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Vidyapati Ki Pagdhwaniyan

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मिथिला प्राचीन काल से ही सभ्यता और संस्कृति की भूमि रही है। यहीं दरभंगा के विस्फी गाँव में मनीषी कवि विद्यापति का जन्म हुआ था। विलक्षण प्रतिभा, विद्वत्ता और युग-चेतना के वाहक विद्यापति का प्रभाव भारतीय कविता पर अत्यन्त व्यापक रहा। उनकी ‘पदावली’ ने भारतीय भाषाओं, विशेषकर, बांग्ला, असमिया और ओड़िया आदि की रचनात्मकता को इतना उद्वेलित किया कि ब्रजबुलि नाम से एक नई साहित्य-धारा का जन्म हो गया जिसमें अनेक कवियों ने राधा-कृष्ण से सम्बन्धित पदों की रचना की। यहाँ तक कि रवीन्द्रनाथ टैगोर और बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय भी उनसे प्रभावित रहे। विद्यापति कृष्ण काव्यधारा के प्रवर्तक कवि थे जिसे आगे चलकर सूरदास एवं मीराबाई ने आगे बढ़ाया। जॉर्ज ग्रियर्सन ने उनके अनेक पदों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। महर्षि अरविन्द ने भी उनके सौ पदों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। ‘विद्यापति की पगध्वनियाँ’ उन्हीं विद्यापति के जीवन और कृतित्व पर केन्द्रित है। इसमें कवि के उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, उनकी पूर्ववर्ती कविता, मैथिली भाषा और साहित्य के इतिहास, शृंगार रस की महत्ता और भावी कविता पर विद्यापति के प्रभाव के साथ उनकी कविता की शक्ति की भी विवेचना की गई है।  छात्रों, अध्येताओं और विद्यापति-प्रेमियों के लिए एक आवश्यक पुस्तक।

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मिथिला प्राचीन काल से ही सभ्यता और संस्कृति की भूमि रही है। यहीं दरभंगा के विस्फी गाँव में मनीषी कवि विद्यापति का जन्म हुआ था। विलक्षण प्रतिभा, विद्वत्ता और युग-चेतना के वाहक विद्यापति का प्रभाव भारतीय कविता पर अत्यन्त व्यापक रहा।
उनकी ‘पदावली’ ने भारतीय भाषाओं, विशेषकर, बांग्ला, असमिया और ओड़िया आदि की रचनात्मकता को इतना उद्वेलित किया कि ब्रजबुलि नाम से एक नई साहित्य-धारा का जन्म हो गया जिसमें अनेक कवियों ने राधा-कृष्ण से सम्बन्धित पदों की रचना की। यहाँ तक कि रवीन्द्रनाथ टैगोर और बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय भी उनसे प्रभावित रहे।
विद्यापति कृष्ण काव्यधारा के प्रवर्तक कवि थे जिसे आगे चलकर सूरदास एवं मीराबाई ने आगे बढ़ाया। जॉर्ज ग्रियर्सन ने उनके अनेक पदों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। महर्षि अरविन्द ने भी उनके सौ पदों का अंग्रेजी में अनुवाद किया।
‘विद्यापति की पगध्वनियाँ’ उन्हीं विद्यापति के जीवन और कृतित्व पर केन्द्रित है। इसमें कवि के उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, उनकी पूर्ववर्ती कविता, मैथिली भाषा और साहित्य के इतिहास, शृंगार रस की महत्ता और भावी कविता पर विद्यापति के प्रभाव के साथ उनकी कविता की शक्ति की भी विवेचना की गई है। 
छात्रों, अध्येताओं और विद्यापति-प्रेमियों के लिए एक आवश्यक पुस्तक।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2026
Weight
300 grams
ISBN-13
9789377473747
Pages
152
Reading time
~5 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
13 × 21 cm
Language
Hindi

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