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Author:
Rahi Masoom Raza, M. Firoz Khan, Shagufta NiyazPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Contemporary-fiction₹
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‘क़यामत’ राही मासूम रज़ा का बेहद दिलचस्प उपन्यास है। राही मासूम रज़ा के कथा साहित्य का विश्लेषण करते समय प्रायः उनकी एक-आध कृति को छोड़कर बाक़ी की चर्चा न के बराबर की जाती है। एक कारण तो यह कि वे उपन्यास हिन्दी में उपलब्ध नहीं हैं अर्थात् वे मूल रूप से उर्दू में लिखे गए हैं। दूसरा यह कि कई बार विभिन्न वजहों से कुछ रचनाओं को ‘पॉपुलर’ के खाते में डाल दिया जाता है। गोया पॉपुलर होने और स्तरीय होने में कोई अनिवार्य अन्तर्विरोध हो! और तो और, कई बार पठनीयता को भी श्रेष्ठता के विपक्ष में खड़ा कर दिया जाता है। कहना चाहिए कि ‘क़यामत’ राही मासूम रज़ा का पठनीय और लोकप्रिय होने के साथ स्तरीय उपन्यास है। भाषा में वही शक्ति है जो राही की पहचान है। उदाहरण के लिए— “जो हिन्दुस्तान से पाकिस्तान चले गए हैं या पाकिस्तान से हिन्दुस्तान आ गए हैं, घर की याद तो उन्हें भी आती होगी। और रात को घर के ख़्वाब आते होंगे। और वो ख़्वाब ही में उदास हो जाते होंगे। और शायद रो भी देते हों।...” डॉ. एम. फ़ीरोज़ ख़ान और डॉ. शगुफ़्ता नियाज़ ने हिन्दी में ‘क़यामत’ का प्रवाहपूर्ण अनुवाद किया है।
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About the Book
‘क़यामत’ राही मासूम रज़ा का बेहद दिलचस्प उपन्यास है। राही मासूम रज़ा के कथा साहित्य का विश्लेषण करते समय प्रायः उनकी एक-आध कृति को छोड़कर बाक़ी की चर्चा न के बराबर की जाती है। एक कारण तो यह कि वे उपन्यास हिन्दी में उपलब्ध नहीं हैं अर्थात् वे मूल रूप से उर्दू में लिखे गए हैं। दूसरा यह कि कई बार विभिन्न वजहों से कुछ रचनाओं को ‘पॉपुलर’ के खाते में डाल दिया जाता है। गोया पॉपुलर होने और स्तरीय होने में कोई अनिवार्य अन्तर्विरोध हो! और तो और, कई बार पठनीयता को भी श्रेष्ठता के विपक्ष में खड़ा कर दिया जाता है।
कहना चाहिए कि ‘क़यामत’ राही मासूम रज़ा का पठनीय और लोकप्रिय होने के साथ स्तरीय उपन्यास है। भाषा में वही शक्ति है जो राही की पहचान है। उदाहरण के लिए—
“जो हिन्दुस्तान से पाकिस्तान चले गए हैं या पाकिस्तान से हिन्दुस्तान आ गए हैं, घर की याद तो उन्हें भी आती होगी। और रात को घर के ख़्वाब आते होंगे। और वो ख़्वाब ही में उदास हो जाते होंगे। और शायद रो भी देते हों।...”
डॉ. एम. फ़ीरोज़ ख़ान और डॉ. शगुफ़्ता नियाज़ ने हिन्दी में ‘क़यामत’ का प्रवाहपूर्ण अनुवाद किया है।
Book Details
-
ISBN9788126724925
-
Pages104
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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लच्छू के हुए नौ लड़के। जैसे-जैसे बड़े हुए उनको निकल आए अक़्ल के सींग। लोगों के पास अक़्ल थी इनके पास सींग। और ये उन सींगों से जो-जो करते उसे देख लोगों को समझ न आता कि रोएँ या हँसे। एक से बढ़कर एक करतब मूर्खता का। और एक दिन वे दो-दो सूप बाँधकर पहाड़ पर चढ़े और उड़ने लगे कि स्वर्ग में बापू से मिल आएँ। गिरे सीधे पत्थरों में और मर गए। लेकिन क्या वे मरे? या हो सकता है उनका पुनर्जन्म हो गया हो। वे नहीं हैं तो ये पहाड़ों को कौन खोद रहा है? नदियों के पानी को कौन बाँध रहा है? सुरंगों में पानी कौन डाल रहा है? किसकी कारस्तानियों से पहाड़ की धरती खोखली होती जा रही है? किसकी वजह से पहाड़ के लोग अपने घर-गाँव-धरती को छोड़कर मैदानों में भाग रहे हैं? ये कारनामे उनके ही हो सकते हैं जिनके सिर में अक़्ल नहीं, अक़्ल के सींग हैं। यह उपन्यास पहाड़ों से लगातार हो रहे पलायन के बारे में है। जो विकास वहाँ पहुँचा है उसने वहाँ के लोगों को रोज़गार नहीं दिया, उन्हें विस्थापित किया जिसके चलते नई पीढ़ी रोजी-रोटी कमाने के लिए मैदानों की तरफ़ निकल जाती है, शहरों में ही बस भी जाती है, कुछ लोग विदेशों तक पहुँच जाते हैं। पीछे रह जाते हैं वृद्ध जन और सूने गाँव-घर। उपन्यास बताता है कि मनुष्य भागा तो जंगल धीरे-धीरे वापस आ गया। ‘विकास वाले’ घर-घर नल भी लगा गए, शौचालय भी बना गए। सड़क भी ला रहे हैं लेकिन अब न कोई घास काटने वाला है, न पानी भरने वाला और सड़क, उस पर भी आने-जाने वाले कहाँ हैं? आनन्द सिंह अपने कुत्ते शेरू से बाते करते हैं और धीरे-धीरे विकास और विनाश की एक-दूसरे पर चढ़ी परतें खुलती हैं। और एक दिन जब गए हुए वापस लौटते हैं तो उन्हें जो दिखाई देता है उसे देखकर बरबस कह उठते हैं—‘घोस्ट विलेज—भूत गाँव’। आधुनिकता के अतिरेकी आकर्षण, विकास के लिए अपनाई गई असंगत नीतियों और नागर सभ्यता से दूर बसे जन-गण की सांस्कृतिक और भावनात्मक जड़ों के प्रति सत्ता की निर्मम लापरवाही के चलते उजड़ते पहाड़ों की पीड़ा की कथा है—‘भूतगाँव’ जिसे लेखक ने स्थानीय बोल-चाल की उच्छल धारा जैसी भाषा में लिखा भी है जो अपने पाठक को फ़ौरन ही बाँध लेती है।
Musafir Hoon Yaro
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Partha Sarthi Sen Sharma
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इस पुस्तक के लेखक सरकार के लिए कार्य करनेवाले एक सैंतीस वर्षीय भारतीय हैं। भारत सरकार ने अपने मध्य क्रम के अधिकारियों के शिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत एम.बी.ए कोर्स हेतु उन्हें चुना और प्रायोजित किया था। इस कोर्स के लिए उन्हें एक अल्पज्ञात यूरोपीय देश स्लोवेनिया की राजधानी ल्युब्ल्याना भेजा गया। बीते हजारों वर्षों से यूरोपीय यात्री भारत की यात्रा करते और अपनी इन यात्राओं के बारे में लिखते रहे हैं। मेगस्थनीज से लेकर मार्को पोलो और निकोलो कॉण्टी से मार्क टली तक बहुत से श्वेत यूरोपियनों ने भारत की यात्रा कर अपने देशवासियों व भावी पीढ़ी के लाभ हेतु अपने अनुभवों को दर्ज किया है। इस अनुपात में, यूरोप की यात्रा करनेवाले भारतीयों की संख्या बहुत कम है और उनमें से भी अपने अनुभवों, दृष्टिकोणों व प्रतिक्रियाओं को दर्ज करनेवालों की संख्या तो और भी कम रही है। लेकिन पिछली शताब्दी में भारत इतना बदल गया है, जितना इतिहास में किसी भी शताब्दी में नहीं बदला था। आज इतिहास में पहली बार यूरोप से आनेवालों के मुकाबले यूरोप जानेवाले भारतीयों की संख्या अधिक हो गई है। इसके बावजूद कुछ अज्ञात कारणों से अपनी यूरोप यात्रा के अनुभवों को दर्ज करनेवाले भारतीयों की संख्या नगण्य ही है। यह पुस्तक इसी असंतुलन को साधने का एक विनीत प्रयास है, जो वहाँ की कला-संस्कृति-समाज का सांगोपांग दर्शन कराती है।
Suraj Mere Saath Mein
- Author Name:
Smt. Kamna Singh
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सूरज मेरे साथ में’ चार उपन्यासों का संकलन है। बाल एवं किशोर मन की दैनंदिन समस्याओं से जुड़े ये चारों उपन्यास सचमुच सूरज की ऐसी उजली किरण हैं, जो बच्चों के पथ को प्रकाशित करने में समर्थ हैं। ‘परीक्षा के बाद’ गौरव का स्कूली परीक्षा के साथ-साथ जीवन के इम्तिहान में भी ऊँचे अंक लेकर सफलता पाने का किस्सा है। बच्चों के लिए पल-पल जिन रोचक-रोमांचक घटनाओं की पिटारी खुलती है, वे उन्हें चमत्कृत किए बिना नहीं रहतीं। ‘खट्टी-मीठी गोलियाँ’ में बाल-मजदूरी उन्मूलन की बात कही गई है। ‘मुझे तो पढ़ना है’ में शिक्षा के बाल अधिकार को एक निर्धन तदपि पढ़ने की ललक रखनेवाले बालक के माध्यम से दरशाया गया है। ‘सूरज मेरे साथ में’ भी कथानायक रोशन के हौसलों की उड़ान है, जो उसे सफलता दिलाती है। कुल मिलाकर चारों उपन्यास बच्चों को सद्गुणों से तो जोड़ते ही हैं, जीवन के प्रति समझ भी जगाते हैं। कदाचित् यही आज के समय की माँग भी है।
Paapoo
- Author Name:
Rita Indiana +1
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आठ साल की एक लड़की सांतो दोमिंगो में अपने पिता–पापू–का इन्तज़ार करती है। यह इन्तज़ार उसे एक लम्बी और दर्दनाक मौत जैसा लगता है लेकिन वह राह देखती है कि पापू अमेरिका से आएँगे और अपनी दौलत और शोहरत की शानदार उपलब्धियों—चमचमाती नई कारों, पोलो शर्टों, सोने की चेन और सुन्दर जूतों से उसे अभिभूत कर देंगे। जब पापू आते हैं तो वह उसे फ़िल्म ‘फ़्राइडे द थर्टींथ’ के जेसन जैसे मालूम पड़ते हैं—स्मार्ट, चतुर और निर्मम। वे एक डोमिनिकन माफ़िया बॉस हैं, एक ड्रग डीलर, एक ऐसा शख़्स जो अविश्वसनीय रूप से ख़तरनाक है, लेकिन इससे उसकी बेटी ख़ुद को बेहद ताक़तवर और जीवन्त महसूस करती है। लड़की के जीवन में पापू आते हैं, ग़ायब हो जाते हैं और फिर एक बार और प्रकट होते हैं पैसे, गाड़ियों और मार-तमाम तोहफ़ों से लदे हुए, प्रेमिकाओं से घिरे हुए। सांतो दोमिंगो और अपने पिता के साथ की गई अमेरिका की जगर-मगर यात्राओं के बीच विभाजित, एक लड़की की बचपन की यादों को समेटे यह उपन्यास एक बेटी के प्यार के अलावा अपराध और मर्दानगी के आकर्षण और बड़ों की दुनिया की हिंसा का कभी न भूलने वाला चित्र पेश करता है। एक बच्ची की कल्पना के साथ व्यंग्य और विज्ञान-कथा के साथ ख़ौफ़ का कुशल मिश्रण, कैरेबियाई संस्कृति की पृष्ठभूमि में बुनी गई इस कहानी को अत्यन्त प्रभावी बना देता है।
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