कथाकार, उपन्यासकार और पत्रकार में अंतर

कथाकार, उपन्यासकार और पत्रकार में अंतर

किसी ने प्रश्न किया,

क्या कारण है कि आज हिंदी में पत्रकार ही कहानीकार और उपन्यासकार हो रहे हैं?
क्यों कहानीकार, उपन्यासकार और पत्रकार के भेद मिटते जा रहे हैं?
पाठक कैसे चुनें कि किसे पढ़ना है?


प्रश्नों को सुन कर एक बात तो अच्छी लगी की आनेवाली पीढ़ी में कुछ लोग सोच तो रहे हैं, मेरा मानना है की प्रश्नों का होना नितांत आवश्यक है, और सभी उत्तर, सही हों या उसी समय हों यह समय के सापेक्ष है और उत्तर देने वाले के ऊपर निर्भर करता है।


बहरहाल, प्रश्न को ध्यान में रखते हुए, कुछ बाते जो मूलभूत रूप से समझनी चाहिए कि, लेखक होना सिर्फ लिखना नहीं, देखने का अभ्यास है।


हम अक्सर “लेखक” शब्द का इस्तेमाल बहुत उदारता से करते हैं। जो कहानी लिखे, लेखक। जो उपन्यास लिखे, लेखक। जो अखबार में कॉलम लिखे, लेखक। जो विश्वविद्यालय में शोध-पत्र लिखे, लेखक। और जो सोशल मीडिया पर हर शाम राष्ट्र, समाज और साहित्य को बचा लेने का दावा करे, वह भी, अपनी दृष्टि में तो लेखक ही है।

लेकिन लिखना और लेखक होना एक ही बात नहीं है।

कथाकार, उपन्यासकार और पत्रकार, ये तीनों भाषा से काम करते हैं। तीनों समाज को देखते हैं। तीनों किसी न किसी रूप में सच से जूझते हैं। फिर भी इनका स्वभाव, प्रशिक्षण, भाषा, समय-बोध और जिम्मेदारी अलग होती है।


पत्रकार बताता है : “यह हुआ।”

कथाकार अपनी कहानी के माध्यम से पूछता है : “यह होने से मनुष्य के भीतर क्या टूटा या बदला?” "क्या था जिसने किसी पात्र को ऐसा कार्य करवाया?"

उपन्यासकार देखता है : “यह घटना परिवार, समाज, इतिहास, स्मृति और भविष्य में कैसे फैलेगी?”

यहीं से तीनों लेखकीय स्वभावों का अन्तर शुरू होता है।


कथाकार

कथाकार हमेशा विश्वविद्यालय के रीडर या प्रोफेसर वर्ग से नहीं आता। वह गाँव की चौपाल से भी आ सकता है, शहर की ओर जाती हुई या वहाँ से लौटती बस से भी, दादी भी हो सकती हैं जो शायद अँगूठा-छाप हों, जाति-व्यवस्था की चोट से जूझता को कर्मचारी भी हो सकता है, घर की चुप्पियों से भी प्रेम तलाशती औरत भी।

कथाकार का जन्म अक्सर अनुभव की तीक्ष्णता से होता है। वह बहुत पढ़ा-लिखा हो सकता/सकती है, पर केवल डिग्री होने मात्र से कोई कथाकार नहीं बनता। कम औपचारिक शिक्षा वाला भी हो सकता या सकती है, पर यदि उसे मनुष्य को देखने की कला आती है, तो वह बड़ा कथाकार बन सकता है।

कथाकार की असली पढ़ाई जीवन से होती है। वह देखता है कि आदमी झूठ क्यों बोलता है, स्त्री कब और क्यों चुप हो जाती है? बच्चा कब डरता है? घर का बूढ़ा कब अपमान पी जाता है? गरीब आदमी कब हँसता है और कब उसके भीतर कुछ पत्थर हो जाता है?


कहानी में “घटना” से अधिक “अनुभूति” महत्त्वपूर्ण होती है। प्रेमचंद की “कफ़न” को याद कीजिए। कहानी छोटी है, पर वह गरीबी, मनुष्य की नैतिक विडंबना और सामाजिक असहायता को जिस तरह खोलती है, वह किसी सरकारी रिपोर्ट से संभव नहीं। प्रेमचंद स्वयं शिक्षक, संपादक, कथाकार और उपन्यासकार, कई भूमिकाओं से गुज़रे; उन्होंने 1930 में हंस जैसी साहित्यिक-राजनीतिक पत्रिका भी शुरू की थी।

कथाकार का बौद्धिक स्तर केवल उसकी डिग्री से नहीं मापा जा सकता।

एक कथाकार को कथाकार बनने से पहले पढ़ना चाहिए, कहानियाँ, लोककथाएँ, इतिहास, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, आत्मकथाएँ, यात्रा-वृत्तांत, अखबार, अदालत की खबरें, लोकगीत, सबकुछ। लेकिन सबसे जरूरी यह है कि उसे मनुष्य को पढ़ना आना चाहिए।

कथाकार का केंद्र है: संवेदना + अवलोकन + भाषा + मौन को सुनने की क्षमता।


उपन्यासकार

उपन्यासकार अक्सर कथाकार से आगे की मंज़िल पर खड़ा दिखाई देता है, पर यह हमेशा क्रमिक विकास नहीं है। कोई सीधे उपन्यास लिख सकता है, कोई जीवन भर कहानी ही लिख सकता है। पर उपन्यासकार बनने के लिए लेखक को जीवन को लंबे विस्तार में देखने की क्षमता चाहिए।

कहानी एक क्षण को पकड़ सकती है। उपन्यास उस क्षण के पीछे की पूरी व्यवस्था को खोलता है।

उपन्यासकार को केवल घटना नहीं, संरचना देखनी होती है। परिवार कैसे बनता है? समाज कैसे दबाव डालता है? सत्ता कैसे परिवर्तित होती है? अर्थव्यवस्था पात्रों की इच्छाओं को कैसे बदलती है? भाषा वर्ग, जाति, लिंग और भूगोल के अनुसार कैसे बदलती है? स्मृति किस तरह आदमी को वर्तमान में भी पीछा करती रहती है?


प्रेमचंद का गोदान केवल होरी की कथा नहीं है। वह किसान जीवन, कर्ज, सामंती दबाव, शहरी मध्यवर्ग, स्त्री की स्थिति और औपनिवेशिक भारत की सामाजिक संरचना का विस्तृत आख्यान है। यही उपन्यास का क्षेत्र है, व्यक्ति को समाज से अलग न देखना।

उपन्यासकार का बौद्धिक प्रशिक्षण अधिक विस्तृत होना चाहिए। उसे समाजशास्त्र, इतिहास, राजनीति, अर्थव्यवस्था, भाषा-शैली, लोकजीवन, चरित्र-निर्माण और कथानक-शिल्प की समझ चाहिए। अगर कथाकार को मनुष्य की धड़कन सुननी है, तो उपन्यासकार को पूरी सभ्यता की चाल भी सुननी है।

उपन्यासकार का खतरा भी बड़ा है। वह विस्तार के नाम पर फैल सकता है। विचार के नाम पर पात्रों को पोस्टर बना सकता है। भाषा के नाम पर बोझिल हो सकता है। शोध के नाम पर कथा को दस्तावेज़ बना सकता है।

अच्छा उपन्यासकार जानता है कि उपन्यास में विचार होना चाहिए, पर पात्र विचारों के नौकर नहीं होने चाहिए।


पत्रकार

पत्रकार का संसार तत्काल समय से बनता है। वह विश्वविद्यालय से आ सकता है, पत्रकारिता संस्थान से आ सकता है, भाषा विभाग से आ सकता है, राजनीति विज्ञान या इतिहास की पढ़ाई से आ सकता है, या सीधे स्थानीय अखबार के दफ्तर से भी। भारत में अनेक पत्रकारों ने मैदान में काम करते हुए ही पत्रकारिता सीखी है।

पत्रकार का प्रशिक्षण अलग है। उसे घटना की पुष्टि करनी होती है। स्रोत जाँचना होता है। भाषा को स्पष्ट रखना होता है। सत्ता और जनता के बीच खड़ा होना होता है। उसे जल्दी लिखना पड़ता है, लेकिन जल्दी में झूठ नहीं लिखना चाहिए।

पत्रकार का बौद्धिक स्तर उसकी खबरों की गहराई से पहचाना जाता है। क्या वह केवल बयान लिखता है? या वह सत्ता, समाज, इतिहास, आंकड़े और मनुष्य की स्थिति को जोड़कर देख सकता है?

पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत है, मैदान से संपर्क। पत्रकार अदालत, संसद, गाँव, दंगा-पीड़ित बस्ती, चुनावी रैली, अस्पताल, विश्वविद्यालय, पुलिस थाने, किसान आंदोलन और शहर की अँधेरी गलियों तक जाता है। इसलिए उसके पास जीवन की सामग्री बहुत होती है।

लेकिन यही जगह भ्रम पैदा करती है। सामग्री होना साहित्य होना नहीं है।


पत्रकार यदि साहित्य में आता है, तो उसे समझना होगा कि रिपोर्ट और कथा में फर्क है। रिपोर्ट में तथ्य अंतिम हैं। कथा में अनुभव-सत्य बड़ा होता है। रिपोर्ट में अस्पष्टता दोष है। साहित्य में कई बार वही अस्पष्टता जीवन की जटिलता बन जाती है।

हिंदी में पत्रकार और साहित्यकार का संबंध पुराना है। अज्ञेय ने साहित्य, संपादन और पत्रकारिता तीनों क्षेत्रों में काम किया। The Wire में प्रकाशित एक लेख के अनुसार अज्ञेय ने दिनमान जैसे हिंदी समाचार-साप्ताहिक को रचा, जिसमें राजनीतिक रिपोर्टिंग के साथ साहित्य, कला, सिनेमा, संगीत और संस्कृति की गंभीर उपस्थिति थी।

रघुवीर सहाय भी कवि, कथाकार, आलोचक, अनुवादक और पत्रकार थे। वे 1969 से 1982 तक दिनमान के प्रधान संपादक रहे और उन्हें उनके कविता-संग्रह "लोग भूल गये हैं " के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला।

इसलिए पत्रकार का लेखक होना कोई नई बात नहीं है। फर्क यह है कि पहले पत्रकारिता में वैचारिक अनुशासन और साहित्यिक भाषा का गहरा रिश्ता था। आज मीडिया की गति, दृश्यता, ब्रांडिंग और तात्कालिक प्रतिक्रिया ने उस रिश्ते को अधिक जटिल बना दिया है।


तीनों की पढ़ाई और बौद्धिक तैयारी में फर्क

यहाँ एक साफ बात कहनी जरूरी है: लेखक का स्तर उसकी डिग्री से तय नहीं होता, लेकिन उसकी बौद्धिक तैयारी से जरूर तय होता है।

कथाकार की तैयारी

कथाकार को मनुष्य को पढ़ना चाहिए। उसे भाषा की लय, संवाद, मौन, स्मृति और संकेत की समझ होनी चाहिए। उसे केवल कथानक नहीं, मानवीय स्थिति पकड़नी चाहिए।

कथाकार के लिए जरूरी पढ़ाई:

  1. लोककथाएँ और आधुनिक कहानियाँ
  2. मनोविज्ञान और सामाजिक व्यवहार
  3. जाति, वर्ग, लैंगिक संबंधों की समझ
  4. अपनी भाषा की बोलियों और मुहावरों का अभ्यास
  5. जीवन के छोटे दृश्य देखने की आदत

कथाकार का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय जीवन है, पर यह वाक्य आलस्य का लाइसेंस नहीं है। जीवन से सीखने के लिए भी सजग बुद्धि चाहिए।


उपन्यासकार की तैयारी

उपन्यासकार को लंबी सांस चाहिए। उसे इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति, परिवार, अर्थशास्त्र, भूगोल और भाषा की परतों की समझ चाहिए।

उपन्यासकार के लिए जरूरी पढ़ाई:

  1. बड़े उपन्यास, भारतीय और विश्व साहित्य
  2. इतिहास और सामाजिक संरचना
  3. चरित्र-निर्माण और कथानक-शिल्प
  4. वर्ग, जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा की जटिलता
  5. लंबी संपादन प्रक्रिया का धैर्य

उपन्यासकार अगर केवल “कहानी बढ़ा” देता है, तो वह उपन्यास नहीं लिखता; वह लंबी कहानी को थका देता है।


पत्रकार की तैयारी

पत्रकार को तथ्य, स्रोत, प्रमाण, भाषा, कानून, संविधान, राजनीति और समाज की समझ चाहिए। उसे कम-से-कम इतना बौद्धिक ईमानदार होना चाहिए कि वह अपनी राय और सत्यापित सूचना के बीच फर्क रख सके।

पत्रकार के लिए जरूरी पढ़ाई:

  1. संविधान और नागरिक अधिकार
  2. इतिहास और समकालीन राजनीति
  3. डेटा और दस्तावेज़ पढ़ने की क्षमता
  4. स्रोतों की जाँच
  5. स्पष्ट, संक्षिप्त और जिम्मेदार भाषा
  6. सत्ता से सवाल करने का साहस

पत्रकार का प्रशिक्षण केवल कैमरा, माइक और न्यूज़रूम नहीं है। पत्रकारिता का असली प्रशिक्षण है, संदेह करना, जाँचना और जनता के पक्ष से देखना।


यहाँ शिक्षक-लेखक की चर्चा भी जरूरी है, क्योंकि हिंदी में बड़ी संख्या में लेखक विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से आते हैं। यह स्वाभाविक भी है। भाषा और साहित्य पढ़ाने वाले लोग पाठ, परंपरा, आलोचना और इतिहास के बीच रहते हैं। उनके पास साहित्य पर गंभीर काम करने का अवसर होता है।

लेकिन समस्या तब आती है जब लेखन रचनात्मक या बौद्धिक आवश्यकता न होकर केवल पदोन्नति की शर्त बन जाता है।

भारत में उच्च शिक्षा के ढाँचे में अध्यापकों की नियुक्ति और पदोन्नति लंबे समय तक शोध, प्रकाशन और अकादमिक प्रदर्शन से जुड़ी रही है। UGC के 2010 के विनियमों में Career Advancement Scheme के लिए API और PBAS आधारित मानदंडों का उल्लेख था। 2018 के विनियमों में भी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में शिक्षकों की नियुक्ति, योग्यता और करियर एडवांसमेंट से जुड़ी व्यवस्था दी गई।

इसका अच्छा पक्ष यह है कि शिक्षक शोध करें, पढ़ें, लिखें और ज्ञान-परंपरा में योगदान दें। खराब पक्ष यह है कि कई जगह “प्रकाशन की संख्या” ने “विचार की गुणवत्ता” को पीछे कर दिया। जल्दी छपने वाली किताबें, संपादित संकलन, औसत शोध-पत्र, बोझिल भाषा और पाठक-विमुख अकादमिक लेखन, इन सबने हिंदी पाठक को भाषा-विभागों से दूर किया।

इसलिए शिक्षक का लेखक होना समस्या नहीं है। समस्या है, लेखन का प्रमाणपत्र में बदल जाना।


एक लेखकीय स्वभाव से दूसरे में जाना: क्या करना चाहिए?

अब असली प्रश्न: अगर कथाकार पत्रकारिता में जाए, पत्रकार उपन्यास लिखे, या शिक्षक कथा लिखना चाहे—तो उसे क्या करना चाहिए?


पत्रकार से कथाकार बनने के लिए

पत्रकार के पास घटनाएँ होती हैं। पर कहानी घटना से नहीं, अनुभव से बनती है।

पत्रकार को यह करना चाहिए:

  1. घटना को तुरंत कथा न बना दे
  2. पात्रों को “केस स्टडी” की तरह नहीं, मनुष्य की तरह देखे
  3. भाषा को रिपोर्टिंग से मुक्त करे
  4. संवाद को वास्तविक पर कलात्मक बनाए
  5. तथ्य की जमीन छोड़े नहीं, पर कथा को तथ्य-सूची न बनाए
  6. अपने “मैं वहाँ था” को कम करे; पात्रों को बोलने दे

उसे यह नहीं करना चाहिए:

  1. सनसनी को साहित्य समझना
  2. हर पात्र को विचारधारा का प्रतिनिधि बना देना
  3. खबर की जल्दबाज़ी को कथा की गति समझ लेना
  4. वास्तविक लोगों की निजी पीड़ा को साहित्यिक सामग्री की तरह इस्तेमाल करना

पत्रकार जब साहित्य में आए तो उसे सबसे पहले धीमा होना सीखना चाहिए।


कथाकार से पत्रकार बनने के लिए

कथाकार अगर पत्रकारिता में आता है, तो उसे कल्पना पर नियंत्रण रखना होगा। पत्रकारिता में “लगता है” नहीं चलता, “साबित है” चाहिए।

कथाकार को यह करना चाहिए:

  1. तथ्य की पुष्टि करे
  2. स्रोतों को अलग-अलग जाँचे
  3. घटना और व्याख्या में फर्क रखे
  4. भाषा को सुंदर से अधिक स्पष्ट रखे
  5. व्यक्ति की निजता और गरिमा का ध्यान रखे

उसे यह नहीं करना चाहिए:

  1. दृश्य को नाटकीय बनाने के लिए तथ्य मोड़ना
  2. अपनी संवेदना को प्रमाण से बड़ा मान लेना
  3. पात्र बनाने की आदत से वास्तविक लोगों को साहित्यिक चरित्र बना देना
  4. रिपोर्ट में अनावश्यक अलंकार भर देना

पत्रकारिता में करुणा जरूरी है, पर करुणा तथ्य का विकल्प नहीं।


कथाकार से उपन्यासकार बनने के लिए

कथाकार जब उपन्यास लिखता है, तो उसे विस्तार का अनुशासन सीखना पड़ता है।

उसे यह करना चाहिए:

  1. पात्रों की जीवन-रेखा बनाए
  2. समय और स्थान की संरचना स्पष्ट करे
  3. छोटे प्रसंगों को बड़े सामाजिक अर्थ से जोड़े
  4. कथानक को केवल घटनाओं की श्रृंखला न बनाए
  5. संपादन को लेखन का हिस्सा माने

उसे यह नहीं करना चाहिए:

  1. कहानी को अनावश्यक रूप से खींचना
  2. हर अध्याय में “बड़ी बात” कहने की कोशिश करना
  3. पात्रों को लेखक के विचारों का माइक बना देना
  4. शोध को कथा पर लाद देना

उपन्यास धैर्य माँगता है। अच्छे उपन्यास में लेखक की मेहनत दिखती नहीं, महसूस होती है।


उपन्यासकार से पत्रकार बनने के लिए

उपन्यासकार को व्यापक दृष्टि होती है, पर पत्रकारिता में उसे संक्षेप, प्रमाण और तात्कालिकता सीखनी होगी।

उसे यह करना चाहिए:

  1. तथ्य को कथा की सुविधा से ऊपर रखे
  2. समयसीमा में स्पष्ट लिखना सीखे
  3. दस्तावेज़ और डेटा पढ़े
  4. अपनी वैचारिक पसंद को रिपोर्ट से अलग रखे

उसे यह नहीं करना चाहिए:

  1. हर रिपोर्ट को महाकाव्य बना देना
  2. अस्पष्टता को गहराई समझना
  3. निष्कर्ष पहले तय करके रिपोर्टिंग करना


शिक्षक से कथाकार या उपन्यासकार बनने के लिए

शिक्षक के पास पाठों की समझ होती है, पर रचना केवल संदर्भों से नहीं बनती।

उसे यह करना चाहिए:

  1. व्याख्यान वाली भाषा छोड़नी होगी
  2. पात्रों को स्वतंत्र जीवन देना होगा
  3. सिद्धांत को कथा में घोलना होगा, चिपकाना नहीं
  4. अकादमिक वाक्यों को बोलती हुई भाषा में बदलना होगा
  5. पाठक को विद्यार्थी न समझना होगा

उसे यह नहीं करना चाहिए:

  1. कहानी को शोध-पत्र बना देना
  2. पात्रों से फुटनोट बुलवाना
  3. अपनी विद्वत्ता का प्रदर्शन करना
  4. निष्कर्ष पहले और कथा बाद में रखना

शिक्षक जब अच्छा लेखक बनता है, तो साहित्य को गहराई मिलती है। जब वह केवल पदोन्नति के लिए लिखता है, तो भाषा को बोझ मिलता है।


भाषा की क्षति कहाँ होती है?

भाषा को सबसे अधिक नुकसान बाहर से नहीं, भीतर से होता है।


  1. जब पत्रकार बिना जाँच के लिखता है, भाषा अविश्वसनीय होती है।
  2. जब कथाकार अनुभव के बिना संवेदना बेचता है, भाषा नकली होती है।
  3. जब उपन्यासकार विचारधारा को पात्रों पर लाद देता है, भाषा कठोर होती है।
  4. जब शिक्षक केवल पदोन्नति के लिए लिखता है, भाषा निर्जीव होती है।
  5. जब प्रकाशक बिना संपादन के छापता है, भाषा घायल होती है।
  6. जब पाठक केवल नाम देखकर खरीदता है, खराब लेखन को शक्ति मिलती है।


आज हिंदी के सामने एक अजीब स्थिति है। एक तरफ सोशल मीडिया और पत्रकारिता ने गद्य को चुस्त, सार्वजनिक और तात्कालिक बनाया है। दूसरी तरफ उसी तात्कालिकता ने धैर्य कम किया है। दूसरी ओर, विश्वविद्यालयी हिंदी ने संदर्भ और आलोचना दी है, पर कई बार उसकी भाषा इतनी बोझिल हो गई कि सामान्य पाठक उससे दूर हो गया।


हिंदी को न तो केवल न्यूज़रूम की जल्दी चाहिए, न केवल अकादमिक कक्ष की धूल। उसे दोनों से सीखना है, दोनों से बचना भी है।


पाठक कैसे चुनें कि किसे पढ़ना है?


पाठक का काम अब पहले से कठिन है। किताबें बहुत हैं, प्रचार बहुत है, पुरस्कार बहुत हैं, सोशल मीडिया पर प्रशंसा बहुत है। ऐसे में पाठक को कुछ कसौटियाँ बनानी होंगी।


पहली कसौटी: क्या लेखक विषय को सचमुच जानता है?

सिर्फ राय दे रहा है या अनुभव, अध्ययन और प्रमाण के साथ लिख रहा है?


दूसरी कसौटी: क्या भाषा जीवित है?

वाक्य चलते हैं या घिसटते हैं? भाषा मनुष्य तक पहुँचती है या केवल लेखक की विद्वत्ता उठाए चलती है?


तीसरी कसौटी: क्या पात्र मनुष्य हैं या पोस्टर?

अच्छा साहित्य पात्रों को जटिल रहने देता है। खराब साहित्य उन्हें नारे में बदल देता है।


चौथी कसौटी: क्या लेखक पाठक को सोचने देता है?

जो लेखक हर बात का फैसला खुद सुनाता है, वह पाठक को बराबरी नहीं देता।


पाँचवीं कसौटी: क्या किताब पढ़ने के बाद दृष्टि बदलती है?

अच्छी किताब आपको सिर्फ जानकारी नहीं देती, देखने का तरीका बदलती है।


यहीं Rachnaye जैसे मंचों की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। भारतीय भाषाओं में पाठक अक्सर बड़े प्रचार या प्रसिद्ध नामों के आधार पर किताब चुनता है। अगर पाठक को अलग-अलग भाषाओं, प्रकाशकों, लेखकों और विधाओं तक पहुँच मिले, तो वह अधिक स्वतंत्र चयन कर सकता है। यही भारतीय भाषा साहित्य के लोकतंत्रीकरण की असली दिशा है।


अच्छा लेखक अपनी विधा से बड़ा हो सकता है, पर विधा की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं

कथाकार, उपन्यासकार और पत्रकार, तीनों जरूरी हैं। पत्रकार हमें बताता है कि दुनिया में क्या हो रहा है। कथाकार बताता है कि उस दुनिया में मनुष्य कैसे जी रहा है। उपन्यासकार बताता है कि यह सब मिलकर समय की बड़ी कहानी कैसे बनता है।

तीनों अलग-अलग जगहों से आते हैं। कथाकार जीवन की संवेदना से। उपन्यासकार जीवन की संरचना से। पत्रकार तत्काल समाज की धड़कन से। शिक्षक पाठ, परंपरा और आलोचना से। लेकिन इन सबको लेखक बनने के लिए एक साझा चीज चाहिए, बौद्धिक ईमानदारी


पत्रकार साहित्य में आए, बहुत अच्छा।

शिक्षक उपन्यास लिखे, स्वागत है।

कथाकार पत्रकारिता करे, क्यों नहीं।

उपन्यासकार सामाजिक रिपोर्ट लिखे, जरूर।


लेकिन हर यात्रा में अनुशासन बदलता है। पत्रकार को धीमा होना सीखना होगा। कथाकार को तथ्य की मर्यादा सीखनी होगी। शिक्षक को अपनी विद्वत्ता का बोझ कम करना होगा। उपन्यासकार को विस्तार और संपादन का संतुलन सीखना होगा।


हिंदी को आज ऐसे लेखकों की जरूरत है जो मैदान भी देखें, पुस्तकालय भी जाएँ, भाषा भी सँभालें, मनुष्य को भी समझें और पाठक का सम्मान भी करें।


क्योंकि अंत में लेखक वही नहीं जो लिखता है। लेखक वह है जो हमारे देखने का तरीका बदल देता है।


~ इति शुभ 🙏

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