Premchand Biskohar Mein
(0)
₹
495
396 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
‘प्रेमचन्द बिस्कोहर’ में हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी की कविताओं का संकलन है—कह सकते हैं कि उनका मन, भावों से भरा। लेकिन ये किसी निराकार अनुभूति से उपजे भाव नहीं हैं। इनकी जड़ें हैं—पृथ्वी में, स्मृति में, परिवार में, प्रकृति में और उस इतिहास में जो समय के अंक में बन रहा है, बीत रहा है— फूल में सूरज में मिट्टी में आँखों में झुलसे सँवलाए चेहरों में एक लपट काँपती रहती है| मैं उसी से शब्दों को सुलगा लेता हूँ| ये धीमी आँच में सुलगते हुए शब्द हैं जिनकी उष्मा हमें कुछ देर बाद महसूस होती है और फिर देर तक साथ रहती है, हमें हमारे ऐसे ही क्षणों की ओर लौटाती हुई—अपने स्मृति-वृक्षों के पास। यह देखकर तो किसे अचरज होगा कि वे भाषा से काम भी एक कुशल कारीगर की तरह लेते हैं। वह शब्द-संयम जो मुक्तिबोध और शमशेर में है, यहाँ भी दिखाई देता है; और अनेक ऐसे बिम्ब भी जो केवल यहीं उपलब्ध हैं। मसलन एक बिल्ली है—मैंने उसके अंगों में चुम्बनों की घंटियाँ बाँध दी हैं वह जहाँ होगी, घंटियाँ खनखना रही होंगी। एक पठनीय और संग्रहणीय कविता-संग्रह।
Read moreDon’t Miss Out
Pick a membership and see exactly what it gets you
- 15 Free Deliveries
- 1 Free Book up to ₹500 MRP
- 0% off every book, every time
Subscribed already? Continue to your
benefits Login
You pay ₹1,499/Year
You will be auto-charged ₹1,499 every year. Cancel auto-charge anytime.
Benefits with Rachnaye Connoisseur
1 Free Physical Book up to ₹500 MRP
Personal Recommendations
15 Free Deliveries Per Year
Format:
Piracy Free
Express Delivery
Secure Payment
About the Book
‘प्रेमचन्द बिस्कोहर’ में हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी की कविताओं का संकलन है—कह सकते हैं कि उनका मन, भावों से भरा।
लेकिन ये किसी निराकार अनुभूति से उपजे भाव नहीं हैं। इनकी जड़ें हैं—पृथ्वी में, स्मृति में, परिवार में, प्रकृति में और उस इतिहास में जो समय के अंक में बन रहा है, बीत रहा है—
फूल में सूरज में मिट्टी में आँखों में झुलसे सँवलाए चेहरों में एक लपट काँपती रहती है|
मैं उसी से शब्दों को सुलगा लेता हूँ|
ये धीमी आँच में सुलगते हुए शब्द हैं जिनकी उष्मा हमें कुछ देर बाद महसूस होती है और फिर देर तक साथ रहती है, हमें हमारे ऐसे ही क्षणों की ओर लौटाती हुई—अपने स्मृति-वृक्षों के पास।
यह देखकर तो किसे अचरज होगा कि वे भाषा से काम भी एक कुशल कारीगर की तरह लेते हैं। वह शब्द-संयम जो मुक्तिबोध और शमशेर में है, यहाँ भी दिखाई देता है; और अनेक ऐसे बिम्ब भी जो केवल यहीं उपलब्ध हैं। मसलन
एक बिल्ली है—मैंने उसके अंगों में
चुम्बनों की घंटियाँ बाँध दी हैं
वह जहाँ होगी, घंटियाँ खनखना रही होंगी।
एक पठनीय और संग्रहणीय कविता-संग्रह।
Book Details
-
ISBN9789360863609
-
Pages104
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Guruji Ki Kheti-Bari
- Author Name:
Vishwanath Tripathi
- Book Type:

- Description:
आलोचक के रूप में अपनी सृजनात्मक अप्रोच के लिए सराहे जानेवाले विश्वनाथ त्रिपाठी की सवा-सराहना बतौर गद्यकार हमेशा ही सुरक्षित रहती है। आलोचना से इतर अपनी हर पुस्तक के साथ उन्होंने ‘दुर्लभ गद्यकार' की अपनी पदवी ऊँची की है। उनकी भाषा और कहाँ चलते-फिरते साकार मनुष्य की प्रतीति देती है। ऐसे कम ही लेखक हैं जिनकी लिखी पंक्तियों के बीच रहते हुए आप एक तनहा पाठक नहीं रह जाते, अपने आसपास किसी की उपस्थिति आपको लगातार महसूस होती है।
इन पृष्ठों में आप राजनीति का वह ज़माना भी देखेंगे जब ‘अनशन, धरना, जुलूस, प्रदर्शन, क्रान्ति, उद्धार-सुधार, विकास, समाजवाद, अहिंसा जैसे शब्दों का अर्थपतन, अनर्थ, अर्थघृणा और अर्थशर्म नहीं हुआ था।’ और विश्वविद्यालय के छात्र मेजों पर मुट्ठियाँ पटक-पटककर मार्क्सवाद पर बहस किया करते थे। जवाहरलाल नेहरू, कृपलानी, मौलाना आज़ाद जैसे राजनीतिक व्यक्तित्वों और डॉ. नागेन्द्र, विष्णु प्रभाकर, बालकृष्ण शर्मा नवीन, शमशेर और अमर्त्य सेन जैसे साहित्यिकों-बौद्धिकों की आँखों बसी स्मृतियों से तारांकित यह पुस्तक त्रिपाठी जी के अपने अध्यापन जीवन के अनेक दिलचस्प संस्मरणों से बुनी गई है। क़िस्म-क़िस्म के पढ़नेवाले यहाँ हैं। हरियाणा से कम्बल ओढ़कर और साथ में दूध की चार बोतलें कक्षा में लेकर आनेवाला विद्यार्थी है तो किरोड़ीमल के छात्र रहे अमिताभ बच्चन, कुलभूषण खरबंदा, दिनेश ठाकुर और राजेन्द्र नाथ भी हैं।
शुरुआत उन्होंने बिस्कोहर से अपने पहले गुरु रच्छा राम पंडित के स्मरण से की है। इसके बाद नैनीताल में अपनी पहली नियुक्ति और तदुपरान्त दिल्ली विश्वविद्यालय में बीते अपने लम्बे समय की अनेक घटनाओं को याद किया है जिनके बारे में वे कहते हैं : ‘याद करता हूँ तो बादल से चले बाते हैं मजमूँ मेरे आगे।’
Bisnath Ka Balrampur
- Author Name:
Vishwanath Tripathi
- Book Type:

- Description:
‘नंगातलाई का गाँव’ के बाद ‘बिसनाथ का बलरामपुर’। इसमें विश्वनाथ त्रिपाठी वर्णन कर रहे हैं अपने विद्यार्थी जीवन और उस समय की सामाजिक-राजनीतिक आबोहवा का। आजादी के ठीक पहले का वातावरण जिसे हम इतिहास की पुस्तकों में उस तरह महसूस नहीं कर सकते, जैसे यहाँ कर सकते हैं—इस आख्यान में।
बलरामपुर यहाँ स्वतंत्रता-पूर्व के मिनी भारत के रूप में दिखाई देता है—वहाँ रियासत है, अंग्रेज अधिकारी हैं, स्वतंत्रता आन्दोलन और उसके नेताओं को लेकर बड़े शहरों जैसी सजगता-सक्रियता है, हिन्दू-मुसलमान के प्रश्न हैं, मुस्लिम लीग है और आर.एस.एस. है जिसके जादुई आकर्षण ने युवा और विचारशील बिसनाथ को सालों बाँधे रखा। वे उसके लिए जेल भी गए, और फिर अपनी विचारशीलता के चलते उससे मुक्त हुए।
विश्वनाथ त्रिपाठी बतौर आलोचक पाठ की जितनी तहों को देख पाते हैं, रचनात्मक आख्यान में उससे भी ज्यादा समाज की और मनुष्य की परतों को देख लेते हैं, और उसे जिस तरह लिखते हैं, वह उन्हें उत्तम कोटि का किस्सागो बनता है।
इस स्मृति-यात्रा में उन्होंने पूर्वी अवध के सांस्कृतिक-सामाजिक और राजनीतिक जीवन का अत्यन्त जीवन्त और व्यापक चित्र खींचा है। बच्चों के खेलों से लेकर लोक में रचे-बसे कला-रूपों, गीत-संगीत और जीवन की दैनन्दिनी में दिखाई पड़नेवाली विडम्बनाओं, आपदाओं और संकटों को भी उन्होंने बहुत नजदीक से देखा-जाना है; और यह सब एक सामर्थ्यवान गद्य के रूप में इस पुस्तक के पन्नों पर अंकित हुआ है। ‘संकट के समय में कविता’ शीर्षक अध्याय में उनकी स्मृतियाँ वर्तमान तक चली आती हैं जिसमें उन्होंने कोविड के दौर के साथ-साथ कुछ और मार्मिक क्षणों को भी लिपिबद्ध किया है।
Vyomkesh Darvesh
- Author Name:
Vishwanath Tripathi
- Book Type:

- Description:
आकाशधर्मा गुरु आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी अपने जीवन-काल में ही मिथक-पुरुष बन गए थे। हिन्दी में ‘आकाशधर्मा’ और ‘मिथक’ इन दोनों शब्दों के प्रयोग का प्रवर्तन उन्होंने ही किया था। उनका रचित साहित्य विविध एवं विपुल है। उनके शिष्य देश-विदेश में बिखरे हैं। लगभग साठ वर्षों तक उन्होंने सरस्वती की अनवरत साधना की। उन्होंने हिन्दी साहित्य के इतिहास का नया दिक्काल एवं प्राचीन भारत का आत्मीय-सांस्कृतिक पर्यावरण रचा। हिन्दी की जातीय संस्कृति के मूल्यों की खोज की, उन्हें अखिल भारतीय एवं मानवीय मूल्यों के सन्दर्भ में परिभाषित किया। परम्परा और आधुनिकता की पहचान कराई। सहज के सौन्दर्य को प्रतिष्ठित किया। वे उन दुर्लभ विद्वान सर्जकों की परम्परा में हैं जिसके प्रतिमान तुलसीदास हैं और जिसमें पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी स्मरणीय हैं। उनका जीवन-संघर्ष विस्थापित होते रहने का संघर्ष है। उनकी जीवन-यात्रा के बारे में लिखना जितना ज़रूरी है उससे ज़्यादा मुश्किल। इस पुस्तक के लेखक को दो दशकों से भी अधिक समय तक उनका सान्निध्य और शिष्यत्व प्राप्त होने का सौभाग्य मिला। इसलिए पुस्तक को संस्मरणात्मक भी हो जाना पड़ा है। प्रयास किया गया है कि प्रसंगों और स्थितियों को यथासम्भव प्रामाणिक स्रोतों से ही ग्रहण किया जाए। आदरणीयों के प्रति आदर में कमी न आने पावे। काशी की तत्कालीन साहित्य-मंडली, लेखक की मित्र-मंडली अनायास पुस्तक में आ गई है।
Nangatalai Ka Gaon
- Author Name:
Vishwanath Tripathi
- Book Type:

- Description:
‘नंगातलाई का गाँव’—इस ‘स्मृति-आख्यान’ में डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी अपने दो लेखकीय रूपों में उपस्थित हैं। पहला—अपनी जीवनी के क़िस्सागो अर्थात् नंगातलाई और दूसरा—इस आख्यान के सजग लेखक यानी बिसनाथ। इस विलक्षण जुगलबन्दी के कारनामे में ‘आत्म’ लेखक का है और ‘कथा’ बिस्कोहर के बहाने भारतीय ग्रामीण जीवन सभ्यता की। ‘आत्म-व्यंग्य’ के कठिन शिल्प में दु:ख को मज़े लेकर कहने का करिश्मा जिस निरायास ढंग से सम्भव हुआ है उससे निराला, परसाई और नागार्जुन का स्मरण हो आता है।
दस अध्यायों में बमुश्किल समाहित बिस्कोहर कथा में लेखक ने पं. जगदम्बा पांडे जगेश, लक्खाबुआ, बल्दी बनिया, जनक दुलारी, सुग्गनजान, नदवी साहब, कृष्ण मोहम्मद, नैपाले, माने, अम्मा-दादा से लेकर अनेक अविस्मरणीय पात्रों का जो यथार्थ पुनर्सृजन किया है और उसमें उपस्थित-जागृत आम कुँजड़ा, बेड़नी, बनिया, मौलवी, भंगी, ठाकुर, ब्राह्मण आदि वर्ग के जय-पराजय, दु:ख-सुख, हास-परिहास, प्रेम-घृणा, मान-अभिमान, क्रोध-प्रसन्नता, विनम्रता-अहंकार आदि का सजीव उद्घाटन जिस निर्वैयक्तिता में किया है, वह आत्मकथा के आभिजात्य से मुक्ति का ऐसा बिन्दु है जिसमें नंगातलाई की यह कथा महाकाव्यात्मक गाथा के क़रीब पहुँच जाती है।
इस कालजयी आख्यान में लोक-सौन्दर्य के स्वाभिमान से पगी ऐसी सजल भाषा है जो शोख़, तीखी, मीठी, चोट खाई, लचीली और विदग्ध है। शब्द यहाँ अनेक अदेखी अनूठी भंगिमाओं में अर्थों का नया संसार रचते हैं। शब्दों की विपन्नता के रुदन के बीच यह किताब एक ऐसे आधार ग्रन्थ की तरह है जिसमें पूरबी अवधी का अजाना समृद्ध भाषा-संसार है।
प्रस्तुत कृति चूँकि लेखक के दो रूपों (जीवनीकार, आत्मकथा-लेखक) से बने प्रयोगधर्मी शिल्प में अपना कथा-विन्यास पाती है, अतः उसमें अतीत से लेकर भूमंडलीकरण तक के प्रभावों का यथार्थ इन्दराज है।
डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने स्मृति आख्यान की विधा के गौरव को जिस तरह पुनर्स्थापित किया है, वह हमारे समय की अनूठी और अप्रतिम साहित्यिक उपलब्धि मानी जाए तो कोई आश्चर्य नहीं।
—लीलाधर मंडलोई
Hindi Aalochana
- Author Name:
Vishwanath Tripathi
- Book Type:

- Description:
प्रस्तुत पुस्तक में हिन्दी के विपुल और विविध आलोचना-साहित्य का विकास-क्रम दिखाते हुए उसका विस्तृत विवेचन किया गया है। लेखक ने कोशिश की है कि आलोचना-साहित्य के मूल स्रोतों को देखकर ही उसके विषय में कुछ लिखा जाए।
यह अध्ययन प्रधानत: शुक्ल और प्रमुख शुक्लोत्तर समीक्षकों पर ही आधारित है। इसमें पं. रामचन्द्र शुक्ल के आलोचक की शक्ति को समझने का उद्यम किया गया है और उन्होंने आलोचक बनने की जो गम्भीर साधना की थी, उस पर प्रकाश डाला गया है। पं. नन्ददुलारे वाजपेयी, पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी तथा डॉ. नगेन्द्र की आलोचनात्मक कृतियों का जायज़ा लिया गया है और प्रगतिशील समीक्षकों में डॉ. रामविलास शर्मा तथा
डॉ. नामवर सिंह के योगदान पर विचार किया गया है।पुस्तक की विशेषता यह है कि इसमें भारतेन्दु युग और द्विवेदी युग की पत्र-पत्रिकाओं और छायावादी कवियों के आलोचनात्मक विचारों के भी महत्त्व को ठीक ढंग से आँकने का प्रयास है। कुल मिलाकर, पुस्तक में हिन्दी आलोचना को नए ढंग से देखा-परखा गया है।
Lokvadi Tulsidas
- Author Name:
Vishwanath Tripathi
- Book Type:

- Description:
कई लोगों का ख़याल है कि तुलसी की लोकप्रियता का कारण यह है कि हमारे देश की अधिकांश जनता धर्म-भीरु है। और क्योंकि तुलसी की कविता भक्ति का प्रचार करती है, इसलिए वह इतनी लोकप्रिय और प्रचलित है।
लेकिन इस पुस्तक के लेखक का तर्क है कि सभी भक्त-कवि तुलसी-जैसे लोकप्रिय नहीं हैं। यदि धर्मभीरुता ही लोकप्रियता का आधार होती तो नाभादास, अग्रदास, सुन्दरदास, नन्ददास आदि भी उतने ही लोकप्रिय होते।
वे इस पुस्तक में बताते हैं कि तुलसीदास की लोकप्रियता का कारण यह है कि उन्होंने अपनी कविता में अपने देखे हुए जीवन का बहुत गहरा और व्यापक चित्रण किया है। उन्होंने राम के परम्परा-प्राप्त रूप को अपने युग के अनुरूप बनाया है। उन्होंने राम की संघर्ष-कथा को अपने समकालीन समाज और अपने जीवन की संघर्ष-कथा के आलोक में देखा है। उन्होंने वाल्मीकि और भवभूति के राम को पुन: स्थापित नहीं किया है, बल्कि अपने युग के नायक राम को चित्रित किया है।
तुलसी की लोकप्रियता का कारण यह है कि यथार्थ की विषमता से देश को उबारने की छटपटाहट उनकी कविता में है। देश-प्रेम इस विषमता की उपेक्षा नहीं कर सकता। इसीलिए तुलसी दैहिक, दैविक, भौतिक तापों से रहित राम-राज्य का स्वप्न निर्मित करते हैं। यही उनकी कविता की नैतिकता और प्रगतिशीलता है।
Vidhaon Ki Virasat
- Author Name:
Vishwanath Tripathi
- Book Type:

- Description:
प्रगतिशील आलोचना-परम्परा के प्रतिनिधि आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी की यह पुस्तक‘विधाओं की विरासत’न केवल उनकी सूक्ष्म आलोचकीय दृष्टि के कारण बल्कि उनके गद्य की सरस सर्जनात्मकता के कारण भी ध्यान आकृष्ट करती है। साहित्य उनके लिए मानवीयता का विस्तार करने वाली नैतिकता का माध्यम है, रचना सांस्कृतिक प्रक्रिया का हिस्सा और आलोचना महत्त्वपूर्ण सामाजिक दायित्व। इस दायित्व का निर्वाह करते हुए वे रचनाओं की और उनमें वर्णित पात्रों की पृष्ठभूमि और जीवन की खोज करते हैं और उसके सामने अपने जीवनानुभव एवं दृष्टिकोण को रखते हुए पाठक के भाव-बोध को समृद्ध करते हैं। वे भाषा एवं चित्रण-कला के विश्लेषण के माध्यम से भी मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा करते हैं। वे रचनाओं की संरचना को अपने विश्लेषण द्वारा सामाजिकता तथा राजनीति की धार प्रदान करते हैं। राजनीति और रचना बराबर सामाजिकता या सामाजिकता और रचना बराबर राजनीति का सूत्र इस पुस्तक के लेखों, टिप्पणियों आदि में मिलता है। सामाजिकता को वे बोध और संवेदना दोनों मानते हैं। जीवन की विषमता को पाटने की छटपटाहट से रहित रचना उनके लिए साहित्य नहीं हो सकती। उनके मुताबिक, संवेदना जीवन-आचरण और रचना-आचरण के द्वारा संस्कृति में ढलती है और साहित्य की महत्ता अनुभूति की तीव्रता को लेकर नहीं, बल्कि उसे शब्द के माध्यम से असीमित कर देने में है। वे किसी भी रचना की परख ऐसी ही कसौटियों से करते हैं और सांस्कृतिक चेतना के विकास को पहचानने वाली अन्तर्दृष्टि पाठक को प्रदान करते हैं। वस्तुतः यह ऐसी आलोचना है जो स्वयं एक सांस्कृतिक प्रक्रिया है जिसकी आज कहीं अधिक आवश्यकता है।
Harishankar Parsai : Desh Ke Is Daur Mein
- Author Name:
Vishwanath Tripathi
- Book Type:

- Description:
देश के इस दौर में हरिशंकर परसाई के व्यंग्य-निबन्धों की विवेचना है। यह वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपनी गहरी अन्तर्दृष्टि के साथ विवेचना की है। परसाई पर केन्द्रित पुस्तकों में इस पुस्तक का अपना अलग स्थान है। बकौल ज्ञानरंजन ‘यह अभी तक की एक अनुपम और अद्वितीय पुस्तक है जिसमें परसाई के रचना-संसार को समझने और उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है।’
त्रिपाठी जी का मानना है कि ‘परसाई का रचनाकार एक इतिहास-पुरुष है जो अपने समय का सबकुछ देख रहा है, अपने युग का चित्र बना रहा है। विवेक के साथ।’ वे कहते हैं कि ‘परसाई का व्यंग्य असहज-असुन्दर का उद्घाटन करके सहज-सुन्दर को गढ़ने का प्रयास करता है।’
लगभग चालीस वर्षों में फैली परसाई की रचनात्मकता को इस पुस्तक में विश्वनाथ त्रिपाठी ने जितने आत्मीय ढंग से जान-समझकर हम तक पहुँचाया है, उससे परसाई हमें एक नए सिरे से समझ आते हैं। वर्तमान की उनकी समझ, अपने पात्रों को लेकर उनकी संवेदना की व्यापकता, मनोविकारों का चित्रण, उनके व्यंग्य-निबन्धों के विषयों का असीम संसार, मानवीय करुणा, चरित्र-चित्रण और उनके सौन्दर्यबोध को उद्धरणों के साथ जिस तरह यहाँ विश्लेषित किया गया है, वह अपूर्व है।
यह इस पुस्तक का परिवर्द्धित संस्करण है जिसमें परसाई के जीवन-वृत्त के साथ भूमिका के रूप में उनके व्यंग्य पर केन्द्रित एक लम्बा आलेख भी शामिल किया गया है।
Premchad : Katha Sunate Huye
- Author Name:
Vishwanath Tripathi
- Book Type:

- Description:
‘प्रेमचन्द : कथा सुनाते हुए’ विश्वनाथ त्रिपाठी के निबन्धों का संचयन है। इसके कुछ आलेख लेखकों को लेकर लिखे गए हैं और कुछ पुस्तकों को पढ़ते हुए, उनके बारे में सोचते हुए। जाहिर है दोनों ही में समकालीन साहित्यिक प्रश्नों पर विचार और साहित्य को समझने-जानने की प्रविधियों पर चर्चा भी होती चली है। उदाहरण के लिए, प्रेमचन्द के बारे में बात करते हुए वे लिखते हैं : ‘निर्मल वर्मा ने कहा है कि भारतीय उपन्यास लिखे ही नहीं गए। नामवर जी ने इसका समर्थन किया।’ इस पर अपना पक्ष रखते हुए विश्वनाथ त्रिपाठी का कहना है : ‘प्रेमचन्द का कथाशिल्प ठेठ भारतीय है (जैसे कोई बुजुर्ग अलाव के आसपास हाथ तापते हुए कहानियाँ सुना रहा हो) और फिर उनकी कथावस्तु क्या अभारतीय है? ...जिसे जादुई यथार्थवाद कहा जाता है वह भी अभारतीय नहीं है। प्रेमचन्द की कई कहानियों में यह जादुई यथार्थ मिलता है।’ जैनेन्द्र के ‘त्यागपत्र’ पर विचार करते हुए कहते हैं : ‘जिस तरह मृणाल की मूक सहनशीलता में विद्रोह छिपा है, उसी तरह निर्णायक घटनाओं और पात्रों के नेपथ्य ही में रहने से उनका रूप प्रभावशाली हो जाता है। शब्द मूलतः मूर्तन नहीं करते, वे श्रोता और पाठक को अपने संस्कारों, रुचियों और आवश्यकता के अनुसार कल्पना करने की पूरी छूट देते हैं। इसीलिए अच्छी कहानी या अच्छे उपन्यास पर बनी हुई फ़िल्में प्रायः पाठकों को सन्तुष्ट नहीं कर पातीं।’ यह विचारोत्तेजक है और पाठक को इन बिन्दुओं पर अपने ढंग से सोचने को आमंत्रित करता है। पुस्तक में संकलित अन्य आलेखों में आप ‘राग दरबारी’, ‘लेकिन दरवाज़ा’, ‘गोदान’, ‘सात आसमान’, ‘सारा आकाश’ और ‘मानस का हंस’ जैसे चर्चित उपन्यासों पर उनके सुचिन्तित अवलोकन के अलावा कई अन्य महत्त्वपूर्ण कृतियों पर भी उनके विचारों से अवगत होते हैं।
Sandesh Rasak
- Author Name:
Abdul Rehman +2
- Book Type:

- Description:
‘संदेश-रासक’, रासक काव्यरूप की विशेषताओं से संयुक्त तीन प्रक्रमों में विभाजित दो सौ तेईस छन्दों का एक छोटा-सा विरह काव्य है, जिसमें कथावस्तु का कोई विशेष महत्त्व नहीं है। विरहिणी नायिका का पथिक के द्वारा अपने प्रिय के पास सन्देश भेजना भारतीय साहित्य में अति प्रचलित काव्य-रूढ़ि है। किन्तु ‘संदेश-रासक’ की विशेषता उसके कथानक में नहीं, उसकी अभिव्यक्ति और कथन-शैली में है। महाकाव्य या भारी-भरकम काव्य न होने के कारण अद्दहमाण को छोटी-छोटी बातों का विशद वर्णन करने का अवसर नहीं था, फिर भी जिस मार्मिकता, संयम और सहृदयता का परिचय कवि ने दिया है वह उसकी कवित्व शक्ति, पांडित्य, परम्परा-ज्ञान और लोकवादिता की पूर्ण प्रतिष्ठा पाठक के हृदय में कर देती है।
जिस प्रकार पात्र दुर्लभ होने पर लोग शतपत्रिका में ही आश्वस्त हो लेते हैं, उसी प्रकार जिन लोगों को प्राचीन कवियों की रचनाएँ रस नहीं दे पातीं उन सबको ‘संदेश-रासक’ का कवि काव्य-रस पान के लिए निमंत्रण देता है। इससे यह भी ज्ञात होता है कि इस ग्रन्थ की रचना करते समय अद्दहमाण का दृष्टिकोण लोकवादी था। उन्होंने ‘संदेश-रासक’ का प्रणयन, साधारण जनों को दृष्टि में रखकर, उनके आनन्द और विनोद के लिए किया था, पंडितों और विद्वानों के लिए नहीं। वे ‘संदेश-रासक’ के पाठक का हाथ पकड़कर कहते हैं कि जो लोग पंडित और मूर्ख में भेद करते हैं अर्थात् जो अपने को साधारण जनों की अपेक्षा अधिक विद्वान् समझते हैं, उनके सामने इसे मत पढ़ना।
Zindagi Kiya Cheez Hai
- Author Name:
Nida Fazli
- Book Type:

- Description:
“Zindagi Kya Cheez Hai” is an important collection of selected and representative poetry by the renowned Urdu poet Nida Fazli, beautifully published by Rekhta Publications. The ghazals, nazms, dohas, and couplets included in this volume give voice to those emotions and experiences that ordinary people feel every day but often cannot express. Nida Fazli’s language carries the sweetness of folk songs, the simplicity of saint poets, and the pain of the modern human condition all at once. He brought Urdu poetry out of closed rooms and away from difficult symbolism, connecting it instead to streets, homes, relationships, and the everyday lives of common people.
Ranjish Hi Sahi
- Author Name:
Ahmed Faraz
- Book Type:

- Description:
In the present book “Ranjish Hi Sahi,” the selected works present the image of a multidimensional poet—one who is at once romantic, neo-classical, modern, and rebellious. Through his poetry, Faraz not only highlights the delicate aspects of love but also offers a deep insight into the political and social conditions of his time. This is why his voice does not remain confined to personal emotions; rather, it becomes a reflection of collective consciousness.This book clearly establishes Faraz’s unique position in Urdu poetry. His style is simple yet powerful, combining emotional intensity with depth of thought. “Ranjish Hi Sahi” not only portrays the many shades of love but also compels the reader to reflect—and that is its greatest strength.
Betarteeb - Weekend Wali Kavita
- Author Name:
Vinod Dubey
- Book Type:

- Description:
सुबह का वक़्त कपालभांति में गुज़ारा, तो चाय पर पत्नी के विचार छूट गए। कॉर्नफ़्लेक्स और फ़्रूट प्लेट में रखे, तो आलू के परांठे और नींबू के अचार छूट गए। न ज़िन्दगी की ये छोटी-बड़ी उलझने बदलती हैं, ना हम बदलते है। कविताएँ बस इन्हें देखने का नज़रियाँ बदल देती हैं। लाख योजनाओं के बावज़ूद जैसे हम अस्त-व्यस्त-सी ज़िन्दगी जीते हैं, ठीक उसी तरह इस संग्रह की कविताएँ भी बेतरतीब विषयों पर लिखी गयी हैं। कई बार हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी बिलकुल नीरस हो जाती है, जैसे जेठ की दुपहरी में सड़क पर लावारिस पड़ा टीन का डिब्बा। इसी ज़िन्दगी से निकली इन कविताओं को फुर्सत के पलों में पढ़ियेगा, क्या पता उस जेठ की नीरसता को बसंत की नज़र लग जाए।
Kavishree
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar +1
- Book Type:

- Description:
श्री' रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की ओजस्वी कविताओं का संग्रह है। कविताओं में प्रखर राष्ट्रवाद, प्रकृति के प्रति उत्कट प्रेम एवं मानव-कल्याण-कामना की मंगल-भावना के दर्शन होते हैं। 'कविश्री' में संगृहीत हैं दिनकर जी की 'हिमालय के प्रति', 'प्रभाती', 'व्याल विजय' एवं 'नया मनुष्य' जैसी प्रसिद्ध प्रदीर्घ कविताएँ, जो हिन्दी काव्य-साहित्य की अमूल्य निधि हैं। दिनकर का काव्य-व्यक्तित्व जिस दौर में निर्मित हुआ, वह राजसत्ता और शोषण के विरुद्ध हर मोर्चे पर संघर्ष का दौर था। इसलिए 'कविश्री' में संकलित रचनाओं को पढ़ना भारतीय स्वाधीनता-संग्राम में साहित्य के योगदान से भी परिचित होना है। अपने ऐतिहासिक महत्त्व के कारण पाठकों के लिए एक संग्रहणीय और अविस्मरणीय संग्रह।
Kajal Lagana Bhoolna
- Author Name:
Vyomesh Shukla
- Book Type:

- Description:
यह एक गद्य कविता है पर इसमें सघन बिम्ब, शब्दों से खिलवाड़, कई अविवक्षित अर्थों के संकेत, अप्रत्याशित मोड़ आदि सब हैं जो गद्य के नहीं, कविता के गुण होते हैं। कविता का शीर्षक जो संकेत देता है, उन्हें कविता की काया में ऐन्द्रिय रूप से चरितार्थ होते महसूस किया जा सकता है। जिस ‘जगह’ से कविता शुरू होती है, कविता के अन्त तक आते-आते उसकी सच्चाई, आशय और परिणतियाँ अप्रत्याशित रूप से बहुल-उत्कट और अर्थगर्भी हो जाती हैं। साधारण जीवन की छवियाँ—जगह, चकवड़ के पौधे, जानवर, गर्मियों की शाम, बँधी पर सौ साँप, डंडे, प्यास, हिजड़े दोस्त—कविता का शिल्प रूपायित कर इस आत्मीय सच्चाई कि ‘जगह के बाहर मुलाक़ातें नहीं हो सकतीं’ और इस दार्शनिक सत्य तक पहुँचाती हैं कि जगह के बाहर ‘न दोस्त होते हैं, न लोग होते हैं, न होना होता है, न न होना होता है’। एक युवा कवि द्वारा एक अपेक्षाकृत अस्पष्ट विषय को इस कौशल और संयम से बरतना विरल है। —अशोक वाजपेयी
Dhoomil Ki Shreshth Kavitayan
- Author Name:
Brahma Dev Mishra +3
- Book Type:

- Description:
‘धूमिल की श्रेष्ठ कविताएँ’ अत्यन्त प्रखर और हिन्दी काव्य-जगत में नई हलचल पैदा करनेवाले सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’ की कविताओं का प्रथम सम्पादन है। एक लम्बी भूमिका के साथ सम्पादकों ने उनकी श्रेष्ठ कविताओं का चयन किया है, साथ ही भाषा के माध्यम से गाँव को शहर की होड़ में लानेवाले कवि की कविताओं पर संक्षिप्त टिप्पणी भी प्रस्तुत की है। लक्ष्य, धूमिल की अनगढ़ भाषा और नए मुहावरे को पाठकों तक सहजता से पहुँचाना है। सम्पादकों की दृष्टि में धूमिल का सर्जनात्मक व्यक्तित्व उनकी कविता में सक्रियता से मुखर है। ‘धूमिल को उनके कथ्य और भाषा के स्वीकृत स्वरूप के लिए जानना चाहिए, न कि प्रयोगात्मक शैलीकार के रूप में।’
Vah Ladki Jo Motorcycle Chalati Hai
- Author Name:
Anant Bhatnagar
- Book Type:

- Description:
पुरातन की स्मृति और अभाव अक्सर ही कविताओं के प्रेरक कारक होते हैं, या तो हम किसी बीते क्षण को कविता में सम्बोधित करते हैं या फिर किसी भविष्य की कामना हमें कविता में सोचने को प्रेरित करती है। लेकिन इस संग्रह की ज़्यादातर कविताएँ वर्तमान को सम्बोधित हैं और आधुनिक सभ्यता के कुछ नए उपादानों को समझने की कोशिश करती हैं; मसलन—‘मोबाइल फ़ोन’, ‘बाज़ार’, ‘सेज के नाम से जाने जानेवाले विशेष आर्थिक क्षेत्र’ और ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है’। >इस नई दुनिया को कवि बिना किसी पूर्वग्रह के एकदम ताज़ा निगाह से देखता और समझता है और पाठक को भी अपनी यात्रा में शामिल करता चलता है—‘क्या/आप नहीं चौंके थे/उस दिन/जब आपने/पहली बार किसी/एक लड़की को/मोटरसाइकिल चलाते/हुए देखा था?’ यह दृश्य कवि को एक नए युग का आरम्भ लगता है, लेकिन इसके भविष्य को लेकर उसे कुछ शंका भी है—‘क्या शादी के बाद भी/चला पाएगी वह मोटरसाइकिल/...क्या/वह आगे बैठी होगी/और पति/होगा/पीछे सवार?’ संग्रह का दूसरा खंड ‘उम्र का चालीसवाँ’ बढ़ती आयु के अहसास की कविताओं का है जिसके विषय में ख़ुद कवि का कहना है कि ‘उम्र के इस संक्रमण काल में रचित ये कविताएँ नितान्त निजी जीवन से लेकर सामाजिक स्तर तक बदलते रिश्तों के प्रति प्रतिक्रिया हैं। इन कविताओं में कई विशुद्ध हास्यबोध की रचनाएँ भी हैं, जिन्हें संग्रह में सम्मिलित करने के पीछे मेरी सोच यह है कि हास्य को केवल मंचीय जुमलेबाज़ी के लिए छोड़ देना हास्यबोध के साथ अन्याय है।’ संक्षिप्त मुहावरे में रची ये कविताएँ हिन्दी कविता-प्रेमियों को निश्चय ही पसन्द आएँगी।
Via Nayi Sadi
- Author Name:
Shriprakash Shukla
- Book Type:

- Description:
‘वाया नई सदी’ दस्तावेज़ है समय की असहजताओं और अस्वाभाविकताओं का जिन्हें हमने जीवन की स्वाभाविक मुद्राओं की तरह स्वीकार कर लिया है। ये कविताएँ इस स्वीकृति के विरुद्ध उठी मुट्ठियों की तरह हैं। यह समय जहाँ बोलने, चीखने और विरोध करने पर लगातार कठोर होती पाबन्दियाँ हमारी चुप्पियों पर हँसने लगी हैं, और हम प्यार को, जनतन्त्र को, मानवीयता को धीरे-धीरे छीजते देख रहे हैं, और ख़ामोश हैं। ‘हमारे समय के करुण इतिहास पर/हिंसा की तरह दर्ज अभिलाषाओं में/महामौन की तरह खड़ी है एक गाय/जो अभी-अभी खूँटे पर आई है/लहूलुहान’—‘गाय’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ भारत की नयी सदी की उस महाविडम्बना की ओर संकेत करती है जहाँ करुणा में रसे-बसे सांस्कृतिक प्रतीकों को हिंसक बिम्बों में बदलने की कोशिश बाक़ायदा सत्ता के इशारों पर हो रही है और समाज, जैसे कि उसे इसी का इंतज़ार था, इस प्रक्रिया को पूरा करने में जुटा हुआ है : ‘उनमें ग़ज़ब की सामूहिक सहमति है’, और ‘एक सीधी सरल गाय/हिंसक पशु में बदल जाती है।’ श्रीप्रकाश शुक्ल भारतीयता के इस क्षरण के प्रति अपनी असहमति, अपना प्रतिरोध दर्ज कराना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि हम बोलें, 'चुप्पी के काइएँपन से दूसरे की हत्या करने से बेहतर है/बोल-बोलकर ख़ुद के भीतर जमी काइयों का वध करना।’ वे कहते हैं कि ‘बोलता आदमी जब चुप हो जाए/तो समझिए कि इस व्यवस्था में एक तानाशाह का जन्म हो चुका है/जो हमारे मुँह से प्रवेश करता है और जीभ को चीरता हुआ/अंतड़ियों में उतर जाता है।’ इसीलिए वे एक मुखर आदमी के पक्ष में अपना बयान देते हैं, ‘मनुष्यों के मुद्दे राजनीति से बड़े होते हैं/और अर्थनीति से ज़्यादा उलझे हुए/...कि लोकतंत्र के मुद्दे भुजा से नहीं/भाषा से तय होते हैं।’ श्रीप्रकाश शुक्ल के इस नए संग्रह में कई कविताएँ ऐसी हैं जो इस विचित्र सदी को सीधे-सीधे सम्बोधित हैं और कई ऐसी जो समय के शोर में बिला रही मनुष्यता की सरस, सहज, सकारात्मक भंगिमाओं को आवाज़ देती हैं। उनके ‘नहीं होने’ को रेखांकित करती हैं ताकि हम उन्हें लौटा लाएँ। कोरोना काल के भीषण विद्रूप भी इन कविताओं में अंकित हुए हैं, और प्रकृति के साहचर्य से पल्लवित संवेदनाएँ भी। लेकिन ‘वाया’ की ओट से समय की लय को भंग करनेवाली ताक़तों को लेकर चेतावनी कहीं धूमिल नहीं पड़ती : ‘बादल होंगे लेकिन नमी नहीं होगी/...रक्षक होंगे लेकिन रक्षार्थ कुछ नहीं होगा.../और तब वे अपने वर्तमान से मुक्त होकर/एक शानदार विरासत का जश्न मनाएँगे/...मानव-मुक्त विकास का जश्न!’
Siyasat Bhi Allahabad Mein Sangam Nahati Hai
- Author Name:
Jaikrishna Rai 'Tushar'
- Book Type:

- Description:
हिन्दी ग़ज़ल में कहन की, कंटेंट की विविधता की आज़ादी है यद्यपि अब उर्दू शायरी भी सिर्फ़ इश्क़ मोहब्बत नहीं रही। यह बदलाव ही साहित्य को समाज से जोड़ता है। एक अच्छा शेर हमेशा याद रहता है- शोख इठलाती हुई परियों का है ख़्वाब ग़जल झील के पानी में उतरे तो है महताब गज़ल उसकी आँखों का नशा, जुल्फ़ की खुशबू, टीका रंग और मेंहदी रचे हाथों का आदाब ग़ज़ल मैंने ग़ज़ल को परिभाषित करने की कोशिश की है। आज ग़ज़ल की लोकप्रियता का ये आलम है कि हिन्दी के साथ अन्य भारतीय भाषाओं यहाँ तक कि बोलियों में भी लिखी और कही जा रही है। मैंने भी विविध विषयों पर ग़ज़ल कही है। कभी मीराँ, कभी तुलसी, कभी रसखान लिखता हूँ ग़ज़ल में गीत में पुरखों का हिन्दुस्तान लिखता हूँ ग़ज़ल ऐसी हो जिसको खेत का मज़दूर भी समझे दिलों की बात जब हो और भी आसान लिखता हूँ स्त्री सौन्दर्य का उपमान आज बदल गया है, स्त्री आज जमीन से अन्तरिक्ष तक अपने पराक्रम को दिखा रही है। अब वह घरों के दालान और आँगन की शोभा नहीं है न चूड़ी है, न बिन्दी है, न काजल, माँग टीका है ये औरत कामकाजी है ये चेहरा इस सदी का है आशा है यह संकलन आप सभी को पसन्द आएगा। जयकृष्ण राय 'तुषार'
Tulsidas "Nirala"
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
- Book Type:

- Description:
“तुलसीदास में स्वाधीनता की भावना का पूर्ण प्रस्फुटन हुआ है। भारत के सांस्कृतिक सूर्य के अस्त होने पर देश में किस तरह अन्धकार छाया हुआ है, इसका मार्मिक चित्रण करते हुए निराला ने दिखलाया है कि किस प्रकार एक कवि इस अन्धकार को दूर करने की चेष्टा करता है। तुलसीदास के रूप में निराला ने आधुनिक कवि के स्वाधीनता-सम्बन्धी भावों के उद्गम और विकास का चित्रण किया है। छायावादी कवि की तरह निराला के तुलसीदास को भी देश की पराधीनता का बोध प्रकृति की पाठशाला में ही होता है; किन्तु छायावादी कवि की तरह वे भी कुछ दिनों के लिए नारी-मोह में पड़कर उस भाव को भूल जाते हैं। अन्त में जो ज्ञान प्रकृति की पाठशाला में मिला था, उसका दीक्षांत भाषण उसी नारी के विश्वविद्यालय में सुनने को मिलता है, और भविष्यवाणी होती है कि : देश-काल के शर से बिंधकर यह जागा कवि अशेष छविधर इसके स्वर से भारती मुखर होंगी। इस तरह हिन्दी जाति के सबसे बड़े जातीय कवि की जीवन-कथा के द्वारा निराला ने अपनी समसामयिक परिस्थितियों में रास्ता निकालने का संकेत दिया है।” —नामवर सिंह
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book