Meri Jail Diary : Vol. 1-2
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ChandrashekharPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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एक तरफ आज की राजनीतिक संस्कृति है, दूसरी ओर यह डायरी–इसे पढ़ते हुए आप इस तुलना से बच नहीं सकते। <br>और यही इस डायरी की बहुत सादा, लेकिन निर्णायक उपलब्धि है। इस डायरी के पन्नों से गुजरते हुए आप अनायास ही अपने आपको एक आश्चर्य की दुनिया में पाते हैं, कि क्या राजनेता भी ऐसा होता है ! क्या राजनीति में सक्रिय कोई व्यक्ति गिलहरियों, चींटियों और चिड़ियाओं के दुख-दर्द के बारे में भी सोच सकता है ?और न सिर्फ सोचता ही है, बल्कि बाकायदा चिंतित होकर उनके दुख-दर्दों को अपनी डायरी के पन्नों पर अंकित भी करता है। <br>जो लोग रोज मन लगाकर अखबार पढ़ते हैं और जो ऊबकर मात्र हेडलाइनों तक सिमट गए हैं, वे दोनों ही यह जानकर आश्चर्यचकित हो सकते हैं कि इस डायरी का लेखक जेल में रहते हुए भी राजनीतिक सक्रियता को ‘मिस’ नहीं कर रहा है, बल्कि अपने विद्रोही तेवरों से मुख्यधारा में उल्लेखनीय लहरें पैदा कर चुकने के बावजूद जेल के अपने कमरे में वह एक चित्रकार होना चाहता है। वह चाहता है कि काश, तूलिका उसका औजार होती ! उसी कमरे में बैठकर वह फाँसी की क्रूर प्रथा पर सिहरता है, कैदियों की विवशता पर शोकाकुल होता है, और होता है वक्त के साथ मुखौटा बदल लेने वाले दोस्तों पर क्रोधित और उदास भी। <br>यह सब एक अत्यंत संवेदनशील व्यक्ति के पोट्रेट की रेखाएँ हैं, जो अपने शारीरिक कष्ट को इसलिए भी छिपाता रहता है कि कहीं जेल-कर्मचारी परेशान न हों ! ऐसा संवेदनशील व्यक्ति ‘नेता’ के उस फ्रेम में फिट नहीं बैठता, जो इधर जनमानस में नेता की ‘छवि’ बनी है। लेकिन इस डायरी के पन्नों में वह व्यक्ति सुरक्षित है–अपनी पूरी संवेदनाओं के साथ, जिसमें दर्द है, पीड़ा है–उन पीड़ितों के प्रति, जो देश में प्रचुर संसाधनों के बावजूद कष्टमय जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं, और इसीलिए यह डायरी एक विशेष कृति के रूप में पठनीय और संग्रहणीय है।
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एक तरफ आज की राजनीतिक संस्कृति है, दूसरी ओर यह डायरी–इसे पढ़ते हुए आप इस तुलना से बच नहीं सकते। <br>और यही इस डायरी की बहुत सादा, लेकिन निर्णायक उपलब्धि है। इस डायरी के पन्नों से गुजरते हुए आप अनायास ही अपने आपको एक आश्चर्य की दुनिया में पाते हैं, कि क्या राजनेता भी ऐसा होता है ! क्या राजनीति में सक्रिय कोई व्यक्ति गिलहरियों, चींटियों और चिड़ियाओं के दुख-दर्द के बारे में भी सोच सकता है ?और न सिर्फ सोचता ही है, बल्कि बाकायदा चिंतित होकर उनके दुख-दर्दों को अपनी डायरी के पन्नों पर अंकित भी करता है। <br>जो लोग रोज मन लगाकर अखबार पढ़ते हैं और जो ऊबकर मात्र हेडलाइनों तक सिमट गए हैं, वे दोनों ही यह जानकर आश्चर्यचकित हो सकते हैं कि इस डायरी का लेखक जेल में रहते हुए भी राजनीतिक सक्रियता को ‘मिस’ नहीं कर रहा है, बल्कि अपने विद्रोही तेवरों से मुख्यधारा में उल्लेखनीय लहरें पैदा कर चुकने के बावजूद जेल के अपने कमरे में वह एक चित्रकार होना चाहता है। वह चाहता है कि काश, तूलिका उसका औजार होती ! उसी कमरे में बैठकर वह फाँसी की क्रूर प्रथा पर सिहरता है, कैदियों की विवशता पर शोकाकुल होता है, और होता है वक्त के साथ मुखौटा बदल लेने वाले दोस्तों पर क्रोधित और उदास भी। <br>यह सब एक अत्यंत संवेदनशील व्यक्ति के पोट्रेट की रेखाएँ हैं, जो अपने शारीरिक कष्ट को इसलिए भी छिपाता रहता है कि कहीं जेल-कर्मचारी परेशान न हों ! ऐसा संवेदनशील व्यक्ति ‘नेता’ के उस फ्रेम में फिट नहीं बैठता, जो इधर जनमानस में नेता की ‘छवि’ बनी है। लेकिन इस डायरी के पन्नों में वह व्यक्ति सुरक्षित है–अपनी पूरी संवेदनाओं के साथ, जिसमें दर्द है, पीड़ा है–उन पीड़ितों के प्रति, जो देश में प्रचुर संसाधनों के बावजूद कष्टमय जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं, और इसीलिए यह डायरी एक विशेष कृति के रूप में पठनीय और संग्रहणीय है।
Book Details
-
ISBN9789395737029
-
Pages873
-
Avg Reading Time29 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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मिथिला के बन्द समाज से बाहर निकलकर नागार्जुन ने अपनी तमाम रचनाओं और सहज सुलभ व्यक्तित्व से एक ऐसा जागरण किया जिसकी आज पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरत है। वे सच्चे अर्थों में क्लैसिकल मॉडर्न थे। तारानन्द वियोगी की यह जीवनी पाठक को नागार्जुन के अन्त:करण में प्रवेश कराने में सक्षम है। उनके घने साहचर्य में जो रहे हैं, वे इसे पढ़कर बाबा की उपस्थिति फिर से अपने भीतर महसूस करेंगे। अपनी सशक्त लेखनी से तारानन्द ने बाबा नागार्जुन को पुनर्जीवित कर दिया है। यहाँ तथ्य और सत्य का सन्तुलित समन्वय है। बाबा से जुड़े शताधिक जनों के अनुभव उन्होंने बड़ी सहृदयता से अन्तर्ग्रथित किए हैं। बाबा नागार्जुन को संसार से विदा हुए बीस वर्ष से ज़्यादा हुए। इस बीच हिन्दी-मैथिली की जो तरुण पीढ़ी आई है, वह भी इस कृति से बाबा नागार्जुन का सम्पूर्ण साक्षात्कार कर सकेगी। बाबा के बारे में एक जगह लेखक ने लिखा है, 'स्मृति, दृष्टान्त और अनुभव का ज़खीरा था उनके पास।' तारानन्द की इस जीवनी में भी ये तीनों बातें आद्यन्त मौजूद हैं। बाबा के जीवन-सृजन पर यह बहुत रचनात्मक, ऐतिहासिक महत्त्व का कार्य सम्पन्न हो सका है। मैं इतना ही कहूँगा कि बाबा की ऐसी प्रामाणिक जीवनी मैं भी नहीं लिख पाता। ‘युगों का यात्री' हिन्दी की कुछ सुप्रसिद्ध जीवनियों की शृंखला की अद्यतन सशक्त कड़ी है। —वाचस्पति, वाराणसी (दशकों तक नागार्जुन के क़रीब रहे अध्येता समीक्षक)
Sutradhar
- Author Name:
Sanjeev
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अपनी रचनात्मक ज़मीन और लेखकीय दायित्व की तलाश करते हुए एक ईमानदार लेखक प्रायः स्वयं को भी रचने की कोशिश करता है। अनुपस्थित रहकर भी वह उसमें उपस्थित रहता है; और सहज ही उस देश-काल को लाँघ जाता है जो उसे आकार देता रहा है। समकालीन कथाकारों में संजीव की मौजूदगी को कुछ इसी तरह देखा जाता है। आकस्मिक नहीं कि हिन्दी की यथार्थवादी कथा-परम्परा को उन्होंने लगातार आगे बढ़ाया है। ‘सूत्रधार’ संजीव का नया उपन्यास है, और उनकी शोधपरक कथा-यात्रा में नितान्त चुनौतीपूर्ण भी। केन्द्र में हैं भोजपुरी गीत-संगीत और लोकनाट्य के अनूठे सूत्रधार भिखारी ठाकुर। वही भिखारी ठाकुर, जिन्हें महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने ‘भोजपुरी का शेक्सपियर’ कहा था और उनके अभिनन्दनकर्ताओं ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र। लेकिन भिखारी ठाकुर क्या सिर्फ़ यही थे? निश्चय ही नहीं, क्योंकि कोई भी एक बड़ा किसी दूसरे बड़े के समकक्ष नहीं हो सकता। और यों भी भिखारी का बड़प्पन उनके सहज सामान्य होने में निहित था, जिसे इस उपन्यास में संजीव ने उन्हीं के आत्मद्वन्द्व से गुज़रते हुए चित्रित किया है। दूसरे शब्दों में, यह एक ऐसी धूपछाँही कथा-यात्रा है, जिसे हम भिखारी जैसे लीजेंडरी लोक कलाकार और उनके संगी-साथियों के अन्तर्बाह्य संघर्ष को महसूस करते हुए करते हैं। काल्पनिक अतिरेक की यहाँ कोई गुंजाइश नहीं। न कोई ज़रूरत। ज़रूरत है तो तथ्यों के बावजूद रचनात्मकता को लगातार साधे रखने की, और संजीव को इसमें महारत हासिल है। यही कारण है कि ‘सूत्रधार’ की शक्ल में उतरे भिखारी ठाकुर भोजपुरी समाज में रचे-बसे लोकराग और लोकचेतना को व्यक्त ही नहीं करते, उद्दीप्त भी करते हैं। उनकी लोकरंजकता भी गहरे मूल्यबोध से सम्बलित है; और उसमें न सिर्फ़ उनकी, बल्कि हमारे समाज और इतिहास की बहुविध विडम्बनाएँ भी समाई हुई हैं। अपने तमाम तरह के शिखरारोहण के बावजूद भिखारी अगर अन्त तक भिखारी ही बने रहते हैं तो यह यथार्थ आज भी हमारे सामने एक बड़े सवाल की तरह मौजूद है। कहने की आवश्यकता नहीं कि देश, काल, पात्र की जीवित-जाग्रत् पृष्ठभूमि पर रचा गया यह जीवनीपरक उपन्यास आज के दलित-विमर्श को भी एक नई ज़मीन देता है। तथ्यों से बँधे रहकर भी संजीव ने एक बड़े कलाकार से उसी के अनुरूप रससिक्त और आत्मीय संवाद किया है। —रामकुमार कृषक
Bageshwar Dham Sarkar: Pt. Dheerendra Krishna Shastri Ki Adbhut Yatra
- Author Name:
Sachin Choudhary
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“बागेश्वर धाम सरकार – पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की अद्भुत यात्रा” सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा है—एक युवा साधक से लेकर राष्ट्र की आस्था के केंद्र बन चुके पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री तक की प्रेरणादायी गाथा। इस पुस्तक में लेखक सचिन चौधरी ने न सिर्फ बागेश्वर धाम सरकार से अपनी पहली मुलाकात, बल्कि पिछले चार वर्षों में उनके साथ हुए अनुभवों, संवादों और आत्मीय क्षणों को सच्चाई और श्रद्धा के साथ शब्दों में पिरोया है। किताब में वर्णित है कि कैसे एक सामान्य से गाँव गढ़ा से शुरू होकर, बाबा का तेज, ज्ञान और दिव्य दृष्टि लोगों के जीवन में चमत्कारिक परिवर्तन लेकर आए। यह पुस्तक इस बात की साक्षी है कि कैसे बुंदेलखंड की धरती से निकला एक युवा आज करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास का प्रतीक बन गया है। बागेश्वर धाम सरकार की महिमा, श्रद्धालुओं की अडिग भक्ति, खजुराहो जैसे क्षेत्रों पर इसका सामाजिक-आर्थिक प्रभाव, और बाबा के अनदेखे पहलुओं को उजागर करती यह पुस्तक—हर उस व्यक्ति के लिए पठनीय है जो आस्था, अध्यात्म और आत्मबल की शक्ति को समझना चाहता है।
Main Barbad Hona Chahti Hoon
- Author Name:
Malika Amar Shaikh +1
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मलिका अमर शेख उस समय मात्र उन्नीस बरस की थीं जब वे मराठी के युग-प्रवर्तक कवि नामदेव ढसाल के साथ विवाह-बन्धन में बँध गईं। लेकिन जल्द ही यह शादी टूट गई। दलित पैंथर्स के सह-संस्थापक नामदेव न तो एक पति के रूप में, न पिता के रूप में, और न ही एक पुरुष के रूप में वैसे निकले जैसी उम्मीद मलिका ने की थी। यह मुख्यतः उस विवाह की कहानी है, जिसमें हम उस स्त्री से मिलते हैं जो एक पुरुष-संसार में अपनी जगह ढूँढ़ने की कोशिश में है। लेकिन यह कहानी मराठी दलित आन्दोलन के अन्तर्विरोधों, मुम्बई शहर, उसके कवियों और एक्टिविस्टों की कहानी भी है। मूल रूप से मराठी में प्रकाशित यह आत्मकथा छपते ही एक सनसनी बन गई थी। व्यक्तिगत बनाम राजनीतिक, वाम विचारधारा बनाम दलित आन्दोलन और अपने पति के प्रति प्रेम और घृणा के बीच फँसी एक स्त्री की यह आत्मकथा कई मायनों में एक दस्तावेज़ की हैसियत रखती है।
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