Sandesh Rasak
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‘संदेश-रासक’, रासक काव्यरूप की विशेषताओं से संयुक्त तीन प्रक्रमों में विभाजित दो सौ तेईस छन्दों का एक छोटा-सा विरह काव्य है, जिसमें कथावस्तु का कोई विशेष महत्त्व नहीं है। विरहिणी नायिका का पथिक के द्वारा अपने प्रिय के पास सन्देश भेजना भारतीय साहित्य में अति प्रचलित काव्य-रूढ़ि है। किन्तु ‘संदेश-रासक’ की विशेषता उसके कथानक में नहीं, उसकी अभिव्यक्ति और कथन-शैली में है। महाकाव्य या भारी-भरकम काव्य न होने के कारण अद्दहमाण को छोटी-छोटी बातों का विशद वर्णन करने का अवसर नहीं था, फिर भी जिस मार्मिकता, संयम और सहृदयता का परिचय कवि ने दिया है वह उसकी कवित्व शक्ति, पांडित्य, परम्परा-ज्ञान और लोकवादिता की पूर्ण प्रतिष्ठा पाठक के हृदय में कर देती है। जिस प्रकार पात्र दुर्लभ होने पर लोग शतपत्रिका में ही आश्वस्त हो लेते हैं, उसी प्रकार जिन लोगों को प्राचीन कवियों की रचनाएँ रस नहीं दे पातीं उन सबको ‘संदेश-रासक’ का कवि काव्य-रस पान के लिए निमंत्रण देता है। इससे यह भी ज्ञात होता है कि इस ग्रन्थ की रचना करते समय अद्दहमाण का दृष्टिकोण लोकवादी था। उन्होंने ‘संदेश-रासक’ का प्रणयन, साधारण जनों को दृष्टि में रखकर, उनके आनन्द और विनोद के लिए किया था, पंडितों और विद्वानों के लिए नहीं। वे ‘संदेश-रासक’ के पाठक का हाथ पकड़कर कहते हैं कि जो लोग पंडित और मूर्ख में भेद करते हैं अर्थात् जो अपने को साधारण जनों की अपेक्षा अधिक विद्वान् समझते हैं, उनके सामने इसे मत पढ़ना।
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‘संदेश-रासक’, रासक काव्यरूप की विशेषताओं से संयुक्त तीन प्रक्रमों में विभाजित दो सौ तेईस छन्दों का एक छोटा-सा विरह काव्य है, जिसमें कथावस्तु का कोई विशेष महत्त्व नहीं है। विरहिणी नायिका का पथिक के द्वारा अपने प्रिय के पास सन्देश भेजना भारतीय साहित्य में अति प्रचलित काव्य-रूढ़ि है। किन्तु ‘संदेश-रासक’ की विशेषता उसके कथानक में नहीं, उसकी अभिव्यक्ति और कथन-शैली में है। महाकाव्य या भारी-भरकम काव्य न होने के कारण अद्दहमाण को छोटी-छोटी बातों का विशद वर्णन करने का अवसर नहीं था, फिर भी जिस मार्मिकता, संयम और सहृदयता का परिचय कवि ने दिया है वह उसकी कवित्व शक्ति, पांडित्य, परम्परा-ज्ञान और लोकवादिता की पूर्ण प्रतिष्ठा पाठक के हृदय में कर देती है।
जिस प्रकार पात्र दुर्लभ होने पर लोग शतपत्रिका में ही आश्वस्त हो लेते हैं, उसी प्रकार जिन लोगों को प्राचीन कवियों की रचनाएँ रस नहीं दे पातीं उन सबको ‘संदेश-रासक’ का कवि काव्य-रस पान के लिए निमंत्रण देता है। इससे यह भी ज्ञात होता है कि इस ग्रन्थ की रचना करते समय अद्दहमाण का दृष्टिकोण लोकवादी था। उन्होंने ‘संदेश-रासक’ का प्रणयन, साधारण जनों को दृष्टि में रखकर, उनके आनन्द और विनोद के लिए किया था, पंडितों और विद्वानों के लिए नहीं। वे ‘संदेश-रासक’ के पाठक का हाथ पकड़कर कहते हैं कि जो लोग पंडित और मूर्ख में भेद करते हैं अर्थात् जो अपने को साधारण जनों की अपेक्षा अधिक विद्वान् समझते हैं, उनके सामने इसे मत पढ़ना।
Book Details
-
ISBN9788126707508
-
Pages236
-
Avg Reading Time8 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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प्रगतिशील आलोचना-परम्परा के प्रतिनिधि आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी की यह पुस्तक ‘विधाओं की विरासत’ न केवल उनकी सूक्ष्म आलोचकीय दृष्टि के कारण बल्कि उनके गद्य की सरस सर्जनात्मकता के कारण भी ध्यान आकृष्ट करती है। साहित्य उनके लिए मानवीयता का विस्तार करने वाली नैतिकता का माध्यम है, रचना सांस्कृतिक प्रक्रिया का हिस्सा और आलोचना महत्त्वपूर्ण सामाजिक दायित्व। इस दायित्व का निर्वाह करते हुए वे रचनाओं की और उनमें वर्णित पात्रों की पृष्ठभूमि और जीवन की खोज करते हैं और उसके सामने अपने जीवनानुभव एवं दृष्टिकोण को रखते हुए पाठक के भाव-बोध को समृद्ध करते हैं। वे भाषा एवं चित्रण-कला के विश्लेषण के माध्यम से भी मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा करते हैं। वे रचनाओं की संरचना को अपने विश्लेषण द्वारा सामाजिकता तथा राजनीति की धार प्रदान करते हैं। राजनीति और रचना बराबर सामाजिकता या सामाजिकता और रचना बराबर राजनीति का सूत्र इस पुस्तक के लेखों, टिप्पणियों आदि में मिलता है। सामाजिकता को वे बोध और संवेदना दोनों मानते हैं। जीवन की विषमता को पाटने की छटपटाहट से रहित रचना उनके लिए साहित्य नहीं हो सकती। उनके मुताबिक, संवेदना जीवन-आचरण और रचना-आचरण के द्वारा संस्कृति में ढलती है और साहित्य की महत्ता अनुभूति की तीव्रता को लेकर नहीं, बल्कि उसे शब्द के माध्यम से असीमित कर देने में है। वे किसी भी रचना की परख ऐसी ही कसौटियों से करते हैं और सांस्कृतिक चेतना के विकास को पहचानने वाली अन्तर्दृष्टि पाठक को प्रदान करते हैं। वस्तुतः यह ऐसी आलोचना है जो स्वयं एक सांस्कृतिक प्रक्रिया है जिसकी आज कहीं अधिक आवश्यकता है।
Pracheen Bharat Ke Kalatmak Vinod
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
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“भारतवर्ष में एक समय ऐसा बीता है जब इस देश के निवासियों के प्रत्येक कण में जीवन था, पौरुष था, कौलीन्य गर्व था और सुन्दर के रक्षण-पोषण और सम्मान का सामर्थ्य था। उस समय के काव्य-नाटक, आख्यान, आख्यायिका, चित्र, मूर्ति, प्रासाद आदि को देखने से आज का अभागा भारतीय केवल विस्मय-विमुग्ध होकर देखता रह जाता है। उस युग की प्रत्येक वस्तु में छन्द है, राग है और रस है।’’ आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की प्रस्तुत कृति उसी छन्द, उसी राग, उसी रस को उद्घाटित करने का एक प्रयास है। इसमें उन्होंने गुप्तकाल के कुछ सौ वर्ष पूर्व से लेकर कुछ सौ वर्ष बाद तक के साहित्य का अवगाहन करते हुए उस काल के भारतवासियों के उन कलात्मक विनोदों का वर्णन किया है जिन्हें जीने की कला कहा जा सकता है। काव्य, नाटक, संगीत, चित्रकला, मूर्तिकला से लेकर शृंगार-प्रसाधन, द्यूत-क्रीड़ा, मल्लविद्या आदि नाना कलाओं का वर्णन इस पुस्तक में हुआ है जिससे उस काल के लोगों की ज़िन्दादिली और सुरुचि-सम्पन्नता का परिचय मिलता है।
Hindi Aalochana
- Author Name:
Vishwanath Tripathi
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प्रस्तुत पुस्तक में हिन्दी के विपुल और विविध आलोचना-साहित्य का विकास-क्रम दिखाते हुए उसका विस्तृत विवेचन किया गया है। लेखक ने कोशिश की है कि आलोचना-साहित्य के मूल स्रोतों को देखकर ही उसके विषय में कुछ लिखा जाए। यह अध्ययन प्रधानत: शुक्ल और प्रमुख शुक्लोत्तर समीक्षकों पर ही आधारित है। इसमें पं. रामचन्द्र शुक्ल के आलोचक की शक्ति को समझने का उद्यम किया गया है और उन्होंने आलोचक बनने की जो गम्भीर साधना की थी, उस पर प्रकाश डाला गया है। पं. नन्ददुलारे वाजपेयी, पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी तथा डॉ. नगेन्द्र की आलोचनात्मक कृतियों का जायज़ा लिया गया है और प्रगतिशील समीक्षकों में डॉ. रामविलास शर्मा तथा डॉ. नामवर सिंह के योगदान पर विचार किया गया है। पुस्तक की विशेषता यह है कि इसमें भारतेन्दु युग और द्विवेदी युग की पत्र-पत्रिकाओं और छायावादी कवियों के आलोचनात्मक विचारों के भी महत्त्व को ठीक ढंग से आँकने का प्रयास है। कुल मिलाकर, पुस्तक में हिन्दी आलोचना को नए ढंग से देखा-परखा गया है।
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