(0)
Author:
Doodhnath Singh, Bhuvaneshwar, BhuvneshwarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
1295
1036 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
भुवनेश्वर प्रेमचन्द की खोज हैं। इसके दो प्रमाण हैं—(1) उनकी अब तक प्राप्त 12 कहानियों में से 9 और अब तक प्राप्त 17 नाटकों में से 9 प्रेमचन्द द्वारा संस्थापित ‘हंस’ पत्रिका में ही प्रकाशित हुए। और (2) भुवनेश्वर की पहली और एकमात्र प्रकाशित किताब ‘कारवाँ’ की पहली समीक्षा ख़ुद प्रेमचन्द ने लिखी। लेकिन भुवनेश्वर मात्र एक कहानीकार–एकांकीकार ही नहीं, एक उत्कृष्ट कवि, सूक्तिकार और मारक टिप्पणीकार भी हैं। अपने सम्पूर्ण लेखन में वे कहीं भी दबी ज़बान से नहीं बोलते। उनकी अंग्रेज़ी की 10 कविताओं में सत्यकथन की अघोर हिंसा का जो हाहाकार है वह हिन्दी कविता के तत्कालीन (छायावादी) वातावरण के बिलकुल विपरीत और अत्याधुनिक है। भुवनेश्वर ने ‘डाकमुंशी’ और ‘एक रात’ जैसी कहानियाँ लिखकर प्रेमचन्द के चरित्रवाद और घटनात्मक कथानकवाद का एक ‘तोड़’ प्रस्तुत किया। उनकी ‘भेड़िये’ कहानी आज की गलाकाट प्रतियोगिताओं की एक प्रतीकात्मक पूर्व–झाँकी है, जहाँ अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए दूसरों की बलि चढ़ाने में ज़रा भी हिचक नहीं। उनके प्रसिद्ध नाटक ‘ताँबे के कीड़े’ में संवादों के होते हुए भी संवादात्मकता का पूरी तरह लोप है। भुवनेश्वर के सम्पूर्ण लेखन में सन्नाटे का एक ‘अनहद’ है जो कहीं से भी आध्यात्मिक नहीं। भुवनेश्वर हिन्दी के एक ऐसे उपेक्षित और भुलाए गए लेखक हैं, जो अपनी पैदाइश के आज सौ वर्षों बाद अब ज़्यादा प्रासंगिक और आधुनिक नज़र आते हैं। भुवनेश्वर आने वाली पीढ़ियों के लेखक हैं।
Read moreDon’t Miss Out
Pick a membership and see exactly what it gets you
- 15 Free Deliveries
- 1 Free Book up to ₹500 MRP
- 0% off every book, every time
Subscribed already? Continue to your
benefits Login
You pay ₹1,499/Year
You will be auto-charged ₹1,499 every year. Cancel auto-charge anytime.
Benefits with Rachnaye Connoisseur
1 Free Physical Book up to ₹500 MRP
Personal Recommendations
15 Free Deliveries Per Year
Format:
Piracy Free
Express Delivery
Secure Payment
About the Book
भुवनेश्वर प्रेमचन्द की खोज हैं। इसके दो प्रमाण हैं—(1) उनकी अब तक प्राप्त 12 कहानियों में से 9 और अब तक प्राप्त 17 नाटकों में से 9 प्रेमचन्द द्वारा संस्थापित ‘हंस’ पत्रिका में ही प्रकाशित हुए। और (2) भुवनेश्वर की पहली और एकमात्र प्रकाशित किताब ‘कारवाँ’ की पहली समीक्षा ख़ुद प्रेमचन्द ने लिखी। लेकिन भुवनेश्वर मात्र एक कहानीकार–एकांकीकार ही नहीं, एक उत्कृष्ट कवि, सूक्तिकार और मारक टिप्पणीकार भी हैं। अपने सम्पूर्ण लेखन में वे कहीं भी दबी ज़बान से नहीं बोलते। उनकी अंग्रेज़ी की 10 कविताओं में सत्यकथन की अघोर हिंसा का जो हाहाकार है वह हिन्दी कविता के तत्कालीन (छायावादी) वातावरण के बिलकुल विपरीत और अत्याधुनिक है। भुवनेश्वर ने ‘डाकमुंशी’ और ‘एक रात’ जैसी कहानियाँ लिखकर प्रेमचन्द के चरित्रवाद और घटनात्मक कथानकवाद का एक ‘तोड़’ प्रस्तुत किया। उनकी ‘भेड़िये’ कहानी आज की गलाकाट प्रतियोगिताओं की एक प्रतीकात्मक पूर्व–झाँकी है, जहाँ अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए दूसरों की बलि चढ़ाने में ज़रा भी हिचक नहीं। उनके प्रसिद्ध नाटक ‘ताँबे के कीड़े’ में संवादों के होते हुए भी संवादात्मकता का पूरी तरह लोप है। भुवनेश्वर के सम्पूर्ण लेखन में सन्नाटे का एक ‘अनहद’ है जो कहीं से भी आध्यात्मिक नहीं। भुवनेश्वर हिन्दी के एक ऐसे उपेक्षित और भुलाए गए लेखक हैं, जो अपनी पैदाइश के आज सौ वर्षों बाद अब ज़्यादा प्रासंगिक और आधुनिक नज़र आते हैं। भुवनेश्वर आने वाली पीढ़ियों के लेखक हैं।
Book Details
-
ISBN9788126722556
-
Pages432
-
Avg Reading Time14 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Sachchidanand Sinha Rachnawali : Vol. 1-8
- Author Name:
Sachchidanand Sinha +1
- Book Type:

- Description:
मुद्रित शब्दों की मुख्यधारा के हिन्दी संसार को यह रचनावली ऐसा बहुत कुछ देनेवाली है जिससे हम अभी तक वंचित रहे आए हैं। यह राजनीति, अर्थशास्त्र, इतिहास, समाजशास्त्र के साथ-साथ दर्शन, कला, संस्कृति और धर्म आदि सभी विषयों पर मौलिक, वैकल्पिक और दिशादर्शक चिन्तन-लेखन करनेवाले भारतीय समाजशास्त्री सच्चिदानन्द सिन्हा के समग्र लेखन की प्रस्तुति है जिसका अधिकांश ऐसा है जो पाठकों के सामने पहली बार व्यवस्थित रूप में आ रहा है। व्यापक अध्ययन और उतने ही बड़े फलक पर उनकी राजनीतिक-सामाजिक सक्रियता ने सच्चिदा जी को विचार, विवेचना और अभिव्यक्ति की जो सामर्थ्य दी वह उनके लेखन को भी विशिष्ट बनाती है और उनके जीवन को भी। उनके विचार संघर्षशील जन से उनके सीधे जुड़ाव से परिपक्व हुए, उन्होंने जो लिखा वह अपने समाज, देश और जन-गण की परिस्थितियों में वास्तविक परिवर्तन को लक्ष्य करके लिखा। उनका लेखन न तो शोधवृत्तियों और वजीफों के परिणामस्वरूप हुआ, और न ही किसी अकादेमिक उपलब्धि के लिए, उसकी प्रेरणा इससे कहीं ज्यादा गहरी थी और पढ़नेवाले को वह उतनी ही गहराई में छूती भी है। उन्होंने अनेक विषयों पर लिखा, अनेक रूपों में लिखा, और अलग-अलग मकसद से लिखा। गहन अवधारणात्मक चिन्तन पुस्तकों में आया, समकालीन मुद्दों पर अखबारों-पत्रिकाओं में लिखा, कार्यकर्ता-शिविरों के लिए अलग ढंग से लिखा, और जरूरत महसूस हुई तो बच्चों के लिए गीत भी लिखे। इस रचनावली में यह सब समेटने का प्रयास किया गया है। सच्चिदानन्द रचनावली के इस पहले खंड में कला, संस्कृति, भारतीयता, जीवन तथा कला-बोध से सम्बन्धित उनके लेखन को शामिल किया गया है। इसमें तीन पुस्तकें, कुछ भाषण और कुछ लेख संकलित हैं। कला की बुनियादी समझ बनानेवाली उनकी चर्चित पुस्तक ‘अरूप और आकार’ को भी इसमें संकलित किया गया है। इस खंड की सामग्री कला और समाज की पारस्परिकता, तथा संस्कृति व मनुष्य की अन्तर्निर्भरता के व्यापक परिप्रेक्ष्य में हमें एक समग्र जनसापेक्ष दृष्टि विकसित करने में सहायता देती है।
Dharohar Kahaniyaan : Bhuvaneshwar
- Author Name:
Bhuvneshwar +2
- Book Type:

- Description:
कहानी के वस्तु-तत्त्व को इस तरह से झीना और प्रगाढ़ करके उसे पारम्परिक कथालेखन से अलगाने का काम उस तरह से किसी ने नहीं किया जैसे कि भुवनेश्वर ने अपनी पाँच-सात कहानियों में कर दिखाया। उनकी संक्षिप्ति और सांकेतिकता हिन्दी कहानीकारों के लिए एक मिसाल है। भुवनेश्वर को मानवीय चरित्रों की अद्भुत पहचान है, और फिर उन्हें रचते वक्त वे हल्के-हल्के ब्रश-स्ट्रोक्स से जिस तरह से कहानी के वातावरण का सृजन करते हैं, उसमें तो उन्हें कमाल हासिल है। —दूधनाथ सिंह
Muktibodh Ke Uddharan
- Author Name:
Prabhat Tripathi
- Book Type:

- Description:
गजानन माधव मुक्तिबोध की जन्म-शती के दौरान उनके उद्धरणों का यह संचयन विशेष रूप से तैयार और प्रकाशित किया जा रहा है। छोटी कविताओं के समय में मुक्तिबोध लम्बी कविताएँ लिखने का जोखिम उठाते रहे और उनकी आलोचना और चिन्तन लीक से हटकर जटिल थे। इसने उन्हें एक कठिन लेखक के रूप में विख्यात कर दिया। उनके अत्यन्त सार्थक, जटिल साहित्य-संसार में प्रवेश के लिए उद्धरणों का यह संचयन मददगार होगा, इस उम्मीद से ही इसे विन्यस्त किया गया है। इससे पाठकों को मुक्तिबोध के संसार में और गहरे जाने का उत्साह होगा। मुक्तिबोध रज़ा के प्रिय कवियों में से एक थे। उनकी एक पंक्ति 'इस तम-शून्य में तैरती है जगत् समीक्षा' का उन्होंने अपने कई चित्रों में इस्तेमाल किया था। मुक्तिबोध अकेले हिन्दी कवि हैं जिन्हें प्रसिद्ध प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के कम से कम तीन बड़े चित्रकारों ने पसन्द किया। रामकुमार ने रोग-शय्या पर लेटे हुए मुक्तिबोध के कई रेखाचित्र बनाए थे जो उनके पहले कविता-संग्रह 'चाँद का मुँह टेढ़ा है' में प्रकाशित हुए थे। मक़बूल फ़िदा हुसेन ने जूते न पहनने का निर्णय मुक्तिबोध की शवयात्रा के दौरान लिया था। रज़ा उनकी कविता को हमेशा याद करते रहे। यह संचयन एक शृंखला की शुरुआत भी है। आगे अज्ञेय, शमशेर बहादुर सिंह, रघुवीर सहाय, निर्मल वर्मा आदि के उद्धरणों के संचयन प्रकाशित करने का इरादा है। —अशोक वाजपेयी
Chaar Yaar Aath Kahaniyaan
- Author Name:
Doodhnath Singh
- Book Type:

- Description:
चार यारों की आठ कहानियों की यह प्रस्तुति हमारे चार बड़े लेखकों की समवयस्क-समकालीन रचना-यात्रा को एक भेंट तो है ही, उससे ज़्यादा यह हिन्दी कहानी के उस दौर का पुनर्पाठ है जब लेखक-मानस किन्हीं सिद्ध, स्वीकृत और स्थापित रूढ़ियों का अनुसरण नहीं कर रहा था, बल्कि एक युवा होते विशाल स्वतंत्र देश की तमाम असहायताओं-अपूर्णताओं के बीच खड़ा अपनी रचनात्मक ‘क्वेस्ट' में अपने आन्तरिक और बाह्य विस्तार को भाषा में पकड़ने का जी-तोड़ प्रयत्न कर रहा था। सम्पादक-आलोचक-पाठक-पोषित फार्मूलों की सुविधा का ईजाद शायद इस दौर के काफ़ी बाद की घटना है। ये कहानियाँ और इन कहानियों के रचनाकार भाषा की सीमाओं और अनुभव की असीमता, रूढ़ियों की आसानियत और अभिव्यक्ति के दुर्वह संकल्प के बीच तने तारों पर सधे खड़े ‘आइकंस’ हैं, भविष्य ने जिनसे उतना नहीं सीखा, जितना सीखना चाहिए था। अन्तर्बाह्य अन्वेषण की जिस मूल वृत्ति के चलते ये कहानियाँ आविष्कार की तरह घटित होती थीं, वही सबसे मूल्यवान चीज़ आगे की रचनात्मकता में गहनतर होती नहीं दिखती। नई पीढ़ियों के लिए लगभग दस्तावेज़ी यह प्रस्तुति लेखकीय मित्रताओं के लिहाज़ से भी उन्हें एक ज़्यादा उजले परिसर में आने की दावत है जहाँ स्पर्द्धाओं के ‘टैक्स’ खुली साँस लेने के लिए पर्याप्त अन्तराल देते हुए स्थित होते हैं।
Swami Vivekanand Sanchayita
- Author Name:
Ramshankar Diwedi +2
- Book Type:

- Description:
“धर्म को ग्रहणशील होना चाहिए और ईश्वर सम्बन्धी अपने विश्वासों में भिन्नता के कारण एक-दूसरे का तिरस्कार नहीं करना चाहिए। ईश्वर सम्बन्धी सभी सिद्धान्त मानव-सिद्धान्त के तहत आने चाहिए। और जब धर्म इतने उदार हो जाएँगे तो उनकी कल्याणकारी शक्ति सौ गुना हो जाएगी। धर्मों में अद्भुत शक्ति है लेकिन उनकी संकीर्णताओं के कारण उनसे लाभ की जगह हानि ज़्यादा हुई है।” ये शब्द स्वामी विवेकानन्द के हैं जो अपने एक अन्य लेख में यह भी कहते हैं कि, “लोग भारत के पुनरुद्धार के विषय में जो जी में आए कहें, मैं अपने अनुभव के बल पर कह सकता हूँ कि जब तक तुम सच्चे अर्थों में धार्मिक नहीं होते, भारत का उद्धार होना असम्भव है।” स्वामी विवेकानन्द भारत के ऐसे चिन्तक थे जिनके विषय में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने रोम्यां रोलां को लिखा था कि अगर आप भारत को जानना चाहते हैं तो सबसे पहले विवेकानन्द का अध्ययन कीजिए। धर्म और धार्मिक होने के सन्दर्भ में उन्हीं स्वामी विवेकानन्द के उपरोक्त दो कथन स्वयं घोषित करते हैं कि आज इक्कीसवीं सदी में वे हमारे लिए कितने उपयोगी और प्रासंगिक हैं। आज जब विचार को लेकर नहीं धर्मों के झंडों को लेकर दुनिया एक नए ध्रुवीकरण की दिशा में बढ़ रही है, हमें धार्मिक होने के सही मायने समझने की ज़रूरत है। सभी धर्म अलग-अलग समय और अलग-अलग जगहों पर उस स्थान और काल की समस्याओं से निजात पाने के प्रयासों के रूप में सामने आए, और अगर कालान्तर में चलकर वे व्यक्ति की इयत्ता का, उसकी पहचान का, उसके सामूहिक बोध और यहाँ तक कि राष्ट्रों तक का आधार बन गए तो इससे सिर्फ़ यह पता चलता है कि न तो कोई धर्म अपने आप में पूर्ण है और न ही व्यक्ति अभी इतना विकसित हुआ है कि वह धर्म के बिना अपना काम चला सके। कह सकते हैं कि हमें अभी सच्चे अर्थों में धार्मिक होना नहीं आया। धर्मों के सांसारिक-राजनीतिक दुरुपयोग की वजह भी यही है। ऐसे समय स्वामी विवेकानन्द के लेखों, भाषणों, कक्षालापों के इस प्रतिनिधि संचयन का प्रकाशन विशेष महत्त्व रखता है। आशा है कि इसके अध्ययन से हमें धर्म, नैतिकता, भक्ति, ईश्वर और हिन्दुत्व के सच्चे अर्थों तक पहुँचने में मदद मिलेगी।
Saat Bhumikayen
- Author Name:
Mahadevi Verma +1
- Book Type:

- Description:
छायावाद की यशस्वी रचनाकार महादेवी वर्मा का लेखन किसी न किसी रूप में पाठकों व आलोचकों को आन्दोलित करता आया है। कभी उनकी रचनाओं में उनके जीवन के बिखरे सूत्र रेखांकित किए जाते हैं तो कभी उनके जीवन में रचनाओं के स्रोत खोजे जाते हैं। महादेवी द्वारा लिखित प्रत्येक शब्द स्वयं को ध्यान से पढ़े जाने का आग्रह करता है। सात भूमिकाएँ’ में ‘रश्मि’, ‘सांध्यगीत’, ‘आधुनिक कवि’, ‘दीपशिखा’, ‘बंग–दर्शन’, ‘सप्तपर्णा’ एवं ‘हिमालय’ कविता–संग्रहों की भूमिकाएँ हैं। महादेवी वर्मा लिखित इन भूमिकाओं का ऐतिहासिक महत्त्व है। ये भूमिकाएँ उनकी तत्कालीन मन:स्थिति को प्रकट करने के साथ उनके समग्र लेखन पर एक ‘अन्त:साक्ष्य’ की भाँति हैं। ‘सात भूमिकाओं’ के सम्पादक दूधनाथ सिंह का सम्पादकीय ‘छायावाद : व्यथा का सवेरा’ अत्यन्त विचारोत्तेजक है। अपनी विशिष्ट ‘तर्कसंगत पद्धति’ से दूधनाथ सिंह ने महादेवी के रचनाकर्म को विवेचित किया है—‘उनके वाक्य स्पष्ट, पारदर्शी व निर्भ्रान्त हैं, ‘महादेवी की आलोचनाएँ शब्द–अलंकृति अधिक हैं, आलोचनाएँ कम। उनका सारा वैचारिक गद्य–लेखन लगभग ऐसा ही है। उनमें तर्क और विश्लेषण का अभाव है। अपनी हर अगली बात के लिए महादेवी तर्क की जगह कोई प्रतीक–बिम्ब ढूँढ़ने लगती हैं।’ दूधनाथ सिंह के सम्पादकीय के प्रकाश में महादेवी की इन सात भूमिकाओं को पढ़ना एक आलोचनात्मक अनुभव है। तब और भी जब महादेवी के चुटीले ‘सुरक्षात्मक वाक्य’ उनकी प्रत्येक भूमिका में हैं। ‘रश्मि’ संग्रह की ‘अपनी बात’ का पहला ही वाक्य, ‘अपने विषय में कुछ कहना प्राय: बहुत कठिन हो जाता है, क्योंकि अपने दोष देखना अपने आपको अप्रिय लगता है और इनको अनदेखा कर जाना औरों को...।’ एक संग्रहणीय पुस्तक।
Tumhare Liye
- Author Name:
Doodhnath Singh
- Book Type:

- Description:
दूधनाथ सिंह जीवन और शब्द के पारखी रचनाकार हैं। उपन्यास, कहानी, नाटक, कविता, आलोचना व संस्मरण विधाओं में व्याप्त उनके रचना-संसार से गुज़रते हुए अनुभव किया जा सकता है कि अर्थ की सहज स्वीकृतियाँ अपना चोला बदल रही हैं। ‘तुम्हारे लिए’ दूधनाथ सिंह की 71 प्रेम कविताओं का संग्रह है। प्रेम के अन्त:करण का आयतन यहाँ विस्तृत हुआ है। इनमें जीवन को साक्षी भाव से देखने की उत्सुकता है। तथ्य निर्भार हो गए हैं और वृत्तान्त विलुप्त। निराला ने लिखा था, ‘मौन मधु हो जाय/भाषा मूकता की आड़ में मन सरलता की बाढ़ में जल बिन्दु सा बह जाय।’ जीवन के पार जाकर जीवन की धारा में बहने और उसे कहने का गुण ‘तुम्हारे लिए’ संग्रह की सर्वोपरि विशेषता है। प्रेम की परिधि में यदि जीवन है तो मृत्यु भी...जाने की उदासी है तो लौटने की उत्कंठा भी...क्षण की उपस्थिति है तो समयातीत से संवाद भी—‘अभी देखा/फिर/युगों के कठिन दुस्तर आवरण के पार तुमको अभी देखा।’ उल्लेखनीय यह है कि ये कविताएँ दूधनाथ सिंह के परिचित मुहावरे से विलग हैं। कई बार इन्हें पढ़ते हुए लगता है कि अपार अकेलेपन में अस्तित्व की पदचाप सुनाई पड़ रही है। ‘स्त्री’ इन कविताओं में कई तरह से आती है...और हर बार अनूठेपन के साथ। इन कविताओं में शिल्प के कुछ ख़ास प्रयोग हैं जो शब्दों और पंक्तियों के बीच भावबोध के लिए थोड़ी अनन्य जगह बनाते हैं। ‘तुम्हारे लिए’ में मौलिकता की सुखद छवियाँ हैं : ‘वह जो जीवन मैंने देखा किसने देखा! वह जो सुख-दु:ख मैंने पाया तुमने पाया?'
Ek Shamsher Bhi Hai
- Author Name:
Doodhnath Singh
- Book Type:

- Description:
‘शमशेर बहादुर उन कवियों में रहे जो लगातार अपनी कविता के प्रति सजग और समर्पित भी रहे। राजनीति की दृष्टि से बहुत ज़्यादा सक्रिय तो वह नहीं रहे और एक उनकी कविता में निहित मूल्य-दृष्टि में और उनकी घोषित राजनीति में, राजनीतिक दृष्टि में लगातार एक विरोध भी रहा। वह प्रगतिवादी आन्दोलन के साथ रहे लेकिन उसके सिद्धान्तों का प्रतिपादन करनेवाले कभी नहीं रहे। उन सिद्धान्तों में उनका पूरा विश्वास भी कभी नहीं रहा। उन्होंने मान लिया कि हम इस आन्दोलन के साथ हैं, और स्वयं उनकी कविता है, उसका जो बुनियादी संवेदन है, वह लगातार उसके बाहर और उसके विरुद्ध भी जाता रहा। वह शायद एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं, उनके जीवन का, उनके कवि का विकास इस तरह से हुआ। पहले वह चित्रकार थे या उन्होंने दीक्षा चित्रकर्म में ली।’ उसमें भी लगातार उनकी दृष्टि बिम्बवादी-दृष्टि रही और काव्य में उनका बल इस पक्ष पर रहा। उनके प्रिय कवि भी ऐसे ही रहे हैं। इससे कभी मुक्त होना न उन्होंने चाहा, न वह हुए। हम चाहें तो उन्हें रूमानी और बिम्बवादी कवि भी कह सकते हैं, कभी इसके बाहर वह नहीं गए। मेरा ख़याल है कि उनके चित्रों और उनकी कविताओं में बराबर सम्बन्ध रहा है। और उस स्तर को उनके घोषित राजनीति विश्वास ने कभी छुआ ही नहीं। अगर उनसे पूछा जाता कि आप राजनीति में किस दल के साथ हैं, तो वह कहते कि मैं प्रगतिवादियों के साथ हूँ। अब आप इसका जो अर्थ चाहें लगा सकते हैं। इसे विभाजित व्यक्तित्व मैं तब कहता जबकि उनकी चेतना में उसका असर होता। उसमें भी दो खंड हो जाते। वैसा शायद हुआ नहीं। शमशेर तो पहली बार वहाँ (‘तार-सप्तक’ में) रखे भी गए थे, फिर उनको दूसरे के लिए रख लिया गया, क्योंकि उनकी कविताएँ बहुत कम मिल पाई थीं। दो-एक पेटियाँ भरकर कविताएँ तो उनके पास पड़ी होंगी, लेकिन ख़ुद उनको अपनी ख़बर नहीं थी। जब यह काम हुआ तो उन्हें लाया जा सका। —अज्ञेय
Ek Anam Kavi Ki Kavitayen
- Author Name:
Doodhnath Singh
- Book Type:

- Description:
गद्य में जिस यथार्थ को उसके भौतिक विवरणों में अंकित किया जाता है, कविता उसे अक्सर उन बिम्बों से खोलती है जो उस यथार्थ को भोगते हुए मनुष्य के मन और जीवन में बूँद-बूँद संचित होते रहते हैं। यह जैसे सत्य को, उसकी सम्पूर्णता को दूसरे सिरे से पकड़ना है। विषय यहाँ भी वही ठोस यथार्थ और उसकी छवियाँ हैं लेकिन कवि की कविता उसे सीधे न देखकर उसके उपोत्पादों के आइनों में रखकर जाँचती है। जो भाषा में, शब्दों में, विभिन्न अर्थ-परम्पराओं और अवधारणाओं में आकर एक अमूर्त लेकिन कहीं ज़्यादा प्रभावशाली सत्ता हासिल कर लेते हैं; मसलन—इस संग्रह की कविता 'कामयाबी’। यह कामयाब आदमी को नहीं उसके उस पद को सम्बोधित है जो उसने हासिल किया है—कामयाबी। यहीं से कवि उस पूरी सामाजिक प्रक्रिया को खोलता है जिसका अर्थ इस शब्द में समाहित होकर हमारी चेतना का हिस्सा हो जाता है। और हम उसे नैतिक-अनैतिक के परे एक मूल्य के रूप में धारण कर लेते हैं। इस संग्रह में और भी ऐसी अनेक कविताएँ हैं जो समाज से नहीं, उसके फ़लसफ़े को सम्बोधित हैं, जिसे हम पहले धीरे-धीरे रचते हैं और फिर उसके सहारे जीना शुरू कर देते हैं। उसके बरक्स खड़ी है कविता जो कवि के अपने एकान्त, अपने मूल्यों और मनुष्यता की अपनी बड़ी परिभाषा के साथ सृष्टि को बचाने-बढ़ाने की चिन्ता में व्यस्त है। संयोग नहीं कि 'भाषा’, 'शब्द’ और 'कविता’ आदि शब्दों का प्रयोग यहाँ अनेक कविताओं में अनेक बार होता है। दरअसल यही वे हथियार हैं जो यथार्थ की अमूर्त व्याप्तियों का मुक़ाबला कर सकते हैं। 'शब्द की चमक और उसकी ताक़त का ख़याल/चारों ओर की बेचारगी में/एक विस्मय था/ताक़त का इकट्ठा होते जाना/लोग जान गए थे/और वे अपने बचाव में/छिप रहे थे/हालाँकि शब्द उन्हें बाहर निकलने के लिए/पूरी ताकत से दे रहे थे आवाज़।’ ये कविताएँ पाठक को अपने समय को एक अलग ढंग से समझने के उपकरण देंगी।
Famous Writers (Set of 10 Books) - Dharohar Kahaniyaan
- Author Name:
Bhuvaneshwar +9
- Book Type:

- Description:
धरोहर कहानियाँ : भुवनेश्वर धरोहर कहानियाँ : प्रेमचंद धरोहर कहानियाँ : सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' धरोहर कहानियाँ : राहुल सांकृत्यायन धरोहर कहानियाँ : सुभद्रा कुमारी चौहान धरोहर कहानियाँ : जयशंकर प्रसाद धरोहर कहानियाँ : चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ धरोहर कहानियाँ : विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’ धरोहर कहानियाँ : रांगेय राघव धरोहर कहानियाँ : आचार्य चतुरसेन शास्त्री
Muktibodh Sahitya Mein Nayi Pravrittiyan
- Author Name:
Doodhnath Singh
- Book Type:

- Description:
अपनी कविताओं में विचारों के आवेग को मुक्तिबोध अपने आत्मचित्रों से सन्तुलित और संवर्धित करते हुए उसमें हर बार एक नया रंग भरते चलते हैं। इस रूप में मुक्तिबोध आधुनिक यूरोपीय चित्रकारों की चित्रशैली और चित्रछवियों के अत्यन्त निकट हैं। कविताएँ केवल शब्दों और लयों और विचारों से ही नहीं सजतीं, कविता में बीच-बीच में प्रकट होनेवाले वे आत्मचित्र हैं जो उनके अन्तर्कथ्य को तराशते हैं। उनका यह आत्म उतना ही क्षत-विक्षत, उतना ही रोमानी, उतना ही यातनादायी है जितना खड़ी बोली के दूसरे कवियों का। मुक्तिबोध कम्युनिस्ट होते हुए भी ललकार के कवि नहीं हैं, ललकार के भीतर की मजबूरी के कवि हैं। यही वह भविष्य दृष्टि है जो उन्हें हिन्दी के दूसरे कवियों से अलग करती है। वे बाहर देखते ज़रूर हैं लेकिन आत्मोन्मुख होकर। उनकी नज़र बाहरी दुनिया के तटस्थ काव्यात्मक कथन में नहीं है, बल्कि बाहरी दुनिया के भीतरी टकरावों में है। इसीलिए वे हिन्दी के एक अलग और अनोखे क़िस्म के कवि हैं जिनकी तुलना किसी से नहीं।
Nirala : Aatmhanta Astha
- Author Name:
Doodhnath Singh
- Book Type:

- Description:
निराला : आत्महन्ता आस्था’ दरअसल एक नए कवि-कथाकार द्वारा एक-दूसरे कवि का आत्मीय विश्लेषण है। इसका एक नाम यह भी हो सकता था—‘एक लेखक की निजी नोट-बुक में एक दूसरा लेखक’। यह पुस्तक लेखक के उन्हीं ‘नोट्स’ का क्रमबद्ध रूपान्तरण है, उसके निजी आनन्द की अभिव्यक्ति है। लेकिन आनन्द की यह अभिव्यक्ति लेखक के श्रद्धा-विगलित क्षणों की उपज न होकर, उसके दिमाग़ की तार्किक रस-सिद्धि का परिणाम है; उसके सधे हुए सुर की झंकार है। अत: उसमें एक तर्कपूर्ण निजी शास्त्रीयता भी है। इसीलिए वह मात्र प्रशस्ति-वाचन या निन्दा नहीं है, बल्कि निराला की काव्य-ऊर्जा तक पहुँचने के लिए बनाया गया एक नया और निजी द्वार है, जिससे जागरूक पाठक और नए आलोचक एक नई जगह से उस सिंह के दर्शन कर सकें। जब आप इस नए द्वार से प्रवेश करेंगे—तभी समझ सकेंगे कि क्यों निराला दूसरे छायावादी कवियों से विरोधी दिशा के कवि हैं? क्यों उनको बने-बनाए काव्य-सिद्धान्तों में 'फिट-इन' नहीं किया जा सकता? क्यों उनकी रचनात्मकता का अध्ययन करने के लिए काल-क्रम का आधार बेमानी ठहरता है? तब आप उस अँधेरी गुफा में बैठी, उन जलती आँखों के सान्द्र प्रकाश का साक्षात्कार कर पाएँगे। इसी साक्षात्कार के लिए प्रस्तुत है यह पुस्तक— ‘निराला : आत्महन्ता आस्था’।
Nishkasan
- Author Name:
Doodhnath Singh
- Book Type:

- Description:
...'दाँये देखना ठीक नहीं। 'गुरू जी ने कहा।' और अगर दाँये गड्ढा-गुड्ढी हो तो गुरू जी?' तो ज़्यादा बाँयें झुक जाओ।' गुरू जी बोले। 'और अगर उधर भी हो तो?' 'तो आगे-पीछे हो जाओ।' 'और आगे-पीछे भी हो तो?' 'तो सवाल यह होगा कि तुम उस सुरक्षित, विचारहीन जगह पर पहुँचे ही कैसे?' गुरू जी ने कहा। 'यही तो मेरी भी समझ में नहीं आता गुरू जी!' ...'मान लीजिये आपकी बेटी है तब? मुफ़्ती की बेटी थी तब? तब तो सारा प्रशासन सिर के बल खड़ा हो गया था! अपहरण और आपूर्ति में ज़्यादा फ़र्क नहीं है पंडित जी! दोनों में अनिच्छित शोषण है। दोनों में हिंसा है। जबर्दस्त शारीरिक और मानसिक अपमान है। दोनों में बल-प्रयोग है, सिर्फ़ उसके तरीके में अन्तर है। दोनों में फिरौती है–एक में प्रत्यक्ष, दूसरे में परोक्ष। आप क्या समझते हैं, जो देवी जी वहाँ प्रतिष्ठित पद पर आसीन हैं और इस कुकर्म में लिप्त हैं उनका कोई निहित स्वार्थ नहीं होगा? सिर्फ़ एक घिनौने मज़े के लिए वे ऐसा करती होंगी?...लेकिन नहीं, किसी खटिक की बेटी होने का क्या मतलब? उसे नरक में डालो और हँसो। या उसे आपकी तरह 'अन्य मामलों' के घूरे पर डालकर रफ़ा-दफ़ा कर दो। 'महामहिम खाँसने लगे।' ...कटुए, क्रिश्चियन और कम्यूनिस्ट, तीनों देशद्रोही हैं–अन्तत: यह उनका और उनकी पार्टी का खुला-छिपा राजनैतिक नारा है। ...'यह कम्यूनिस्टों की साजिश है सर! 'कुलपति ने कहा। महामहिम ने पीछे खड़े अपने प्रमुख सचिव को देखा, जैसे कह रहे हों, उस दिन लॉन में टहलते हुए मैंने आपको बेकार ही डाँटा था। 'ये फ़ाइल है सर।' कुलपति ने फ़ाइल प्रमुख सचिव की ओर बढ़ायी। 'नहीं, उसकी अब कोई ज़रूरत नहीं।' महामहिम ने हाथ के इशारे से मना किया।
Kaha-Suni
- Author Name:
Doodhnath Singh
- Book Type:

- Description:
‘इस किताब में दूधनाथ सिंह के चार साक्षात्कार और चार आलोचनात्मक निबन्ध संकलित हैं। साक्षात्कार एक तरह का विशिष्ट शास्त्रार्थ होता है। प्रश्नों के आलोक में यह शास्त्रार्थ लेखक तरह-तरह से करता है। कभी आत्म-मन्थन, आत्म-प्रकाश, कभी अपने समय, समाज, इतिहास, साहित्य, कला आदि पर टिप्पणियाँ और प्रतिक्रियाएँ, कभी मतभेद-सहमति और सौमनस्य, कभी अपनी क्षुब्धता, उदासी या ख़ुशी का इज़हार, कभी अपनी ही आस्थाओं पर प्रश्नचिह्न, कभी कलह, वैमनस्य और फिर प्रेम; कभी गहन विश्लेषण और आत्म-स्वीकृति—एक अच्छे साक्षात्कार में एक कलाकार के विविधवर्णी छटाओं वाले रूप के दर्शन पाठक को होते हैं। इस तरह ‘साक्षात्कार’ तर्क-वितर्क की असमंजसपूर्ण, वक्र भाषा में लिपटा हुआ कलाकार के औचक पकड़े गए चिन्तन का निचोड़ है, एक नए क़िस्म का भाष्य है, आलोचना का एक खिलंदरा राग है। ‘कहा-सुनी’ के चारों आलोचनात्मक निबन्ध लेखक के उपर्युक्त साक्षात्कारों के शास्त्रार्थों का ही फैलाव और वितान हैं। बातों और विचारों की अन्तिम तर्क-सिद्धि, परिणति और समापन हैं। फिर भी आलोचना की विधागत माँग के कारण उनमें तटस्थ और निर्वैयक्तिक विश्लेषण, तर्क-वितर्क के आघात-प्रतिघात, नियमन-अनुशासन यहाँ अधिक हैं। आ आशा है, यह किताब एक नए बौद्धिक आस्वाद के साथ पढ़ी-गुनी जाएगी।
Namo Andhakaram
- Author Name:
Doodhnath Singh
- Book Type:

- Description:
गुरू का पैसार बहुत बड़ा है। वाणी में अद्भुत शक्ति है। अफ़वाहों का अतुल भंडार है गुरू के पास। कनफूँकों की कमी नहीं है। अगर गुरू को पता चल गया बेटा, कि तुम फरजी बनने के फेर में गुरू से ही ऐंड़ ले रहे हो तो समझ लो, ऐसी लँगड़ी लगेगी कि हमेशा के लिए गुड़ुम्। कहीं कोई है, कोई है जिसका पता नहीं। जिसका तुम्हें कभी पता नहीं चलेगा। चौबीसों घंटे पहरा देते रहो–तब भी नहीं। वह दिन और रात के समय के बाहर के समय में कहीं स्थित है। वहाँ तुम नहीं पहुँच सकते। वहाँ के दोनों निश्चिन्त-निरावृत्त विहार करते हैं। और तुम पर हँसते हैं। वह हँसी तुम्हें कभी सुनाई नहीं देगी। खोजते रहो जीवन-भर–उस अलक्ष्य-निराकार के पीछे पड़े रहो। ठेंगा दिखाता हुआ वह तुम्हारे सामने से गुज़र जाएगा और तुम्हारा जीवन इसी में चुक जाएगा। गड़बड़ है। बहुत गड़बड़ है। कुछ भी हो सकता है। तुम पर कोई भी इल्ज़ाम आ सकता है। किसी पर भी। नहीं, संग-साथ ठीक नहीं। दरअसल, दुनिया एक हिलता हुआ पर्दा है। तुम देख सकते हो कि मुर्दे की बग़ल में कोई संभोग-रत है। या तुम यही कहोगे कि पर्दा हिल रहा है। अनरीयल, अनरीयल–तुम चिल्लाओगे। जैसे नक़्क़ाशीदार सोने के गहने पिघलाने के बाद एकसार हो जाते हैं। सिर्फ़ स्वर्ण-द्रव बच रहता है–अपनी सुनहली आभा में झिलमिल-झिलमिल करता हुआ, वही हाल प्रेम में लड़की का होता है। और शैव्या भी वही रह गई–अपनी नक़्क़ाशी के पास एक झिलमिल-सी आभा। कुछ भी जुड़ा नहीं उसमें, बल्कि प्रेम ने उसे विनष्ट कर दिया। पहले वह क्या थी और अब क्या है! छुएँ तो बचपन हाथ नहीं लगेगा। एक बार नक़्क़ाशी खंड-खंड हुई तो फिर वापस नहीं आने की।
Aakhiri Kalaam
- Author Name:
Doodhnath Singh
- Book Type:

- Description:
यह कथा-कृति उपन्यास की सारी सीमाओं और लालचों को उलट-पुलट देती है। चरित्रों के टकराव से कथा का विकास—यह जो उपन्यास-लेखन की आदत बन चुकी है, यहाँ इस आदत से लगभग इनकार है। फिर भी यह कथा-कृति एक उपन्यास ही है। इसमें गद्य और वृत्तान्त का एक अजब संयोजन है, जहाँ से ढाँचागत वर्जनाएँ समाप्त होती हैं और कथा का विस्तार और खुलापन बातों और विचारों को आमंत्रित करते-से लगते हैं। गद्य और गल्प का एक नया रसायन तैयार होता है जो अपने रस और सुर से अद्भुत पठनीयता पैदा करता है। इस तरह यह उपन्यास गल्प की एक नई, अबाध निरन्तरता का प्रमाण है। इस उपन्यास में मिथकीय संस्कृति के विश्लेषण की एक पवित्र और निहत्थी छटपटाहट है। मिथक को इतिहास में बदलने की कोशिशों का पर्दाफाश है; विचार, संरचना और संस्कृति पर एकल बहसों का निर्वेद है। इसी के भीतर कहानी के तार बिखरे पड़े हैं। इन्हीं तकलीफ़ों के भीतर से इतिहास के उन सूत्रों को ढूँढ़ने का प्रयत्न है, जो एक मिले-जुले समाज की बुनियाद हैं और जिनको उलट-पुलट देने की बर्बर आहटें इधर चौतरफ़ा सुनाई दे रही हैं। इसी तरह यह उपन्यास अपने समय के संसार की एक चित्र-रचना बनता है। अपने अतीत, इतिहास, मिथक और साहित्य-संस्कृति को उकेरता-उधेड़ता हुआ उसकी एक विस्फोटक और स्तब्धकारी पुनर्रचना सामने रखता है। उन बातों, अर्थों और व्याख्याओं को सामने लाता है, जो उसी में छुपी थीं लेकिन लोग और समाज, संस्कृति और विचार के धनुर्धर उसकी ओर से अक्सर आखें मूँदे रहते हैं। अन्तत: यह उपन्यास हमारे अतीत और वर्तमान की एक नई ‘पोलेमिक्स' है। इंसाफ़ की इच्छा का एक दुखद-द्वंद्वात्मक संवाद है, जो अपने लोगों और अपनी जनता को ही सम्बोधित है।
Lout Aa, Aao Dhar
- Author Name:
Doodhnath Singh
- Book Type:

- Description:
यह पूरी किताब एक आदिम , दीप्त स्मरण के विस्फोटक क्षणों में लिखी गई। फिर भी यह सम्पूर्ण संस्मरण या आत्म-स्मरण नहीं है। उस धुन में जो ‘विच्छुरित’ हुआ , उसी के कुछ रंग-बिरंगे , जलते हुए ‘ब्रश-स्ट्रोक्स’ हैं—कभी आगे-पीछे , कभी पीछे-आगे आते-जाते , अक्रमबद्धता के निजी ढाँचे में बँधे हुए। इसीलिए इसका शिल्प आवर्तों में बँधा हुआ है। इसको कुछ भी कह सकते हैं। यह डायरी है। संस्करण है। आत्मवाची गद्य है। टिप्पणी है। आलोचना है। कथा-वृतान्त है। अपने साहित्यिक जीवन के प्रारम्भिक वर्षों की दुखती धड़कन से छेड़छाड़ है। और सबसे अधिक अनेक लोगों की धुँधली और चमकती छवियों से मेरा आत्म-संवाद है। यह एक रंगीन मोज़ैक है। विधाओं में एक तोड़-फोड़ है। गद्य का आन्तरिक अवकाश है। —दूधनाथ सिंह।
Mahadevi "Doodhnath Singh"
- Author Name:
Doodhnath Singh
- Book Type:

- Description:
यह किताब महादेवी की लिखत-पढ़त, उनके चित्रों-रेखांकनों, उनके जीवन-वृत्त और उनके बारे में लेखक की संस्कृतियों के भीतर से उनको समझने की एक निजी कोशिश है। लेखक की निजी संस्मृतियाँ भी महादेवी के कर्तृत्व को व्याख्यायित करने और उसके सारतत्त्व तक पहुँचने की बुनियाद के बतौर हैं। महादेवी का संसार जितना अन्तरंग है, उतना ही बहिरंग। अन्तरंग में दीपक की खोज है और बहिरंग के कुरूप-काले संसार में सूरज की एक किरण की। महादेवी के सम्पूर्ण कृतित्व में अद्भुत संघर्ष है और पराजय कहीं नहीं। इस किताब का हर शीर्षक एक नया अध्याय है और इसका शिल्प आलोचना के क्षेत्र में एक नई सूझ। साहित्य की अन्य विधाओं की तरह ही आलोचना की पठनीयता भी ज़रूरी है। दरअसल किसी कविता, कला, कथा, विचार या लेखक के प्रति सहज उत्सुकता जगाना और उसे समझने का मार्ग प्रशस्त करना ही आलोचना का उद्देश्य है। और यह किताब यही काम करती है। महादेवी के रचनात्मक विवेक को जानने के लिए यह किताब एक समानान्तर रूपक की तरह है। उनकी कविता, गद्य और उनकी चित्र-वीथी—तीनों मिलकर ही महादेवी के सौन्दर्यशास्त्र का चेहरा निर्मित करते हैं। यह किताब इसी चेहरे का दर्शन-दिग्दर्शन है।
Renu Rachanawali : Vols. 1-5
- Author Name:
Phanishwarnath Renu +1
- Book Type:

- Description:
रेणु के ‘मैला आँचल’ का प्रकाशन अगस्त, 1954 में हुआ और इसके ठीक दस वर्ष पूर्व उनकी पहली कहानी ‘बट बाबा’ 27 अगस्त, 1944 के साप्ताहिक ‘विश्वमित्र’ में प्रकाशित हुई। 1944 ई. से 1972 ई. तक उन्होंने लगातार कहानियाँ लिखीं—प्रारम्भिक कहानियों—‘बट बाबा’, ‘पहलवान की ढोलक’, ‘पार्टी का भूत’ से लेकर अन्तिम कहानी ‘भित्तिचित्र की मयूरी’ तक एक ही कथा–शिल्पी रेणु का दर्शन होता है जो अपने कथा–विन्यास में एक–एक शब्द, छोटे–से–छोटे पात्र, परिवेश की मामूली बारीकियों, रंगों, गन्धों एवं ध्वनियों पर एक समान नज़र रखता है; किसी की उपेक्षा नहीं करता। नई कहानी के दौर में रेणु ने अपनी कहानियों द्वारा एक नई छाप छोड़ी। उनकी ‘रसप्रिया’, ‘लालपान की बेगम’ और ‘तीसरी क़सम’ अर्थात् ‘मारे गए गुलफ़ाम’ छठे दशक की हिन्दी कहानी की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ मानी जाती हैं। ‘तीसरी क़सम’ पर राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित लोकप्रिय फ़िल्म का निर्माण हो चुका है। रेणु की ‘पंचलाइट’ कहानी पर एक टेलीफ़िल्म भी बन चुकी है। ‘रेणु रचनावली’ के पहले खंड में रेणु की सम्पूर्ण कहानियाँ पहली बार एक साथ, एक जगह प्रकाशित हो रही हैं। इन तमाम कहानियों से एक साथ गुज़रने के बाद पाठक यह सहज ही महसूस करेंगे कि रेणु ने एक कहानी की वस्तु या पात्र को परिवेश या नाम बदलकर दुहराया नहीं है। हर कहानी में रेणु का अपना मिज़ाज और रंग होते हुए भी वे एक–दूसरे से अलग हैं और उनके अपूर्व रचना–कौशल की परिचायक हैं।
Nagarjun Rachanawali : Vols. 1-7
- Author Name:
Nagarjun +1
- Book Type:

- Description:
उनके जीवन के लगभग अड़सठ वर्ष (1929–1997) रचनाकर्म को समर्पित। कविता, उपन्यास, संस्मरण, यात्रावृत्त, निबन्ध, बाल–साहित्य आदि सभी विधाओं में उन्होंने लिखा। हिन्दी के अलावा मैथिली, बांग्ला और संस्कृत में भी उन्होंने न सिर्फ़ मौलिक रचनाएँ कीं, इन भाषाओं से अनुवाद भी किए। कुछ पत्र–पत्रिकाओं में उन्होंने स्तम्भ-लेखन भी किया। रचनावली के प्रथम खंड में बाबा की उन सभी कविताओं को संकलित किया गया है, जिनका रचनाकाल 1967 ई. तक है। ‘युगधारा’, ‘सतरंगे पंखोंवाली’, ‘प्यासी पथराई आँखें’, ‘तुमने कहा था’, ‘हज़ार–हज़ार बाँहोंवाली’, ‘पुरानी जूतियों का कोरस’, ‘रत्नगर्भ’, ‘इस गुब्बारे की छाया में’ तथा ‘भूल जाओ पुराने सपने’—इन संग्रहों से 1967 तक की सभी कविताओं को कालक्रम से यहाँ ले लिया गया है। इसके अलावा नागार्जुन के सर्वाधिक प्रिय कवि कालिदास की रचना ‘मेघदूत’ का उनके द्वारा मुक्तछन्द में किया गया अनुवाद भी इसमें संकलित है। यह अनुवाद 1953 में ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ के एक ही अंक में प्रकाशित हुआ। इसके बाद 1955 में पुस्तकाकार प्रकाशन के समय इसमें एक लम्बी भूमिका और कुछ पादटिप्पणियाँ भी जोड़ी गर्इं। रचनावली में वह इसी रूप में उपलब्ध है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book