Tulsi Rachnawali Vol-3
Author:
Dr. Ramji TiwariPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 720
₹
900
Available
गोस्वामी तुलसीदास की विलक्षण प्रतिभा से प्रसूत अनंत काव्य-कीर्ति-कौमुदी में स्नात होकर समस्त विश्व के काव्य-रसिक धन्य, रससिक्त और श्रद्धानवत होते रहे हैं, किंतु सभी के दृष्टि-पथ में 'रामचरितमानस' ही आकाशदीप की भाँति विराजमान है। अन्य ग्रंथरत्न छायावेष्टित ही रह जाते हैं। जबकि लोक-परलोक चिंतन, व्यावहारिक चेतन जीवन और अध्यात्मबोध, संस्कृति और संस्कार, संघर्ष और आस्था तथा जय और पराजय से युक्त विलक्षण व्यक्तित्व उनके सभी ग्रंथ-रत्नों को देखने के बाद ही सगुण साकार हो पाता है। संस्कारशील और सुरुचि-संपन्न पाठक भी इस विश्वकवि के संपूर्ण वाड्मय का रसास्वादन कर लेने के बाद ही पूर्ण परितोष का लाभ ले पाता है। गोस्वामीजी के सभी ग्रंथरत्नों को एकत्र उपलब्ध कराने के पुनीत उद्देश्य से ही इस 'रचनावली' की योजना बनाई गई है।
ग्रंथावली का प्रथम खंड सुविज्ञ पाठकों को समर्पित है। इसमें गोस्वामीजी की 'रामलला नहछू', 'वैराग्य संदीपनी', 'बरवै रामायण', 'जानकी मंगल', 'पार्वती मंगल', 'रामाज्ञा-प्रश्न', 'दोहावली', 'श्रीकृष्ण गीतावली' कृतियों का समावेश है। आशा है, सुधी पाठकों को अभीप्सित परितोष मिल सकेगा।
ISBN: 9789355219046
Pages: 520
Avg Reading Time: 17 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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समाज में लगातार बढ़ती जा रही यंत्रणा और अलगाव की ट्रेजडी की गहन पड़ताल ही नहीं करतीं,
बल्कि ‘ऐसा नहीं होना चाहिए’—इस उत्कट इच्छा का भी प्रकटीकरण करती हुई चलती हैं। एक युवा
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Description:
चन्द्रकान्त देवताले की कविताएँ भवानीप्रसाद मिश्र के इस स्वर्णाक्षरों में उत्कीर्ण किए जाने योग्य वक्तव्य का अप्रतिम उदाहरण बनती नज़र आती हैं कि जो अभी की कविता नहीं है वह कभी की कविता नहीं हो पाएगी। चन्द्रकान्त देवताले जिस तरह हमारे समाज, देश और राजनीति ही नहीं, सारे वैश्विक परिदृश्य पर अपलक तथा पैनी निगाह रखे हुए कवि हैं, वह सिर्फ़ एक अद्वितीय जागरूकता ही नहीं, मुक्तिबोध, नागार्जुन और रघुवीर सहाय जैसी मानव–केन्द्रित नैतिकता से युक्त और ग़ैर–बराबरी तथा अन्याय से मुक्त दुनिया बनाने की आस्था और उसे पाने के संघर्ष की ईमानदार तथा साहसिक मिसाल भी है। कवि जानता है कि समय तारीख़ों से नहीं बदला करता हम एक ऐसी ‘सभ्यता’ में हैं जो उजाड़ में उस संग्रहालय की तरह है जिसकी प्रेक्षक–पुस्तिका में दर्ज़ टिप्पणियों से आप कभी यथार्थ को जान नहीं सकते, जहाँ चीज़ों पर वैधानिक चेतावनियाँ लिखकर सारी ज़िम्मेदारियों से मुक्ति पा ली गई है और अन्त में हर अज्ञात व्यक्ति से सावधान रहने की हिदायत देकर आदमी को आदमी के ख़िलाफ़ तैनात कर दिया गया है।
इस कविता का केन्द्रीय शब्द है ‘हिंसा’ जैसी रचना हमें दो टूक आगाह करती है कि चन्द्रकान्त का कवि–कर्म क्या है, कवि कविता से कितना–क्या चाहता है और कविता तथा जीवन में काहे से गुरेज़ नहीं करता। ‘कवियों की छुट्टी’, ‘क्षमाप्रार्थी हों कविगण’, ‘तुका और नामदेव’ तथा ‘कविता पर रहम करो’ काव्य–कला पर कविताएँ नहीं हैं बल्कि चन्द्रकान्त के आत्मालोचन और व्यापक रचनाधर्मिता को लेकर उसकी अदम्य प्रतिबद्धता को अभिव्यक्ति देती हैं। जीवन–भर पढ़ने–पढ़ाने तथा साक्षरता एवं पुस्तकालय आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी का असर उसकी करिश्मे भी दिखा सकती हैं अब किताबें और किताबों की दुकान में जैसी रचनाओं में देखा जा सकता है जो पुस्तकों की मात्र उपस्थिति से हर्षित होनेवाली हिन्दी की शायद पहली अशाले कविताएँ हैं वे पुस्तकें जिन्हें आज़ादी के बाद से उत्तरोत्तर हमारे समाज से ग़ायब करने का राष्ट्रीय षड्यंत्र अब भी जारी है। इसी तरह शिक्षकों को लेकर लिखी गई नोटबुक से (एक) तथा (दो) कविताएँ हिन्दी में कदाचित् अपने ढंग की पहली ही होंगी। ये सब चन्द्रकान्त की कविता के नए आयाम हैं।
इस पर पहले भी ध्यान गया है कि चन्द्रकान्त देवताले ने स्त्रियों को लेकर हिन्दी में शायद सबसे ज़्यादा और सबसे अच्छी कविताएँ लिखी हैं लेकिन यहाँ उनकी कुछ ऐसी रचनाएँ हैं जो माँ और आजी की दुनियाओं और स्मृतियों में जाती हैं, किन्तु वहीं तक सीमित नहीं रहतीं—वहाँ एक कैंसर–पीड़ित ज़िलाबदर औरत है, बलात्कार के बाद तीन टुकड़ों में काटकर फेंकी गई युवती है, और चन्द्रकान्त अचानक एक विलक्षण परिहास–भावना का परिचय देते हुए मध्यवर्गीय ‘बहनजी–आंटीजी’ छाप प्यारी–प्यारी महिलाओं पर औसतपन और बुद्धिमत्ता के बीच, हिदायतें देने और निगरानी रखनेवाली बीवियाँ, कन्या महाविद्यालय की मैडमों से एक प्राचार्य की बातचीत, ‘मैं आपके काम का आदमी नहीं’ और ‘नींबू माँगकर’ जैसी अनूठी कविताएँ भी लिख डालते हैं—कवयित्रियों में सिर्फ़ निर्मला गर्ग ने ऐसा किया है। देवी–वध में चन्द्रकान्त ने दुस्साहसिकता से देवी–प्रतिमाओं को डायनों और बाज़ार में बैठनेवाली औरतों में बदलते देखा है जबकि ‘बाई! दरद ले’ जैसी मार्मिक कविता में मानो कवि स्वयं उन औरतों में शामिल हो गया है जो अपनी एक सहकर्मी श्रमजीवी आसन्नप्रसवा बहन से प्रसूति–पीड़ा उपजाने को कह रही हैं।
समाज की हर करवट, उसकी तमाम क्रूरताओं और विडम्बनाओं को पहचानने वाली चन्द्रकान्त देवताले की यह प्रतिबद्ध कविताएँ दरअसल भारतीय इनसान और भारतीय राष्ट्र के प्रति बहुत गहरे, यदि स्वयं विक्षिप्त नहीं तो विक्षिप्त कर देनेवाले प्रेम से विस्फोटित कविताएँ हैं। दरअसल कबीर से लेकर आज के युवतम उल्लेख्य हिन्दी कवि–कवयित्रियों की सर्जना के केन्द्र में यह समाज और यह देश ही रहा है। यह देश को खोकर प्राप्त की गई नकली आधुनिक या उत्तर–आधुनिक कविता नहीं है, एक सार्थक देश को पाने की कोशिश की तकलीफ़देह सच्ची कविता है। चन्द्रकान्त देवताले जैसे सर्जक अपनी कविताओं के ज़रिए वही काम करते नज़र आते हैं जो 1857–1947 के बीच और उसके बाद भी सारे असली वतनपरस्तों ने किया है।
यदि चन्द्रकान्त देवताले अपनी जन्मतिथि प्रकट न करें तो उनके किसी भी नए या पुराने पाठक को उनकी यह कविताएँ पढ़कर ऐसा लगेगा कि वे अधिकतम किसी चालीस–पैंतालीस की उम्र के सर्जक की रचनाएँ हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि (हमारे कुछ दूसरे कथित वरिष्ठ कवियों की तरह) उनका विकास अवरुद्ध हो गया है या वे अपनी श्लथ रचनात्मकता के एक लम्बे हाँफते हुए पठार पर पहुँच गए हैं, बल्कि यह कि अभी भी उनकी दृष्टि, अनुभूति तथा ऊर्जा में कोई कमी या छीजन आना तो दूर, उलटे उनके तज्रिबों और निगाह का दायरा और विस्तार पाता जा रहा है। कई कवि एक ख़ास आयु तक आते–आते सहिष्णु, समझौतावादी और परलोकोन्मुख हो जाते हैं क्योंकि हमारे यहाँ एक समन्वय एवं आशीर्वाद वाली सिद्ध मुद्रा प्रौढ़ता की पराकाष्ठा मानी गई है लेकिन चन्द्रकान्त के पास यह कहने की हिम्मत है : “मैं जानता हूँ कि मर रहा हूँ/फिर भी मुझे ईश्वर की ज़रूरत नहीं/क्योंकि धरती की गन्ध और समुद्र का नमक/हमेशा मेरे साथ हैं.../जब सीढ़ियाँ चढ़ता हूँ सबके सुख–दु:ख में शामिल/तो जीवन का संग्राम मेरी धड़कनों में झपट्टे मारने लगता है/पत्थरों के इसी संगीत में मुझे/कुछ भविष्यवाणियाँ सुनाई दे रही हैं...
—विष्णु खरे
Rang Birange Baal Geet
- Author Name:
Rameshraaj
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- Book Type:

- Description: छोटे बच्चों के लिए छोटे, सुंदर बाल गीत
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