Aacharya Shukla Ka Itihas Padhte Huye
(0)
Author:
Bachchan Singh, Dr. Bachchan SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
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‘आचार्य शुक्ल का इतिहास पढ़ते हुए’ साहित्यालोचना की श्रेणी में एक अलग ढंग की पुस्तक है। हिन्दी साहित्य के मानक इतिहास के रूप में प्रतिष्ठित आचार्य शुक्ल की पुस्तक को ‘साहित्येतिहास-लेखन की अत्यन्त प्रौढ़ और प्रगतिशील विरासत’ मानते हुए डॉ. बच्चन सिंह यह भी कहते हैं कि अभी भी अनेक प्रश्न हैं जो उत्तर की माँग करते हैं, बहुत-से बिन्दु है जिन पर विचार किया जाना चाहिए। वे कहते हैं कि शुक्ल जी पहले व्यक्ति हैं जिनके हाथों हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन के लिए एक सुसंगत आधार और उसका पैटर्न तैयार हुआ। इसके लिए उन्होंने जो केन्द्रीय बिन्दु रखा, वह है ‘लोक प्रवृत्ति’, जिसे उन्होंने जनता की चित्तवृत्ति कहा। लेकिन वे इस तथ्य के प्रति भी सजग थे कि जिस चित्तवृत्ति का प्रतिफलन साहित्य में हुआ, उसका सरोकार शिक्षित जन से है। डॉ. बच्चन सिंह आचार्य शुक्ल के बाद आचार्य द्विवेदी के काम को ही उल्लेखनीय मानते हैं, इसलिए इस पुस्तक में दोनों ही विद्वानों के इतिहास-सम्बन्धी कामों पर अकसर साथ में बात करते हैं, जिससे पाठक के रूप में हम और भी लाभान्वित होते हैं। यह पुस्तक आचार्य शुक्ल लिखित इतिहास को पढ़ने के लिए वृहत्तर भूमि तैयार करती है, और अन्य उपलब्ध साहित्येतिहास-ग्रंथों का भी परिचय देती चलती है।
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‘आचार्य शुक्ल का इतिहास पढ़ते हुए’ साहित्यालोचना की श्रेणी में एक अलग ढंग की पुस्तक है। हिन्दी साहित्य के मानक इतिहास के रूप में प्रतिष्ठित आचार्य शुक्ल की पुस्तक को ‘साहित्येतिहास-लेखन की अत्यन्त प्रौढ़ और प्रगतिशील विरासत’ मानते हुए डॉ. बच्चन सिंह यह भी कहते हैं कि अभी भी अनेक प्रश्न हैं जो उत्तर की माँग करते हैं, बहुत-से बिन्दु है जिन पर विचार किया जाना चाहिए।
वे कहते हैं कि शुक्ल जी पहले व्यक्ति हैं जिनके हाथों हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन के लिए एक सुसंगत आधार और उसका पैटर्न तैयार हुआ। इसके लिए उन्होंने जो केन्द्रीय बिन्दु रखा, वह है ‘लोक प्रवृत्ति’, जिसे उन्होंने जनता की चित्तवृत्ति कहा। लेकिन वे इस तथ्य के प्रति भी सजग थे कि जिस चित्तवृत्ति का प्रतिफलन साहित्य में हुआ, उसका सरोकार शिक्षित जन से है।
डॉ. बच्चन सिंह आचार्य शुक्ल के बाद आचार्य द्विवेदी के काम को ही उल्लेखनीय मानते हैं, इसलिए इस पुस्तक में दोनों ही विद्वानों के इतिहास-सम्बन्धी कामों पर अकसर साथ में बात करते हैं, जिससे पाठक के रूप में हम और भी लाभान्वित होते हैं। यह पुस्तक आचार्य शुक्ल लिखित इतिहास को पढ़ने के लिए वृहत्तर भूमि तैयार करती है, और अन्य उपलब्ध साहित्येतिहास-ग्रंथों का भी परिचय देती चलती है।
Book Details
-
ISBN9789349159594
-
Pages136
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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लेखक ने पुस्तक के पहले संस्करण की भूमिका में इस नए पैटर्न की ऐतिहासिक अनिवार्यता को स्पष्ट करते हुए लिखा : ‘‘शुक्ल जी के इतिहास का संशोधित और परिवर्द्धित संस्करण सन् 1940 में छपा था। उसके प्रकाशन के बाद 50 वर्ष से अधिक का समय निकल गया। इस अवधि में अनेकानेक शोध-ग्रन्थ छपे, नई पांडुलिपियाँ उपलब्ध हुईं, ढेर-सा साहित्य लिखा गया। नया इतिहास लिखने के लिए यह सामग्री कम पर्याप्त और कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। यह भी ध्यातव्य है कि शुक्ल जी का इतिहास औपनिवेशिक भारत में लिखा गया। अब देश स्वतंत्र है। उसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था है। भारतीय लोकतंत्र की अपनी समस्याएँ हैं। सांस्कृतिक-सामाजिक संघर्ष हैं, इन्हें देखने-समझने का बदला हुआ नज़रिया है। इस नए सन्दर्भ में यदि पिष्टपेषण नहीं करना है, तो नया इतिहास ही लिखा जाएगा।’’
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गोपाल राय द्वारा ‘उपन्यास की पहचान’ शृंखला में व्यावहारिक आलोचना को आधार बनाकर फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की अप्रतिम रचना ‘मैला आँचल’ को परखने की प्राथमिक कोशिश की गई है। कहते हैं कि ‘मैला आँचल’ के प्रकाशन के बाद हिन्दी में आंचलिक उपन्यासों का आन्दोलन-सा चल पड़ा। ऐसा नहीं है कि भारतीय ग्रामीण जीवन को केन्द्र रखकर उपन्यास न रचे गए हों; किन्तु आंचलिक उपान्यासालोचना का मानदंड रचने में ‘मैला आँचल’ की महत्ती भूमिका रही है। गोपाल राय ने ‘उपन्यास की पहचान’ शृंखला की कड़ी में इन्हीं तथ्यों का उद्घाटन करने के साथ, उपन्यास की व्यावहारिक आलोचना की सैद्धान्तिक पहचान का आधार ‘मैला आँचल’ के कथ्य और शिल्प में तराशने की समग्र कोशिश की है। यह पुस्तक आंचलिक उपन्यास की अवधारणा और हिन्दी उपन्यास की परम्परा को रेखांकित करने के साथ-साथ फणीश्वरनाथ रेणु की उपन्यास-यात्रा पर भी अपनी बात रखती है। ‘मैला आँचल’ के कथ्य, शिल्प, पात्र-योजना, भाषा आदि के रचनात्मक तत्त्वों पर प्राथमिक बयान दर्ज करती है। कह सकते हैं कि उपन्यास के रचनात्मक मानकों की व्यावहारिक परख करते हुए ‘मैला आँचल’ की पढ़त को यह पुस्तक नये आयाम प्रदान करेगी।
Kabeer aur Bhakti Andolan
- Author Name:
Gyantosh Kumar Jha
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Criticism
Upanyas Ki Pahchan : Divya
- Author Name:
Gopal Ray
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यशपाल के उपन्यास ‘दिव्या’ का प्रकाशन 1945 में हुआ था। उपन्यास के प्रकाशन के साथ ही यह ऐतिहासिक कथानक का उपन्यास होने के कारण उसी रूप में अपनी पैठ बना रहा था। कई बार इसके कथ्य को ध्यान में रखते हुए इसे बौद्धकालीन उपन्यास कहा गया है। जैसा कि ऐतिहासिक उपन्यासों के साथ अक्सर होता है 'दिव्या' के साथ भी वही परम्परा चल पड़ी अर्थात् उपन्यास के कथानक को बौद्धकालीन प्रामाणिकता पर परखना आलोचकों ने समीचीन समझा। बहरहाल। गोपाल राय की ‘उपन्यास की पहचान’ शृंखला में ‘दिव्या’ पाँचवीं पुस्तक है। आलोचक ने अपने स्तर पर न केवल कथानक की समीचीनता की पड़ताल की है बल्कि ‘अतीत, इतिहास और उपन्यास’ पर एक अध्याय भी इस पुस्तक के आरम्भ में रख दिया है। मूलत: मूल रचनाओं की पड़ताल करते हुए आलोचक मूल पाठ की व्यावहारिक आलोचना को भी प्राथमिकता देते हैं। ‘दिव्या’ के मूल पाठ पर गोपाल राय ने इन्हीं कड़ियों को सूत्रबद्ध करने का कार्य किया है। जैसे कि ‘दिव्या’ का कथा-संसार और उसके मार्मिक प्रसंग, पात्र, ऐतिहासिकता की कसौटी, दिव्या में चित्रित समाज और भारतीय संस्कृति अस्मितामूलक नारी-विमर्श की झलक, शिल्प और भाषा आदि-आदि की रचनात्मकता के स्तर पर गोपाल राय ने उपन्यास को खँघालने का महत्ती कार्य पूरा किया है। अत: उक्त आयामों की विविधता में उपन्यास की दृष्टि से दिव्या का मूल्यांकन गोपाल राय का इस आलोचनात्मक पुस्तक में प्राथमिक ध्येय रहा है। इस कार्य में वे कितनी उत्कृष्टता प्राप्त कर पाए हैं यह इस पुस्तक के अध्ययन से स्पष्ट होगा। यह भी ज्ञान होगा कि पाठ्यक्रमों की सीमाओं को पार करते हुए कोई आलोच्य कृति कितनी समयानुकूल और प्रासंगिक ठहरती है।
Upanyas Ki Pahchan : Mahabhoj
- Author Name:
Gopal Ray
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No Description
Kahani Se Samwad
- Author Name:
Rashmi Rawat
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कहानी से संवाद शास्त्रीय आलोचना नहीं है। जैसाकि नाम से ही ज़ाहिर है, यह कहानी के साथ चलते हुए, उससे बतियाने और उसे समझने की एक रचनात्मक प्रक्रिया है। रश्मि रावत रचना को उसकी समग्रता में देखती हैं, अपने समय और समाज के आलोड़न से उपजी एक जैविक इकाई के रूप में; जो उन मूल्यों को भी वहन करती है, जिन्हें रचनाकार जान रहा होता है, और उन चीजों को भी जो उसके अदेखे स्वयमेव रचना में आ जाती हैं, और कई बार लेखक की सचेत अभिव्यक्तियों से ज्यादा कुछ बता जाती हैं—कहानी के ही बारे में नहीं, लेखक के बारे में भी, और उस सामाजिक-नैतिक पर्यावरण के बारे में भी जिसमें उस रचना ने आकार लिया। यह आलोचना की उस परिपाटी से आगे जाना है जो दी गई कसौटियों पर कहानी या किसी भी रचना को विश्लेषित करके अपने काम को पूरा मान लेती है। इस पुस्तक में शामिल कथा-समीक्षाएँ, हर कहानी को पढ़ते हुए अपनी कुछ कसौटियाँ बनाती हैं; जिनकी जड़ें केवल साहित्य-चिन्तन में नहीं होतीं, बल्कि समाज और उन मूल्यों से जुड़ी चिन्ताओं में होती हैं, जिनकी खोज वे कहानी के घोषित उद्देश्यों के अलावा पात्रों की गठन, लेखकीय भाषा की बुनावट और उसके शब्द-चयन तक में करती हैं। यही वह विशेषता है जिसके चलते ये समीक्षाएँ सिर्फ सम्बद्ध कहानियों की समीक्षाएँ नहीं रह जातीं, बल्कि वृहत्तर पैमाने पर अपने समय, समाज और संस्कृति की समीक्षा हो जाती हैं।
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