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Author:
Rahi Masoom RazaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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‘छोटे आदमी की बड़ी कहानी’ 1965 के भारत-पाक युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए परमवीर चक्र से सम्मानित अब्दुल हमीद का जीवन-वृत्तान्त है। इस जीवनी के धागे उन्होंने हिन्दुस्तानियत की उस परम्परा से काते हैं जिसमें हिन्दू-मुस्लिम का भेद सिर्फ़ राजनीतिक साज़िशों में दिखाई देता है, समाज में नहीं, न ही अवाम के सोचते-देखने के तरीक़े में। वीर अब्दुल हमीद इस परम्परा के जीते-जागते उदाहरण रहे। उनका ताल्लुक़ उसी गाज़ीपुर से था जो राही मासूम रज़ा की जन्मभूमि है। इस किताब में ‘वसीयत’ शीर्षक समर्पण में वे अपने बच्चों को कहते हैं—‘इस बात पर फ़ख्र करना कि तुम भारतीय हो। तुम बुद्ध के हिन्दुस्तान और परमवीर अब्दुल हमीद के ग़ाज़ीपुर के हो।’ और अगली पंक्ति यह—‘वतन मजहब नहीं जो बदला जा सके।’ राष्ट्रवाद के नाम पर फैलाए जा रहे अंधे मुस्लिम-विरोध को अतार्किक और अवांछनीय साबित करने के लिए यह एक ही पंक्ति पर्याप्त है जिसे वीर अब्दुल हमीद का जीवन साकार करना है औपन्यासिक कथा-प्रवाह के साथ लिखी गई इस जीवनी में हमें निम्न आय वर्ग के मुस्लिम समाज की रोज़मर्रा ज़िन्दगी के अविस्मरणीय चित्र भी दिखाई देते हैं।
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‘छोटे आदमी की बड़ी कहानी’ 1965 के भारत-पाक युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए परमवीर चक्र से सम्मानित अब्दुल हमीद का जीवन-वृत्तान्त है। इस जीवनी के धागे उन्होंने हिन्दुस्तानियत की उस परम्परा से काते हैं जिसमें हिन्दू-मुस्लिम का भेद सिर्फ़ राजनीतिक साज़िशों में दिखाई देता है, समाज में नहीं, न ही अवाम के सोचते-देखने के तरीक़े में। वीर अब्दुल हमीद इस परम्परा के जीते-जागते उदाहरण रहे। उनका ताल्लुक़ उसी गाज़ीपुर से था जो राही मासूम रज़ा की जन्मभूमि है। इस किताब में ‘वसीयत’ शीर्षक समर्पण में वे अपने बच्चों को कहते हैं—‘इस बात पर फ़ख्र करना कि तुम भारतीय हो। तुम बुद्ध के हिन्दुस्तान और परमवीर अब्दुल हमीद के ग़ाज़ीपुर के हो।’ और अगली पंक्ति यह—‘वतन मजहब नहीं जो बदला जा सके।’
राष्ट्रवाद के नाम पर फैलाए जा रहे अंधे मुस्लिम-विरोध को अतार्किक और अवांछनीय साबित करने के लिए यह एक ही पंक्ति पर्याप्त है जिसे वीर अब्दुल हमीद का जीवन साकार करना है
औपन्यासिक कथा-प्रवाह के साथ लिखी गई इस जीवनी में हमें निम्न आय वर्ग के मुस्लिम समाज की रोज़मर्रा ज़िन्दगी के अविस्मरणीय चित्र भी दिखाई देते हैं।
Book Details
-
ISBN9789377370602
-
Pages128
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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परम पूज्य दलाई लामा – खामोश लोगों की ओर से यह पुस्तक परम पूज्य दलाई लामा की आत्मकथात्मक कृति Voice for the Voiceless का हिंदी अनुवाद है। इसमें उन्होंने तिब्बत और तिब्बती लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए चीन के विरुद्ध अपने सात दशकों के शांतिपूर्ण संघर्ष को आत्मीयता से वर्णित किया है। पुस्तक में उन प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं जो चीन द्वारा तिब्बत और तिब्बतीयों को लेकर खड़े किए जाते हैं- और जो पाठकों के मन में भी स्वाभाविक रूप से उठते हैं। इसके साथ ही, अगली दलाई लामा की घोषणा और उससे जुड़ी जटिलताओं पर भी विस्तार से चर्चा की गई है, जो वर्तमान में चीन और अंतरराष्ट्रीय समुदाय में गंभीर बहस का विषय बना हुआ है। इसकी भाषा और शैली प पू दलाई लामा के व्यक्तित्व की तरह ही सहज और सरल है।
Aamne-Saamne
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Namvar Singh +2
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नामवर सिंह अब हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनका बोला-बताया अब भी ऐसा बहुत कुछ है जो सामने आना बाकी है। लम्बे समय तक उन्होंने व्यवस्थित ढंग से कुछ नहीं लिखा था; व्याख्यानों और वक्तव्यों के रूप में ही उन्होंने आलोचना के नए-नए पैमाने तोड़े और बनाए। युवाओं, वरिष्ठों, छात्रों-पत्रकारों और समकालीन रचनाकारों को दिए साक्षात्कारों में भी उन्होंने सदैव एक उत्तरदायी आलेचकीय चेतना को अभिव्यक्ति दी। उनकी आश्चर्यजनक स्मृति, वैचारिक स्पष्टता और आस्वादपरक समीक्षा के चलते व्याख्यानों की तरह उनके साक्षात्कार भी सदैव चर्चित रहे। इस पुस्तक में उनके ऐसे साक्षात्कारों को संकलित किया गया है जो अब तक किसी और पुस्तक में नहीं आए थे। कई वरिष्ठ और कनिष्ठ रचनाकारों और सम्पादकों के साथ हुए ये वार्तालाप उनकी आलोचना-दृष्टि, समकालीन रचनात्मकता पर उनके विचारों और सरोकारों को रेखांकित करते हैं। इनमें से कुछ साक्षात्कार इसलिए और भी दिलचस्प है कि इनमें उन्होंने किसी एक ही रचनाकार या कृति पर केन्द्रित प्रश्नों पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। मसलन स्वयं प्रकाश, त्रिलोचन, काशीनाथ सिंह का ‘काशी का अस्सी’ आदि पर केन्द्रित बातचीत। साक्षात्कारकर्ताओं में भी अलग-अलग पीढ़ियों के लोग हैं; जिन्होंने अपने-अपने ढंग से उनसे अपनी जिज्ञासाओं पर विचार-विनिमय किया है।
Chaitanya Mahaprabhu
- Author Name:
Amritlal Nagar
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चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव वैष्णव धर्म के विकास में एक चमत्कारी घटना है। एक गहरे आवेश और भावनात्मकता के साथ सारे जनसामान्य तक वैष्णव धर्म को पहुँचाने का काम पहले बंगाल में और बाद में सम्पूर्ण देश में, चैतन्य महाप्रभु ने किया। मधुर भाव की नाम–संकीर्तन पद्धति चैतन्य की देन है। इसी के साथ वैष्णव धर्म ने एक नए युग में प्रवेश किया। प्रस्तुत पुस्तक में पहली बार चैतन्य के व्यक्तित्व के इस योगदान को सम्पूर्णता के साथ उजागर किया गया है। लेकिन इस पुस्तक का उद्देश्य मात्र इतना ही नहीं है। विद्वान लेखक ने चैतन्य के व्यक्तित्व को तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों में भी रखकर देखा है। अपने समय के इतिहास में चैतन्य का व्यक्तित्व एक चुनौती की तरह उभरा और पराजित हिन्दू जाति को एक नई आस्था और नए आलोक से संयुक्त करने का काम भी चैतन्य ने किया। उपन्यासकार नागर जी की लेखनी से प्रस्तुत चैतन्य की यह जीवनी पढ़ने पर एक उपन्यास का मज़ा तो देती है, साथ ही वैष्णव धर्म के उदार पथ के विकास में उनका महत्त्वपूर्ण और अद्वितीय योगदान भी सामने लाती है।
Tumhare Naam : Jan Nisar Akhtar ko Safia Akhtar ke khat
- Author Name:
Safia Akhtar
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जाँ निसार अख़्तर और उनकी शरीके-हयात सफ़िया अख़्तर को साथ रहने का मौक़ा बहुत कम मिला। उस ज़माने में जब औरतों के लिए घर से बाहर जाकर काम करना बहुत आम बात नहीं थी, वे स्कूल में अपनी नौकरी करती रहीं और न सिर्फ़ अपनी और अपने बच्चों, बल्कि मुम्बई की फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी ज़मीन तलाश रहे जाँ निसार साहब के लिए भी सम्बल जुटाती रहीं। ये ख़त उन्होंने इसी संघर्ष के दौरान लिखे, लेकिन ये ख़त सिर्फ़ उनके हाल-अहवाल की सूचना-भर नहीं देते, बल्कि वे एक बड़े सृजक की क़लम से उतरे शाहकार की तरह हमारे सामने आते हैं। ज़िन्दगी उन्हें कुछ और वक़्त देती तो निश्चय ही वे साहित्य की दुनिया को कुछ बड़ा देकर जातीं। इन ख़तों में उनकी मुहब्बत और हिम्मत के साथ-साथ उनकी और बेशक जाँ निसार अख़्तर की ज़िन्दगी खुलती जाती है, साथ ही उनका अपना दौर भी अपने तमाम स्याह-सफ़ेद के साथ रौशन होता जाता है। ये ख़त प्यार और हौसले से भरे एक दिल की अक़्क़ासी करते हैं। ये जादू की तरह असर करते हैं; इनका बेहद ताक़तवर और सधा हुआ ‘प्रोज़’ कहीं आपको रुकने नहीं देता, और इनकी तुर्श मिठास में डूबे-डूबे बारहा आपकी आँखें भर आती हैं। उनके निधन के बाद जाँ निसार साहब ने उनके इन ख़तों को दो जिल्दों में प्रकाशित कराया—’हर्फ़े-आश्ना’ और ‘ज़ेरे-लब’। इस किताब में इन दोनों जिल्दों में संकलित ख़तों को दे दिया गया है।
Tumhare Naam : Jan Nisar Akhtar ko Safia Akhtar ke khat
Safia Akhtar
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