Mallika Samagra
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बहुमुखी प्रतिभा की धनी एवं स्वतंत्रचेता मल्लिका आधुनिक हिन्दी साहित्य के आरम्भिक दिनों की एक महत्त्वपूर्ण, लेकिन उपेक्षित शख़्सियत हैं। अकसर उनका उल्लेख भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की प्रेयसी (धर्मग्रहीता) और उनकी बौद्धिक सहायक के रूप में किया जाता है जबकि एक रचनाकार के रूप में उनकी स्वतंत्र पहचान को स्वीकार किया जाना और उनके योगदान का यथोचित मूल्यांकन अब भी शेष है। उन्होंने कई उपन्यास लिखे। गीतों और लेखों की रचना की। पत्रिकाओं के सम्पादन-प्रकाशन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई—बालाबोधिनी में उनकी भूमिका तो थी ही, रहस्य चन्द्रिका पत्रिका का भी उन्होंने स्वतंत्र रूप से प्रकाशन किया। यही नहीं, उन्होंने मल्लिका चन्द्र एंड कम्पनी चलाने की ज़िम्मेदारी का भी निर्वाह किया। सम्भवतः उन्नीसवीं सदी में लेखन करनेवाली हिन्दी-क्षेत्र की वह अकेली स्त्री हैं जो लेखन के साथ-साथ प्रकाशन-सम्पादन में सक्रिय दिखाई देती हैं। बांग्ला और हिन्दी के बीच अपने लेखन से एक सेतु बनाने का उनका प्रयास भी उल्लेखनीय है। इस परिप्रेक्ष्य में मल्लिका के योगदान का सम्यक् मूल्यांकन हिन्दी-क्षेत्र के पुरुष-केन्द्रित साहित्यिक-सांस्कृतिक इतिहास को दुरुस्त करने के लिए ज़रूरी है। वास्तव में मल्लिका के बिना न तो उन्नीसवीं सदी के कथित ‘हिन्दी नवजागरण’ की कहानी पूरी हो सकती है, न ही उस नवजागरण के प्रवर्तक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की। उम्मीद है, मल्लिका की समस्त उपलब्ध रचनाओं का यह प्रामाणिक संकलन इस ज़रूरत को पूरा करेगा।
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बहुमुखी प्रतिभा की धनी एवं स्वतंत्रचेता मल्लिका आधुनिक हिन्दी साहित्य के आरम्भिक दिनों की एक महत्त्वपूर्ण, लेकिन उपेक्षित शख़्सियत हैं। अकसर उनका उल्लेख भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की प्रेयसी (धर्मग्रहीता) और उनकी बौद्धिक सहायक के रूप में किया जाता है जबकि एक रचनाकार के रूप में उनकी स्वतंत्र पहचान को स्वीकार किया जाना और उनके योगदान का यथोचित मूल्यांकन अब भी शेष है।
उन्होंने कई उपन्यास लिखे। गीतों और लेखों की रचना की। पत्रिकाओं के सम्पादन-प्रकाशन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई—बालाबोधिनी में उनकी भूमिका तो थी ही, रहस्य चन्द्रिका पत्रिका का भी उन्होंने स्वतंत्र रूप से प्रकाशन किया। यही नहीं, उन्होंने मल्लिका चन्द्र एंड कम्पनी चलाने की ज़िम्मेदारी का भी निर्वाह किया। सम्भवतः उन्नीसवीं सदी में लेखन करनेवाली हिन्दी-क्षेत्र की वह अकेली स्त्री हैं जो लेखन के साथ-साथ प्रकाशन-सम्पादन में सक्रिय दिखाई देती हैं। बांग्ला और हिन्दी के बीच अपने लेखन से एक सेतु बनाने का उनका प्रयास भी उल्लेखनीय है। इस परिप्रेक्ष्य में मल्लिका के योगदान का सम्यक् मूल्यांकन हिन्दी-क्षेत्र के पुरुष-केन्द्रित साहित्यिक-सांस्कृतिक इतिहास को दुरुस्त करने के लिए ज़रूरी है। वास्तव में मल्लिका के बिना न तो उन्नीसवीं सदी के कथित ‘हिन्दी नवजागरण’ की कहानी पूरी हो सकती है, न ही उस नवजागरण के प्रवर्तक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की।
उम्मीद है, मल्लिका की समस्त उपलब्ध रचनाओं का यह प्रामाणिक संकलन इस ज़रूरत को पूरा करेगा।
Book Details
-
ISBN9789390971343
-
Pages264
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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