Rajkamal Prakashan Samuh
Vartman Jaisa Ateet
- Author Name:
Romila Thapar
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Book Type:

- Description: अतीत के बारे में प्रचलित धारणाओं को तब तक ऐतिहासिक नहीं माना जा सकता जब तक उनकी आलोचनात्मक जाँच-पड़ताल न कर ली जाए। ‘वर्तमान जैसा अतीत’ किताब मुख्यतः यही करती है। उदाहरण के लिए ये कुछ सवाल—सोमनाथ मन्दिर पर हमले के बाद वास्तव में क्या हुआ? हम में से आर्य या द्रविड़ कौन हैं? भारतीय समाज का धर्मनिरपेक्ष होना क्यों ज़रूरी है? साम्प्रदायिकता ने एक विचारधारा के रूप में देश में कब अपने पैर जमाए? हमारी पितृसत्तात्मक मानसिकता ने महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की संस्कृति को कैसे और कब बढ़ावा देना शुरू किया? इतिहास की पाठ्यपुस्तकों को फिर से लिखने के लिए कट्टरपन्थी इतने उत्सुक क्यों हैं? इन और इस तरह के अन्य प्रश्नों को लेकर उसी समय से विवाद और बहसें होती आई हैं जब इन्हें पहली बार पूछा गया था। प्रतिष्ठित इतिहासकार रोमिला थापर अकसर ही ऐसे प्रश्नों के मूल में स्थित ऐतिहासिक तथ्यों की जाँच, विश्लेषण और व्याख्या करती रही हैं। वे कहती हैं कि इतिहास में सिर्फ सूचनाएँ ही नहीं, उन सूचनाओं का विश्लेषण और व्याख्या भी शामिल होती है। चार उपखंडों के तहत विभिन्न प्रश्नों पर तथ्यात्मक और दृष्टि-सम्पन्न ढंग से विचार करने वाली यह पुस्तक ऐसे समय में निहायत ज़रूरी पाठ बन जाती है जब साम्प्रदायिकता, बनावटी ‘राष्ट्रवाद’ और ऐतिहासिक तथ्यों को धूमिल करना हमारे सार्वजनिक, निजी और बौद्धिक जीवन का अभिन्न अंग बनता जा रहा है।
Vartman Jaisa Ateet
Romila Thapar
Unneesaveen Sadi Ka Aupniveshik Bharat : Navjagaran Aur Jaati-Prashna
- Author Name:
Rupa Gupta
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Book Type:

- Description: उन्नीसवीं सदी उनमें से ज़्यादातर मूल्यों की जन्मदाता रही है जो बीसवीं सदी में भारत के जन-गण, राजनीति और सामाजिक गति-प्रगति के आधार-मूल्य रहे। आधुनिकता का विचार इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है जो इसी सदी में भारत आया और जिसने हमें अपनी चारित्रिक बनावट को देखने के लिए एक नई दृष्टि दी। राष्ट्र का विचार और विभिन्न सांस्कृतिक प्रश्नों का उत्तर खोजने की ललक भी इसी सदी में पैदा हुई। परम्परा और आधुनिकता, तर्क और आस्था, विज्ञान और धर्म के तार्किक घात-प्रतिघात का यह समय आनेवाली सदियों में हमारी चिन्तनधारा की पृष्ठभूमि होना था। यह पुस्तक इस आलोड़नकारी समय में जाति के प्रश्न को टटोलती है। क्या आर्थिक आत्मनिर्भरता, विदेशी शोषकों के विरोध, स्त्री-शिक्षा और सामाजिक उत्थान के अन्य प्रश्नों की चेतना का यह दौर जाति को लेकर भी उतना ही उद्विग्न था? या फिर भारतीय समाज को आज तक अपने चंगुल में दबोचे रखनेवाली 'जाति' देश के जातीय पुनर्जागरण की समग्र धारणा में कहीं पीछे छूट गई थी? छूट गई थी तो क्या वह निष्क्रिय भी थी? क्या वह देश और मनुष्यता के बोध को भीतर-भीतर खा नहीं रही थी? और भारत का अग्रणी बौद्धिक वर्ग उसे लेकर कितना सचेत और विचलित था? यह सुदीर्घ पुस्तक इन्हीं प्रश्नों का उत्तर तलाशते हुए नवजागरणकालीन हिन्दी साहित्य को लेकर हुए नए शोध-कार्यों की रोशनी में एक सन्तुलित दृष्टि बनाने की कोशिश करती है। भारतेन्दुकालीन साहित्य और पत्रकारिता आदि के परिप्रेक्ष्य में जाति और स्त्री विषयक चिन्तन को लेकर जो एकांगी मान्यताएँ इधर प्रचलन में आई हैं, इसमें उनका भी निवारण करने का प्रयास किया गया है। इतिहास और साहित्येतिहास की श्रेणी से स्वयं को बाहर रखते हुए भी यह शोध-ग्रंथ इन दोनों विधाओं को जोड़ते हुए आलोचना की एक नई समझ का विस्तार करता है। भाषा की सामाजिक व्याप्ति, सत्ता की भाषा, वर्ण-धर्म-जाति के समीकरण, 1857 के स्वाधीनता संग्राम में जातियाँ और जातीय बोध आदि कई विषयों को व्यापक अध्ययन के आधार पर विश्लेषित करते हुए यह पुस्तक पाठकों, शोध-छात्रों और अध्येताओं को दृष्टि तथा ज्ञान, दोनों स्तरों पर समृद्ध करेगी।
Unneesaveen Sadi Ka Aupniveshik Bharat : Navjagaran Aur Jaati-Prashna
Rupa Gupta
Azadi Ke Baad Ka Bharat
- Author Name:
Aditya Mukherjee +2
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Book Type:

- Description: ‘आज़ादी के बाद का भारत’ देश के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिदृश्य का विस्तृत अवलोकन है। इसमें हमें न सिर्फ़ इस कालखंड की निर्णायक घटनाओं की जानकारी मिलती है, बल्कि उन्हें देखने के लिए एक सन्तुलित दृष्टिकोण भी प्राप्त होता है। प्रो. बिपिन चंद्र और उनके सहयोगी लेखकों द्वारा लिखित चर्चित पुस्तक ‘भारत का स्वतंत्रता संग्राम’ की अगली कड़ी के रूप में प्रकाशित यह पुस्तक संविधान के निर्माण, रियासतों के एकीकरण, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के दौर में अपनाई गई राजनीतिक-आर्थिक नीतियों, पंचवर्षीय योजनाओं, हरित क्रान्ति और अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण आदि विषयों की चर्चाओं के अलावा उन समस्याओं को देखने का प्रयास भी करती है जो लम्बे औपनिवेशिक दौर के बाद आज़ाद भारत ने अपने सामने पाई, जैसे कि साम्प्रदायिकता और बड़े पैमाने पर ग़रीबी। इस पुस्तक को विशेषतः तथ्यों की स्पष्टता, प्रामाणिकता और समग्रता के लिए जाना जाता है जिसके पीछे एक व्यापक शोध परियोजना का परिश्रम है। विद्वानों, सामान्य पाठकों और छात्रों के बीच समान रूप से स्वीकृत ‘आज़ादी के बाद का भारत’ आधुनिक भारत को समझने और जानने के सन्दर्भ में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पुस्तक है।
Azadi Ke Baad Ka Bharat
Aditya Mukherjee
Mughal Saltanat Ki Arthvyavastha C. 1595 : A Statistical Study
- Author Name:
Shireen Moosvi
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Book Type:

- Description: ‘मुग़ल सल्तनत की अर्थव्यवस्था’ इतिहास की एक बेहद चर्चित और प्रशंसित कृति है। यह पुस्तक वर्ष 1595 के आसपास के मुग़ल भारत की अर्थव्यवस्था का सांख्यिकीय विश्लेषण करती है। मुगल साम्राज्य के महान आधिकारिक ग्रन्थ ‘आइन-ए-अकबरी’ की प्रारंभिक पांडुलिपियों में मौजूद समृद्ध सांख्यिकीय सामग्री का विश्लेषण करते हुए, यह पुस्तक तत्कालीन आर्थिक स्थितियों पर व्यापक प्रकाश डालती है, साथ ही इस विषय में प्रचलित विचारों-धारणाओं को चुनौती भी देती है और उनमें संशोधन भी करती है। प्रसिद्ध इतिहासकार शीरीं मूसवी की यह मौलिक पुस्तक मुग़ल सल्तनत की अर्थव्यवस्था के मात्रात्मक विश्लेषण द्वारा उसी तरह एक नया आयाम स्थापित करती है जैसा कि समकालीन अर्थशास्त्र में किया जाता है। इस पुस्तक का पहला संस्करण 1987 में प्रकाशित हुआ था, उसके बाद इसका जो दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ उसमें न सिर्फ़ सकल घरेलू उत्पाद पर एक नया अध्याय इसमें जोड़ा गया बल्कि अन्य अध्यायों को भी अद्यतन किया गया, यह उसी संस्करण का अनुवाद है। मुगल साम्राज्य की अर्थव्यवस्था के कामकाज और उसकी सम्भावित विकास क्षमताओं में रुचि रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह पुस्तक अपरिहार्य है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में भारत की औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की संरचना के साथ मध्यकालीन अर्थव्यवस्था की तुलना के लिए भी यह एक ठोस आधार प्रदान करती है।
Mughal Saltanat Ki Arthvyavastha C. 1595 : A Statistical Study
Shireen Moosvi
Mauryakaleen Bharat
- Author Name:
S. Irfan Habib
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Book Type:

- Description: इतिहास-पुस्तकों की चर्चित शृंखला ‘भारत का लोक-इतिहास’ की यह कड़ी ईसा पू. 350 से लेकर ईसा पू. तक के कालखंड पर केन्द्रित है। भारतीय और यूनानी स्रोतों से प्राप्त जानकारी और अद्यतन विश्लेषणों को आधार बनाकर लिखी गई पुस्तक ‘मौर्यकालीन भारत’ में सिकंदर के भारत पर आक्रमण और मौर्य साम्राज्य के इतिहास को समेटा गया है। सन्दर्भ सामग्री के रूप में अशोक के शिलालेखों के विश्लेषण के साथ उनकी अहमियत को भी रेखांकित किया गया है, साथ ही तत्कालीन अर्थव्यवस्था, समाज और संस्कृति का विस्तृत विवरण भी उपलब्ध कराया गया है ताकि पाठक को हाल की खोजों से अवगत कराया जा सके। मौर्यशासन के कालक्रम, अर्थशास्त्र, अभिलेख विज्ञान और अशोककालीन प्राकृत की बोलियों पर विशेष टिप्पणियाँ भी इस अध्ययन का हिस्सा है, अशोक के दस पूर्ण शिलालेखों और भारत तथा यूनान के कुछ महत्त्वपूर्ण स्रोतों के अंश भी इसमें शामिल हैं। सामान्य पाठकों और छात्रों के पाठ्यक्रम को ध्यान में रखकर तैयार की गई यह पुस्तक मौर्य साम्राज्य विषयक अध्ययन के लिए विशेष महत्त्व रखती है।
Mauryakaleen Bharat
S. Irfan Habib
Bharatiya Arthvyavastha
- Author Name:
S. Irfan Habib
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Book Type:

- Description: ‘भारत का लोक इतिहास’ शृंखला की इस पुस्तक ‘भारतीय अर्थव्यवस्था’ में 1857 के विद्रोह से लेकर पहले विश्व युद्ध तक की अवधि के दौरान भारत की अर्थव्यवस्था का जायज़ा लिया गया है। यह वह दौर था जब औपनिवेशिक शासन भी अपने उरूज पर था और भारतीय जन-गण भी अपनी सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक स्वाधीनता को लेकर तेज़ी से सचेत हो रहा था। जिन विषयों को इस पुस्तक में ख़ासतौर पर रेखांकित किया गया है उनमें जनसंख्या, सकल उत्पाद, कीमतें, साम्राज्यवादी मुक्त व्यापार, रेलवे का निर्माण, कृषि की स्थिति, किसानों की आय, खेती का व्यवसायीकरण, बैंकिंग एवं वित्त, राजकोषीय प्रणाली और टैक्स आदि प्रमुख हैं। संकलित सामग्री और सूचनाओं के लिए तत्कालीन रिपोर्टों, टिप्पणियों और अन्य स्रोतों के अंश भी पुस्तक में शामिल किए गए हैं ताकि सभी प्रासंगिक तथ्य प्रामाणिक रूप में सामने आ सकें। सभी अध्ययनों के साथ प्रासंगिक ग्रन्थ सूची भी संलग्न की गई है ताकि इच्छुक पाठक छात्र एवं अध्येतागण सम्बन्धित विषय पर अपने अध्ययन को विस्तार दे सकें। औपनिवेशिक दौर में भारत की अर्थव्यवस्था का यह विश्लेषण पठनीय तो है ही संग्रहणीय भी है।
Bharatiya Arthvyavastha
S. Irfan Habib
Vedic Log : Unka Itihas Aur Bhugol
- Author Name:
Rajesh Kochhar
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Book Type:

- Description: क्या ऋग्वेद की रचना अफगानिस्तान में हुई थी? क्या किसी समय घग्गर नदी ही ऋग्वेद में वर्णित महान सरस्वती थी? क्या ऋग्वैदिक जन और हड़प्पा निवासी समान ही थे? क्या राम की अयोध्या भारत में ही थी? प्राचीन भारतीय इतिहास के इन निर्णायक प्रश्नों के उत्तर इस किताब ‘वैदिक लोग’ में मिलते हैं। इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए विख्यात खगोल-भौतिकीविद राजेश कोचर भाषाविज्ञान, साहित्य, प्राकृतिक इतिहास, पुरातत्व, प्रौद्योगिकी के इतिहास, भू-आकृति विज्ञान और खगोलशास्त्र आदि अनेक क्षेत्रों से प्राप्त आँकड़ों का विश्लेषण और संश्लेषण करते हैं और इस क्रम में ऐसे कई विरोधाभासों को सुलझाने की कोशिश करते हैं जो पेशेवर इतिहासकारों और पुरातत्वविदों, दोनों को उलझन में डालते आए हैं। यह तर्क देते हुए कि ऋग्वेद के ज़्यादातर हिस्से की रचना दक्षिण अफ़ग़ानिस्तान में (1700 ई.पू. के बाद), ऋग्वैदिक लोगों के पुन्जाल मैदान में प्रवेश करने और गंगा नदी के पूर्व की ओर जाने से भी बहुत पहले हुई, वे दावा करते हैं कि अपने प्रवसन के दौरान वे न सिर्फ अपने अनुष्ठान और भजन इत्यादि, बल्कि नदियों और स्थानों के नाम भी अपने साथ ले गए जिनका प्रयोग उन्होंने अपनी इच्छानुसार किया। हर कदम पर अपनी बात को तर्कों से प्रमाणित करते हुए एक वैज्ञानिक ने इस पुस्तक को ऐसी सरल और सुबोध शैली में लिखा है कि साधारण पाठक भी इसे रुचिपूर्वक पढ़ सकते हैं, इतिहासकारों, पुरातत्वशास्त्रियों और भारतविदों के लिए तो यह काम उल्लेखनीय रहा ही है।
Vedic Log : Unka Itihas Aur Bhugol
Rajesh Kochhar
Aadhunik Hindi Prayog Kosh
- Author Name:
Badrinath Kapoor
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Book Type:

- Description: भाषा शब्दों से बनती है। शब्दों के बारे में जानकारी व्याकरण देता है और उनके अर्थों का विवरण कोश प्रस्तुत करता है। इस प्रकार भाषा को जानने-समझने के लिए व्याकरण और कोश दो आधार माने जाते हैं। लेकिन भाषा का एक तीसरा महत्त्वपूर्ण आधार भी है—प्रयोग। भाषा के स्वाभाविक विकास की प्रक्रिया में नए-नए सन्दर्भों के अनुरूप नए-नए प्रयोग चलते रहते हैं। प्रयोगों से भाषा की प्रभावकता और क्षमता में वृद्धि होती है। इनकी महत्ता इस तथ्य में निहित है कि बहुधा ये व्याकरण और कोश को पीछे छोड़ जाते हैं। प्रयोगों के फलस्वरूप ही नए-नए पदबन्ध और मुहावरे अस्तित्व में आते हैं। लेखक की लेखनी और वक्ता की वाणी को उनसे ऊर्जा मिलती है। उनके अर्थ अक्सर आप सामान्य कोशों में ढूँढ़ नहीं पाते, व्याकरण से वे सिद्ध नहीं होते, फिर भी वे मान्य और अपरिहार्य होते हैं। एक प्रामाणिक प्रयोग कोश की अनिवार्यता ऐसी ही स्थिति में सामने आती है। यह ‘आधुनिक हिन्दी प्रयोग कोश’ इसी अभाव की पूर्ति की दिशा में पहला सार्थक प्रयास है। सुप्रसिद्ध कोशकार डॉ. बदरीनाथ कपूर द्वारा प्रस्तुत ‘आधुनिक हिन्दी प्रयोग कोश’ उनकी दीर्घकालीन श्रम-साधना का सुफल है। इसमें ऐसे तमाम प्रयोगों के बारे में उदाहरणसहित जानकारी दी गई है जो हिन्दी में प्रचलित और मान्य हैं। आधुनिक प्रयोग इसमें ऐसे हैं जो अभी तक अन्य कोशों में अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा पाए हैं। ‘आधुनिक हिन्दी प्रयोग कोश’ में इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि यह समान रूप से भाषा के प्रति जागरूक पाठकों, लेखकों, पत्रकारों, शिक्षकों और छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध हो।
Aadhunik Hindi Prayog Kosh
Badrinath Kapoor
Mandavi
- Author Name:
Asha Prabhat
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Book Type:

- Description: ‘मांडवी’ रामकथा की स्त्री-चरित्रों को लेकर संवेदनशील रही आशा प्रभात की लेखनी का नया पड़ाव है। इससे पहले वह ‘मैं जनकनन्दिनी’ और ‘उर्मिला’ लिख चुकी हैं। ‘मांडवी’ भरत की पत्नी थीं जिनके विषय में न तो रामकथा में बहुत विस्तार से कुछ आता है, न ही बाद के विद्वानों-साहित्यकारों ने उन पर कुछ ख़ास ध्यान दिया, जबकि राम-वनवास के दौरान उन्होंने सम्भवतः लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला से भी ज़्यादा पीड़ा का वहन किया होगा। आशा प्रभात एक सजग लेखिका के रूप में यह ठीक ही प्रश्न उठाती हैं कि रामायण के पुरुष-पात्र जहाँ इतने पराक्रमी, प्रज्ञावान और गुणवान थे, तो फिर स्त्री-पात्र क्या इतने संवेदनहीन और प्रज्ञाशून्य थे कि उनकी मनस्थिति का विस्तृत चित्रण करना कवियों की अनिवार्य नहीं लगा। इसी से प्रेरित होकर उन्होंने सीता और उर्मिला के बाद अब मांडवी को अपना विषय बनाया जो दुर्भाग्य से उस कैकेयी की बहू भी थी जिसके चलते राम को वनवास हुआ और उनसे जुड़े तमाम पात्रों, ख़ासकर स्त्रियों को इतना कुछ झेलना पड़ा। यह उपन्यास एक पौराणिक चरित्र की भावभूमि का अन्वेषण करते हुए स्त्री-मात्र की व्यथा को समझने का प्रयत्न करता है, और रामकथा के महत्त्वपूर्ण लेकिन उपेक्षित चरित्र को, उसके पूरे व्यक्तित्व के साथ रेखांकित करता है।
Mandavi
Asha Prabhat
Sun Mere Bete Pyare
- Author Name:
Dinesh Kumar Jangid 'Sarang'
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Book Type:

- Description: Awaiting Description
Sun Mere Bete Pyare
Dinesh Kumar Jangid 'Sarang'
Gawah Gairhazir
- Author Name:
Chandrakishore Jaiswal
-
Book Type:

- Description: किसुन साह ने जब बिना किसी सिर-फुड़ौव्वल के बेटों के बीच बाँट-बखरा कर दिया तो लोगों ने उन्हें इस बात पर खुश होने को कहा कि अब उनके बुढ़ापे के दिन मौज-मस्ती में कटते रहेंगे। किसुन साह ने भी निर्णय ले लिया कि मौज-मस्ती में दिन काटने के लिए उन्हें अब बूढ़ा भी हो ही जाना चाहिए। लेकिन...। परिवार नामक सुख के टापू की यह कहानी यहीं से शुरू होती है। लोक और ग्रामीण जीवन के मर्मज्ञ कथाकार चन्द्रकिशोर जायसवाल का उपन्यास ‘गवाह गैरहाजिर’ अपनी बहुस्तरीय भाषा-सामर्थ्य के लिए खासतौर पर जाना जाता है। पात्रों की कहानी कहने के साथ ही कथाकार इसमें भारतीय ग्राम्य समाज और उसकी संरचना पर भी टिप्पणियाँ करते चलते हैं जिससे एक तरफ सूक्ष्म पर्यवेक्षण की उनकी क्षमता रेखांकित होती है, तो दूसरी तरफ़ गाँव की गझिन सामाजिक-मानसिक बनावट को समझने में भी मदद मिलती है। उपन्यास की कथा के केन्द्र में किसुन साह हैं—एक स्वाभिमानी और समझदार बुजुर्ग। घर की सम्पत्ति इत्यादि का बँटवारा अपने परिवार में शान्तिपूर्वक करने के बाद वे सबसे छोटे बेटे के साथ रहने का फैसला करते हैं। कुछ दिन वहाँ रहने के बाद जब उन्हें लगता है कि बेटा-बहू का व्यवहार उनके प्रति ठीक नहीं है तो वे घर छोड़कर बाकी जीवन एक मन्दिर में बिताने का फैसला करते हैं, लेकिन परिवार से मोह के चलते यह भी नहीं कर पाते। पारिवारिक सम्बन्धों की महीन अक्कासी के अलावा यह उपन्यास पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी और सम्बन्धों की ऊष्मा के छीजते जाने की मनोवैज्ञानिक पड़ताल भी करता है। समर्थ शिल्प, जीवन्त भाषा और बेधक कथ्य वाला अत्यन्त पठनीय उपन्यास !
Gawah Gairhazir
Chandrakishore Jaiswal
Joothi Gali
- Author Name:
Hrishikesh Sulabh
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Book Type:

- Description: ‘जूठी गली’ जीवनानुभव का एक ऐसा लोक है जिसके भीतर वर्तमान की आँधी में इतिहास की धूल और राख उड़ती रहती है। जब अठारहवीं सदी के आरम्भ में पटना का नाम अज़ीमाबाद हुआ, उन्हीं दिनों जूठी गली की नींव पड़ी थी। उन दिनों से अब तक यह गली ज़िन्दा है। लोग जनमते और विदा होते रहे, मकान बिकते-ढहते-बनते रहे, जूठी गली अपना रूप बदलती रही और किसी ज़िन्दा इनसान की तरह धड़कती रही। इसके बाशिन्दे ख़बरों के रसिया हैं। ख़बरें इस गली में हवा के पर लगाकर उड़ती हैं। जन्म और मृत्यु दोनों के लिए यहाँ समान भाव से सुख-दुःख उपजता है। प्रेम और नफ़रत एक ही बटुए में रखकर लोग आपस में मिलते-जुलते हैं। जो ज़ुबान प्रशंसा करते नहीं थकती वह पीठ फेरते ही निन्दा रस उड़ेलने लगती है। इस गली में मध्यवर्गीय प्रपंचों के कीचड़ में लिथड़कर जीती स्त्रियों के साथ ऐसी स्त्रियाँ भी हैं जो पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती देती हैं और परिदृश्य बदल जाता है। राजनीति ने अपने नाख़ूनों के खरोचों से जूठी गली को जो घाव दिए हैं, लोग उन्हें सहलाते हुए जीते हैं। इस गली में जाति-दंश की ज़हरीली हवा बहती है। प्रेम करनेवाले यहाँ सम्मान नहीं, हँसी के पात्र हैं। हृषीकेश सुलभ अपनी रचनाओं में स्वयं नहीं बोलते बल्कि उनके पात्रों का जीवन-व्यापार और परिवेश कथ्य को सघनता से प्रकट करता है। अपनी सहज भाषा की मार्मिकता और आत्मीय कहन के हुनर के सहारे वे कथा के बीहड़ में उतरते हैं और जीवन के ऐसे क्षणों को रचते हैं जो मानवीय गरिमा की रक्षा करते हैं। जूठी गली हमारे समय का जीवन्त दस्तावेज़ है।
Joothi Gali
Hrishikesh Sulabh
Bharat : Ek Vichar-Parampara
- Author Name:
Prem Kumar Mani
-
Book Type:

- Description: भारत क्या है—आज इस सवाल को पूछना, इसके उत्तर तलाश करना और एक राष्ट्र के रूप में भारत की संरचना को समझना बहुत ज़रूरी हो गया है। समय है कि अकादमिक बहसों-विमर्शों से आगे बढ़कर इस सवाल पर आम जन की आम भाषा में बात हो। ‘भारत : एक विचार-परम्परा’ इसी दिशा में एक बड़ा क़दम है। इसका उद्देश्य भारतखंड की हज़ारों वर्षों की सामाजिक-सांस्कृतिक यात्रा पर दृष्टिपात करते हुए यह जानना है कि वह क्या चीज़ है कि ‘हस्ती मिटती नहीं हमारी’? वह क्या तत्व है जो आरम्भ से अब तक इस इतने लम्बे सफ़र की प्रेरणा-पूँजी रहा है। सिन्धु नदी के किनारे उगी-उभरी सभ्यता कैसे आगे बढ़ी; वेदों का, उपनिषदों का समय आया, हड़प्पा और मुअन-जो-दड़ो विकसित हुए, तक्षशिला जैसे ज्ञान के महान केन्द्र अस्तित्व में आए, मगध में विचारों और विचारकों का इतना जमावड़ा हुआ; बौद्ध दर्शन, जहाँ उद्भूत हुआ, मध्यकाल में जिसने विदेशी आक्रान्ताओं का सामना किया, ब्रिटिश शासन का लम्बा औपनिवेशिक दौर देखा, और लम्बे संघर्ष के उपरान्त विभाजन जैसी विभीषिका के साथ स्वतंत्रता प्राप्त की। लेकिन एक विचार के रूप में भारत भारत ही बना रहा; समय से सीखता ख़ुद को बदलता, आगे बढ़ता। यह पुस्तक इस पूरी यात्रा पर दृष्टिपात करती है और हमें अपनी सुदीर्घ वैचारिक परम्परा के मद्देनज़र एक मत स्थिर करने में मदद करती है।
Bharat : Ek Vichar-Parampara
Prem Kumar Mani
Mini Aur Anya Kahaniyan
- Author Name:
Avadhesh Preet
-
Book Type:

- Description: मिनी और अन्य कहानियाँ अवधेश प्रीत की नई कहानियों का संग्रह है। एक कथाकार के रूप में उन्होंने समाज, राजनीति और निरन्तर बदलते भारतीय यथार्थ को व्यावहारिक भाषा और शिल्प के साथ अंकित किया है। इस संग्रह में शामिल कहानियाँ मौजूदा समय के कई सवालों से रू-ब-रू होते हुए उन्हें हमारे विचार के दायरे में लाती हैं। संग्रह की शीर्षक कथा ‘मिनी’ का फलक इतना व्यापक है जिसमें नए रूप में ढलती स्त्री-चेतना से लेकर समकालीन पत्रकारिता तक कई मुद्दों की तरफ़ हमारा ध्यान जाता है। इसी प्रकार दूसरी कहानी ‘नग्न’ में पुलिस तंत्र में व्याप्त ग़ैर-ज़िम्मेदारी को बहुत कौशल के साथ रेखांकित किया गया है। यह कहानी बताती है कि न्याय की प्रक्रिया में पुलिस की अरुचि के चलते कैसे एक युवती को न सिर्फ़ इंसाफ नहीं मिलता, बल्कि वह अपने जीवन से भी हाथ धो बैठती है। भाषा में स्थानीय लहजे और शब्दों का प्रयोग अवधेश प्रीत की कहानियों को उसी तरह बेहद पठनीय और यथार्थवादी बनाता है, जैसे कहानी से सम्बन्धित सामाजिक, प्रशासनिक और राजनीतिक मुद्दों का ज्ञान उन्हें प्रामाणिक बनाता है। ‘मिनी और अन्य कहानियाँ’ संग्रह में उनकी बारह कहानियाँ संकलित हैं जिनमें व्यापक सामाजिक सरोकारों को चिन्हित करने वाली कहानियों के साथ-साथ ‘कॉफ़ी’ जैसी कहानियाँ भी हैं जहाँ दो बुज़ुर्ग पति-पत्नी पुराने दिनों की याद करते हुए एक भाव-भीगी शाम बिता रहे हैं।
Mini Aur Anya Kahaniyan
Avadhesh Preet
Aadhi Pankti
- Author Name:
Anchit
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Book Type:

- Description: Aadhi Pankti Poetry
Aadhi Pankti
Anchit
Baghin Ki Sawari
- Author Name:
Chandrakishore Jaiswal
-
Book Type:

- Description: ‘बाघिन की सवारी’ संग्रह की कहानियाँ जीवन और समाज का एक वृहद ‘स्पेक्ट्रम’ पाठक के सामने रखती हैं। एक के बाद एक कहानी से गुजरते हुए हम कहीं गहन करुणा से आप्लावित होते हैं तो कहीं अपनी दुनिया की विसंगतियों से क्षुब्ध। कहीं किसी पात्र की असहायता हमें भिगो देती है तो कहीं किसी का संकल्प हमें आजादी की एक दिशा दे जाता है। ‘सहेलियाँ’ शीर्षक कहानी में दो सखियों की तरह प्रेम और विवाह जैसे विषयों पर खुलकर बतियातीं माँ वत्सला और बेटी गुंजन ऐसे ही पात्र हैं जो धीरे-धीरे बदलते हमारे समय को परम्परा की धारा से एकदम नहीं तोड़ना चाहते और नई सम्भावनाओं—परिवर्तनों से मुँह भी नहीं फेरते। वहीं ‘बेटा का घर’ कहानी के हताश माँ-पिता अपने परिवार में मगन बेटे के व्यवहार और अपनी विवशताओं को सोच आँख गीली कर लेते हैं, और पाठक को मौजूदा समय के प्रति सचेत कर जाते हैं। वृद्धावस्था और उससे जुड़े दुखों पर ये कहानियाँ बार-बार दृष्टिपात करती हैं। यह ऐसा विषय है जिस पर चन्द्रकिशोर जायसवाल अकसर लौटे हैं। इस संग्रह में ‘रोवनहार’ शीर्षक कहानी पूरी तरह इसी विषय पर केन्द्रित है जहाँ चार बेटों और बहुओं-पोतों से भरे घर में रामजनम चौधरी को वास्तविक लगाव अपने किराएदार की बच्ची से मिलता है, उन्हें लगता है कि उनके मरने पर और भले कोई न रोए वह जरूर रोएगी। संग्रह की शीर्षक कथा ‘बाघिन की सवारी’ सत्ता और सुख से मोहभंग और लगाव की लम्बी कहानी है जिसमें हमारी मुलाकात जवानी में साधु बने एक ऐसे व्यक्ति से होती है जो बीस साल बाद वापस, कदम-दर-कदम चलते हुए समाज और उसके सत्ता-व्यूह में दाखिल होता है।
Baghin Ki Sawari
Chandrakishore Jaiswal
Patkatha Lekhan : Vyavaharik Nirdeshika
- Author Name:
Asghar Wajahat
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Book Type:

- Description: फ़िल्मों और टी.वी. के सर्वाधिक लोकप्रिय कार्यक्रम, धारावाहिक के लिए पटकथा अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त डाक्यूड्रामा और डाक्यूमेंट्री फ़िल्मों के लिए भी दृश्य-श्रव्य केन्द्रित लेखन आवश्यक है। फ़िल्म और टेलीविज़न के व्यापक होते क्षेत्र में शिक्षापरक/ज्ञानपरक मल्टीमीडिया कार्यक्रम भी आकर जुड़ गए हैं। ज्ञान और शिक्षा के अपार भंडार को दृश्य-श्रव्य माध्यम से उपलब्ध कराने की चुनौती भारत सरकार के मानव-संसाधन मंत्रालय के अतिरिक्त अनेक अन्य संगठनों ने ली है। प्रोग्राम प्रोडक्शन के क्षेत्र में यदि अभाव है तो पटकथा लेखकों का है। इसके कई कारण हैं। प्रोग्राम प्रोडक्शन सम्बन्धी तकनीकी प्रशिक्षण देने की तुलना में पटकथा-लेखन के पाठ्यक्रम बहुत कम हैं। जिन संस्थानों में पटकथा-लेखन के कार्यक्रम चलाए जाते हैं, वहाँ प्रायः अच्छे शिक्षकों की कमी बनी रहती है और यह भी ज़रूरी नहीं है कि अच्छा पटकथा लेखक अच्छा शिक्षक भी हो। प्रस्तुत पुस्तक में सिनेमा के इतिहास, सैद्धान्तिकी और समीक्षा इत्यादि पर कोई चर्चा नहीं की गई है, क्योंकि पुस्तक का उद्देश्य पटकथा के व्यावहारिक पक्ष को सामने लाना है। यह पुस्तक पटकथा-लेखन में रुचि लेनेवाले विद्यार्थियों तथा अन्य सभी पाठकों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकती है। इस व्यावहारिक निर्देशिका में पटकथा के एक-एक बिन्दु की चर्चा की गई है। पुस्तक का उद्देश्य है कि इसके माध्यम से पटकथा-लेखन की तकनीक सीखी जा सके।
Patkatha Lekhan : Vyavaharik Nirdeshika
Asghar Wajahat
Daryaganj Via Bazaar Fatte Khan
- Author Name:
Sujata
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Book Type:

- Description: नीनो फ़त्ते ख़ाँ बाज़ार, बहावलपुर ही रह गई होती, तो शायद वैसी ही होती जैसी अब भी वहाँ रह रही हज़ारों औरते हैं। एक हवेली से दूसरी हवेली में दुल्हन बन कर जाती और ढेर सारे पोते-पोतियों की विरासत छोड़ कर दुनिया को विदा कहती। लेकिन 1947 में नीनो दरयागंज पहुँच गई। बसना चाहा। बिखर गई। एक औरत की यह उजड़न सिर्फ़ उसकी कहानी न रह सकी, राजनीति और इतिहास की अनुगूँजों से भरी हुई वह उसकी सन्तानों में, पोते-पोतियों में रिसती चली गई—तीन पीढ़ियाँ एक अन्तहीन अजनबियत के सिलसिले में बँधी हुईं। दिल्ली वाले मुल्तानी मिट्टी तो जानते हैं। मुल्तान के लोग भी थे, उनकी ज़बान भी थी, उनकी तहज़ीब भी थी—यह कोई नहीं जानता। वह सब दिल्लीवाला बनने की जल्दबाज़ी में, पाकिस्तान से आए पंजाबी न कहलाने के डर में धीरे-धीरे खोता जा रहा है। तीन पीढ़ियों का यह आख्यान विभाजन की उस महात्रासदी से आगे बढ़ता है जिसे हम सब जानते हैं। यह उस अनकही दास्तान को खोलता है जिसमें रिफ़्यूजी दिल्ली में बसे और दिल्ली ख़ुद रिफ़्यूजियों से बसी। दोनों ने एक-दूसरे को नया चेहरा दिया—धीरे-धीरे, दर्द के साथ। मुल्तान की खोई गलियों से दिल्ली के ज़ख़्मी दिल तक, कश्मीर की ख़ामोश, बेचैन वादियों से बॉम्बे की धड़कन तक—यह एक विस्तृत और मार्मिक गाथा है ज़बान की, भूगोल की, और कभी न थमने वाली भटकन की। यह कहानी बताती है कि जब वह सब कुछ जो घर कहलाता है, राख हो जाए, तब भी क्या है जो बचा रह जाता है। एक बड़े जमाने और उसे जीने वाले बड़ी कद-काठी के लोगों और इतिहास की शक्ल बदलने वाली बड़ी घटनाओं का आख्यान है यह उपन्यास जो एक तरफ अगर क़िस्सागोई की नई उठान को संभव करता है, तो दूसरी ओर भाषा के संयम और सामर्थ्य को एक नई ऊँचाई देता है।
Daryaganj Via Bazaar Fatte Khan
Sujata
Is Shahar Mein Ik Shahar Tha
- Author Name:
Jaya Jadwani
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Book Type:

- Description: विभाजन भारतीय उपमहाद्वीप का ऐसा दारुण जख़्म है जो न जाने कितने दिलों के भीतर मुसलसल टीस रहा है। जया जादवानी का उपन्यास ‘इस शहर में इक शहर था’ विभाजित सिन्ध और उसके लोगों की कसक और पीड़ा का आख्यान है। यह एक जगह से उजड़ और बिखर कर दूसरी जगहों पर जड़ें जमाने की संघर्ष भरी दास्तान भी है जहाँ ऊपरी तौर पर भले ही सब कुछ सहज लगता हो पर उनकी रूह का एक हिस्सा कहीं बहुत पीछे के शहर में फंसा रह गया है। अपनी रूह के इसी गुम हिस्से की तलाश में उपन्यास का वाचक ‘नन्द’ कराची पहुँचता है जहाँ से उसे शिकारपुर जाना है, जहाँ जाने की उसे अनुमति नहीं है। जहाँ उसे अपने ही जैसे बिखरे हुए लोगों से मिलना है, जिन्हें उसकी तलाश में इस तरह से मददगार होना है जैसे वे अपनी ही मदद कर रहे हों। शिकारपुर—जहाँ उसका बचपन बीता है, जहाँ से निकलकर वह बम्बई में रहते हुए दुनिया भर में भटक रहा है। यह स्मृति में धँसी हुई एक ऐसी विलक्षण यात्रा है जहाँ एक बूढ़ा आईने के सामने अपने आपसे सिन्धी में बतिया रहा है; कोई बरसों बाद मिली एक बूढ़ी औरत के साथ रोटी खाते हुए उसकी गोद में रो रहा है, वह श्मशान जहाँ नन्द के लोग जलाए गए, वह गलियाँ जहाँ वे चले, उनमें ठहरते और चलते हुए नन्द अपने पुरखों के तलवों का दुख-दर्द जी रहा है। जहाँ से अपने बचपन के प्यार की एक झलक भर देखकर बिना कुछ कहे वह वापस चला आता है कि बार-बार आने की एक वजह यह भी बनी रहे।
Is Shahar Mein Ik Shahar Tha
Jaya Jadwani
Door Desh Ke Parinde
- Author Name:
Anamika
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Book Type:

- Description: यह आवश्यक नहीं कि स्त्री-पुरुष का सम्बन्ध नर-मादा का ही हो; एक स्तर ऊपर उठकर वह दो व्यक्तियों, दो मनुष्यों, दो सखाओं का भी हो सकता है। सार्वजनिक स्पेस में एक स्वस्थ सन्तुलन भी तभी साधा जा सकता है जब सम्बन्धों में एक अहैतुक सजगता मौजूद रहे, और स्त्री की सहज सकारात्मकता इसमें निर्णायक भूमिका निभा सकती है। ‘दूर देश के परिन्दे’ उपन्यास बीसवीं सदी में, स्वतंत्रता-प्राप्ति के आसपास के वर्षों में दीप्तिमान ऐसे विश्व-प्रसिद्ध लोगों के जीवन में आईं स्त्रियों की कथा कहता है जो अपने समय की स्त्रियों के विशेष प्रिय रहे; कुछ था उनमें जिसके चलते स्त्री-मन उन्हें उम्मीद से देखता था कि उनकी अगुवाई में जो समाज बनेगा उसमें धैर्य, ममता, सहिष्णुता और त्याग जैसे गुण स्त्री और पुरुष दोनों में बराबर बँटेगे; दोनों साहचर्य का एक अधिक सृजनात्मक मॉडल विकसित करेंगे। टैगोर, निराला, गांधी, रोमां रोलां आदि इनमें से कुछ थे। कई स्त्रियाँ इनके जीवन में आयीं, विवाद भी उठे। इनका ज्यादा त्रास तो स्त्रियों ने ही अनुभव किया जिसके विवरण इस उपन्यास के दृश्यबन्धों और संवादों में अनुस्यूत हैं। उपन्यास का पहला खंड निराला पर केन्द्रित है जहाँ नायिका उनकी अपनी ही बेटी सरोज है; दूसरे खंड की नायिका है ज्याँ क्रिस्तोफ की माँ डोरोथी जिनके विषय में कल्पना की गई है कि वे रोमां रोलां की केयरटेकर टाइपिस्ट थीं, तीसरे खंड की नायिकाएँ गांधी के ब्रह्मचर्य-विषयक प्रयोगों की साक्षी और सहचर रहीं मीरा बेन और कस्तूरबा हैं। चौथे खंड के केन्द्र में है भारत में ग्रामोफ़ोन की प्रथम गायिका गौहर जान और पाँचवाँ खंड समर्पित है टैगोर की प्रेरणा कही जाने वाली रानू को। यहाँ वे सब अपनी कथा कहती हैं और दोस्त-समाज की इस संकल्पना को बल देती हैं कि जिस आत्म-परिवर्तन की उम्मीद स्त्रियाँ पुरुषों से करती रही हैं, संसार के सुदीर्घ, स्थायी और ऊर्ध्वमुखी बदलाव के लिए भी वह एक आधारभूत शर्त है।