Bhikhari Thakur

Bhikhari Thakur

तो हुआ कुछ यूँ कि Rachnaye के एक Social Media post पर, ये प्रश्न आया की,


भिखारी ठाकुर को भोजपुरी का शेक्सपीयर क्यों कहा जाता है? कालिदास से तुलना क्यों नहीं होती?
क्या यह उपाधि आधिकारिक है?
क्या शेक्सपीयर कालिदास से बड़े नाटककार थे?


इन प्रश्नों को समझने और वास्तविक रूप देने के प्रयास से यह लेख है.


भिखारी ठाकुर को “भोजपुरी का शेक्सपीयर” क्यों कहा गया, “भोजपुरी का कालिदास” क्यों नहीं?

भारतीय भाषाओं के बड़े रचनाकारों के साथ एक दिलचस्प और कभी-कभी परेशान करने वाली बात होती है। जैसे ही कोई लेखक अपनी भाषा, अपने समाज और अपने समय पर असाधारण प्रभाव डालता है, हम उसे समझाने के लिए किसी पहले से प्रतिष्ठित “वैश्विक” नाम का सहारा लेने लगते हैं। यही वजह है कि भिखारी ठाकुर को लंबे समय से “भोजपुरी का शेक्सपीयर” कहा जाता रहा है। The Hindu ने भी उन्हें इसी नाम से याद किया, और साथ ही यह भी रेखांकित किया कि वे भोजपुरी समाज के साधारण लोगों के बीच असाधारण सांस्कृतिक प्रतिष्ठा रखते थे।

लेकिन यहीं से असली प्रश्न पैदा होता है। अगर भिखारी ठाकुर भोजपुरी के इतने बड़े नाटककार, लोककवि, अभिनेता और सांस्कृतिक व्यक्तित्व थे, तो उन्हें “भोजपुरी का कालिदास” क्यों नहीं कहा गया? क्या शेक्सपीयर, कालिदास से ऊँचे नाटककार थे? या यह पूरी तुलना ही किसी और इतिहास की देन है या औपनिवेशिक मानसिकता का? इस प्रश्न का उत्तर केवल साहित्यिक नहीं है; इसमें रंगमंच, सांस्कृतिक स्मृति, औपनिवेशिक शिक्षा, भाषाई प्रतिष्ठा और लोक बनाम शास्त्र की बहस सब एक साथ जुड़ते हैं।


भिखारी ठाकुर केवल नाटक लिखने वाले लेखक नहीं थे। वे भोजपुरी क्षेत्र के लोकनाट्य परंपरा के ऐसे कलाकार थे जिन्होंने लेखन, गायन, अभिनय, नृत्य और सामाजिक टिप्पणी, इन सबको एक साथ जोड़ा। उन्हें भोजपुरी का बड़ा लोकनाटककार, कवि, गीतकार, अभिनेता और सामाजिक चेतना से जुड़ा कलाकार माना जाता है। The Hindu ने उन्हें poor and marginalised voices का प्रतिनिधि कहा, जबकि अन्य स्रोत उनके नाटकों को migration, women’s suffering, caste, poverty और social reform जैसे विषयों से गहराई से जोड़ते हैं।


उनकी सबसे चर्चित कृतियों में बिदेसिया, बेटी बेचवा, गबरघिचोर, विधवा विलाप, कलजुग प्रेम और गंगा असनान जैसी रचनाएँ आती हैं। इन कृतियों का दायरा केवल घरेलू दुख-सुख तक सीमित नहीं है; ये समाज के उन हिस्सों को मंच पर लाती हैं जिन्हें अक्सर उच्च साहित्य नज़रअंदाज़ कर देता है, मजदूर, स्त्रियाँ, निम्नवर्ग, जाति से दबे हुए लोग, और वे परिवार जो आर्थिक विवशता के कारण टूटते रहते हैं। इसीलिए भिखारी ठाकुर की चर्चा करते समय केवल “लोक” कहना काफी नहीं; वे लोक के भीतर से उठने वाली सामाजिक आलोचना के बड़े कलाकार हैं।


“भोजपुरी का शेक्सपीयर” यह उपाधि आई कहाँ से?

भिखारी ठाकुर के लिए “Shakespeare of Bhojpuri” वाली उपाधि कोई आज की सोशल मीडिया खोज नहीं है; यह लंबे समय से प्रचलित है। The Hindu की 2012 की रिपोर्ट में यह संबोधन साफ़ दिखाई देता है, और 2018 की रिपोर्ट में भी उन्हें Bhojpuri theatre का Shakespeare कहा गया। कुछ द्वितीयक स्रोत यह भी दर्ज करते हैं कि राहुल सांकृत्यायन ने यह उपाधि उनसे जोड़ी थी, हालांकि इस दावे की पुष्टि के लिए सावधानी ज़रूरी है क्योंकि हर स्रोत समान रूप से विश्वसनीय नहीं है। इतना तय है कि यह उपमा साहित्यिक संसार और पत्रकारिता, दोनों में जीवित रही है।


यहाँ समझने वाली बात यह है कि ऐसी उपाधियाँ अक्सर “रैंकिंग” नहीं बतातीं, बल्कि “सांस्कृतिक shorthand” बन जाती हैं। जैसे कोई कहे कि फलाँ व्यक्ति “अपने क्षेत्र का आइंस्टीन” है, तो उसका अर्थ यह नहीं कि उसने वही सिद्धांत दिए; अर्थ यह होता है कि वह अपने क्षेत्र में असाधारण प्रभावशाली, प्रतिनिधि और स्मरणीय है। भिखारी ठाकुर के मामले में “शेक्सपीयर” नाम इसलिए फिट बैठा क्योंकि वे भी नाटक, अभिनय और मंच, तीनों के आदमी थे; केवल किताब के लेखक नहीं। शेक्सपीयर भी कवि और नाटककार होने के साथ अभिनेता थे और एक रंगदल से गहराई से जुड़े थे।


शेक्सपीयर से तुलना किस आधार पर समझ में आती है?

शेक्सपीयर की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह है कि वे “थिएटर के भीतर” पैदा हुए लेखक हैं। वे मंच के लिए लिखते थे, प्रदर्शन के लिए लिखते थे, और उनका साहित्य दर्शक की प्रत्यक्ष उपस्थिति में अपना पूरा प्रभाव ग्रहण करता था। ब्रिटानिका उन्हें poet, dramatist and actor बताता है और उनकी रंगमंचीय दुनिया को उनकी रचना का अभिन्न हिस्सा मानता है।

भिखारी ठाकुर के साथ भी यही बात दिखाई देती है। वे केवल पाठ्य लेखक नहीं थे; वे troupe बनाते थे, मंच पर उतरते थे, गाते थे, अभिनय करते थे, और अपने दर्शक की सामाजिक भाषा में संवाद करते थे। बिदेसिया इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जो केवल एक नाटक नहीं रहा बल्कि भोजपुरी अंचल की एक नाट्य-शैली बन गया। उपलब्ध स्रोत बताते हैं कि बिदेसिया 1912 में रचा और मंचित किया गया, और उसकी लोकप्रियता इतनी व्यापक हुई कि वह एक सांस्कृतिक रूप में स्थापित हो गया।


यही कारण है कि “भोजपुरी का शेक्सपीयर” कहना एक हद तक समझ में आता है। दोनों के यहाँ मंचीय ऊर्जा है, जन-प्रभाव है, और प्रदर्शन-केंद्रित रचना है। लेकिन यहीं रुक जाना भिखारी ठाकुर के साथ अन्याय भी है, क्योंकि उनकी सामाजिक ज़मीन शेक्सपीयर से बहुत अलग है। शेक्सपीयर के यहाँ राजसत्ता, मनोविज्ञान, प्रेम, ईर्ष्या, महत्वाकांक्षा और त्रासदी का विराट संसार है; भिखारी ठाकुर के यहाँ आर्थिक विवशता, परदेशगमन, स्त्री का अकेलापन, जाति की चोट और सामाजिक विडंबना का लोक संसार है।


भिखारी ठाकुर की असली शक्ति: लोकजीवन की सामाजिक व्याख्या

भिखारी ठाकुर की कला को समझने के लिए बिदेसिया पर लौटना जरूरी है। इस नाटक का केंद्र migration है, वह ऐतिहासिक-सामाजिक यथार्थ जिसमें पूर्वी भारत के पुरुष रोज़गार के लिए कलकत्ता और दूसरे शहरों की ओर जाते थे, और पीछे छूट जाती थीं स्त्रियाँ, घर, प्रतीक्षा और असुरक्षा। एक शैक्षणिक स्रोत बताता है कि बिदेसिया जैसी रचनाएँ पीछे छूट गई स्त्रियों की पीड़ा और migration की पारिवारिक कीमत को सामने लाती हैं।


यहीं भिखारी ठाकुर केवल लोक-मनोरंजनकर्ता नहीं रहते; वे समाजशास्त्रीय संवेदना वाले कलाकार बन जाते हैं। उनके नाटकों में विवाह संस्था, स्त्री की देह और उसकी सामाजिक स्थिति, बूढ़े दूल्हों से कम उम्र की लड़कियों के विवाह, शराबखोरी, ढोंग और जातिगत अन्याय जैसे प्रश्न आते हैं। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार उनके रंगकर्म में oppressive, feudal, casteist and patriarchal structures के खिलाफ एक आंतरिक प्रतिरोध मौजूद था।


इस लिहाज़ से भिखारी ठाकुर को केवल “भोजपुरी का शेक्सपीयर” कह देना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इस उपाधि में उनके लोक-सुधारक, सामाजिक आलोचक और भाषाई जनतंत्रीय पक्ष की पूरी चमक नहीं आ पाती। वे एक ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने भोजपुरी को केवल बोली नहीं रहने दिया; उसे रंगमंच, कविता और सामाजिक अनुभव की शक्तिशाली भाषा बनाया।


फिर “भोजपुरी का कालिदास” क्यों नहीं?

अब आइए प्रश्न के दूसरे हिस्से पर। कालिदास संस्कृत साहित्य के शिखर कवि-नाटककार माने जाते हैं। ब्रिटानिका उन्हें “probably the greatest Indian writer of any epoch” कहता है। उनकी प्रामाणिक मानी जाने वाली छह रचनाओं में तीन नाटक, अभिज्ञानशाकुंतलम्, विक्रमोर्वशीयम् और मालविकाग्निमित्रम् शामिल हैं।


कालिदास का नाट्य-संसार शास्त्रीय सौंदर्य, रस, प्रकृति, स्मृति, प्रेम, विरह और भाव-संयम की दुनिया है। उनकी कलात्मकता अत्यंत परिष्कृत है। ब्रिटानिका अभिज्ञानशाकुंतलम् को भारतीय साहित्य की महानतम उपलब्धियों में रखता है, और कालिदास के नाटकों में dramatic refinement की बात करता है। इसलिए यह कहना कि कालिदास शेक्सपीयर से “छोटे” हैं, न तो ऐतिहासिक रूप से उचित है, न साहित्यिक रूप से।


फिर भी भिखारी ठाकुर के साथ “कालिदास” की उपमा क्यों नहीं जमी? इसका कारण साहित्यिक से ज्यादा सांस्कृतिक है। आधुनिक भारतीय सार्वजनिक आलोचना-भाषा पर अंग्रेज़ी शिक्षित ढाँचे का गहरा असर रहा। ऐसे में “X का Shakespeare” कहना जल्दी समझ में आने वाला मुहावरा बन गया, जबकि “X का Kalidasa” उतना प्रचलित shorthand नहीं बन पाया। यह औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक सांस्कृतिक मानस का असर है, न कि शुद्ध साहित्यिक न्याय। यह निष्कर्ष एक सांस्कृतिक inference है, लेकिन इसे शेक्सपीयर और कालिदास की स्थापित सार्वजनिक प्रतिष्ठाओं से मजबूती मिलती है।


क्या शेक्सपीयर कालिदास से बड़े नाटककार थे?

इसका ईमानदार उत्तर है: एक सार्वभौमिक पैमाना यहाँ काम ही नहीं करता। शेक्सपीयर की वैश्विक प्रतिष्ठा असाधारण है; ब्रिटानिका कहता है कि उनकी living reputation राष्ट्रीय सीमाओं से बहुत आगे जाती है और दुनिया भर में उनका पाठ और प्रदर्शन होता रहा है।


लेकिन कालिदास भारतीय काव्य-नाट्य परंपरा में उसी तरह शिखर हैं। वे किसी “स्थानीय” महत्त्व के लेखक नहीं, बल्कि शास्त्रीय भारतीय साहित्य के महाशिखर हैं। इसलिए सवाल “कौन बड़ा?” से ज़्यादा ठीक सवाल यह है कि “किस परंपरा में, किस तरह के नाटक के संदर्भ में, किस सौंदर्य-दृष्टि पर?” शेक्सपीयर को मनोवैज्ञानिक विस्तार, त्रासदी और नाटकीय चरित्र-निर्माण के लिए पढ़ा जाता है; कालिदास को रस, काव्यात्मकता और भाव-संयम की अद्वितीय सिद्धि के लिए।


भिखारी ठाकुर को “भोजपुरी का शेक्सपीयर” कहना गलत नहीं है, क्योंकि वह उनके रंगमंचीय प्रभाव, लोकप्रियता और प्रदर्शन-केंद्रित प्रतिभा को पहचानता है। लेकिन यह उपाधि अधूरी है, क्योंकि वह उनके लोक-सामाजिक संघर्ष, भोजपुरी समाज की पीड़ा को मंच पर लाने की क्षमता, और भाषाई-सांस्कृतिक लोकतंत्र में उनके योगदान को पूरा नहीं पकड़ती।


उन्हें “भोजपुरी का कालिदास” कहना भी संभव है, लेकिन वह दूसरी तरह से अधूरा होगा, क्योंकि भिखारी ठाकुर की असली ताकत शास्त्रीय परिष्कार नहीं, बल्कि लोक ऊर्जा, सामाजिक हस्तक्षेप और मंचीय प्रत्यक्षता है। सच तो यह है कि भिखारी ठाकुर को समझाने के लिए उधार की उपाधियाँ उपयोगी तो हो सकती हैं, पर्याप्त नहीं। वे अपने आप में एक मानक हैं, भोजपुरी रंगमंच, लोकसाहित्य और सामाजिक चेतना के ऐसे रचनाकार, जिन्हें समझने के लिए हमें भोजपुरी समाज के इतिहास, श्रम, प्रवासन, जाति और स्त्री-अनुभव की पूरी पृष्ठभूमि में उतरना पड़ता है।


भिखारी ठाकुर “भोजपुरी के शेक्सपीयर” कहे जा सकते हैं, लेकिन उससे भी अधिक सही यह है कि वे भोजपुरी के अपने, अद्वितीय और अप्रतिम भिखारी ठाकुर हैं।

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