Uttargita
About the book
महाभारत के महा-विध्वंस के बाद श्रीकृष्ण ने अर्जुन के आग्रह पर उन्हें एक और गहन सत्य का बोध कराया कि जीवन का वास्तविक युद्ध भीतर घटित होता है। उसकी विजय मानसिक एकाग्रता, आत्मनियंत्रण और अन्तर्मुखी चेतना में निहित है। हस्तिनापुर के शान्त वातावरण में दिया गया, यह उपदेश केवल अर्जुन के लिए नहीं बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है, जो अपने भीतर और बाहर के संघर्षों से जूझ रहा है। ‘उत्तरगीता’ उसी युद्ध के ज्ञान का स्वर है, जहाँ मौन की शक्ति बोलती है; जहाँ बाहरी विजय नहीं, बल्कि आन्तरिक सन्तुलन ही सर्वोच्च सिद्धि बन जाता है। श्रीकृष्ण इसमें संकेत देते हैं कि मनुष्य का चिन्तन उसकी सबसे तीव्र शक्ति है और जब वह एकाग्र होकर स्थिर होता है, तो वह किसी भी संघर्ष में विजय पाने में सक्षम हो जाता है। जो तकनीकी दबाव, अनिश्चितताओं और मूल्य-संकटों से भरा हुआ आज का युग, किसी भी दृष्टि से द्वापर के कुरुक्षेत्र से कम जटिल नहीं है। ऐसे समय में ‘उत्तरगीता’ जीवन के लिए एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका के रूप में उपयोगी है। यह बताती है कि किस प्रकार कोई भी व्यक्ति अपने मन, प्राण और चेतना की सूक्ष्म शक्तियों को सन्तुलित कर व्यक्ति आन्तरिक स्थिरता, स्पष्टता, एकाग्रता और शक्ति का आत्मिक रूपान्तरण प्राप्त कर सकता है। यह आत्म-विस्मृति के चक्रव्यूह को तोड़कर व्यक्ति को उसकी गहनतम सत्ता से जोड़ती है। जीवन के प्रत्येक संघर्ष को साधना में रूपान्तरित करने का सन्देश देती है।
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About the Book
महाभारत के महा-विध्वंस के बाद श्रीकृष्ण ने अर्जुन के आग्रह पर उन्हें एक और गहन सत्य का बोध कराया कि जीवन का वास्तविक युद्ध भीतर घटित होता है। उसकी विजय मानसिक एकाग्रता, आत्मनियंत्रण और अन्तर्मुखी चेतना में निहित है। हस्तिनापुर के शान्त वातावरण में दिया गया, यह उपदेश केवल अर्जुन के लिए नहीं बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है, जो अपने भीतर और बाहर के संघर्षों से जूझ रहा है।
‘उत्तरगीता’ उसी युद्ध के ज्ञान का स्वर है, जहाँ मौन की शक्ति बोलती है; जहाँ बाहरी विजय नहीं, बल्कि आन्तरिक सन्तुलन ही सर्वोच्च सिद्धि बन जाता है। श्रीकृष्ण इसमें संकेत देते हैं कि मनुष्य का चिन्तन उसकी सबसे तीव्र शक्ति है और जब वह एकाग्र होकर स्थिर होता है, तो वह किसी भी संघर्ष में विजय पाने में सक्षम हो जाता है।
जो तकनीकी दबाव, अनिश्चितताओं और मूल्य-संकटों से भरा हुआ आज का युग, किसी भी दृष्टि से द्वापर के कुरुक्षेत्र से कम जटिल नहीं है। ऐसे समय में ‘उत्तरगीता’ जीवन के लिए एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका के रूप में उपयोगी है। यह बताती है कि किस प्रकार कोई भी व्यक्ति अपने मन, प्राण और चेतना की सूक्ष्म शक्तियों को सन्तुलित कर व्यक्ति आन्तरिक स्थिरता, स्पष्टता, एकाग्रता और शक्ति का आत्मिक रूपान्तरण प्राप्त कर सकता है।
यह आत्म-विस्मृति के चक्रव्यूह को तोड़कर व्यक्ति को उसकी गहनतम सत्ता से जोड़ती है। जीवन के प्रत्येक संघर्ष को साधना में रूपान्तरित करने का सन्देश देती है।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2026
- Weight
- 150 grams
- ISBN-13
- 9789347265280
- Pages
- 144
- Reading time
- ~5 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 21.5 cm
- Language
- Hindi
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