Asantosh Ke Din
(0)
Author:
Rahi Masoom RazaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
495
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हिन्दी उपन्यास-जगत् में राही मासूम रज़ा का प्रवेश एक सांस्कृतिक घटना-जैसा ही था। ‘आधा गाँव’ अपने-आप में मात्र एक उपन्यास ही नहीं, सौन्दर्य का पूरा प्रतिमान था। राही ने इस प्रतिमान को उस मेहनतकश अवाम की इच्छाओं और आकांक्षाओं को मथकर निकाला था, जिसे इस महादेश की जन-विरोधी व्यवस्था ने कितने ही आधारों पर विभाजित कर रखा है।</p> <p>राही का कवि-हृदय व्यवस्था द्वारा लादे गए झूठे जनतंत्र की विभीषिकाओं को उजागर करने में अत्यन्त तत्पर, विकल, संवेदनशील और आक्रोश से भरा हुआ रहा है। यही हृदय और अधिक व्यंजनाक्षम होकर ‘असन्तोष के दिन’ में व्याप रहा है। आक्रोश और संवेदना की यह तरलता यहाँ धुर गम्भीर राजनीतिक सवालों को पेश करती है, जिनकी आँच में सारा हिन्दुस्तान पिघल रहा है।</p> <p>राष्ट्र की अखंडता और एकता, जातिवाद की भयानक दमघोंटू परम्पराएँ, साम्प्रदायिकता का हलाहल, एक-से-एक भीषण सत्य, चुस्त शैली और धारदार भाषा में लिपटा चला आता है और हमें घेर लेता है। इस कृति की माँग है कि इन सवालों से जूझा और टकराया जाए। इसी समय, इनके उत्तर तलाश किए जाएँ अन्यथा मनुष्य के अस्तित्व की कोई गारंटी नहीं रहेगी।</p> <p>
Read moreAbout the Book
हिन्दी उपन्यास-जगत् में राही मासूम रज़ा का प्रवेश एक सांस्कृतिक घटना-जैसा ही था। ‘आधा गाँव’ अपने-आप में मात्र एक उपन्यास ही नहीं, सौन्दर्य का पूरा प्रतिमान था। राही ने इस प्रतिमान को उस मेहनतकश अवाम की इच्छाओं और आकांक्षाओं को मथकर निकाला था, जिसे इस महादेश की जन-विरोधी व्यवस्था ने कितने ही आधारों पर विभाजित कर रखा है।</p>
<p>राही का कवि-हृदय व्यवस्था द्वारा लादे गए झूठे जनतंत्र की विभीषिकाओं को उजागर करने में अत्यन्त तत्पर, विकल, संवेदनशील और आक्रोश से भरा हुआ रहा है। यही हृदय और अधिक व्यंजनाक्षम होकर ‘असन्तोष के दिन’ में व्याप रहा है। आक्रोश और संवेदना की यह तरलता यहाँ धुर गम्भीर राजनीतिक सवालों को पेश करती है, जिनकी आँच में सारा हिन्दुस्तान पिघल रहा है।</p>
<p>राष्ट्र की अखंडता और एकता, जातिवाद की भयानक दमघोंटू परम्पराएँ, साम्प्रदायिकता का हलाहल, एक-से-एक भीषण सत्य, चुस्त शैली और धारदार भाषा में लिपटा चला आता है और हमें घेर लेता है। इस कृति की माँग है कि इन सवालों से जूझा और टकराया जाए। इसी समय, इनके उत्तर तलाश किए जाएँ अन्यथा मनुष्य के अस्तित्व की कोई गारंटी नहीं रहेगी।</p>
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Book Details
-
ISBN9788126708321
-
Pages91
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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देश के वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य की विसंगतियों, द्वंद्वों और दुविधाओं के उत्स की तलाश है ‘तरंग’। यह तलाश इतिहास के जिस कालखंड (1934-42 ) में ले जाती है उसकी धड़कनें स्वातंत्र्योत्तर भारत की बुनियाद में अन्तर्भुक्त हैं और उसकी यात्रा को लगातार विचलित-आलोड़ित करती रही हैं। उस कालखंड में इन विसंगतियों, द्वंद्वों और दुविधाओं को जिस तरह बरता गया, उसका फलित हमें आज भी उद्भ्रान्त किए हुए है। उपन्यास के रूप में ‘तरंग’ उसी कालखंड की गहन पड़ताल करती एक बहुआयामी कथा है जिसकी जड़ों के रेशे पिछली सदी के आरम्भ तक जाते हैं।
भगत सिंह और चन्द्रशेखर आज़ाद के बलिदान के साथ ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’ की क्रान्तिकारी धारा का अवसान नहीं हो गया था, उसमें बिखराव ज़रूर आया था। ‘तरंग’ एक औपन्यासिक कृति के रूप में उसी अवशिष्ट धारा के एक विच्छिन्न समूह के गुमनाम क्रान्तिकारियों के अन्तरंग से साक्षात्कार कराती है। उसी धारा को केन्द्र में रखकर वैश्विक परिप्रेक्ष्य में स्वतंत्रत आन्दोलन की मुख्यधारा का प्रतिपाठ भी रचती है और इतिहास के कई मिथकों का भेदन करती है। इस अर्थ में ‘तरंग’ भारतीय और विश्व इतिहास के एक अहम अध्याय में उपन्यासकार का सुचिन्तित सृजनात्मक हस्तक्षेप है। गांधी-नेहरू-पटेल की अन्तर्विरोधी धारा के बरअक्स उपन्यास का विशाल फलक स्वामी सहजानन्द, डॉ. अम्बेडकर, एम.एन. रॉय और सुभाषचन्द्र बोस के गिर्द घूमता है और अकादमिक इतिहास-लेखन के कुहासे को भेदकर उसके उपेक्षित या अल्पज्ञात पक्ष को निर्मम यथार्थ की रोशनी में उद्घाटित करता है। इस अर्थ में उपन्यास उस कालखंड के ज़मीनी, अन्तरंग और ज़रूरी दस्तावेज़ की निर्मिति भी है। अकादमिक रिक्ति को भरने का एक श्रमसाध्य, निष्ठावान और सृजनात्मक उपक्रम।
उस कालखंड में किसान आन्दोलन की एक उत्कट क्रान्तिकारी धारा भी प्रवाहित है जो जमींदारों, ताल्लुकेदारों के विरुद्ध किसान-संघर्ष की नई प्रविधि ईजाद करती है। क्रान्तिकारियों का उक्त समूह स्वामी सहजानन्द के उत्प्रेरण में इस ईजाद के केन्द्र में है। इस ब्याज से उपन्यास सबाल्टर्न इतिहास के एक अँधेरे कोने को दीप्त करता है। क्रान्ति-पथ को स्खलित करने की ओर प्रवृत्त ऐन्द्रिक स्त्री-पुरुष सम्बन्ध का कलात्मक अतिक्रमण भी ‘तरंग’ का एक अहम उपजीव्य है।
Samudra Mein Khoya Hua Aadmi
- Author Name:
Kamlesh
- Book Type:

- Description: “समुद्र में लापता हुए लोग भी बरसों बाद लौटकर आए हैं...” हरबंस उन्हें समझाने लगा—“बहुत बार समुद्रों में तूफ़ान आ जाते हैं। जहाज टूट जाते हैं। लोग समुद्र में खो जाते हैं...तैरते-तैरते वे अनजानी जगहों पर जा लगते हैं...” लेकिन बीरन न कहीं पहुँचा, न उसने किसी का दरवाज़ा खटखटाया, पहुँची सिर्फ़ उसके हमेशा के लिए विलीन हो जाने की ख़बर। अवाक् खड़ा रह गया, अपनी दैनंदिन चुनौतियों में उलझा-फँसा उसका परिवार। बीरन जिसे हमेशा अपने बाबूजी की बेबसी और मायूसी सताती रहती थी, जो कॉलेज के दिनों में शाम को ही अपनी ड्रेस धोकर सूखने के लिए डाल देता था, जूतों पर खड़िया फेर लेता था और जिसका भार, जिसकी मौजूदगी घर में किसी को महसूस नहीं होती थी, वही बीरन अपने बोझ से सबको मुक्त कर गया। मध्यवर्गीय जीवन के सफल चितेरे कमलेश्वर ने एक मार्मिक कथा के जरिए इस उपन्यास में दो समुद्रों की तरफ़ इशारा किए हैं—एक पानी का वह असीम सागर, जिसमें बीरन खो गया और दूसरा महानगर की ठंडी, उदासीन भीड़ का पराया समुद्र, जिसमें उसके पिता श्यामलाल और मासूम बहनें अपनी अलक्षित जिजीविषा के साथ तैरने की कोशिश करते रहे। आधुनिक सभ्यता के अथाह समुद्र में आज का मध्यवर्गीय व्यक्ति अपनी सीमाओं और विडम्बनाओं के साथ किस तरह लुप्त हो जाता है, यही इस उपन्यास का केन्द्रीय विषय है।
Shaheednama
- Author Name:
Howard Fast
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Anitya
- Author Name:
Mridula Garg
- Book Type:

-
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‘अनित्य’ प्रतिबोध तक पढ़ा है। ‘अविजित’ जैसा, सभ्य शिष्ट जीवन का सही सांगोपांग चित्र शायद ही कहीं और मिले।
—जैनेन्द्र
याद रही किताबों में सबसे पहला नाम लेना चाहूँगा मृदुला गर्ग के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण उपन्यास ‘अनित्य’ का। केन्द्रीय बिम्ब है उसका पहाड़ों में उगा लम्बा शानदार देवदारु जो धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ता जा रहा है और एक दिन जड़ से उखड़कर गिर पड़ता है। देवदारु प्रतीक है उस संस्कारवान व्यक्तित्व का जो राष्ट्रीय संघर्ष के दौरान उभरा था। वह समझौतों के ख़िलाफ़ था। लेकिन इन समझौतावादियों की जो कुटिल दोमुँही संस्कृति आज़ादी पाने के बाद उभरी, उसने धीरे-धीरे उन क्रान्तिकारी मूल्यों को छिन्न-भिन्न कर दिया, जिनका प्रतीक भगतसिंह का ‘इंक़लाब ज़िन्दाबाद’ था। इस सारी प्रक्रिया को एक मध्यमवर्गीय परिवार की कथा में पिरोकर मृदुला गर्ग ने जितने मार्मिक, प्रामाणिक और कलात्मक ढंग से अपने इस उपन्यास में रखा है, वह सचमुच बहुत प्रभावशाली है।
—धर्मवीर भारती
‘अनित्य’ सचमुच अनित्य है। क्या कथा शिल्प है, भूत को वर्तमान में लाकर कैसे हमारा बनाया जाता है, यह मंत्र दिया है। ‘दुविधा’ से भी आगे ‘प्रतिशोध’ और सशक्त है। कथा में विचार कैसे किस रंग और अनुपात में आता है, यह अविस्मरणीय रहेगा।
—लक्ष्मी नारायण लाल
मृदुला का लेखन परम्परावादी नहीं है। जितना सशक्त लेखन मृदुला ने किया है, हिन्दी में वैसा लेखन कोई नहीं कर रहा। बहुत अद्भुत लेखन है, अपने ढंग का एकदम अकेला। ‘अनित्य’ के सभी पात्र मेरे परिचित होने पर भी अपरिचित लगते हैं। यूँ तो पूरा मध्यवर्गीय परिवेश है। मगर पात्र स्टीरियोटिपिकल नहीं हैं। वे ऐसे लिखती हैं, तटस्थ भाव से, कहीं जजमेंटल नहीं हैं, कोई निर्णय नहीं देतीं, नैतिकता का प्रश्न नहीं उठातीं। इतना काजुअल स्टाइल है कि वैसे लिखती हैं जैसे बोल रही हों।
—मनोहर श्याम जोशी
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