तुकांत और अतुकांत कविता में अंतर
July 26, 2026
बचपन में हममें से अधिकतर लोगों ने कविता को तुक से पहचाना था।
चंदा था तो मामा आना लगभग निश्चित था, मछली जल की रानी थी और फूल के आसपास भूल, धूल या शूल में से कोई शब्द देर-सबेर पहुँच ही जाता था।
तुक कविता को याद रखने लायक बनाती है। वह पंक्तियों को संगीत देती है और पाठक के मन में अगली ध्वनि की प्रतीक्षा जगाती है। पर क्या हर कविता को गाने जैसा होना चाहिए? क्या युद्ध, विस्थापन, अकेलेपन, राजनीतिक हिंसा या मनुष्य के भीतर चल रहे असंगत विचारों को भी बराबर लंबाई वाली पंक्तियों और मिलते-जुलते शब्दों में बाँधना आवश्यक है?
कविता ने इस प्रश्न का उत्तर बहुत पहले दे दिया था...नहीं।
इसी उत्तर से तुकांत, अतुकांत, मुक्तछंद और गद्य-कविता जैसे अलग-अलग काव्य रूपों को समझने की शुरुआत होती है।
तुकांत कविता क्या है?
जिस कविता की पंक्तियों के अंत में समान या मिलती-जुलती ध्वनियाँ आती हैं, उसे सामान्यतः तुकांत कविता कहा जाता है। हिंदी काव्यशास्त्र में इस ध्वनि-साम्य को प्रायः अंत्यानुप्रास कहा जाता है।
उदाहरण के लिए:
नदी चली तो गाने लगी,
धूप किनारे आने लगी।
चिड़िया ने आकाश बुना,
धरती फिर मुस्काने लगी।
यहाँ “लगी” की पुनरावृत्ति पंक्तियों को एक सुनाई देने वाला ढाँचा देती है। तुकांत कविता में तुक प्रत्येक पंक्ति में भी हो सकती है और किसी निश्चित क्रम, जैसे पहली पंक्ति की तुक तीसरी से तथा दूसरी की चौथी से, में भी रखी जा सकती है।
गीत, दोहा, चौपाई, सवैया, ग़ज़ल, सोनेट और लोकगीत जैसी अनेक विधाओं में तुक का महत्त्वपूर्ण स्थान है। लेकिन एक बात ध्यान रखने योग्य है: तुकांत होना और छंदबद्ध होना एक ही बात नहीं है।
किसी कविता में तुक तो हो सकती है, लेकिन मात्राओं की संख्या अनियमित हो सकती है। दूसरी ओर, कविता पूरी तरह छंदबद्ध हो सकती है, लेकिन उसके अंतिम शब्द आपस में तुक न मिलें।
अतुकांत कविता क्या है?
जिस कविता की पंक्तियों के अंतिम शब्दों में अनिवार्य तुक नहीं होती, उसे अतुकांत कविता कहा जाता है।
उदाहरण:
नदी शहर के पीछे से गुजरती है
जैसे कोई पुरानी बात
जिसे घर का हर व्यक्ति जानता है
लेकिन कोई दोहराता नहीं।
इन पंक्तियों में “है”, “बात”, “जानता” और “नहीं” के बीच कोई निश्चित तुक-योजना नहीं है। फिर भी पंक्तियों में विराम, चित्र, अर्थ और भाव की गति मौजूद है।
अतुकांत कविता का अर्थ यह नहीं कि उसमें कोई अनुशासन नहीं होता। उसमें तुक के स्थान पर दूसरे साधन कविता को बाँधते हैं:
- आंतरिक लय
- शब्दों और वाक्यों की पुनरावृत्ति
- ध्वनियों का संयोजन
- बिंब और प्रतीक
- पंक्तियों की लंबाई
- विराम और रिक्त स्थान
- विचार या भाव का क्रम
- बोलचाल की स्वाभाविक गति
यही कारण है कि अच्छी अतुकांत कविता पढ़ते समय गद्य जैसी दिखाई देने के बावजूद गद्य जैसी सुनाई नहीं देती।
अतुकांत, मुक्तछंद और गद्य-कविता में क्या अंतर है?
इन तीन शब्दों का परस्पर अदला-बदली करके प्रयोग किया जाता है, जबकि इनके अर्थ पूरी तरह समान नहीं हैं।
1. अतुकांत कविता
अतुकांत कविता में अंतिम तुक नहीं होती, लेकिन वह किसी निश्चित छंद या लय का पालन कर सकती है। अंग्रेज़ी का ब्लैंक वर्स इसका प्रसिद्ध उदाहरण है। ब्लैंक वर्स में तुक नहीं होती, लेकिन एक निश्चित मीटर बना रहता है। अंग्रेज़ी परंपरा में यह प्रायः आयम्बिक पेंटामीटर में लिखा जाता है। जॉन मिल्टन का Paradise Lost और शेक्सपियर के अनेक नाटक इसके प्रसिद्ध उदाहरण हैं।
2. मुक्तछंद
मुक्तछंद किसी पूर्वनिर्धारित तुक, मात्रिक गणना या समान पंक्ति-लंबाई को अनिवार्य नहीं मानता। वह बोलचाल, विचार, बिंब और आंतरिक संगीत से अपनी लय बनाता है। कविता के लिए अंग्रेज़ी में प्रयुक्त free verse और फ्रांसीसी vers libre इसी अवधारणा से जुड़े हैं।
3. गद्य-कविता
गद्य-कविता पंक्तियों में टूटने के बजाय गद्य के अनुच्छेद जैसी दिखाई दे सकती है, लेकिन उसमें रूपक, प्रतीक, ध्वनि, संक्षिप्तता और काव्यात्मक तनाव मौजूद रहता है। इसलिए प्रत्येक मुक्तछंद गद्य-कविता नहीं है और प्रत्येक गद्य-कविता केवल साधारण गद्य भी नहीं है।
सरल भाषा में कहें तो:
अतुकांत कविता तुक से मुक्त होती है, मुक्तछंद पूर्वनिर्धारित काव्य-साँचे से और गद्य-कविता पारंपरिक पंक्ति-विन्यास से।
क्या अतुकांत कविता आधुनिक आविष्कार है?
नहीं। यह अतुकांत कविता के बारे में सबसे बड़ी ऐतिहासिक गलतफहमियों में से एक है।
भारत की प्राचीन संस्कृत कविता मुख्यतः छंद और मात्राओं पर आधारित थी, तुक पर नहीं। वैदिक ऋचाओं तथा संस्कृत के अनुष्टुप, त्रिष्टुप और गायत्री जैसे छंदों में ध्वनि और मात्राओं का सुव्यवस्थित विधान था, पर पंक्तियों के अंतिम शब्दों का तुकांत होना अनिवार्य नहीं था। संस्कृत काव्य में तुक का प्रयोग हुआ जरूर, लेकिन वह उसका मूल नियम नहीं था।
इसी तरह प्राचीन यूनानी और लैटिन काव्य भी मुख्यतः मीटर पर आधारित थे, अंतिम तुक पर नहीं। इसलिए “बिना तुक की कविता” कविता के इतिहास में नई नहीं है।
आधुनिक युग में नया यह हुआ कि कवियों ने पहले अंतिम तुक छोड़ी और फिर निश्चित मीटर तथा समान पंक्ति-लंबाई से भी स्वतंत्रता माँगी।
आधुनिक अतुकांत और मुक्तछंद कविता का विकास कब हुआ?
इस विकास को तीन प्रमुख चरणों में समझा जा सकता है।
पहला चरण: यूरोपीय ब्लैंक वर्स
पुनर्जागरण कालीन इटली में सोलहवीं शताब्दी के दौरान प्राचीन यूनानी और रोमन अतुकांत काव्य से प्रेरित होकर ब्लैंक वर्स विकसित हुआ। 1550 के दशक में हेनरी हॉवर्ड, अर्ल ऑफ सरे ने वर्जिल की Aeneid का अनुवाद करते हुए इसे अंग्रेज़ी में लोकप्रिय बनाया। इसके बाद क्रिस्टोफर मार्लो, विलियम शेक्सपियर और जॉन मिल्टन ने इसे नाटक और महाकाव्य का शक्तिशाली माध्यम बनाया।
दूसरा चरण: उन्नीसवीं शताब्दी का फ्री वर्स
उन्नीसवीं शताब्दी में वॉल्ट व्हिटमैन ने Leaves of Grass और विशेष रूप से “Song of Myself” जैसी कविताओं में लंबी, फैलती हुई और बोलचाल की लय वाली पंक्तियों का प्रयोग किया। फ्रांसीसी प्रतीकवादी कवियों ने पारंपरिक फ्रांसीसी एलेक्ज़ांद्रिन छंद से मुक्ति के लिए vers libre शब्द का प्रयोग किया। आगे चलकर टी.एस. एलियट, एज़रा पाउंड, एच.डी. और विलियम कार्लोस विलियम्स जैसे कवियों ने मुक्तछंद को आधुनिक कविता की केंद्रीय शैली बना दिया।
तीसरा चरण: भारतीय भाषाओं में आधुनिक प्रयोग
भारतीय भाषाओं ने अतुकांत कविता को केवल यूरोप की नकल के रूप में नहीं अपनाया। यहाँ पहले से मौजूद छंद, लोकलय, धार्मिक वाचिक परंपराएँ और आधुनिक औपनिवेशिक अनुभव इसके साथ मिले। परिणामस्वरूप प्रत्येक भाषा ने मुक्तछंद का अपना अलग स्वर विकसित किया।
हिंदी में अतुकांत कविता का आरंभ
आधुनिक हिंदी कविता में मुक्तछंद की स्थापना का सबसे बड़ा श्रेय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ को दिया जाता है।
उनकी कविता “जूही की कली” को हिंदी मुक्तछंद के आरंभिक और निर्णायक उदाहरणों में माना जाता है। निराला ने इसका रचनाकाल 1916 बताया था। इसके प्रकाशन-वर्ष को लेकर अलग-अलग साहित्यिक स्रोतों में भिन्न मत मिलते हैं, इसलिए 1916 को इसका सर्वमान्य प्रकाशन-वर्ष कहने के बजाय रचनाकाल मानना अधिक सावधान और उचित है। शैक्षणिक स्रोत निराला को मुक्तछंद का प्रवर्तक तथा “जूही की कली” को इस दिशा की प्रमुख प्रारंभिक रचना मानते हैं।
निराला के लिए कविता की मुक्ति का अर्थ कविता को लय से वंचित करना नहीं था। वे बाहरी बंधनों से स्वतंत्रता चाहते थे, आंतरिक संगीत से नहीं। यही कारण है कि उनकी मुक्तछंद कविताओं में कहीं संस्कृतनिष्ठ गंभीरता, कहीं लोकधुन, कहीं व्यंग्य और कहीं बोलचाल का तीखा प्रवाह सुनाई देता है।
उनकी मुक्त या अतुकांत शैली से जुड़ी प्रमुख कविताओं में शामिल हैं:
- जूही की कली
- वह तोड़ती पत्थर
- कुकुरमुत्ता
- संध्या सुंदरी
- राम की शक्तिपूजा
- सरोज-स्मृति
इनमें प्रत्येक रचना समान प्रकार की छंदहीन कविता नहीं है। कई जगह निराला पारंपरिक और नवीन लयों को एक-दूसरे में मिलाते हैं। यही उनकी विशेषता है, उन्होंने छंद को नष्ट नहीं किया; उसकी संभावनाओं का विस्तार किया।
हिंदी के प्रमुख अतुकांत और मुक्तछंद कवि
निराला के बाद प्रयोगवाद, नई कविता, प्रगतिशील कविता और समकालीन कविता में मुक्तछंद मुख्य अभिव्यक्ति-माध्यम बन गया। 1951 के बाद की नई कविता ने विशेष रूप से नए अनुभवों, शहरी जीवन, राजनीतिक विडंबना, व्यक्ति की असुरक्षा और सामाजिक यथार्थ के लिए नए शिल्प तलाशे।
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
अज्ञेय की कविता में पंक्ति-विन्यास, मौन, रिक्त स्थान और शब्दों के बीच संबंध बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।
प्रमुख कविताएँ:
- असाध्य वीणा
- नदी के द्वीप
- हरी घास पर क्षण भर
- साँप
- कलगी बाजरे की
“असाध्य वीणा” में कथा, दर्शन और संगीत मुक्तछंद की लंबी संरचना में एक साथ उपस्थित होते हैं।
गजानन माधव मुक्तिबोध
मुक्तिबोध की कविता विचारों की सीधी रेखा पर नहीं चलती। वह स्वप्न, अपराधबोध, राजनीति, आत्म-संघर्ष और फैंटेसी के बीच घूमती है। लंबी और असमान पंक्तियाँ उनके मानसिक तनाव का रूप बन जाती हैं।
प्रमुख कविताएँ:
- अँधेरे में
- ब्रह्मराक्षस
- चाँद का मुँह टेढ़ा है
- भूल-गलती
- मुझे कदम-कदम पर
“अँधेरे में” हिंदी की सर्वाधिक चर्चित लंबी मुक्तछंद कविताओं में गिनी जाती है।
शमशेर बहादुर सिंह
शमशेर की कविता रंग, ध्वनि, दृश्य और स्मृति के सूक्ष्म संयोजन से बनती है। उनकी पंक्तियाँ कई बार चित्रकला जैसी दिखाई देती हैं।
प्रमुख कविताएँ:
- बात बोलेगी
- उषा
- काल तुझसे होड़ है मेरी
- टूटी हुई बिखरी हुई
रघुवीर सहाय
रघुवीर सहाय ने साधारण नागरिक, सत्ता, भय और लोकतांत्रिक विडंबना को बोलचाल के करीब दिखाई देने वाली, पर गहरे व्यंग्य से भरी कविता में रखा।
प्रमुख कविताएँ:
- रामदास
- हँसो हँसो जल्दी हँसो
- आत्महत्या के विरुद्ध
- अधिनायक
धूमिल
धूमिल की कविता में सड़क, संसद, पेशा, भूख और व्यवस्था की भाषा आती है। उनकी पंक्तियाँ चमकदार अलंकारों से अधिक प्रश्नों और टकराहट से बनती हैं।
प्रमुख कविताएँ:
- मोचीराम
- रोटी और संसद
- पटकथा
- देश-प्रेम: मेरे लिए
“मोचीराम” में बातचीत, सामाजिक यथार्थ और राजनीतिक अर्थ एक ही मुक्त संरचना में विकसित होते हैं।
केदारनाथ सिंह
केदारनाथ सिंह की कविता मुक्तछंद में भी लोक, गाँव, भाषा और स्मृति की सहज लय बचाए रखती है।
प्रमुख कविताएँ:
- बाघ
- अकाल में सारस
- बनारस
- रोटी
- हाथ
इस सूची में नागार्जुन, भवानी प्रसाद मिश्र, श्रीकांत वर्मा, कुँवर नारायण, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, चंद्रकांत देवताले, आलोक धन्वा, मंगलेश डबराल और अनेक समकालीन कवियों को भी जोड़ा जा सकता है। लेकिन यह याद रखना आवश्यक है कि किसी कवि को “मुक्तछंद कवि” कहने का अर्थ यह नहीं कि उसकी प्रत्येक कविता तुक और पारंपरिक छंद से पूरी तरह मुक्त है।
हिंदी के अलावा किन भाषाओं में अतुकांत कविता लिखी जाती है?
वस्तुतः आज लगभग हर प्रमुख साहित्यिक भाषा में अतुकांत या मुक्तछंद कविता लिखी जाती है। भारतीय भाषाओं में इसका विकास अलग-अलग समय और सामाजिक परिस्थितियों में हुआ।
बांग्ला
आधुनिक भारतीय भाषाओं में अतुकांत काव्य का एक बड़ा पड़ाव माइकल मधुसूदन दत्त का अमित्राक्षर छंद है। उन्होंने 1860 के आसपास बांग्ला में ब्लैंक वर्स का प्रयोग शुरू किया और 1861 में प्रकाशित “মেঘনাদবধ কাব্য” — मेघनादबध काव्य में इसे महाकाव्यात्मक ऊँचाई दी। यह रचना रामायण को मेघनाद और रावण के पक्ष से पुनः देखने के लिए भी प्रसिद्ध है।
आधुनिक बांग्ला मुक्तछंद की चर्चित रचनाओं में:
- माइकल मधुसूदन दत्त — মেঘনাদবধ কাব্য
- जीवनानंद दास — বোধ, আট বছর আগের একদিন
- सूनिल गंगोपाध्याय — কেউ কথা রাখেনি अर्थात “किसी ने अपना वचन नहीं निभाया”
“কেউ কথা রাখেনি” आधुनिक बांग्ला पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय कविता रही है।
उर्दू
उर्दू में आधुनिक मुक्तछंद को प्रायः आज़ाद नज़्म कहा गया। नून मीम राशिद और मीराजी ने ग़ज़ल की स्थापित तुक, रदीफ़ और बहर से बाहर आधुनिक मनुष्य की जटिलता व्यक्त करने में बड़ी भूमिका निभाई।
प्रमुख उदाहरण:
- नून मीम राशिद — حسن کوزہ گر — हसन कूज़ागर
- नून मीम राशिद — ज़िंदगी से डरते हो
- मीराजी — समंदर का बुलावा
- अख़्तर-उल-ईमान — एक लड़का
“हसन कूज़ागर” लंबी आधुनिक नज़्म का प्रसिद्ध उदाहरण है, जिसमें कथा, स्मृति और आत्मसंवाद मुक्त पंक्ति-विन्यास में सामने आते हैं।
तमिल
तमिल आधुनिक कविता में मुक्त रूप को புதுக்கவிதை — पुदुक्कवितै, अर्थात “नई कविता”, कहा गया। सुब्रमण्यम भारती की वसन-कविताएँ इसका आरंभिक संकेत बनीं, जबकि न. पिचमूर्ति ने इसे आधुनिक काव्य-प्रवृत्ति के रूप में स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रमुख उदाहरण:
- न. पिचमूर्ति — கிளிக் கூண்டு — किलिक्कूण्डु
- न. पिचमूर्ति — ஒளியின் அழைப்பு — प्रकाश का आह्वान
- न. पिचमूर्ति — காதல் — प्रेम
- भारतीदासन तथा आगे चलकर अनेक पुदुक्कवितै कवि
तमिल वर्चुअल अकादमी पिचमूर्ति को पारंपरिक काव्य-व्याकरण की कठोरता से अलग नई कविता की अग्रणी आवाज़ों में रखती है।
मलयालम
मलयालम में के. अय्यप्प पणिक्कर की लंबी कविता കുരുക്ഷേത്രം — कुरुक्षेत्रम् आधुनिकतावादी कविता का निर्णायक पड़ाव मानी जाती है। यह कविता 1951 से 1957 के बीच रची गई और 1960 में प्रकाशित हुई। इसमें विभिन्न लयों, टूटती संरचना और आधुनिक जीवन की नैतिक बेचैनी का प्रयोग किया गया।
प्रमुख उदाहरण:
- के. अय्यप्प पणिक्कर — कुरुक्षेत्रम्
- अक्कितम अच्युतन नंबूदिरी — इरुपताम नूट्टांडिन्ते इतिहासम्
- के. सच्चिदानंदन — अनेक आधुनिक मुक्तछंद कविताएँ
कन्नड़
कन्नड़ के नव्य आंदोलन में गोपालकृष्ण अडिग केंद्रीय कवि रहे। उन्होंने स्वतंत्रता के बाद के भ्रम, शहर, राजनीति और आधुनिक व्यक्ति की विखंडित चेतना के लिए नवीन बिंबों और मुक्त संरचनाओं का प्रयोग किया।
प्रमुख उदाहरण:
- गोपालकृष्ण अडिग — ಭೂಮಿಗೀತ — भूमिगीत
- गोपालकृष्ण अडिग — ಏನಾದರೂ ಮಾಡುತಿರು ತಮ್ಮ — कुछ करते रहो, भाई
- गोपालकृष्ण अडिग — समाज भैरव
“भूमिगीत” की असमान पंक्तियाँ, तीखे दृश्य और बदलती ध्वनियाँ आधुनिक कन्नड़ कविता की प्रयोगशीलता को सामने लाती हैं।
तेलुगु
आधुनिक तेलुगु कविता में श्रीरंगम श्रीनिवास राव ‘श्री श्री’ ने श्रमिक, कारखाने, क्रांति और रोज़मर्रा की दुनिया को कविता का विषय बनाया। उनकी पुस्तक మహాప్రస్థానం — महाप्रस्थानम् ने आधुनिक तेलुगु कविता की भाषा और गति को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई।
प्रमुख उदाहरण:
- श्री श्री — దేశ చరిత్రలు — देश चरित्रालु
- श्री श्री — జగన్నాథుని రథ చక్రాలు — जगन्नाथ के रथचक्र
- श्री श्री — महाप्रस्थानम्
तेलुगु मुक्तछंद ने पारंपरिक छंद को केवल अस्वीकार नहीं किया; उसने मशीन, रेल, मोटर और औद्योगिक जीवन के लिए नई काव्य-भाषा तैयार की।
मराठी
मराठी आधुनिक कविता में बी.एस. मर्ढेकर ने आधुनिकतावादी संवेदना को नया रूप दिया, जबकि नामदेव ढसाल ने दलित जीवन, मुंबई के अँधेरे भूगोल और हिंसक सामाजिक यथार्थ को विस्फोटक मुक्तछंद में व्यक्त किया।
प्रमुख उदाहरण:
- नामदेव ढसाल — माणूस, तू फोडून टाक स्वतःला
- नामदेव ढसाल — कामाठीपुरा
- अरुण कोलटकर — जेजुरी की कविताएँ
ढसाल का पहला संग्रह गोलपीठा 1972 में प्रकाशित हुआ और मराठी कविता की भाषा, विषय तथा नैतिक सीमाओं को गहरे स्तर पर बदल गया।
पंजाबी
पंजाबी कविता में अवतार सिंह संधू ‘पाश’ का मुक्तछंद राजनीतिक चेतना और प्रतिरोध की तीखी भाषा बन गया।
प्रमुख उदाहरण:
- पाश — ਸਭ ਤੋਂ ਖਤਰਨਾਕ — सबसे ख़तरनाक
- पाश — हम लड़ेंगे साथी
- पाश — लोह कथा
“सबसे ख़तरनाक” अपने दोहराव, बातचीत जैसी पंक्तियों और बढ़ते हुए वैचारिक तनाव से अपनी लय बनाती है, उसे पारंपरिक तुक की आवश्यकता नहीं पड़ती।
विश्व की दूसरी भाषाओं में मुक्तछंद
अंग्रेज़ी
- वॉल्ट व्हिटमैन — Song of Myself
- टी.एस. एलियट — The Waste Land
- विलियम कार्लोस विलियम्स — The Red Wheelbarrow
- एलेन गिन्सबर्ग — Howl
फ्रांसीसी
- गिलॉम अपोलिनेयर — Zone
- आर्थर रिम्बो — आधुनिक मुक्त संरचनाओं वाली अनेक कविताएँ
- सेंट-जॉन पर्स — लंबी मुक्तछंद रचनाएँ
फ्रांसीसी प्रतीकवादी परंपरा से ही vers libre शब्द व्यापक हुआ। अपोलिनेयर की “Zone” आधुनिक नगर, विज्ञापन, तकनीक और स्मृति को विस्तृत मुक्त संरचना में जोड़ती है।
स्पेनी
- पाब्लो नेरूदा — Walking Around
- फेदेरिको गार्सिया लोर्का — आधुनिक मुक्त संरचना वाली कविताएँ
- सेसार वायेखो — The Black Heralds तथा बाद की प्रयोगशील कविताएँ
- ऑक्टावियो पाज़ — Sunstone
इन कवियों ने मुक्तछंद को प्रेम या प्रकृति तक सीमित न रखते हुए शहर, हिंसा, उपनिवेश, श्रम, अकेलेपन और आधुनिक मनुष्य की विडंबना से जोड़ा।
क्या मुक्तछंद लिखना आसान होता है?
ऊपर से देखें तो आसान लगता है। न मात्राएँ गिननी हैं, न हर पंक्ति के लिए तुक खोजनी है। इसलिए कभी-कभी ऐसा भ्रम होता है कि किसी गद्य-वाक्य को चार-पाँच हिस्सों में तोड़ देने से कविता बन जाएगी।
लेकिन मुक्तछंद में बाहरी नियम कम होते हैं, इसलिए कवि की जिम्मेदारी अधिक हो जाती है।
उसे तय करना पड़ता है:
पंक्ति यहीं क्यों टूटे?
यह शब्द अगली पंक्ति में क्यों जाए?
कहाँ मौन रखा जाए?
किस बिंब को दोहराया जाए?
कविता की गति तेज हो या धीमी?
वह गद्य से अलग कैसे सुनाई दे?
तुकांत कविता में खराब तुक कविता को कृत्रिम बना सकती है। मुक्तछंद में अनावश्यक शब्द, अर्थहीन पंक्ति-विभाजन और बनावटी गंभीरता वही काम करते हैं।
अच्छा मुक्तछंद नियमों का अभाव नहीं, स्वयं निर्मित अनुशासन है।
तुकांत और अतुकांत में कौन-सी कविता बेहतर है?
यह वैसा ही प्रश्न है जैसे पूछा जाए, बाँसुरी बेहतर है या तबला?
उत्तर विषय, अनुभव और कवि की आवश्यकता पर निर्भर करता है।
तुकांत कविता स्मृति, गीतात्मकता, हास्य, बाल-कविता, लोकधुन, प्रेम और सार्वजनिक पाठ के लिए अत्यंत प्रभावशाली हो सकती है। अतुकांत कविता जटिल विचार, टूटे अनुभव, बातचीत, मनोवैज्ञानिक तनाव और बदलती आधुनिक वास्तविकता को अधिक स्वतंत्रता दे सकती है।
अच्छा कवि किसी एक रूप को श्रेष्ठ घोषित नहीं करता। वह अनुभव के लिए उचित रूप चुनता है।
कई आधुनिक कवियों ने एक ही रचना में तुक, अतुक, लोकलय और मुक्त पंक्तियों का मिश्रण किया है। कविता का इतिहास दरअसल पुराने रूप को मिटाने की कहानी नहीं, रूपों की संख्या बढ़ने की कहानी है।
आज अतुकांत कविता क्यों महत्त्वपूर्ण है?
हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ भाषा हर जगह टूट रही है, मोबाइल संदेशों में, शहरों की बोलियों में, प्रवासियों की बातचीत में, विज्ञापनों में, राजनीतिक नारों में और अलग-अलग भाषाओं के मिश्रण में।
मुक्तछंद इस टूटन को केवल दर्ज नहीं करता; उसमें से नई लय भी खोजता है।
वह ऐसी आवाज़ों को जगह देता है जो पारंपरिक साहित्यिक भाषा में सहज नहीं बैठतीं—मजदूर की बातचीत, स्त्री का निजी अनुभव, दलित प्रतिरोध, आदिवासी स्मृति, शहर का अकेलापन और अपनी मातृभाषा से दूर होते मनुष्य की बेचैनी।
इसीलिए रचनाएँ जैसे बहुभाषी साहित्यिक मंच के लिए अतुकांत कविता केवल एक साहित्यिक तकनीक नहीं हैं। यह भारतीय भाषाओं के अलग-अलग जीवन-अनुभवों को उनकी अपनी गति, विराम और आवाज़ में सुनने का माध्यम है।
कविता को तुक से प्रेम करना चाहिए, पर तुक की कैदी नहीं बनना चाहिए।
कभी वह गीत की तरह लौटती है।
कभी संवाद की तरह खुलती है।
कभी एक अधूरे वाक्य पर रुक जाती है।
और कई बार वही अधूरा वाक्य पाठक के भीतर सबसे लंबे समय तक चलता रहता है।
पाठकों के सामान्य प्रश्न
तुकांत और अतुकांत कविता में मुख्य अंतर क्या है?
तुकांत कविता की पंक्तियों के अंत में समान ध्वनियाँ आती हैं। अतुकांत कविता में अंतिम तुक अनिवार्य नहीं होती।
क्या अतुकांत कविता में छंद हो सकता है?
हाँ। अतुकांत कविता किसी निश्चित मीटर या छंद का पालन कर सकती है। अंग्रेज़ी का ब्लैंक वर्स इसका प्रसिद्ध उदाहरण है।
क्या मुक्तछंद और अतुकांत कविता एक ही हैं?
पूरी तरह नहीं। अतुकांत का अर्थ केवल तुक का न होना है। मुक्तछंद तुक के साथ-साथ पूर्वनिर्धारित मीटर और समान पंक्ति-रचना को भी अनिवार्य नहीं मानता।
हिंदी में मुक्तछंद के प्रवर्तक कौन माने जाते हैं?
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ को हिंदी मुक्तछंद का प्रमुख प्रवर्तक माना जाता है और “जूही की कली” इसकी आरंभिक महत्त्वपूर्ण रचनाओं में गिनी जाती है।
क्या बिना तुक के लिखी हर रचना कविता होती है?
नहीं। कविता के लिए तुक आवश्यक नहीं, लेकिन भाषा का चयन, लय, बिंब, भाव-सघनता और सार्थक पंक्ति-विन्यास आवश्यक होते हैं।
दुनिया की किन भाषाओं में मुक्तछंद मिलता है?
हिंदी, बांग्ला, उर्दू, तमिल, मलयालम, कन्नड़, तेलुगु, मराठी, पंजाबी, अंग्रेज़ी, फ्रांसीसी, स्पेनी, पुर्तगाली और लगभग सभी आधुनिक साहित्यिक भाषाओं में मुक्तछंद लिखा जाता है।
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