि उसकी सारी तैयारियाँ पूरी कर ली गई हैं। पर हमारे लिए या कहना चाहिए कि सिनेमा के आशिकों के लिए सबसे बढ़कर महत्त्व का उनका फ़िल्मकार व्यक्तित्व है जिसने उन्हें लाखों दिलों की चाहतों में शामिल किया है। हमारी यह किताब सुभाष घई के फ़िल्मकार व्यक्तित्व से ही मुख़ातिब है जिसका हमसे लगातार प्रगाढ़ सम्बन्ध बनता चला गया। कई जानकारियों से अवगत कराती एक बेहद महत्त्वपूर्ण कृति।
Uttal Umang
Prahlad Agarwal
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Dhuno Ki Yatra
- Author Name:
Pankaj Raag +1
-
Book Type:

- Description:
‘धुनों की यात्रा’ हिन्दी फ़िल्म के संगीतकारों पर केन्द्रित ऐसी पहली मुकम्मिल और प्रामाणिक पुस्तक है, जिसमें सन् 1931 से लेकर 2005 तक के सभी संगीतकारों का श्लाघनीय समावेश किया गया है। संगीतकारों के विवरण और विश्लेषण के साथ उनकी सृजनात्मकता को सन्दर्भ सहित संगीत, समाज और जनाकांक्षाओं की प्रवृत्तियों से गुज़रते पहली बार इस पुस्तक के माध्यम से रेखांकित किया गया है। ‘धुनों की यात्रा’ में मात्र संगीत की सांख्यिकी को ही नहीं देखा गया है, वरन् संगीत रचनाओं के तत्कालीन जैविक और भौतिक अनुभूतियों के साथ ही संगीत के राग, ताल, प्रभाव, बारीकी और उसकी विशिष्टताओं के साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवेश, चेतना और उसके पुराने एवं नए ढहते और बनते रूपाकारों को उसके उल्लास, आवेश-आवेग, संघर्षों एवं संयोजनों को भी सूक्ष्मता के साथ विवेचित किया गया है। आम तौर पर फ़िल्मी संगीत के बारे में धारणा और प्रारम्भिक आकर्षण रोमान का ही होता है। ‘धुनों की यात्रा’ इस मिथकीय भ्रम को तोड़ती है। स्वातंत्र्य चेतना के प्रादुर्भाव, स्वतंत्रता आन्दोलन, रूढ़ सामाजिक विसंगतियों के प्रति अलगाव, विभिन्नता, बहुलता और बहुमत के प्रति लगाव, जनाकांक्षा की तीव्र अभिव्यक्ति, धर्म और बाज़ार के खंड-खंड पाखंड, युवा और युवतर चेतना की सशक्त वैश्विक दृष्टि, उनकी शैलियों और उनके समय की पड़ताल के सन्दर्भ में यह पुस्तक फ़िल्मी संगीत पर सर्वथा नए दृष्टि पथ का निर्माण करती है। स्वतंत्रता के पूर्व की चेतना से लेकर आज के भूमंडलीकरण के दौर तक, संगीत की सन्दर्भों के साथ बदलती प्रवृत्तियों की यह यात्रा आम पाठकों और संगीत रसिकों के लिए तो उपयोगी है ही; साथ ही भारतीय फ़िल्म संगीत के इतिहास, सांगीतिक धुनों की छवि और छाप, शैलियों की विविधता और विशिष्टता, राग और तालों के विवरण और विस्तार तथा फ़िल्म संगीत के क्रमिक विस्तार के तत्त्वों और सन्दर्भों के कारण फ़िल्म संगीत के विद्यार्थियों के लिए भी यह अनिवार्य सन्दर्भ पुस्तक के रूप में महत्त्वपूर्ण और उपयोगी होगी।
Dhuno Ki Yatra
Pankaj Raag
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Lekhak Ka Cinema
- Author Name:
Kunwar Narayan +1
-
Book Type:

- Description:
कुँवर नारायण अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित कवि हैं। वह विश्व सिनेमा के गहरे जानकारों में हैं। उन्होंने आधी सदी तक सिनेमा पर गम्भीर, विवेचनापूर्ण लेखन किया है, व्याख्यान दिए हैं। ‘लेखक का सिनेमा’ उन्हीं में से कुछ प्रमुख लेखों, टिप्पणियों, व्याख्यानों और संस्मरणों से बनी पुस्तक है। इसमें अनेक अन्तरराष्ट्रीय फ़िल्मोत्सवों की विशेष रपटें हैं, जो लेखकीय दृष्टिकोण से लिखी गई हैं और बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। इस किताब में वे कला, जीवन, समाज और सिनेमा, इन सबके बीच के सम्बन्धों को परिभाषित, विश्लेषित करते हुए चलते हैं। इसमें सिनेमा के व्याकरण की आत्मीय मीमांसा है। यहाँ देख डालने, सोच डालने की जल्दीबाज़ी नहीं है, बल्कि विचार एक लम्बी, निरन्तरता से भरी प्रक्रिया है, जो उतनी ही गझिन है, जितनी फ़िल्म बनाने की प्रक्रिया।
प्रसिद्ध फ़िल्मों व निर्देशकों के अलावा उन निर्देशकों व फ़िल्मों के बारे में पढ़ना एक धनात्मक अनुभव होगा, जिनका नाम इक्कीसवीं सदी के इस दूसरे दशक तक कम आ पाया। हिन्दी किताबों से जुड़ी नई पीढ़ी, जो विश्व सिनेमा में दिलचस्पी रखती है, के लिए इस किताब का दस्तावेज़ी महत्त्व भी है।
अर्जेंटीना के लेखक बोर्हेस की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं—‘‘मैं वे सारे लेखक हूँ जिन्हें मैंने पढ़ा है, वे सारे लोग हूँ जिनसे मैं मिला हूँ, वे सारी स्त्रियाँ हूँ, जिनसे मैंने प्यार किया है, वे सारे शहर हूँ जहाँ मैं रहा हूँ।’’ कुँवर नारायण के सन्दर्भ में इसमें जोड़ा जा सकता है कि मैं वे सारी फ़िल्में हूँ जिन्हें मैंने देखा है।
Lekhak Ka Cinema
Kunwar Narayan
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Cinema Ko Padhte Huye
- Author Name:
Shivani Rakesh
-
Book Type:

- Description:
सामान्य दर्शक फिल्मों को सिर्फ मनोरंजक दृश्य माध्यम के रूप में देखता है, लेकिन शिवानी राकेश की इस किताब की मूल स्थापना ही यही है कि फिल्में सिर्फ देखी ही नहीं जातीं, बल्कि पढ़ी भी जाती हैं। रचनाकार ने कई विश्व स्तरीय सिने-सिद्धान्तकारों का उद्धरण देते हुए यह स्पष्ट किया है कि सिनेमा के इस ‘पाठ’ के लिए हमें फिल्मों को सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक अनुशासनों के बीच रखकर परखना होता है। यदि हम इतिहास की समझ के साथ इन फिल्मों को देखते हैं तो उन्हें नए नजरिये से देखने का मौका मिलता है। यह किताब हिन्दी सिनेमा की कई प्रमुख फिल्मों का विश्लेषण करते हुए उन्हें एक विमर्श के रूप में देखने का दृष्टिकोण देती है और यही इसकी सफलता है। लेखक ने भारतीय सिनेमा की अनेक फिल्मों का गहन विश्लेषण किया है। पुस्तक में अन्तर्वस्तु विश्लेषण पद्धति का उपयोग करते हुए कई चर्चित और कलात्मक रूप से उत्कृष्ट कही जाने वाली फिल्मों के पात्रों, कथानकों और संवादों का विस्तृत अध्ययन किया है। इस किताब में आप महिलाओं के मुद्दों पर बनी फिल्में, प्रवासी सिनेमा, युद्ध आपदा और दूसरे कई भिन्न विषयों पर आधारित फिल्मों के बारे में विस्तार से जान सकते हैं। भारतीय सिनेमा के इतिहास से लेकर सिनेमा में उठाए गए सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर भी इस किताब में विस्तृत चर्चा की गई है। मुझे यकीन है कि यह किताब छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए एक उपयोगी सन्दर्भ सामग्री के रूप में अपनी जगह बनाएगी।
—दिनेश श्रीनेत
Cinema Ko Padhte Huye
Shivani Rakesh
20% offAvailable
The Lyrics & Songs category celebrates India’s musical and poetic heritage. This shelf brings together songbooks, lyric collections, poetic anthologies, devotional songs, folk compositions, film lyrics, and curated works of iconic lyricists across Indian languages. These books help readers explore the depth, metaphor, rhythm, and cultural context behind beloved songs.
What readers will find here:
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Film song lyrics from Hindi, Tamil, Telugu, Malayalam, Bengali, Marathi cinema
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Devotional songs: bhajans, kirtans, abhangs, dohas, vachanas
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Folk song collections from Rajasthan, Bengal, Northeast India, Karnataka, Maharashtra
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Classical compositions: Hindustani & Carnatic lyrics, bandish, kritis
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Lyricist anthologies (old & contemporary)
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Poetry–song crossover collections
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Translation-based songbooks for multilingual accessibility
What types of books are included under lyrics and songs?
This category includes film lyrics, devotional songs, folk compositions, classical music lyrics, lyricist anthologies, and translated song collections.
Who should read song and lyric books?
Music learners, singers, students preparing for cultural programs, poetry lovers, and anyone exploring India’s musical traditions.
Are devotional songs included in this category?
Yes. Bhajans, kirtans, shlokas, abhangs, sufi kalaam, and other devotional compositions are featured.
What makes published lyric books better than online lyrics?
They offer accurate, authorised, and complete versions without transcription errors.