Paath : Kuchh Aur Kahaniyon Ka

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विश्वनाथ त्रिपाठी की कहानी-केन्द्रित पुस्तक 'कुछ कहानियाँ : कुछ विचार' समकालीन कहानी पर एक लोकप्रिय और बहुपठित कृति है। 'पाठ : कुछ और कहानियों का' को हम उसी की अगली कड़ी कह सकते हैं। इस पुस्तक में शामिल आलेख मूलतः उन प्रवृत्तियों को रेखांकित करते हैं जो हिन्दी कहानियों में अलग-अलग समय पर प्रकट हुईं, और अब की कहानियों में नया रूप धारण कर रही हैं। इस विवेचन में वे अनेक कथाकारों और कहानियों का हवाला देते हुए उन तमाम घटकों का भी उल्लेख करते चलते हैं, जिनसे हिन्दी कहानी की दशा-दिशा निर्धारित हुई। पुरानी से पुरानी और इधर के नए रचनाकारों तक की कहानियाँ इस विवेचन का हिस्सा बनी हैं। ये आलेख सिर्फ कहानियों का नहीं, उस समय का भी विश्लेषण करते हैं, जिस समय में ये लिखी गईं। भूमंडलीकरण, नव-उपनिवेशवाद, उपभोक्तावाद और मौजूदा सांस्कृतिक दिशाहीनता-इनकी विवेचना भी साथ-साथ होती चली है। कहानी के पाठ में निहित आशयों को खोलते हुए वे कुछ प्रश्न भी उठाते हैं और सलाह भी देते हैं। मसलन, वे कहते हैं कि 'विचारधारा की लड़ाई और रचनाधर्मिता के बीच अपने पक्ष का दुराग्रह रचना को कमजोर करता है। एकांगी बनाता है। प्रगतिशीलता का साहित्यिक रूप वही नहीं होगा जो राजनीतिक या समाजशास्त्रीय होगा।' इस पुस्तक में एक लम्बी भूमिका के अलावा सोलह और लेख संकलित हैं जिनमें हम प्रेमचन्द से लेकर अब तक के कथाकारों और उनकी कहानियों को विश्वनाथ त्रिपाठी की अपनी अनूठी आस्वाद-धर्मी आलोचना-दृष्टि से नए ढंग से पढ़-समझ सकते हैं।

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ISBN
9789377370701
Pages
184
Avg Reading Time
6 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

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विश्वनाथ त्रिपाठी की कहानी-केन्द्रित पुस्तक 'कुछ कहानियाँ : कुछ विचार' समकालीन कहानी पर एक लोकप्रिय और बहुपठित कृति है। 'पाठ : कुछ और कहानियों का' को हम उसी की अगली कड़ी कह सकते हैं। इस पुस्तक में शामिल आलेख मूलतः उन प्रवृत्तियों को रेखांकित करते हैं जो हिन्दी कहानियों में अलग-अलग समय पर प्रकट हुईं, और अब की कहानियों में नया रूप धारण कर रही हैं। इस विवेचन में वे अनेक कथाकारों और कहानियों का हवाला देते हुए उन तमाम घटकों का भी उल्लेख करते चलते हैं, जिनसे हिन्दी कहानी की दशा-दिशा निर्धारित हुई। पुरानी से पुरानी और इधर के नए रचनाकारों तक की कहानियाँ इस विवेचन का हिस्सा बनी हैं।
ये आलेख सिर्फ कहानियों का नहीं, उस समय का भी विश्लेषण करते हैं, जिस समय में ये लिखी गईं। भूमंडलीकरण, नव-उपनिवेशवाद, उपभोक्तावाद और मौजूदा सांस्कृतिक दिशाहीनता-इनकी विवेचना भी साथ-साथ होती चली है। कहानी के पाठ में निहित आशयों को खोलते हुए वे कुछ प्रश्न भी उठाते हैं और सलाह भी देते हैं। मसलन, वे कहते हैं कि 'विचारधारा की लड़ाई और रचनाधर्मिता के बीच अपने पक्ष का दुराग्रह रचना को कमजोर करता है। एकांगी बनाता है। प्रगतिशीलता का साहित्यिक रूप वही नहीं होगा जो राजनीतिक या समाजशास्त्रीय होगा।'
इस पुस्तक में एक लम्बी भूमिका के अलावा सोलह और लेख संकलित हैं जिनमें हम प्रेमचन्द से लेकर अब तक के कथाकारों और उनकी कहानियों को विश्वनाथ त्रिपाठी की अपनी अनूठी आस्वाद-धर्मी आलोचना-दृष्टि से नए ढंग से पढ़-समझ सकते हैं।

Book Details

  • ISBN
    9789377370701
  • Pages
    184
  • Avg Reading Time
    6 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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