Premchad : Katha Sunate Huye
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Author:
Vishwanath TripathiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
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‘प्रेमचन्द : कथा सुनाते हुए’ विश्वनाथ त्रिपाठी के निबन्धों का संचयन है। इसके कुछ आलेख लेखकों को लेकर लिखे गए हैं और कुछ पुस्तकों को पढ़ते हुए, उनके बारे में सोचते हुए। जाहिर है दोनों ही में समकालीन साहित्यिक प्रश्नों पर विचार और साहित्य को समझने-जानने की प्रविधियों पर चर्चा भी होती चली है। उदाहरण के लिए, प्रेमचन्द के बारे में बात करते हुए वे लिखते हैं : ‘निर्मल वर्मा ने कहा है कि भारतीय उपन्यास लिखे ही नहीं गए। नामवर जी ने इसका समर्थन किया।’ इस पर अपना पक्ष रखते हुए विश्वनाथ त्रिपाठी का कहना है : ‘प्रेमचन्द का कथाशिल्प ठेठ भारतीय है (जैसे कोई बुजुर्ग अलाव के आसपास हाथ तापते हुए कहानियाँ सुना रहा हो) और फिर उनकी कथावस्तु क्या अभारतीय है? ...जिसे जादुई यथार्थवाद कहा जाता है वह भी अभारतीय नहीं है। प्रेमचन्द की कई कहानियों में यह जादुई यथार्थ मिलता है।’ जैनेन्द्र के ‘त्यागपत्र’ पर विचार करते हुए कहते हैं : ‘जिस तरह मृणाल की मूक सहनशीलता में विद्रोह छिपा है, उसी तरह निर्णायक घटनाओं और पात्रों के नेपथ्य ही में रहने से उनका रूप प्रभावशाली हो जाता है। शब्द मूलतः मूर्तन नहीं करते, वे श्रोता और पाठक को अपने संस्कारों, रुचियों और आवश्यकता के अनुसार कल्पना करने की पूरी छूट देते हैं। इसीलिए अच्छी कहानी या अच्छे उपन्यास पर बनी हुई फ़िल्में प्रायः पाठकों को सन्तुष्ट नहीं कर पातीं।’ यह विचारोत्तेजक है और पाठक को इन बिन्दुओं पर अपने ढंग से सोचने को आमंत्रित करता है। पुस्तक में संकलित अन्य आलेखों में आप ‘राग दरबारी’, ‘लेकिन दरवाज़ा’, ‘गोदान’, ‘सात आसमान’, ‘सारा आकाश’ और ‘मानस का हंस’ जैसे चर्चित उपन्यासों पर उनके सुचिन्तित अवलोकन के अलावा कई अन्य महत्त्वपूर्ण कृतियों पर भी उनके विचारों से अवगत होते हैं।
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‘प्रेमचन्द : कथा सुनाते हुए’ विश्वनाथ त्रिपाठी के निबन्धों का संचयन है। इसके कुछ आलेख लेखकों को लेकर लिखे गए हैं और कुछ पुस्तकों को पढ़ते हुए, उनके बारे में सोचते हुए। जाहिर है दोनों ही में समकालीन साहित्यिक प्रश्नों पर विचार और साहित्य को समझने-जानने की प्रविधियों पर चर्चा भी होती चली है।
उदाहरण के लिए, प्रेमचन्द के बारे में बात करते हुए वे लिखते हैं : ‘निर्मल वर्मा ने कहा है कि भारतीय उपन्यास लिखे ही नहीं गए। नामवर जी ने इसका समर्थन किया।’ इस पर अपना पक्ष रखते हुए विश्वनाथ त्रिपाठी का कहना है : ‘प्रेमचन्द का कथाशिल्प ठेठ भारतीय है (जैसे कोई बुजुर्ग अलाव के आसपास हाथ तापते हुए कहानियाँ सुना रहा हो) और फिर उनकी कथावस्तु क्या अभारतीय है? ...जिसे जादुई यथार्थवाद कहा जाता है वह भी अभारतीय नहीं है। प्रेमचन्द की कई कहानियों में यह जादुई यथार्थ मिलता है।’
जैनेन्द्र के ‘त्यागपत्र’ पर विचार करते हुए कहते हैं : ‘जिस तरह मृणाल की मूक सहनशीलता में विद्रोह छिपा है, उसी तरह निर्णायक घटनाओं और पात्रों के नेपथ्य ही में रहने से उनका रूप प्रभावशाली हो जाता है। शब्द मूलतः मूर्तन नहीं करते, वे श्रोता और पाठक को अपने संस्कारों, रुचियों और आवश्यकता के अनुसार कल्पना करने की पूरी छूट देते हैं। इसीलिए अच्छी कहानी या अच्छे उपन्यास पर बनी हुई फ़िल्में प्रायः पाठकों को सन्तुष्ट नहीं कर पातीं।’ यह विचारोत्तेजक है और पाठक को इन बिन्दुओं पर अपने ढंग से सोचने को आमंत्रित करता है।
पुस्तक में संकलित अन्य आलेखों में आप ‘राग दरबारी’, ‘लेकिन दरवाज़ा’, ‘गोदान’, ‘सात आसमान’, ‘सारा आकाश’ और ‘मानस का हंस’ जैसे चर्चित उपन्यासों पर उनके सुचिन्तित अवलोकन के अलावा कई अन्य महत्त्वपूर्ण कृतियों पर भी उनके विचारों से अवगत होते हैं।
Book Details
-
ISBN9789360865405
-
Pages168
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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कृष्ण कुमार अपने पाठकों को पहचानते हैं और उनसे आत्मीयता बढ़ाने के अन्दाज़ में लिखते हैं। पहली बार उनका गद्य पढ़ रहे नए पाठक इस आत्मीयता का स्पर्श पाकर चकित होते हैं। निबन्ध की विधा कृष्ण कुमार को विशेष प्रिय रही है यद्यपि वे कहानी और संस्मरण भी चाव से लिखते रहे हैं। ‘भाषा की संजीवनी’ की शुरुआत थोड़ा-बहुत भी बता पाने के संघर्ष और सुकून से होती है और अन्त भाषा के जीवनदायी चरित्र के अभिन्दन से। इन दो विचार-ध्रुवों के बीच इस संग्रह में अठ्ठारह निबन्ध, समीक्षा-लेख और संस्मरण शामिल हैं। विषयों की विविधता के बीच पाठकों को कृष्ण कुमार के स्थायी सरोकार मिलेंगे—प्रकृति, स्त्री, सरकार और पढ़ाई। इन सभी के भीतर और इर्द-गिर्द मची भगदड़ और हिंसा पर टिप्पणी भी मिलेगी। इस निबन्ध विविधा से गुज़रते हुए पाठक याद करेंगे कि कृष्ण कुमार के लिए अगर कोई चीज़ नागवार है तो वह ‘विचार का डर’ है जो उनके एक प्रसिद्ध संग्रह का शीर्षक भी है।
Zindagi Ki Kitab (A To Z)
- Author Name:
Kalpana Kaushik
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पस्तुत पुस्तक में उदीयमान लेखिका के 26 ललित निबंध हैं, जो विभिन्न मानवीय मनोभावों/प्रवृत्तियों पर आधारित हैं। लेखिका ने अपने निबंधों को अंग्रेजी वर्णमाला की ध्वनि के अनुसार अपने लेखों को संयोजित किया है। भरोसा, चतुराई, धैर्य, इच्छाशक्ति, उत्साह, वचनबाध्यता, जुझारूपन, ईमानदारी, करुणा, मंथन, जिंदादिली, संस्कार आदि गुण जहाँ मनुष्य का निर्माण करते हैं, वहीं आशा, हँसी-मजाक, लालसा, जिज्ञासा, उत्साह उसके दैनंदिन व्यवहार का अभिन्न अंग हैं। लेखिका ने शुष्क एवं क्लिष्ट विषयों को रोचक रूप में प्रस्तुत किया और इसके लिए रोचक संस्मरणों की सहायता ली है, ताकि विषय स्पष्ट हो सके और बोझिलता कम हो। जिंदगी में जिंदादिली और खुशी का मार्ग दिखानेवाली एक पठनीय पुस्तक।
School Ki Hindi
- Author Name:
Krishna Kumar
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कृष्ण कुमार का यह नया निबन्ध-चयन उनके शैक्षिक लेखन को एक वृहत्तर सांस्कृतिक सन्दर्भ देता है। बच्चों के लालन-पालन और उनकी शिक्षा से जुड़े सवालों की पड़ताल यहाँ बीसवीं सदी के अन्तिम वर्षों में बदलती-बनती नागरिक संस्कृति की परिधि में की गई है। खिलौनों और पाठ्य-पुस्तकों की भाषा से लेकर धार्मिक अलगाववाद की राजनीति और सामाजिक विषमता तक एक लम्बी प्रश्न-शृंखला है, जिसमें कृष्ण कुमार अपनी सुपरिचित चिन्ताएँ पिरोते हैं। इन चिन्ताओं में साहित्य की परख, स्त्री की असुरक्षा और भाषा के भविष्य जैसे विविध प्रसंग शामिल हैं। अपनी व्यंजनापरक शैली और चीज़ों को रुककर देखने की ज़िद से कृष्ण कुमार ने एक बड़ा पाठक-वृत्त बनाया है। अध्यापन और लेखन के बीच कृष्ण कुमार एक व्यक्तिगत पुल बनाने में सफल हुए हैं। यह पुल उनके शैक्षिक सरोकारों को खोजी यात्राओं पर ले जाता है और उनके पाठकों को स्कूल की चारदीवारी और बच्चों के मनोजगत में प्रवेश कराता है।
Vichar Ka Kapda
- Author Name:
Anupam Mishra
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‘‘क़ायदे से अनुपम मिश्र न लेखक थे, न पत्रकार। वे साफ़ माथे के एक आदमी थे जो हर हालत में माथा ऊँचा और साफ़ रखना चाहते थे। उनकी निराकांक्षा उनकी बुनियादी बेचैनियों को ढाँप नहीं पाती थी। ये बेचैनियाँ ही उन्हें कई बार ऐसे प्रसंगों, व्यक्तियों, घटनाओं, वृत्तियों को खुली नज़र देखने-समझने की ओर ले जाती थीं। उनकी संवेदना में ऐसी ऐन्द्रियता थी कि वे विचार का कपड़ा भी पहचान लेती थीं। कुल मिलाकर अनुपम मिश्र की अकाल मृत्यु के बाद शेष रह गई सामग्री में से किया गया यह संचयन हिन्दी में सहज, निर्मल और पारदर्शी, मानवीय गरमाहट से भरे गद्य का विरल उपहार है। हमें मरणोत्तर अनुपम मिश्र को उनकी भरी-पूरी जीवन्तता में प्रस्तुत करने में प्रसन्नता है।”
—अशोक वाजपेयी
Kuchh Musafir Sath The
- Author Name:
Rajendra Rao
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इन दिनों हिंदी साहित्य में कथेतर गद्य को महत्त्व की दृष्टि से देखे जाने की प्रवृत्ति जोर पकड़ रही है और उसमें पाठकों की रुचि निरंतर अनुभव की जा रही है। कुछ अभिनव प्रयोग भी किए जा रहे हैं। वरिष्ठ कथाकार राजेंद्र राव ने संस्मरण, स्मृति-लेख और रेखाचित्र जैसी विधाओं की त्रिवेणी को कथात्मक संस्मरण के रूप में प्रस्तुत करकेकथा और कथेतर के बीच की फाँक को न्यूनतम करने का एक सफल रचनात्मक प्रयास किया है, जो कथात्मक संस्मरणों के इसअत्यंत पठनीय संकलन में द्रष्टव्य है। इनके बारे में लेखक का कहना है, स्मृति जैसे रंग-बिरंगे फलों से लदा वृक्ष है। इनमें कुछ मीठे हैं, कुछ खट्टे और कुछ कड़वे भी, मगर बेस्वाद कोई नहीं है। इनमें से कुछ को स्वाद की तीव्रता के क्रम से हम यादों में सँजोए रखते हैं कहानियों के रूप में। हर याद रह गए चेहरे के पीछे एक या एक से अधिक कहानी/कहानियाँ होती हैं। स्मृति-पटल पर गहरे खुदे व्यक्तियों के ये रेखाचित्र/संस्मरण न होकर उनकी कहानियाँ हैं। साप्ताहिक हिंदुस्तान और धर्मयुग में प्रकाशित राजेंद्र राव की धारावाहिक कथा-शृंखलाएँ ‘सूली ऊपर सेज पिया की’, ‘कोयला भई न राख’ और ‘हम विषपायी जनम के’ अत्यंत चर्चित और लोकप्रिय रही हैं। विश्वास है, कथात्मक संस्मरणों के इस सिलसिले का भी भरपूर स्वागत होगा।
Ped Aur Parchhai
- Author Name:
Udyan Vajpeyi +1
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प्रसिद्ध कवि और लेखक उदयन वाजपेयी के लघु निबंध और भज्जू श्याम के चित्र इस पुस्तक का निर्माण करते हैं। उदयन वाजपेई के निबंध कल्पनाशील और चतुराई से गढ़े गए हैं। वह परिभाषाओं से निपटता नहीं है बल्कि वह किसी चीज़ को देखने के वैकल्पिक तरीकों पर विचार करता है। इस प्रकार वह वस्तु को उसकी प्रचलित परिभाषाओं से मुक्त कर देता है। भज्जू श्याम के चित्र सोच-समझकर बनाए गए और विस्तृत हैं। उनके सूक्ष्म विवरणों का आनंद लेने के लिए उन्हें ध्यानपूर्वक, बारीकी से देखें। Age group 9-12 years
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