Harihargita
Author:
Ashok Kumar SharmaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality0 Ratings
Price: ₹ 160
₹
200
Available
आत्मा य : केवलः स्वस्थः शान्तः सूक्ष्मः सनातनः।
अस्ति सर्वान्तरः साक्षाच्चिन्मात्रस्तमसः पर:॥
यह आत्मा केवल स्वस्थ, शान्त, सूक्ष्म, सनातन, सभी में विद्यमान परमात्मा के गुणों समान अर्थात् विकारहीन चेतना के रूप में, परमात्मा का प्रतीक अंश ही है और अज्ञान अर्थात् बुरी प्रवृत्तियों से परे है।
ISBN: 9789349159693
Pages: 168
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: महात्मा गांधीजी ने गीता को ‘माता’ की संज्ञा दी थी। उसके प्रति उनका असीम अनुराग और भक्ति थी। उन्होंने गीता के श्लोकों का सरल-सुबोध भाषा में तात्पर्य दिया, जो ‘गीता-बोध’ के नाम से प्रकाशित हुआ। उन्होंने सारे श्लोकों की टीका की और उसे ‘अनासक्तियोग’ का नाम दिया। कुछ भक्ति-प्रधान श्लोकों को चुनकर ‘गीता-प्रवेशिका’ पुस्तिका निकलवाई। इतने से भी उन्हें संतोष नहीं हुआ तो उन्होंने ‘गीता-पदार्थ-कोश’ तैयार करके न केवल शब्दों का सुगम अर्थ दिया, अपितु उन शब्दों के प्रयोग-स्थलों का निर्देश भी किया। गीता के मूल पाठ के साथ वह संपूर्ण सामग्री प्रस्तुत पुस्तक में संकलित है। गीता को हमारे देश में ही नहीं, सारे संसार में असाधारण लोकप्रियता प्राप्त है। असंख्य व्यक्ति गहरी भावना से उसे पढ़ते हैं और उससे प्रेरणा लेते हैं। जीवन की कोई भी ऐसी समस्या नहीं, जिसके समाधान में गीता सहायक न होती हो। उसमें ज्ञान, भक्ति तथा कर्म का अद्भुत समन्वय है और मानव-जीवन इन्हीं तीन अधिष्ठानों पर आधारित है। महात्मा गांधी की कलम से प्रसूत गीता पर एक संपूर्ण पुस्तक, जो जीवन के व्यावहारिक पक्ष पर प्रकाश डालकर पाठक की कर्मशीलता को गतिमान करेगी।
Devtulya Nastik
- Author Name:
Arun Bhole
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Description:
धर्म, दर्शन और विज्ञान अपने-अपने तरीक़े से सत्य और ज्ञान की खोज करते रहते हैं। स्थूल रूप से इनकी चेष्टाएँ विरोधी प्रतीत हो सकती हैं, लेकिन गहरे मन्तव्यों में लक्ष्य एक ही है। आस्तिक और नास्तिक केवल व्यावहारिक विभाजन हैं—प्रक्रिया की भिन्नता के कारण।
‘देवतुल्य नास्तिक’ पुस्तक में अरुण भोले कुछ विशिष्ट व्यक्तित्वों के माध्यम से जीवन के रहस्यों को जानने का प्रयास करते हैं। ‘ज्ञानपिपासु गौतम’, ‘अन्तर्मुखी विज्ञान’, ‘तटस्थ प्रकृति’, ‘वैज्ञानिक ज्ञान-मीमांसा’, ‘सन्देह और श्रद्धा के संगम’, ‘संवाद और सहयोग', 'जले दीप से दीप' तथा 'विज्ञान और नियति' शीर्षकों के अन्तर्गत लेखक ने सत्य और ज्ञान की खोज करनेवाले विश्वविख्यात व्यक्तित्वों का विश्लेषण किया है।
लेखक का उद्देश्य स्पष्ट है। वह चाहता है कि शक्तियों में समन्वय हो।
लेखक के शब्दों में : ‘अपने अन्वेषण और प्रयोगों से विज्ञान ने जो तथ्य बटोरे हैं, उन सबके आत्यन्तिक अर्थ क्या हैं तथा लोकमंगल की दृष्टि से उनका परम उपयोग क्या होगा, इसी का बोध ज्ञान माना जाएगा। वैसे ज्ञान के अभाव में अमर्यादित वैज्ञानिक जानकारियाँ हमें सर्वनाश की ओर ले जा सकती हैं। यही वह स्थल है जहाँ हमें धर्म और दर्शन की सहायता लेनी पड़ेगी; क्योंकि वैज्ञानिक भी मानते हैं कि जीवन को सँवारने और मानवीय भावनाओं को प्रभावित करने का अधिक अभ्यास और अनुभव दर्शन और धर्म को ही है।’
विश्व संस्कृति की अन्तर्धाराओं का प्रवाहपूर्ण, प्रामाणिक और सतर्क विश्लेषण।
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