Hindi Ki Jatiya Sanskriti Aur Aupniveshikta
Author:
RajkumarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 559.2
₹
699
Available
हिन्दी की जातीय संस्कृति और औपनिवेशिकता एक ऐसा विषय है जिस पर लगातार कई दृष्टियों से विचार करने की ज़रूरत है, क्योंकि ऐसे वैचारिक अनुसन्धान से ही हम उन कई प्रश्नों के उत्तर पा सकते हैं जो हमें बेचैन किए रहते हैं। हिन्दी में बार-बार व्याप रही विस्मृति, जातीय स्मृति की अनुपस्थिति आदि ऐसे कई पक्ष हैं जो आलोचना के ध्यान में बराबर रहने चाहिए। डॉ. राजकुमार की यह नई पुस्तक ऐसे आलोचनात्मक उद्यम की ही उपज है और हम उसे सहर्ष प्रकाशित कर रहे हैं।
ISBN: 9788126730841
Pages: 218
Avg Reading Time: 7 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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विश्व के समुद्रतटीय देशों और द्वीपों में विदेशी सत्ताधारियों के द्वारा गिरमिटिया मज़दूरों के रूप में ले जाए गए भारतीय पुरखों ने जीविका और जीवन का संघर्ष करते हुए भारतीयता और भारत की संस्कृति बनाए रखी। इसी के ज़रिए उन्होंने विदेश में स्वदेश रचाए रखा। भारतवंशियों के घरों के आँगन और अहातों में गड़ी हुई झंडियाँ, मन्दिरों में फहराती हुई पताकाएँ और अन्य जाति, धर्म के समुदायों के साथ आनन्ददायी मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध सूरीनामी आप्रवासी भारतवंशियों की आत्मीयता की गाथा का गान करते हैं। संस्कृति भाषा से जन्म लेती है और भाषा संस्कृति से अपनी पहचान बनाती है। विश्व के आप्रवासी भारतवंशियों की मातृभाषा आज भी किसी-न-किसी रूप में हिन्दी है, जिनके रक्त में संस्कृति की शक्ति है, वे अपनी भावी पीढ़ियों को येन-केन-प्रकारेण हिन्दी सिखाना चाहते हैं।
विश्व के दक्षिणी-पश्चिमी गोलार्द्ध के कैरेबियाई देशों के भारतवंशियों की बोली-बानी सरनामी हिन्दी है जिसे सूरीनाम गयानी देशों के आप्रवासी भारतीयों ने तुलसी, कबीर और लोकगीतों के साहित्य के सहारे हिन्दुस्तानी अवधी हिन्दी के आधार पर रचा।
विदेशों में हिन्दी की बोलियों के रूप में पुरखों की स्मृतियाँ बची और बसी हुई हैं। सूरीनाम में बसे पुरखों की हिन्दीतर पीढ़ियों ने सरनामी हिन्दी द्वारा हिन्दी भाषा को बचाए रखने का संघर्ष किया। गत पच्चीस वर्षों में सूरीनाम हिन्दी परिषद की अहम भूमिका है जिसने नीदरलैंड में बस रहे सूरीनामी भारतवंशियों के भीतर भी हिन्दी भाषा और हिन्दुस्तानी संस्कृति के संस्कार बसाए। भाषा के ऐसे ऐतिहासिक कार्यकर्ताओं का इतिहास प्रस्तुत है, क्योंकि इतिहास बनानेवाले इतिहास नहीं लिखा करते हैं।
Hindi Dalit Sahitya : Samvedana Aur Vimarsh
- Author Name:
P.N. Singh
- Book Type:

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Description:
दलित रचनाकार और विमर्शकार चाहे जितना भी शहादती तेवर अपनाएँ, अपने पूर्व के कम्युनिस्टों की तुलना में इन्होंने सुरक्षित विकेट पर ही खेला है। अपराध-बोध से पीड़ित पारम्परिक चेतना सुरक्षात्मक रही है अथवा चुप। प्रगतिशील चेतना ने भी विरोध न कर दलित साहित्य संवेदना के कतिपय अतिरेकों के विरुद्ध मात्र सावधान किया है। इसकी आलोचना मित्रवत् रही है।
प्रथम आधुनिक दलित होने का गौरव पटना के दलित कवि ‘हीरा डोम’ को दिया जा सकता है जिनकी एक कविता ‘अछूत की शिकायत’, सरस्वती में 1914 में प्रकाशित हुई थी। इसमें दलित पीड़ा का मार्मिक अंकन है। 1914 में अपने जाति-नाम ‘डोम’ का उल्लेख उनके दलितवादी स्वर का भी परिचायक है।
...कुल मिलाकर, इसके राजनीतिक क्षितिज पर जो घटित हुआ है, लगभग वही इसके साहित्यिक फलक पर भी। अब दलित बुद्धिधर्मी पारम्परिक जातिबद्ध सोच से मुक्त किसी रैडिकल सामाजिक विवेक एवं नैतिकता के अग्रधावक नहीं लगते। इसी कारण ये अपने नव-अगड़ों की शिनाख़्त से बचते हैं। आरम्भिक सर्जनात्मक विस्फोट के बाद दलित कविता ने अपने लिए कोई नया पथ अन्वेषित करने की चिन्ता नहीं दिखाई।
Samkalin Hindi Kavita
- Author Name:
Vishwanath Prasad Tiwari
- Book Type:

- Description: प्रस्तुत पुस्तक में समकालीन हिन्दी कविता के उन्नीस महत्त्वपूर्ण और अतिविशिष्ट कवियों के काव्य का विश्लेषण-मूल्यांकन हुआ है। कहना न होगा कि ये कवि परस्पर भिन्न रुचियों के हैं; तथा इनकी काव्य-संवेदनाएँ और काव्य-चिन्ताएँ एक दूसरे से अलग हैं। समकालीन हिन्दी कविता के प्रवृत्तिगत अध्ययन से उसकी एक विकास परम्परा का तो पता चलता है पर अधिकांशत: शीर्षकों-उपशीर्षकों के अन्तर्गत कवियों का वर्ग निर्धारण मात्र होकर रह जाता है। जबकि अलग-अलग कवियों की कविताओं के अध्ययन में उन कवियों के अपने संस्कारों, उनकी भिन्न जीवन दृष्टियों, उनकी काव्य विषयक धारणाओं तथा समकालीन वास्तविकता के विविध पहलुओं की जानकारी होती है। कविता का अध्ययन एक जटिल व्यापार है। साहित्य की अन्य विधाओं में सबसे जटिल नई कविता का अध्ययन तो और भी कठिन है। आज की पत्र-पत्रिकाओं में लिखी जा रही आलोचना रचना केन्द्रित नहीं लगती। व्यक्तिगत-दलगत गुटबन्दियों में फँसकर यह उखाड़-पछाड़ और तीव्र होता जा रहा है। प्रस्तुत पुस्तक की दृष्टि सन्तुलित और वस्तुपरक है। आलोचक ने कवियों के शब्द प्रयोगों का बारीक़ी से विश्लेषण करते हुए उनकी काव्य-चिन्ताओं का उद्घाटन किया है। हिन्दी के प्रसिद्ध कवि और नए साहित्य के सहृदय समीक्षक डॉ. विश्वनाथप्रसाद तिवारी ने इस पुस्तक में सहअनुभूति के साथ कवियों की कविताओं के समानान्तर यात्रा करते हुए आधुनिक हिन्दी कविता के निकट अध्ययन (क्लोज रीडिंग) की कोशिश की है। यह पुस्तक निश्चय ही कविता के अध्येताओं के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगी।
Aadhunikata Aur Hindi Aalochana
- Author Name:
Indranath Madan
- Book Type:

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Description:
बीसवीं सदी में आलोचना की अनेक धारणाओं का विकास हुआ है जिनमें भाषागत और शैलीगत आलोचना, अस्तित्ववादी आलोचना, मिथकीय आलोचना को गिना जाता है। इनके मूल में आधुनिकता की चुनौती है और इनमें आपसी विरोध भी है। हर धारणा की अपनी-अपनी उपलब्धियाँ और सीमाएँ भी हैं जिनका विश्लेषण और विवेचन अनेक दृष्टियों से किया गया है।
आलोचना की इन धारणाओं और दृष्टियों का अपना-अपना इतिहास और विकास है जिनकी राह से गुज़रकर एक बात रोशन होने लगती है कि इनका विकास कविता को लेकर अधिक हुआ है, उपन्यास, कहानी और नाटक को लेकर कम। यह शायद इसलिए कि कविता में आधुनिकता की चुनौती का अधिक सामना किया गया है और इसकी आलोचना की परम्परा भी अधिक लम्बी है। नाटक की आलोचना की परम्परा भी काफ़ी पुरानी है। उपन्यास और कहानी की विधा हाल की है और हाल में उपन्यास और कहानी की आलोचना के अन्दाज़ और मिज़ाज भी बदले हैं।
आधुनिकता के बोध ने अरस्तू आदि के सिद्धान्तों पर नई रोशनी भी डाली है; लेकिन भारतीय काव्यशास्त्र पर रोमांटिक बोध की छाप तो लग चुकी है, आधुनिकता की दृष्टि से इसका फिर से आँका जाना अभी शेष है। इस तरह आलोचना फिर से अपने अस्तित्व को क़ायम रखने के लिए, अपनी अस्मिता को जानने-पहचानने के लिए अनेक दिशाओं में भटकने की गवाही दे रही है।
इस पुस्तक में समकालीन आलोचना में आधुनिकता की खोज, उसे समझने और रेखांकित करने के प्रयासों का जायज़ा लिया गया है। चार प्रमुख साहित्यिक विधाओं की आलोचना का ऐतिहासिक और वैचारिक विश्लेषण करते हुए यह जानने की कोशिश की गई है, कि हिन्दी की आलोचना आधुनिकता को किस रूप में और किस हद तक पहचान पा रही है।
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