चाहे आप 80 के दशक के ऐ दिल-ए-नादान (लता मंगेशकर - रज़िया सुल्तान) की बात कर लें, या 2000 के दशक के बिस्मिल बिस्मिल बुलबुल-ए-बिस्मिल (सुखविंदर सिंह - हैदर) की, रफ़ी साहब का गाया हुआ, दर्द-ए-दिल, दर्द-ए-ज़िगर, दिल में जगाया आपने हो.बॉलीवुड के गाने हों या उर्दू शायरी, इन से...
किसी मुशायरे में एक अच्छा शेर पढ़ा जाता है। श्रोता उसके शब्दों का पूरा अर्थ समझें या न समझें, उनकी गर्दन हल्के से हिलने लगती है। कभी वे दूसरी पंक्ति आने से पहले ही उसके उतरने की जगह पहचान लेते हैं। कभी कोई मिसरा वर्षों तक स्मृति में बना रहता...
बचपन में हममें से अधिकतर लोगों ने कविता को तुक से पहचाना था। चंदा था तो मामा आना लगभग निश्चित था, मछली जल की रानी थी और फूल के आसपास भूल, धूल या शूल में से कोई शब्द देर-सबेर पहुँच ही जाता था।तुक कविता को याद रखने लायक बनाती है।...
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