Gyandan
Author:
YashpalPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections1 Ratings
Price: ₹ 76
₹
95
Available
यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है। ‘ज्ञानदान’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘ज्ञानदानֺ’, ‘एक राज़’, ‘गण्डेरी’, ‘कुछ समझ न सका’, ‘दु:ख का अधिकार’, ‘पराया सुख’, ‘80/100’, या ‘सांई सच्चे!’, ‘ज़बरदस्ती’, ‘हलाल का टुकड़ा’, ‘मनुष्य’, ‘बदनाम’ और ‘अपनी चीज़’।
ISBN: 9788180314646
Pages: 147
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Sudha Sahay
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- Description: दोनों कहानियाँ बहुत अच्छी हैं। '...और वह लाश बन गया' शीर्षक कहानी तो मुझे बहुत जँची।... सचमुच वे अच्छा लिख रही हैं। उन्हें मेरी हार्दिक बधाई। —मिथिलेश्वर मुझे आश्चर्यचकित कर जाती 'नारी तू नारायणी' कथा—कितनी विचित्र कथा—एक विशेष मनोभाव को जन्म देना, साकार करना, दिशा देना और सफल होना; इसी संकल्प शक्ति और दृढ़ विश्वास के साथ कालधर्म का निर्वाह एक साधारण स्त्री में नारायणी का आविर्भाव नहीं तो और क्या है? इसी संकलन की एक और कथा 'वापसी' ने भी चमत्कृत कर दिया। जिसे हम वैराग्य समझते हैं, अक्सर वह पलायन साबित होता है। संसार कहीं बाहर नहीं बल्कि मन के अंदर निरन्तर चलने वाला इन्द्रधनुषी जाल है, जिसकी पकड़ से बच पाना लगभग असम्भव है। —विजयलक्ष्मी शर्मा प्रस्तुत पुस्तक 'पल दो पल' अपने शब्दों से एक अध्यात्म को प्रदर्शित करता है। तभी तो ग्यारह कहानियों की इस पुस्तक में समाज के चरित्र पर, व्यवहार पर, भाई-भतीजावाद, जातिगत द्वेष—सभी पक्षों पर सुधाजी ने बेबाकी से कलम चलायी है। —डॉ. कैलाश कुमारी सहाय
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