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राही मासूम रज़ा मूलतः कवि हैं और उनकी आन्तरिक अनुभूतियों को कविताओं में ही तीव्रतम अभिव्यक्ति मिली है। ‘मैं एक फेरीवाला’ की कविताओं में ज़िन्दगी की कटुताओं से जूझने की ज़िद है और उसी ज़िन्दगी को गरम-गरम पीने की प्यास भी! संग्रह में लगभग 18 वर्षों के लम्बे अन्तराल में लिखी गई कविताएँ संगृहीत हैं। ‘मैं एक फेरीवाला’ की कविताएँ ‘हिज्र’, ‘प्यास’ और ‘तनहाई’ की कविताएँ है। स्वयं कवि के शब्दों में, “मेरी शायरी की बुनियादी लय उदासी की है। यह उदासी हमारे युग की सबसे बड़ी और जीवित वास्तविकता है।” इन भावनाओं को विभिन्न कविताओं में प्रतिबिम्वित होते देखा जा सकता है। इतनी लम्बी अवधि की कविताओं का संग्रह होने की वजह से काव्यरूप और विषयवस्तु के स्तर पर इसमें बड़ा वैविध्य है। रूमानियत से भरपूर गीतों से लेकर एक सामान्य आदमी की लाचारी और आकांक्षा का चित्रण करनेवाली छोटी-छोटी कविताएँ भी इस संग्रह में मिलेंगी । यह संग्रह राही मासूम रज़ा के कवि-व्यक्तित्व का वैविध्य पाठकों के सामने प्रस्तुत करता है ।
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राही मासूम रज़ा मूलतः कवि हैं और उनकी आन्तरिक अनुभूतियों को कविताओं में ही तीव्रतम अभिव्यक्ति मिली है। ‘मैं एक फेरीवाला’ की कविताओं में ज़िन्दगी की कटुताओं से जूझने की ज़िद है और उसी ज़िन्दगी को गरम-गरम पीने की प्यास भी! संग्रह में लगभग 18 वर्षों के लम्बे अन्तराल में लिखी गई कविताएँ संगृहीत हैं। ‘मैं एक फेरीवाला’ की कविताएँ ‘हिज्र’, ‘प्यास’ और ‘तनहाई’ की कविताएँ है। स्वयं कवि के शब्दों में, “मेरी शायरी की बुनियादी लय उदासी की है। यह उदासी हमारे युग की सबसे बड़ी और जीवित वास्तविकता है।” इन भावनाओं को विभिन्न कविताओं में प्रतिबिम्वित होते देखा जा सकता है। इतनी लम्बी अवधि की कविताओं का संग्रह होने की वजह से काव्यरूप और विषयवस्तु के स्तर पर इसमें बड़ा वैविध्य है। रूमानियत से भरपूर गीतों से लेकर एक सामान्य आदमी की लाचारी और आकांक्षा का चित्रण करनेवाली छोटी-छोटी कविताएँ भी इस संग्रह में मिलेंगी ।
यह संग्रह राही मासूम रज़ा के कवि-व्यक्तित्व का वैविध्य पाठकों के सामने प्रस्तुत करता है ।
Book Details
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ISBN9789360861414
-
Pages112
-
Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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आज कोई भी संवेदनशील प्राणी युग, देश की विसंगतियों से अछूता नहीं रह सकता। प्रतिक्रिया प्रायः व्यंग्यात्मक होती हैं—निर्ममता और क्रूरता लिये हुए। सत्यमोहन की प्रतिक्रिया व्यंग्यात्मक होकर भी कोमल है, उनके व्यक्तित्व—चरित्र के अनुकूल। उनसे जब भी मिला हूँ उनके मृदु स्वभावी होने की छाप मेरे मन पर पड़ी है।
—डॉ. हरिवंश राय बच्चन
सब पार्थिव और अपार्थिव दीवारों के ख़िलाफ़ हैं। सत्यमोहन भी इस ‘मुक्तिबोध’ के प्रति लापरवाह नहीं हैं। जीवन के प्रति यह स्वस्थ दृष्टिकोण है। वे ऐसा कुछ लिखते हैं, जो सबका जाना-समझा और अनुभूत होता है।
—पं. भवानी प्रसाद मिश्र
सत्यमोहन की प्रसन्न सकारात्मकता उनकी संक्रामक आत्मीयता का मूल है। दूब जैसे भीतर ही भीतर फैलती है वैसे ही उनकी रचनात्मकता विभिन्न विधाओं में फैलती है। वे जीवन के पात्र को कभी आधा ख़ाली नहीं देखते—आधा भरा हुआ देखते हैं। वे सफलता की तुलना में सार्थकता को श्रेयस्कर मानते हैं।
—प्रो. कांति कुमार जैन
सत्यमोहन से 'सर्जना-77' के दौरान पहचान हुई और 'गंगा' के प्रकाशन के समय प्रगाढ़ता बढ़ी। वे बेहद शालीन और प्रिय व्यक्तित्व के धनी हैं। उनकी रचनाएँ समय सापेक्ष हैं। छोटी-छोटी कविताओं में वे बड़ी बात कह जाते हैं। उनकी गजलें उद्वेलित करती हैं और उनका तरन्नुम बेहद प्रभावी है।
—कमलेश्वर
सत्यमोहन की साहित्य और रंगकर्म की गतिविधियों में उत्साही और सक्रिय सहभागिता रही है। उम्र के इस पड़ाव पर साहित्यिक जागरूकता और संलग्नता बनाए रखना प्रशंसनीय उपलब्धि है। उम्मीद है कि उनकी कल्पनाशील और आस्थावान रुचियाँ अभी भी जीवन्त रहेंगी।
—प्रो. मनोहर वर्मा
सत्यमोहन जी के लेखन में साफ़-सुथरी भाषा और सम्प्रेषण क्षमता है। उनकी रचनात्मकता की उड़ान काफ़ी ऊँची है। वे इस पड़ाव पर भी सक्रिय हैं यह क्या कम है, उनके जीवन की अपेक्षाएँ पूरी हों यही हमारी कामना है।
—डॉ. रमाकान्त श्रीवास्तव
Shabri
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Shri Naresh Mehta
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- Description: ‘शबरी’ में कवि आधुनिकता के अधिक पास होते हैं। उन्होंने लिखा है—‘वाल्मीकि ने सामाजिक वर्ण-व्यवस्था से ऊपर व्यक्ति के आध्यात्मिक स्वत्व एवं असंग कर्म को प्रतिष्ठापित किया और शबरी वही बीज चरित्र है। चरित्र की दृष्टि से शबरी मंत्र चरित्र लगती है'—अपनी छोटी-सी उपस्थिति में सार-भूत। ‘शबरी’ काव्य विचारों की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। एक दलित स्त्री को अपने कर्म-श्रम के ज़रिए ऊपर उठाकर ऋषि मतंग जिस भूमि पर प्रतिष्ठित करते हैं, उससे पौराणिकता की रक्षा भी होती है और वर्ण-व्यवस्था के विरुद्ध उठती आज की आवाज़ को भी बल मिलता है।
Yadi Pyar Karo
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Taslima Nasrin
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- Description: प्रेम। अकुंठ प्रेम। निर्बंध प्रेम। देह और आत्मा को आप्लावित करता प्रेम। शरीर के सर्वांग को कँपाता आग-सा जलता, बर्फ़-सा शीतल प्रेम। प्रेम जिसके चिह्न देर तक साथ रहते हैं, देह पर भी, मन पर भी, रूह के भीतर गहरे अँधेरे में भी। यादों में चहकता, उम्मीद और इन्तज़ार में छटपटाता प्रेम! प्रेम की इन कविताओं को तसलीमा नसरीन के अलावा भला कौन लिख सकता था। प्रेम के समूचे अनुभव को शब्द देने के लिए एक साहसी क़लम की ज़रूरत हर दौर में पड़ेगी, उनके पास वह क़लम है, वह साहस भी। उनके भीतर की प्रेमाकांक्षी स्त्री कहती है—‘यदि प्यार करो’ तो उसे कहो, और इस तरह कहो कि ‘चिड़ियाँ कहें, पेड़ के पत्ते, फूल बोलें, आकाश बोले, मेघ-वर्षा बोलें, धूप बोले, चन्द्रमा की रोशनी बोले, पड़ोसी बोलें, तालाब का घाट बोले, कि तुम मुझे प्यार करते हो।’ ‘यदि प्यार करो’ में संकलित तसलीमा नसरीन की इन कविताओं में वह सब कुछ है जिसका आविष्कार प्रेम ने अब तक किया है—बेशर्त समर्पण भी, अधिकार भी, ईर्ष्या भी, और हाँ, अपने होने का गहरा बोध भी, अपने अस्तित्व को अपनी हद में सम्पूर्ण बनाए रखने की ज़िद भी, क्योंकि अगर मैं ही नहीं हूँगी तो प्यार कौन करेगी, और तुम किससे प्यार करोगे? तसलीमा का प्यार न समाज के सामने शर्मिन्दा है, न उम्र के सामने अवश, न मानक-स्वीकृत रिश्तों की चहारदीवारी तक सीमित। यह सम्पूर्ण प्रेम है, जैसा उसे होना चाहिए।
Patte Chinaron Ke
- Author Name:
Dr. Vinod Prakash Gupta 'Shalabh'
- Book Type:

- Description: डॉ. विनोद प्रकाश गुप्ता ‘शलभ’ की ग़ज़लों के कथ्य के पीछे विचार होता है और क्राफ़्ट के पीछे है उनका गहरा अभ्यास जो लगातार और गहरा होता गया है। ‘पत्ते चिनारों के’ उनका तीसरा ग़ज़ल-संग्रह है और इसमें संकलित अधिकांश ग़ज़लों में अनेक छवियाँ उन बीते दिनों की हैं जब पूरी दुनिया पर कोरोना के रूप में एक भयावह संकट की छाया मँडरा रही थी। एक सजग नागरिक और संवेदनशील रचनाकार होने के नाते ‘शलभ’ जी उन हालात पर पैनी निगाह रखते हैं जो हमारे व्यक्तिगत जीवन से लेकर प्रकृति तक को प्रभावित करते हैं। वह चाहे धर्मभीरु अवाम की आस्थाओं का दोहन करने के लिए धर्म और राजनीति की दुरभिसन्धियाँ हों, लगातार बढ़ती सामाजिक-आर्थिक विषमता हो, लोकतांत्रिक मर्यादाओं का सत्ता द्वारा उल्लंघन और अवमूल्यन हो या आम आदमी के उपभोक्ताकारी संजाल में उलझकर व्यक्तित्वहीन हो जाने की दुर्घटना हो, उनकी ग़ज़लें हर इलाके में होकर आती हैं— हर किसी पर हो रहा है दोषारोपण देश अपना कटघरा क्यों हो गया है उनकी ग़ज़लों की ख़ास विशेषता उनकी ज़बान और सहजता है। सुनते ही याद हो जाने वाले उनके शेर अलग-अलग सन्दर्भों में, जीवन और अहसास के अलग-अलग मौकों पर बरबस याद आ जाने की सलाहियत रखते हैं। हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा को और-और समर्थ बनाती हुई उनकी ग़ज़लगोई प्रेम और प्रकृति को भी साथ लेकर चलती है, उम्मीद का दामन भी नहीं छोड़ती और वक़्त को घायल करने वाली ताक़तों को बख़्शती भी नहीं।
Bagh Upaakhyaan
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Gayatribala Panda
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बाघ को नहीं मालूम/इनसानों की दुनिया में/उसे लेकर कितनी घटनाएँ घटित होती हैं। कितनी कहानियाँ, कितनी किंवदंतियाँ/कितनी कल्पनाएँ...।
‘बाघ उपाख्यान’ शीर्षक के तहत ये पचपन कविताएँ सिर्फ़ बाघ की नहीं मनुष्यों के भीतर और उसके समाज में मौजूद बाघ-पन की कविताएँ हैं; उस हिंसा और अमानवीयता के अन्वेषण की कविताएँ जिनके सामने सचमुच के बाघ की प्राकृतिक भयावहता निरीह मालूम होने लगती है। उसे यह भी पता नहीं होता कि मनुष्य का समाज उसे कितने अच्छे ढंग से जान चुका है, और अपनी पूरी ताकत के बावजूद वह इतना कमज़ोर हो चला है कि अब मनुष्य ही उसके जीवन का संरक्षण चाहने लगा है। लुप्त होते उस जीव के लिए मनुष्य-समाज नारे लगा रहा है; योजनाएँ बना रहा है।
लेकिन उस बाघ का क्या, जो हमारे भीतर है जिसके पंजों के निशान हर जगह हैं, हर जगह जिसके ख़ौफ़ का अँधेरा पसरा हुआ है! वह बाघ जो हमारे पापों, दुष्कर्मों और छलों से बना है; हमारी महत्त्वाकांक्षाओं से, लालच से, लिप्सा और अबुझ वासना से, वह जो हमारे आसपास हर कहीं, हर समय उपस्थित है।
स्वयं रचनाकार के शब्दों में, ‘बाघ का बाघ-भाव और मनुष्य का बाघ-भाव—ये दोनों मुझे आलोड़ित, आन्दोलित...और आहत करते रहे लगातार।’ इसी मनस्थिति में उन्होंने बाघ को जानना शुरू किया जो उन्हें हर कहीं दिखा—मंचों पर, मंत्रणा-कक्षों में, सड़कों पर और घरों में। बाघ को पहचानने की इसी प्रक्रिया में ये कविताएँ जन्मीं हैं जो हमें अपने आसपास की दुनिया को एक नई और चकित निगाह से देखने को प्रेरित करती हैं।
Chidiya Laut Aai Hai
- Author Name:
Pratap Rao Kadam
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मुनिश्री क्षमासागर हमारे समय के एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कवि हैं, एक अद्वितीय कवि। यह तथ्य उनके प्रत्येक काव्य-संग्रह के साथ और पुष्ट और गहरा होता गया। मुनिश्री की कविताएँ जितना बाहर की यात्रा कराती हैं, उससे कहीं अधिक भीतर अपनी पड़ताल करती हैं। संवेदना के दायरे में आई हर वस्तु असाधारण काव्यात्मक गरिमा से भर उठती है। वस्तुओं की वस्तुमयता और जीवों के जैविक गुण और क्रियाकलापों की स्वाभाविकता बनाए रख, उसे अपनी दृष्टि से इतना ट्रांसपेरेंट और व्यापक बना देते हैं कि हमें हमारी गाँठें स्वत: दिखाई पड़ने लगती हैं—‘वाह रे हम/अपनी प्यास/अपने लालच/और अपने दीवानेपन पर/हमें अपने से/कुछ नहीं कहना।’
जीवन और जगत् के प्रति उनकी सजग, सतर्क, संवेदनशील दृष्टि समूचे काव्य-जगत से झाँकती है। जड़ता हमारे समाज को चारों तरफ़ से घेर रही है, ऐसे में मानवीय संवेदना को जीवित और सुरक्षित रखना कवि की प्राथमिकता है—‘सवाल यह नहीं है/कि किसे कम मिला/और किसके हिस्से में/ज़्यादा आया है/मेरी पीड़ा/अपने ही/बँट जाने की है।’
मुनि क्षमासागर जी की कविताओं को तीन भागों में बाँटा जा सकता है। एक वह, जिसके केन्द्र में प्रकृति है। दूसरा वह, जिसमें इहलोक झाँकता है और कर्म के लिए प्रेरित करता है। तीसरा वह, जिसमें अमूर्त व गूढ़ विषयों पर महत्त्वपूर्ण कविताएँ हैं। बहुत सारे अवरोध तो उसके अपने ही हाथों खड़े किए गए हैं। चिड़िया भीग जाती है, नदी भर जाती है, धरती गीली हो जाती है, पर वह न भीग पाता है, न भर पाता है, न गीला हो पाता है। बचने की जुगत में रीता ही रह जाता है। भीगना, भरना, गीला होना व्यापक सन्दर्भ खोलते हैं। प्रकृति से यह दूरी उसे अधूरा ही रखती है—‘पर बहुत मुश्किल है/इस तरह/आदमी का/भीगना और/भर जाना/आदमी के पास/बचने के/उपाय हैं न।’
इन कविताओं में आकाश शामिल होता है चिड़िया की उड़ान में। चिड़िया की, घर पहुँचने की दृढ़ता को असीम सखा भाव से सहलाता है। प्रकृति से बड़ा कोई कलाकार नहीं और न ही प्रकृति से बड़ा कोई शिक्षक, सखा। प्रकृति न कोई भेदभाव करती है, न जाति-बिरादरी के आधार पर बँटवारा। कठघरे, घेरे तो हमारे अपने बनाए हैं—‘आकाश सबका/ दीवारें हमारी अपनी/नदी सबकी/गागर हमारी अपनी/धरती सबकी/आँगन हमारा अपना/बिराट सबका/सीमाएँ हमारी अपनी।’
मुनि क्षमासागर जी की कविताओं से गुज़रकर चीज़ें वह नहीं रहतीं जो पूर्व में थीं। उन्हें देखने का नज़रिया अलहदा हो जाता है। इन कविताओं में ‘घर’ रह-रहकर आता है और घर एक समाधान, दिशा, दृष्टि की तरह आता है। वह दृष्टि, जो ‘मेरे घर’ को ‘अपना घर’ बनाती है—‘तुम मेरे घर/नहीं आती/अपने घर आती हो/पर अपने घर/आने के लिए/तुम्हारा मेरे घर आना/मुझे अच्छा लगता है/सचमुच/तुम्हारे घर ने/मेरे घर को/अपना घर बना दिया है।’ वहीं घर-1 व घर-2 कविताओं में घर भिन्न तरह से आता है, जहाँ ‘अपना घर’ कविता में सबके लिए गुंजाइश है। वह मेरे घर से अपना घर बनता है। पर यहाँ बड़ा घर होता है। अतीत, अनागत, वर्तमान के बावजूद। घर—1 कविता यही कहती है—‘चिड़ियों के लिए/और शायद/हम सभी के लिए/अतीत/अनागत/और वर्तमान का/इतना ही अर्थ है/कि हमें हर बार/रहने के लिए/एक घर बनाना है।’ एक छत की जद्दोजहद तो हमेशा रही है और सम्बन्धों के सगेपन को जीने की चाह भी और जहाँ यह हो, वहाँ तो घर होता ही है। ‘खिड़की’ कविता में व्याप्त घर इसी तरफ़ इशारा करता है।
ये कविताएँ कर्म के लिए उकसाती हैं। होश और जोश दोनों ही स्थितियों में कर्म की सीढ़ी बनाने की बात कहती हैं। इन कविताओं के केन्द्र में मनुष्य है। ये कविताएँ अपने-अपने ख़ुदाओं को बनानेवाले मनुष्य से मनुष्य बनने का आग्रह करती हैं—‘सवाल सिर्फ़/योग्यता का नहीं/हू-ब-हू होने का है/स्वयं को/भगवान मानने/मनवाने का नहीं स्वयं भगवान बन जाने का है/और फिर इस बार/ना सही भगवान/एक बेहतर/इनसान तो बन जाएँ।’
मुनि क्षमासागर जी की कविताएँ, प्रकृति को इतना पारदर्शी बना देती हैं कि उसमें भूत-वर्तमान-भविष्य, सत्ता, नश्वरता, व्यवस्था और जनजीवन के जटिल सम्बन्धों की पहचान आसानी से हो जाती है। ये कविताएँ प्रकृति को इतना अर्थगर्भित और व्यापक बना देती हैं कि इसमें हमारे समय और समाज की आहट अनन्त सम्भावनाएँ उत्पन्न करती हैं। इन कविताओं से गुज़रना प्रकृति, कर्म और घर के नज़दीक होना है। चिड़िया की तरह अपने आकाश, पेड़, नदी, परिवेश को जीना है। कुल मिलाकर अपने नज़दीक आना है, चिड़िया की तरह लौट आना है।
—प्रताप राव कदम
Hanso Hanso Jaldi Hanso
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रघुवीर सहाय विडम्बना के खोजी कवि हैं। समाज और उसके ऊपर-नीचे खड़ी-पड़ी तमाम संरचनाओं, यथा राजनीति, शासन-प्रशासन और ताक़त से बने या ताक़त से बिगड़े अनेक मूर्त-अमूर्त फ़ॉर्म्स को वे एक नई और असंलग्न निगाह से देखते हैं। इस बहुपठित-बहुचर्चित संग्रह की अनेक कविताएँ, जिनमें अत्यन्त प्रसिद्ध कविता, 'रामदास' भी है उनकी उसी असंलग्नता के कारण इतनी भीषण बन पड़ी है। वह असंलग्नता जो अपने समाज से बहुत गहरे, बेशर्त जुड़ाव के बाद किसी शुभाकांक्षी मन का हिस्सा बनती है।
वे इस समाज और उसको चला रही व्यवस्था को बदलने की इतनी गहरी आकांक्षा से बिंधे थे कि कविता भी उन्हें कवि न बनाकर एक चिन्तित सामाजिक के रूप में प्रक्षेपित करती थी। इसीलिए उनकी हर कविता अपनी पूर्ववर्ती कविता के विस्तार की तरह नहीं, एक नई शाखा की तरह प्रकट होती थी। यह संग्रह अपने संयोजन में स्वयं इसका साक्षी है कि हर कविता न तो शिल्प में, और न ही भाषा में अपनी किसी परम्परा का निर्माण करने की चिन्ता करती दिखती और न किसी और काव्य-परम्परा का निर्वाह करती। हर बार उनका कवि समाज नामक दु:ख के इस विस्तृत पठार में एक नई जगह से उठता दिखाई देता है और पीड़ा के एक नए रंग, नए आकार का ध्वज लेकर।
ये कविताएँ बार-बार पढ़ी गई हैं और बार-बार पढ़े जाने की माँग करती हैं। आज भी, क्योंकि, हमारे समूह-मन की जिन दरारों की ओर इन कविताओं ने संकेत किया था, आज वे और गहरी हो गई हैं।
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- Description: "रहीम अर्थात् अब्दुर्रहीम खानखाना को अधिकतर लोग कवि के रूप में जानते है; लेकिन कविता ने उनका दूसरा पक्ष आवृत कर लिया हो, ऐसा नहीं है। रहीम का व्यक्तित्व बहुआयामी था। एक ओर वे वीर योद्धा, सेनापति, चतुर राजनीतिज्ञ और कूटनीतिज्ञ थे तो दूसरी ओर कवि-हृदय, कविता-मर्मज्ञ, उदार चित्त, उत्कट दानी, मानवीयता आदि गुणों से ओत-प्रोत थे। रहीम का जीवन तीव्र घटनाक्रमों से भरा रहा। चार वर्ष की उम्र में पिता असमय बिछड़ गए। तीन पुत्र युवावस्था में ही एक-एक कर गुजर गए। एक धर्मपुत्र फहीम युद्ध में मारा गया। इसके बाद उपाधि और जागीरदारी छिन गई। इस प्रकार 7 2 वर्ष का उनका जीवन बारंबार कसौटी पर कसा गया; और इस रस्साकाशी ने उन्हें इस कदर तोड़कर रख दिया कि अंत समय में पुनः मिली उपाधि और सत्ता का भी वे उपभोगी नहीं कर सके। इस पुस्तक में उसी युग-पुरुष के जीवन-वृत्त और काव्य-संसार पर प्रकाश डाला गया है। यह पाठकोपयोगी सामग्री अब्दुर्रहीम खानखाना उर्फ रहीम के रचनाकर्म और व्यक्तित्व से परिचित कराएगी। "
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अब मेरी बारी की कविताएँ नए समय की उस नई स्त्री को सम्मुख लाती हैं जो प्रेम तो करना जानती है, लेकिन अपनी वैयक्तिक इयत्ता की क़ीमत पर नहीं। वह प्रेम में डूब जाना चाहती है, लेकिन इस आश्वस्ति के साथ कि प्रेम का दूसरा भागीदार भी उतना ही गहरे उतरे—दूसरे के साथ/न होना/ नहीं होता वफ़ादार होना/वफ़ादार होना होता है/
किसी के साथ/पूरी तरह होना!
प्रेम, पाठ, पहचान और परिवेश—इन श्रेणियों में विभक्त इस संग्रह की कविताएँ जीवन और समाज के अन्य हलक़ों को भी इतनी ही आत्म सजगता के साथ देखती हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि ये कविताएँ अपनी भाषा भी अलग ढंग से गढ़ती हैं। निहायत और ग़ैर-पारम्परिक बिम्बों और प्रतीकों का उपयोग करती हुई ये कविताएँ अपनी एक नई भाषा ईजाद करती हैं जिसके ऊपर काव्यास्वाद की स्वीकृत
पम्परा का भार लगभग नहीं है।
पुरुषों के घेरों के बीच अपने पूरे आप को लेकर खड़ी हुई औरतों की तरफ़ से कहा गया है—हम अट्टहास करें, भयावह दिखें, ऑक्टोपस बनें/शरीर से छोड़ें स्याही की पिचकारियाँ/उन पर साधे/जो संग होली खेलने को व्याकुल थे।
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