Satire

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Raag Darbari

  • Author Name:

    Shrilal Shukla

  • Book Type:
  • Description:

    ‘राग दरबारी’ एक ऐसा उपन्यास है जो गाँव की कथा के माध्यम से आधुनिक भारतीय जीवन की मूल्यहीनता को सहजता और निर्ममता से अनावृत्त करता है। शुरू से आख़िर तक इतने निस्संग और सोद्देश्य व्यंग्य के साथ लिखा गया हिन्दी का शायद यह पहला बृहत् उपन्यास है। फिर भी ‘राग दरबारी’ व्यंग्य-कथा नहीं है। इसका सम्बन्ध एक बड़े नगर से कुछ दूर बसे हुए गाँव की ज़िन्दगी से है, जो इतने वर्षों की प्रगति और विकास के नारों के बावजूद निहित स्वार्थों और अनेक अवांछनीय तत्त्वों के सामने घिसट रही है। यह उसी ज़िन्दगी का दस्तावेज़ है। 1968 में ‘राग दरबारी’ का प्रकाशन एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक घटना थी। 1971 में इसे ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया और 1986 में एक दूरदर्शन-धारावाहिक के रूप में इसे लाखों दर्शकों की सराहना प्राप्त हुई। वस्तुतः ‘राग दरबारी’ हिन्दी के कुछ कालजयी उपन्यासों में से एक है।

Raag Darbari

Raag Darbari

Shrilal Shukla

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Available

Paavati Kaun Dega

  • Author Name:

    Priy

  • Book Type:
  • Description:

    प्रिय का सधा हुआ चमकदार गद्य उनके व्यंग्य को वह ज़रूरी धार मुहैया कराता है जिसकी अनुपस्थिति में इस तरह के लेखन के सामने दोहराव का जोखिम बना रहता है। उनके लेखन में जीवन से सीधी मुठभेड़ करते आमजन के लिए स्पष्ट प्रतिबद्वता तो नज़र आती ही है, उनके अध्ययन के विस्तृत और दिलचस्प दायरे की झलक भी मिलती है। वे बड़ी आसानी से भाषा और शैलियों के अलग-अलग रास्तों में आवाजाही करना जानते हैं और उनकी चपल और संवेदनशील दृष्टि चीज़ों के आरपार देखने का हौसला रखती है। प्रिय का यह पहला संग्रह समकालीन साहित्य में उनकी मजबूत उपस्थिति को दर्ज करेगा। -अशोक पाण्डे प्रिय हिन्दी व्यंग्य की उम्मीद हैं। उनके लेखन में राजनीतिक जुमलों से भरमाने वाली अभिव्यक्ति नहीं बल्कि उससे आगे निकलता सहज परिहास है। बीते अनेक दशकों से व्यंग्य के नाम पर बौद्विक कुण्ठा परोसी जा रही थी। कभी-कभी कुण्ठा के ऐसे ही प्रस्तुतिकरण को राजनीतिक चेतना भी कह दिया जाता रहा है। प्रिय की लिखत में सिर्फ राजनीति नहीं, हमारे आसपास का आम परिवेश है। प्रिय, तुम ‘पारसाई’ से बचते हुए हमाम की हलचल बताते रहो।

Paavati Kaun Dega

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Priy

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Media Ka Character Dheela!

  • Author Name:

    Mukesh Kumar

  • Book Type:
  • Description:

    हाथियों को वीडियो में खिचड़ी खाते मानव के रंग-ढंग ठीक नहीं लगे। वह दोपायें सामने खड़े स्तनपायी के सामने ऐसे दोहरा हो रहा था मानो उसके पास मेरुदंड न हो। उन्हें ये समस्त स्तनपायी प्राणियों के लिए घोर अपमान और शर्मनाक लगा। उसकी लपर-लपर चलती जीभ उन्हें किसी और प्राणी की लगी, जिससे उन्हें और भी पीड़ा हुई। हर चैनल इसी बेशरम रंग से रंगा हुआ है। ऐंकरानियों को बेशरम रंग से इश्क़ हो गया। उन्होंने भक्ति प्रदर्शित करने के लिए अपनी चुनरी बेशरम रंग में रंगा ली और स्टूडियो में गाने लगीं..... दीवानी... दीवानी। यही हाल ऐंकरों का हुआ। दर्शकों को धोखा देने के लिए वे ब्लैक एंड व्हाइट करते रहे, मगर उनके टाई, पैंट, कोट सब बेशरम रंग के हो गए। -इस पुस्तक से

Media Ka Character Dheela!

Media Ka Character Dheela!

Mukesh Kumar

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KUCHH SHARIF KUCHH SHARARTI

  • Author Name:

    Ram Badan Ray

  • Book Type:
  • Description:

    Satire

KUCHH SHARIF KUCHH SHARARTI

KUCHH SHARIF KUCHH SHARARTI

Ram Badan Ray

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Papi Vote Ke Liye

  • Author Name:

    Dinanath Mishra

  • Book Type:
  • Description:

    दिल्ली भारत का टिकट धाम है। टिकटार्थी चुनावों के पावन पर्व पर यहाँ तीर्थयात्रा को आते हैं। झुंड-के-झुंड घूमते रहते हैं। टिकट मंदिरों में माथा टेकने जाते हैं। सुबह से शाम तक दर्जनों नेताओं के पास, नेताओं के चमचों के पास दस्तक देते हैं। एक ही पुकार होती है—‘टिकटं देहि, टिकटं देहि।’ उनके विन्यास में सांस्कृतिक झलक होती है। ‘चाणक्य’ धारावाहिक में आपने ब्रह्मचारियों को सुबह-सुबह ही ‘भिक्षां देहि, भिक्षां देहि’ कहते सुना होगा। एक-एक सीट के लिए दस-दस, बीस-बीस टिकटार्थी आते हैं। हर एक के साथ उनका समर्थक मंडल होता है। सभी उम्मीदवारों के पास अपने जीतने के समीकरण होते हैं। लोकसभा चुनाव-क्षेत्र में उनकी जाति के कम-से-कम दो लाख वोट तो होते ही हैं। और किस-किस जाति में कितना समर्थन मिल जाएगा, इसका पूरा हिसाब होता है। जीतने का विश्‍वास उनमें लबालब भरा होता है। उनके और उनकी जीत के बीच में सिर्फ टिकट बाधा होती है। हफ्तों टिकट साधना करते हैं। मैं ‘साधना’ जानबूझकर कह रहा हूँ। उन्हें न भोजन की याद आती है, न नाश्ते की। न उन्हें नींद आती है, न चैन आता है। साधना में वे टिकटलीन हो जाते हैं। उन्हें देखकर लगता है कि भारत सचमुच ही एक आध्यात्मिक देश है। जो टिकटलीन हो सकता है, वह ईश्‍वर में भी ओत-प्रोत हो सकता है। —इसी पुस्तक से ये व्यंग्य अपनी पठनीयता के दावेदार तब भी थे, जब अखबार के माध्यम से लाखों मन को छू रहे थे और अब भी हैं, जब पुस्तक के कलेवर में आपके हाथों में हैं।

Papi Vote Ke Liye

Papi Vote Ke Liye

Dinanath Mishra

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Shesh Agale Prishth Par

  • Author Name:

    K. D. Singh

  • Book Type:
  • Description:

    यह किताब एक ऐसे लेखक की है जो लेखन की दुनिया का पेशेवर बाशिन्दा नहीं है, फिर भी गद्य की एकदम ताज़ा पृष्ठभूमि से आया है, जहाँ विद्यार्थी जीवन के हल्के-फुल्के और रोचक अनुभवों के छोटे-छोटे टुकड़े हैं। उसने स्वयं कहा है कि ‘यह उपन्यास नहीं है’ और मैं इस तरह की कोशिश को ‘विधाओं में एक तोड़-फोड़’ कहता हूँ। यह तोड़-फोड़ सार्थक है, समर्थ है और पठनीय है। नये लोग कविता की तरह गद्य में भी नई संरचना लेकर आएँगे तो निश्चित ही समृद्धि आएगी—भाषा में, रूप में और विन्यास में भी। —दूधनाथ सिंह

Shesh Agale Prishth Par

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K. D. Singh

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Animal Farm

  • Author Name:

    George Orwell

  • Book Type:
  • Description:

    Animal Farm was first published in England on 17 August 1945. It talks about the story of some animals living in a farm trying to stand up against the human farmer, with the hope of creating an equal, happy and unbound society for themselves. Filled with enthusiasm and motivated to rule over themselves, they create an utopia of equality, freedom and justice. The book is a satirical allegorical novella by George Orwell, a must-read for young readers. Orwell was born on 25 June 1903 in Eastern India, he was the son of a Bristish colonial civil servant. Educated in England, left Eton and joined the Indian Imperial Police in Burma, then a Bristish colony. He resigned from his job in 1927 and choose writting as his profession. 'Animal Farm' is one of his most widely known book of 20th century, a fable published in 1945 based on the events of Russia's Bolshevik revolution. The book gave Orwell a stable financial status.

Animal Farm

Animal Farm

George Orwell

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Anjam-e-Gulistan Kya Hoga

  • Author Name:

    Pallavi Trivedi

  • Book Type:
  • Description:

    Description Awaited

Anjam-e-Gulistan Kya Hoga

Anjam-e-Gulistan Kya Hoga

Pallavi Trivedi

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Fir Aaya Mausam Chunav Ka

  • Author Name:

    Sunita Shanoo

  • Book Type:
  • Description:

    मैं जो हूँ तो हूँ… जब जिंदगी में तकलीफें इस कदर बढ़ जाएँ कि खुशियाँ मुँह चिढ़ाने लग जाएँ, और लगे कि अब बस आँसुओं को निकलने से कोई रोक नहीं सकता, तो खुद को इतना गुदगुदाओ, हँसाओ कि आँसू निकल आएँ और तुम कह सको—अरे यार! ये तो खुशी के आँसू हैं।...मैं भी ऐसा ही कुछ करती हूँ। जब दुःख-परेशानियाँ अपनी हदें पार कर जाती हैं, और क्रांति फिल्म की तरह खुद को कभी उलटा तो कभी सीधा खूँटी पर टँगा पाती हूँ तो आज भी मैं वही गाना गाती हूँ, मेरा चना खा गए गोरे, मारें हमको कोड़े, फिर भी निकला न है दम, चना जोर गरम। मैं जो हूँ, बस ऐसी ही हूँ, और उम्मीद करती हूँ कि मेरा यह व्यंग्य-संग्रह आपको डिस्प्रीन, क्रोसिन से निजात दिलाएगा।

Fir Aaya Mausam Chunav Ka

Fir Aaya Mausam Chunav Ka

Sunita Shanoo

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Sire Se Kharij

  • Author Name:

    Anoop Mani Tripathi

  • Book Type:
  • Description:

    त्रासदी जब जीवन में रोजमर्रा का हिस्सा बन जाती तो वह प्रहसन बन जाती है। दुःख की सघनता करुणा या क्रोध की जगह एक निर्मम हँसी के शिल्प में व्यक्त होती है। व्यंग्य का सम्बन्ध विनोद से नहीं गहरी करुणा से जुड़ा होता है। हरिशंकर परसाई की परम्परा और श्रीलाल शुक्ल की पाठशाला के सिद्ध और प्रसिद्ध व्यंग्यकार अनूप मणि त्रिपाठी की रचनाओं का मूल स्वभाव यही है। एक ऐसे समय में जब लगातार बदरूप होता जा रहा यथार्थ असम्भव कल्पनाओं का भी अतिक्रमण करता जा रहा है तब चित्रण की पुरानी और प्रचलित यथार्थवादी शैली आज के यथार्थ को पकड़ने में नाकाफी होने लगी है। इसी वजह से कविता में फैन्टेसी और बिम्बों का चलन बढ़ा और गद्य का स्वभाव व्यंग्यात्मक होता जा रहा है। ‘सिरे से ख़ारिज’ संग्रह आज की राजनीतिक, सामाजिक (और साहित्यिक भी) विडम्बनाओं पर लेखक की गहरी प्रतिक्रिया और तीखी टिप्पणी के रूप में हमेशा दर्ज किया जाएगा। भले ही लेखक ने रावण की कल्पित कहानियाँ लिखी हैं, लेकिन वह कल्पित रावण की सच्ची कहानियों के रूप में पढ़ी जाएँगी। तब लोग पाएँगे कि इस आर्यावर्त में राजा के प्रेम-पत्र का आलम्बन भारत माता नहीं, सूखे काठ की ठूँठ कुर्सी रही है। 'सिरे से ख़ारिज' के इन वाकयात की असली ताकत यह है कि किताब के हाथ में होने तक ये आपको गुदगुदाएँगे और जब आप पढ़कर किताब को रख देंगे तो धीरे-धीरे अपने आगोश में जकड़ते चले जाएँगे। —देवेन्द्र

Sire Se Kharij

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Anoop Mani Tripathi

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Rishwat Mahadevi Ki Jai!

  • Author Name:

    Yashwant Kothari

  • Book Type:
  • Description:

    हे सर्वव्यापिनी, सर्वशक्तिमान माँ रिश्वत, आपकी जय हो। विजय हो। आप अजेय हैं, आप धन्य हैं। इस हरी-भरी वसुंधरा पर सर्वत्र आपका ही साम्राज्य है। क्या घर, क्या ऑफिस, क्या सचिवालय और क्या उद्योग-धंधे, हर तरफ आपकी ही बहार है। इस हवा से कौन बच सकता है। आप कल भी थीं, आज भी हैं और कल भी रहेंगी। अंग्रेजों के जमाने में आप‘ ‘डाली’ के नाम से मशहूर थीं, फिर दस्तूर हुईं, चंदा हुईं, कुमकुम, काजल हुईं और अब तो आप सर्वमान्य माँ भवानी हुई जा रही हैं। मायारूपी रूपसी आप तो साक्षात् नवदुर्गा हैं। कुरसी तो आपकी अनुजा है, हे कलियुगी भवानी! आपको सहस्रों प्रणाम! है कोई इस वीर महि पर जो आपके प्रभाव को नकार सके। चाँदी के जूते के सामने मुँह खोल सके। आपके एक रुपए में सवा रुपए की शक्ति है। आपको चढ़ाया प्रसाद पाने को मंत्री, संत्री, अफसर, चमचे, चपरासी सब तरसते हैं। आप काली हों या सफेद, गुणवाली हैं। आप सचमुच महान हैं। —इसी संग्रह से गरीबी, भूख, मध्यम वर्ग, रिश्वत, समाज, चमचावाद, कविकर्म, भ्रष्टाचार, आम आदमी की परेशानियों को इन व्यंग्यों में प्रमुखता से उठाया गया है। मानवीय त्रासदियों को उकेरा गया है; दुष्कर्म पर विचार किया गया है; साहित्यिक व्यंग्य भी हैं; कला संस्कृति को भी व्यंग्य का विषय बनाया है। इस संग्रह में राजनैतिक व्यंग्य भी हैं, जो आज के राजधर्म को परिभाषित करते हैं। कुल मिलाकर यह एक पठनीय और संग्रहणीय व्यंग्य-संकलन है, जो आज के समाज की विसंगतियाँ और विद्रूपताओं पर तीक्ष्ण प्रहार करता है।s

Rishwat Mahadevi Ki Jai!

Rishwat Mahadevi Ki Jai!

Yashwant Kothari

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Neki Kar, Akhbar Main Dal

  • Author Name:

    Alok Puranik

  • Book Type:
  • Description:

    तमाम दरियाओं की गन्दगी देखकर पता लगता है कि लोग अब दरियाओं में नेकी तो नहीं डालते। कोई वक़्त रहा होगा, जब नेकी दरिया में डाली जाती थी। कोई वक़्त रहा होगा, जब साधु-सन्त प्रवचन करते थे, अब प्रवचनों की मार्केटिंग होती है। रामकथा की मार्केटिंग होती है। राम की मार्केटिंग होती है। राम के चाकर तुलसीदास ने लिखा था कि बड़ी मुश्किल से खाने का इन्तज़ाम हो पाता है, मस्जिद में सोना पड़ता है। अब राम के चाकर एक मस्जिद छोड़, पचास मस्जिद भर की जगह क़ब्ज़ा कर लें। राम की चाकरी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नौकरी के रिटर्न इधर समान हो गए हैं। राम की चाकरी में लगे सीनियर लोग भी मर्सिडीज में चल रहे हैं और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नौकरी में लगे सीनियर लोग भी मर्सिडीज में चल रहे हैं। राम का कारोबार इधर बहुत रिटर्न वाला हो गया है। ग़ौर से देखने पर पता चलता है कि बाज़ार सिर्फ़ वहाँ नहीं है, जहाँ वह दिखाई पड़ता है। बाज़ार वहाँ भी है, जहाँ वह दिखाई नहीं पड़ता है।

    बाज़ार के इस छद्म को पकड़ने की चुनौती ख़ासी जटिल है। यह किताब इस छद्म को समझने में महत्त्वपूर्ण मदद करती है। व्यंग्य के लपेटे से कुछ भी बाहर नहीं है, इस कथन की पुष्टि इस किताब में बार-बार होती है।

     

Neki Kar, Akhbar Main Dal

Neki Kar, Akhbar Main Dal

Alok Puranik

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₹ 95

₹ 76

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Roshani Ki Shinakht

  • Author Name:

    Gyan Chaturvedi

  • Book Type:
  • Description:

    नदी को आदमी की चिन्ता है और आदमी को विकास की। विज्ञान सोचने वाली मशीन बनाना चाहता कि मनुष्य को सहूलियत हो, लेकिन सत्ता सोच को नियंत्रित करनेवाला यंत्र चाहती है। अफ़सरी है जो अभी भी अपनी पुरातन पटरी पर चली जा रही है। पुलिस की तफ़्तीश है जो पीड़ित को अपराधी-सा अहसास करा रही है। ऐसी ही और अनेक उलटबाँसियाँ हैं जिन पर ज्ञान चतुर्वेदी के ये व्यंग्य बहुत साफ़, बहुत तीखे ढंग से उँगली रखते हैं। समाज, राजनीति, साहित्य-संस्कृति जहाँ भी कुछ उथला है, छूँछा है, बेईमान और इनसानियत के ख़िलाफ़ है उनकी नज़र से नहीं चूकता। ये व्यंग्य जो हैं उसकी अक्कासी-भर नहीं करते, बल्कि अपने आसपास के विद्रूप को देखने की दृष्टि भी देते हैं, कभी किसी रूपक में पिरोकर, कभी सीधी टिप्पणियों से। लेकिन यह व्यंग्य सब कुछ को स्याह नहीं दिखाता, जहाँ रोशनी है उसकी शिनाख़्त भी करता है। ‘रोशनी की शिनाख़्त’ व्यंग्य-संग्रह की भूमिका अपने आप में इस प्रस्तुति की उपलब्धि है जिसमें ज्ञान चतुर्वेदी वर्तमान हिन्दी व्यंग्य का अत्यन्त विचारोत्तेजक विश्लेषण करते हुए, देश के मौजूदा समय पर भी एक सार्थक टिप्पणी करते हैं।

Roshani Ki Shinakht

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Gyan Chaturvedi

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Raag Bhopali

  • Author Name:

    Sharad Joshi

  • Book Type:
  • Description:

    सीधा और स्पष्ट अवलोकन, गहरी विश्लेषण-दृष्टि, एक निश्चित और परिभाषित फ़ासले से अपने विषय को देखना, उसका निर्मम विवेचन करना, सटीक और सुस्पष्ट शब्दों का चुनाव और अपने आसपास के जीवन के प्रामाणिक अनुभवों से उपजी विवरणात्मकता—ये कुछ तत्त्व हैं जो शरद जोशी को एक विशिष्ट व्यंग्यकार बनाते हैं। जो वस्तु, व्यक्ति या विषय शरद जोशी की लेखनी के निशाने पर आता है, वह सचमुच कुछ देर के लिए कुछ नहीं रहता। उसकी एक-एक परत, उसकी आभा के एक-एक आवरण को उतारकर वे उसे उसी प्राकृतिक रूप में वापस कर देते हैं जैसा वह सत्ता की विभिन्न भंगिमाओं को ओढ़ने के पहले होता होगा। यह उनके व्यंग्य को दार्शनिक आभा देता है जो हास्य उत्पन्न करने को व्याकुल व्यंग्यकारों के यहाँ नहीं होती। शरद जोशी का व्यंग्य कहीं-कहीं इतना क्रूर, निर्दय और बहुपक्षीय होता है कि लगता है, आस्था को पैर टिकाने के लिए कोई जगह ही नहीं रही। लेकिन मनुष्यता फिर भी है, जो उनके व्यंग्य की रीढ़ है, और जो जीवन की अन्तिम और सबसे ज़्यादा भरोसेमन्द आस्था है। उसी के लिए, और उसी के नज़रिए से वे अपने विषयों की अप्राकृतिकता और हास्यास्पदता को देखते हैं, और उसी के हित में उनका अनावरण भी करते हैं। इस पुस्तक में उनके अपने शहर भोपाल के विषय में लिखे गए आलेखों को समेटा गया है।

Raag Bhopali

Raag Bhopali

Sharad Joshi

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₹ 399

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Available

Jahalat Ke Pachas Saal

  • Author Name:

    Shrilal Shukla

  • Book Type:
  • Description:

    श्रीलाल शुक्ल के रचना संसार की सबसे बड़ी शक्ति है—व्यंग्य। शायद ही कोई दूसरा लेखक हो जिसने व्यंग्य का इतना विपुल, विविध और बहुआयामी उपयोग किया हो। ऐसे अद्वितीय लेखक श्रीलाल शुक्ल के लगभग सभी व्यंग्य निबन्धों का संग्रह है—'जहालत के पचास साल’। इस तरह देखें तो इस पुस्तक का प्रकाशन हिन्दी जगत में एक महत्त्वपूर्ण घटना तो है ही, यह एक अति विशिष्ट लेखक श्रीलाल शुक्ल के व्यंग्य की दुनिया को भली-भाँति जानने, समझने और उसमें सैर करने का दुर्लभ अवसर भी जुटाता है। 'जहालत के पचास साल’ की रचनाएँ आधुनिक भारत के महान से महान व्यक्तियों, संस्थाओं, अवधारणाओं, घोषणाओं, नारों की भी गल्तियों को नहीं बख्शतीं। समाज, सभ्यता और संस्कृति के किसी भी हिस्से की चूक पर श्रीलाल शुक्ल के व्यंग्य की बेधक मार के निशानों से भरी पड़ी है यह किताब। यह कहने में हर्ज नहीं कि यदि आ$जादी के बाद के भारत का असली चेहरा देखना हो तो वह समाजशास्त्र और पत्रकारिता से भी ज्यादा प्रामाणिक और चाक्षुष दिखेगा 'जहालत के पचास साल’ में। 'जहालत के पचास साल’ की रचनात्मक उत्कृष्टता का एक स्रोत यह है कि इसके व्यंग्य और हल्के-फुल्केपन के पीछे श्रीलाल शुक्ल का गहन अध्यवसाय, समय की सच्ची समझ और मनुष्यता के प्रति गहरे सरोकार का बल सक्रिय रहता है। इस संग्रह की रचनाएँ औसत समाज और औसत व्यंग्य-लेखन—दोनों को—कड़ी चुनौती देती हैं और फटकार लगाती हैं। संक्षेप में कहा जाए तो 'जहालत के पचास साल’ में भारतीय सत्ता और समाज की कारगुजारियों से सीधी भिड़ंत है। इस लड़ाई में भाषा के लिए एक से बढ़कर एक अमोघ अस्त्र तैयार करते हैं श्रीलाल शुक्ल।

Jahalat Ke Pachas Saal

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Shrilal Shukla

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₹ 1250

₹ 1000

Available

Khabron Ki Jugali

  • Author Name:

    Shrilal Shukla

  • Book Type:
  • Description:

    ‘ख़बरों की जुगाली’ विख्यात रचनाकार श्रीलाल शुक्ल के लेखन का नया आयाम है। यह न केवल व्यंग्य लेखन के नज़रिए से महत्त्वपूर्ण है, बल्कि समाज में चतुर्दिक व्याप्त विद्रूपों के उद्घाटन की दृष्टि से भी बेमिसाल है। साठ के दशक में श्रीलाल शुक्ल ने अपनी कालजयी कृति ‘राग दरबारी’ में जिस समाज के पतन को शब्दबद्ध किया था, वह आज गिरावट की अनेक अगली सीढ़ियाँ भी लुढ़क चुका है। उसकी इसी अवनति का आखेट करती हैं ‘ख़बरों की जुगाली’ की रचनाएँ।

    ये रचनाएँ वस्तुत: नागरिक के पक्ष से भारतीय लोकतंत्र के धब्बों, ज़ख़्मों, अन्तर्विरोधों और गड्ढों का आख्यान प्रस्तुत करती हैं। हमारे विकास के मॉडल, चुनाव, नौकरशाही, सांस्कृतिक क्षरण, विदेश नीति, आर्थिक नीति आदि अनेक ज़रूरी मुद्दों की व्यंग्य-विनोद से सम्पन्न भाषा में तल्‍ख़ और गम्भीर पड़ताल की है ‘ख़बरों की जुगाली’ की रचनाओं ने।

    जुगाली को स्पष्ट करते हुए श्रीलाल शुक्ल बताते हैं—“यह जुगाली बहुत हद तक लेखक, पाठकों की ओर से, उनकी सम्भावित शंकाओं और प्रश्नों को देखते हुए कर रहा था। वे प्रश्न और शंकाएँ अभी भी हमारा पीछा कर रही हैं।” इस सन्‍दर्भ में ख़ास बात यह है कि उन प्रश्नों और शंकाओं के पनपने की वजह मौजूदा सामाजिक व्यवस्था का सतर्क, सचेत ढंग से पीछा कर रही है श्रीलाल शुक्ल की लेखनी।

Khabron Ki Jugali

Khabron Ki Jugali

Shrilal Shukla

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Available

Chhalkat Jaye Gyan Ghat

  • Author Name:

    K. D. Singh

  • Book Type:
  • Description:

    जब ढोल की बात चल ही पड़ी है, तो एक और खास बात है जिस पर आपको गौर करना चाहिए। ... और वह यह है कि, जो ढोल जितनी गहन, गम्भीर आवाज करता है, वह अन्दर से उतना ही खोखला होता है। ढोल की आवाज, उसके आकार-प्रकार पर कम, उसके खोखलेपन पर ज्यादा निर्भर करती है। ढोल की एक पोल भी होती है, जो कभी-कभी खुल जाती है। परम्परागत ढोल की तो पोल खुलते ही वह बजना बन्द हो जाता है और घर के किसी कोने पर सन्यास लेकर पड़ा रहता है, जब तक कि उसे उसकी पोल के साथ पुनः कस न दिया जाय। लेकिन आधुनिक पीढ़ी के ढोल तो, पोल खुलने के बाद भी उतनी ही गम्भीर रिदम के साथ पूरी बेशर्मी से बजते रहते हैं... और मजे की बात यह है कि लोग उसे सुनते भी रहते हैं... पूरी तन्मयता के साथ। बजनेवाले ढोल, अगर आपके नजदीक बज रहे हों, तो वे आपको कर्कश लग सकते हैं... लेकिन ज्यों-ज्यों ढोल और आपके बीच की दूरी बढ़ती जाती है, उनकी आवाज अपेक्षाकृत मधुर होती जाती है, और विश्वसनीय भी।

Chhalkat Jaye Gyan Ghat

Chhalkat Jaye Gyan Ghat

K. D. Singh

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Available

Buddhiprakash

  • Author Name:

    Sampat Saral

  • Book Type:
  • Description:

    सम्पत सरल को ज़्यादातर लोग मंच से जानते हैं जहाँ वे पिछले कई वर्षों से उल्लेखनीय निडरता के साथ न सिर्फ़ समाज, बल्कि सरकार को भी आईना दिखाते रहे हैं। ‘बुद्धिप्रकाश’ उनके व्यंग्य निबन्धों की पुस्तक है; और इन्हें पढ़कर कोई भी कहेगा कि जिस धारदार, सधे और सुँते हुए व्यंग्य की कमी हिन्दी में काफ़ी समय से खल रही थी, वह अब हमारे सामने है। हमारे आसपास ऐसी बहुत कम चीज़ें रह गई होंगी, जिन्हें व्यंग्य का विषय बनाते हुए किसी को कोई संकोच हो; जीवन का, सामाजिक व्यवस्था का अधिकांश अपने विरोधाभासों के चलते स्वयं ही व्यंग्य है। लेकिन चीज़ों के बाह्य आडम्बरों, शक्ति और सामर्थ्य की अभेद्य भंगिमाओं और रंध्रहीन व्यवस्था को बेधकर उनके भीतर के व्यंग्य को पकड़ना—इसके लिए एक निगाह चाहिए, जो सम्पत सरल के पास है; और उसे बिना किसी लाग-लपेट के साफ़-साफ़ उकेर देनेवाली भाषा भी। इस संकलन में शामिल निबन्धों को पढ़ते हुए जो चीज़ सबसे पहले महसूस होती है वह यही कि वे अपनी एक भी पंक्ति को व्यर्थ नहीं जाने देते; हर वाक्य सही निशाने पर जाकर लगता है; और हर बात अपने अनूठेपन में हमें नई लगती है। हास्य उनके व्यंग्य के साथ स्वयं चला आता है, अनायास, एक साथ कई दिशाओं में मार करता हुआ, जैसे कि उन्होंने अपने इस समय को सांगोपांग समझ लिया हो। यह पुस्तक आपको बार-बार अपने पास बुलाएगी।

Buddhiprakash

Buddhiprakash

Sampat Saral

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₹ 299

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Available

Pret Katha

  • Author Name:

    Gyan Chaturvedi

  • Book Type:
  • Description:

    ज्ञान चतुर्वेदी ने हिन्दी व्यंग्य को एक नए सिरे से स्थापित किया है। अपने उपन्यासों, निबन्धों और स्तम्भों में वे एक-सी निर्ममता से अपने समय और उसकी सामाजिक-राजनीतिक व नैतिक गाँठों की चीर-फाड़ करते रहे हैं। ‘प्रेत कथा’ उनका पहला व्यंग्य-संग्रह है जो पहली बार 1985 में छपा था और लगभग तभी से अनुपलब्ध भी था। इस संकलन में उनकी कतिपय लम्बी व्यंग्य-रचनाएँ हैं जिन्हें वे खुद भी अपने व्यंग्यकार की आधार-भूमि मानते हैं। ‘धर्मयुग’ के लिए धर्मवीर भारती के आग्रह पर लिखे गए ‘आत्म-व्यंग्य’ से आरम्भ होकर इस संग्रह में लगभग पचास निबन्ध संकलित हैं जो भारतीय समाज में लम्बे समय से जड़ पकड़ते अमानवीयकरण को गहराई से अंकित करते हैं। इन्हें पढ़ते हुए आप देखेंगे कि अब भी बदला कुछ नहीं है, बल्कि पहले से बदतर ही हुआ है। ‘प्रेत कथा’ के पहले संस्करण पर प्रकाशित डॉ. धनंजय वर्मा की यह टीप ज्ञान चतुर्वेदी के व्यंग्य को और बेहतर ढंग से समझाती है कि वे इसल‌िए भी उल्लेखनीय हैं कि ‘उन्होंने सपाट विवरण और चालू नुस्खों के बजाय भारतीय कथा-परम्परा से अपने व्यंग्य की रचना-विधि को समृद्ध किया है। ...रूपक, दृष्टान्त और फैंटेसी के माध्यम से उन्होंने समकालीन यथार्थ को अधिक व्यापक, सांकेतिक और प्रभावशाली ढंग से प्रतिबिंबित किया है।

Pret Katha

Pret Katha

Gyan Chaturvedi

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₹ 350

₹ 280

Available

Tipoo Ka Afsana : Himmat-E-Marda

  • Author Name:

    Frank Huzur

  • Book Type:
  • Description:

    इस किताब में उत्तर प्रदेश के युवा, सुचर्चित, सुस्वीकृत, सजग और सफल मुख्यमंत्री रहे अखिलेश यादव तथा समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता श्री मुलायम सिंह यादव के बेटे, टीपू के राजनीतिक जीवन पर बने कार्टून इकट्ठे किए गए हैं। वे कार्टून जो ख़ुद अखिलेश यानी टीपू को भी उतने ही प्यारे हैं जितने देश के लाखों-लाख पाठकों को। या हो सकता है उनसे भी ज़्यादा, क्योंकि संस्कृति-साहित्य और रचनात्मकता से ख़ास लगाव रखनेवाला यह युवा समाजवादी कार्टून विधा में कुछ ज़्यादा ही रस लेता है। कार्टूनकार ने अपनी रेखाएँ उनके ख़िलाफ़ उकेरी हों तो भी अखिलेश उसके रचनात्मक आयाम को नज़रअन्दाज़ नहीं करते और अच्छे कार्टूनों को अपने फ़ोन में सहेजकर रखते हैं। यह नेता के रूप में उनकी वयस्कता और सोच के खुलेपन की निशानी है और समाजवादी सहिष्णुता की एक अनुकरणीय मिसाल। इन कार्टूनों में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल की खट्टी-मीठी झलकियाँ भी मिलेंगी और श्रेष्ठ कार्टून कला के संग्रहणीय नमूने भी जिन्हें आप भी अपने पास सँजोकर रखना चाहेंगे।

Tipoo Ka Afsana : Himmat-E-Marda

Tipoo Ka Afsana : Himmat-E-Marda

Frank Huzur

20% off

₹ 2000

₹ 1600

Available

The Satire category on Rachnaye brings together books that use humour, irony, exaggeration, and wit to expose the absurdities of society, politics, culture, and everyday life. Satire doesn’t just entertain—it questions power, pokes at hypocrisy, and holds up a mirror to uncomfortable truths.

What readers will find here:

  • Political and social satire rooted in Indian realities

  • Literary satire and parody

  • Essays and columns using humour to critique institutions

  • Satirical fiction and short stories

  • Classic Indian satirists and contemporary voices

  • Satire blended with journalism, memoir, and commentary

What is satire in literature?

Satire uses humour, irony, and exaggeration to criticise society, politics, or human behaviour.

How is satire different from humour?

Humour entertains, while satire uses humour to critique and provoke thought.

Is satire suitable for general readers?

Yes. Satire is often accessible, especially when rooted in everyday situations and familiar cultural contexts.

Do satire books cover politics and society?

Many do. Political and social satire is a major part of this category.

Are satirical essays and short stories available?

Yes. The category includes essay collections, columns, short stories, and narrative satire.

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