Sone Ki Sikdi : Roop Ki Nathiya
(0)
Author:
Padamsri Chittoo Tudu, Rashmi Vajpeyi, Shiv Shankar Singh 'Parijat', Satya Prakash ChoudharyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Lyrics-songs₹
125
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संताल आदिवासी समुदाय झारखंड की आबादी का एक मुख्य हिस्सा है। यहाँ के तेजी से बदलते सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में संताल लोगों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती जा रही है। संताल परगना के प्रमण्डलीय मुख्यालय दुमका को झारखण्ड की उप-राजधानी का दर्जा दिया गया है जो इसकी महत्ता को स्वतः उजागर करता है। आज की बदली हुई स्थिति में संताल आदिवासियों के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर गहन शोध एवं अध्ययन की आवश्यकता प्रबल होती जा रही है। संताल आदिवासियों के बीच अलग-अलग मौसम त्योहार और अवसरों के लिए अलग-अलग गीतों के विधान हैं। दोङ अर्थात् विवाह गीतों के अतिरिक्त सोहराय दुरूमजाक् बाहा लांगड़े रिजां मतवार डान्टा और कराम संताल परगना के प्रमुख लोकगीत हैं। बापला अर्थात् विवाह संताल आदिवासियों के लिए मात्र एक रस्म ही नहीं वरन् एक वृहत् सामाजिक उत्सव की तरह है जिसका वे पूरा-पूरा आनन्द उठाते हैं। इसके हर विधि-विधान में मार्मिक गीतों का समावेश है। इन गीतों में जहाँ आपको आदिवासी जीवन की सहजता सरलता उत्फुल्लता तथा नैसर्गिकता आदि की झलक मिलेगी वहीं उनके जीवन-दर्शन सामाजिक सोच और मान्यता जिजीविषा तथा अदम्य आतंरिक शक्ति से भी अनायास साक्षात्कार हो जाएगा। परम्परागत संताली जीवन विविधतापूर्ण है जिसकी एक झलक प्रस्तुत करने की दिशा में हमने यह प्रयास किया है।
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संताल आदिवासी समुदाय झारखंड की आबादी का एक मुख्य हिस्सा है। यहाँ के तेजी से बदलते सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में संताल लोगों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती जा रही है। संताल परगना के प्रमण्डलीय मुख्यालय दुमका को झारखण्ड की उप-राजधानी का दर्जा दिया गया है जो इसकी महत्ता को स्वतः उजागर करता है। आज की बदली हुई स्थिति में संताल आदिवासियों के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर गहन शोध एवं अध्ययन की आवश्यकता प्रबल होती जा रही है।
संताल आदिवासियों के बीच अलग-अलग मौसम त्योहार और अवसरों के लिए अलग-अलग गीतों के विधान हैं। दोङ अर्थात् विवाह गीतों के अतिरिक्त सोहराय दुरूमजाक् बाहा लांगड़े रिजां मतवार डान्टा और कराम संताल परगना के प्रमुख लोकगीत हैं।
बापला अर्थात् विवाह संताल आदिवासियों के लिए मात्र एक रस्म ही नहीं वरन् एक वृहत् सामाजिक उत्सव की तरह है जिसका वे पूरा-पूरा आनन्द उठाते हैं। इसके हर विधि-विधान में मार्मिक गीतों का समावेश है। इन गीतों में जहाँ आपको आदिवासी जीवन की सहजता सरलता उत्फुल्लता तथा नैसर्गिकता आदि की झलक मिलेगी वहीं उनके जीवन-दर्शन सामाजिक सोच और मान्यता
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Book Details
-
ISBN9788126710096
-
Pages115
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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इस किताब का आधारभूत उद्देश्य हिंसा अपराधों के पीछे छिपे मनोविज्ञान को समझना है जो सबसे कम बिगड़े तथा भारतीय आदिवासियों में श्रेष्ठ प्रजाति के लोगों द्वारा किए जाते हैं, तथा वे परिस्थितियाँ जो यहाँ के आदमी, औरतों को आत्महत्या करने के लिए उकसाती हैं।
ऐसी कृति तथा शोधकार्य उन आदिवासियों को, जो जजों तथा मजिस्ट्रेटों द्वारा अपराधी करार दिए जाते हैं, सावधानी तथा बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से समझने तथा उनके साथ सलूक करने के लिए मार्गदर्शन दे सकते हैं। यह कृति निश्चित रूप से दंडित करने तथा आदिवासी कैदियों के साथ जेल में किए जानेवाले व्यवहार पर भी प्रश्न उठाती है। इस किताब के शुरुआती पृष्ठों में मारिया जीवन की विविधता को सारांश में बतलाया गया है। इस संक्षिप्तता में ही उनके अनेक विविध पक्षों को उजागर किया गया है। यह किताब अपराधों के अध्ययन की अपेक्षा सामाजिक नृतत्त्व विज्ञान के लिए एक अमूल्य योगदान है।
Kavi Man Jani Man :Aadivasi Stri Kavitayen
- Author Name:
Vandana Tete
- Book Type:

- Description:
वासी जनी (स्त्री) मन का धरातल बिलकुल दूसरी तरह का है। आदिवासियत के दर्शन पर खड़ा। समभाव जिसकी मूल प्रकृति है। प्राकृतिक विभेद के अलावा जहाँ इनसान अथवा सत्ता द्वारा कृत्रिम रूप से थोपा हुआ कोई दूसरा भेद नहीं है। हालाँकि कुछ बन्दिशें हैं, परन्तु सामन्ती क्रूरता और धार्मिक आडम्बरों के क़िले में आदिवासी स्त्री बिलकुल क़ैद नहीं है। ‘कवि मन जनी मन’ संकलन में वृहत्तर झारखंड के आदिवासी समुदायों की स्त्री-रचनाकारों की कविताएँ शामिल हैं। कवियों में से एक या दो को छोड़कर प्राय: सभी अपनी-अपनी आदिवासी मातृभाषाओं में लिखती हैं। परन्तु संकलन में शामिल कविताएँ मूल रूप से हिन्दी में रची गई हैं। कुछ का हिन्दी अनुवाद है जिसे कवयित्रियों ने स्वयं किया है। हिन्दी में आदिवासी स्त्री-कविताओं का मूल या अनुवाद लाना इसलिए ज़रूरी लगा कि यह समझ बिलकुल साफ़ हो जाए कि नसों में दौड़नेवाला लहू चाहे कितनी पीढ़ियों का सफ़र तय कर ले, अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ता। यानी रचने का, गढ़ने का और बचाने का स्वभाव। अपने लिए ही नहीं बल्कि सबके लिए सम्पूर्ण समष्टि की चिन्ता का स्वभाव। पहाड़ी नदी की तरह चंचल, पोखरे की तरह गम्भीर, घर के बीचोंबीच खड़ा मज़बूत स्तम्भ या कि आर्थिक-सांस्कृतिक पौष्टिकता लिये महुआ-सी महिलाएँ अपने समुदाय की रीढ़ हैं। ठीक वैसे ही उनका लेखन है। वे अपनी कविताओं से विमर्श करती हैं। उनके विमर्श में वर्चस्व की आक्रामकता नहीं बचाव के युद्धगीत हैं। और है रचने का दुर्दम्य आग्रह जिसका सबूत यह संकलन
Bastar Ki Aadivasi Evam Lok Hastshilp Parampara
- Author Name:
Harihar Vaishnav
- Book Type:

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कोई भी शिल्प या कला केवल शिल्प या कला नहीं होती, वह इतिहास को भी अपने भीतर समेटे होती है और वर्तमान को भी उसी तरह सामने रखती है, उसे प्रतिबिम्बित करती है। इतना ही नहीं, हम उसमें सम्बन्धित समाज का भविष्य भी देख-पढ़ सकते हैं। कहना ग़लत न होगा कि आदिवासी एवं लोक हस्तशिल्पों में उनका कल्पना-लोक बहुत ही प्रभावशाली ढंग से रूपायित होता और अहम् भूमिका निभाता दिखलाई पड़ता है। बस्तर अंचल के हस्तशिल्प, चाहे वे आदिवासी हस्तशिल्प हों या लोक हस्तशिल्प, दुनिया-भर के कलाप्रेमियों का ध्यान आकृष्ट करने में सक्षम रहे हैं! कारण, इनमें इस आदिवासी बहुल अंचल की आदिम संस्कृति की सोंधी महक बसी रही है। यह शिल्प-परम्परा और उसकी तकनीक बहुत पुरानी है। शिल्प का यह ज्ञान बहुत पुराना और पारम्परिक है, किन्तु इस ज्ञान का लिखित स्वरूप अब तक नहीं मिल पाया था। यही कारण है कि बस्तर अंचल में जन्मे, पले, बढ़े और सतत जिज्ञासु साहित्यकार-लेखक और संस्कृतिकर्मी हरिहर वैष्णव को यह लगा कि न केवल बस्तर, अपितु देश के अन्य भागों में विभिन्न हस्तशिल्प विधाओं से जुड़े शिल्पियों के पास शिल्प और उसकी परम्परा से सम्बन्धित जो मौखिक ज्ञान है, वह किसी-न-किसी तरह अगली पीढ़ी तक हस्तान्तरित होना चाहिए। श्री वैष्णव के पास यहाँ के आदिवासी एवं लोक हस्तशिल्पियों से सम्बद्ध विभिन्न लोगों से बातचीत के दौरान पहले से एकत्र थोड़ी-बहुत सामग्री तो थी और कच्ची भी। अपनी इस नहीं के बराबर और कच्ची जानकारी को उन्होंने सम्बन्धित शिल्पियों से कई-कई बार मिलकर तथा सहभागी अवलोकन आदि के द्वारा और अधिक समृद्ध करने का प्रयास किया। विश्वास है कि बस्तर के आदिवासी एवं लोक हस्तशिल्प तथा इसकी परम्परा में रुचि रखनेवाले कलाप्रेमियों तथा अध्येताओं के लिए यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी।
Garha Ka Gond Rajya
- Author Name:
Suresh Mishra
- Book Type:

- Description:
यह पुस्तक भारत के मध्य भाग के इतिहास के एक विस्मृत अध्याय को और गोंडों के गौरवशाली अतीत को उजागर करनेवाला एक दस्तावेज़ है। गढ़ा का गोंड राज्य बहुधा मुग़ल सम्राट अकबर की सेना से लोहा लेनेवाली वीरांगना रानी दुर्गावती के सन्दर्भ में ही याद किया जाता है और शेष इतिहास एक धुँधले आवरण से आवृत रहा है। यह आश्चर्य की बात है कि केवल दो सौ साल पहले समाप्त होनेवाले इस विशाल देशी राज्य के बारे में अभी तक बहुत कम जानकारी रही है। इस कृति में लेखक ने फ़ारसी, संस्कृत, मराठी, हिन्दी और अंग्रेज़ी स्रोतों के आधार पर गढ़ा राज्य का प्रामाणिक एवं क्रमबद्ध इतिहास प्रस्तुत किया है। वे सभी कड़ियाँ जोड़ दी गई हैं, जो अभी तक अज्ञात थीं। पुस्तक बताती है कि पन्द्रहवीं सदी के प्रारम्भ में विंध्य और सतपुड़ा और विन्ध्याचल के अंचल में गोंड राजाओं ने जिस राज्य की स्थापना की वह क्रमशः गढ़ा, गढ़ा-कटंगा और गढ़ा-मंडला के नाम से विख्यात हुआ। गढ़ा का गोंड राज्य यद्यपि सोलहवीं सदी में मुग़लों के अधीन हो गया, तथापि न्यूनाधिक विस्तार के साथ यह अठारहवीं सदी तक मौजूद रहा। सोलहवीं सदी में अपने चरमोत्कर्ष काल में यह राज्य उत्तर में पन्ना से दक्षिण में भंडारा तक और पश्चिम में भोपाल से लेकर पूर्व में अमरकंटक के आगे लाफागढ़ तक फैला हुआ था और 1784 में मराठों के हाथों समाप्त होने के समय भी यह वर्तमान मंडला, डिंडोरी, जबलपुर, कटनी और नरसिंहपुर ज़िलों और कुछ अन्य क्षेत्रों में फैला था। यह विस्तृत राज्य पौने तीन सौ वर्षों तक लगातार अस्तित्व में रहा, यह स्वयं में एक उल्लेखनीय बात है। राजनीतिक विवरण के साथ ही यह कृति उस काल की सांस्कृतिक गतिविधियों का परिचय देते हुए बताती है कि आम धारणा के विपरीत गोंड शासक साहित्य, कला और लोक कल्याण के प्रति भी जागरूक थे।
Santal Hool Santal-Vidroh : 1854-55
- Author Name:
Dr. S.P. Sinha +5
- Book Type:

- Description:
सन्ताल हूल झारखंड में हुए महान उपनिवेश-विरोधी विद्रोह के वास्तविक स्वरूप और भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास में उसके समुचित स्थान को रेखांकित करनेवाली पुस्तक है। भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आदिवासी प्रतिरोध का लम्बा सिलसिला रहा है। छोटानागपुर और सन्ताल परगना के आदिवासियों ने पहाड़ियों और घने जंगलों के अपने गढ़ में अंग्रेजों को कभी भी चैन से नहीं रहने दिया। वे ईस्ट इंडिया कम्पनी की शोषणकारी नीति और भेदभावपूर्ण व्यवस्था से असन्तुष्ट थे। उन्हें उसकी अधीनता स्वीकार नहीं थी। वे अपना राज चाहते थे, इसलिए उन्होंने बार-बार विद्रोह किया। उन्हीं विद्रोहों में से एक था सन्ताल हूल, जो 1857 के बहुचर्चित प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के ठीक पहले 1854-55 में हुआ था। इस विद्रोह के नेता थे सिदो, कानू, चाँद और भैरव। सन्ताल हूल का–जैसा कि अन्य आदिवासी विद्रोहों में भी दिखता है—उपनिवेशवाद विरोधी तेवर और स्वाधीनता का उद्देश्य स्पष्ट था। उसके नेताओं और भागीदारों की शहादत भी असंदिग्ध थी। बावजूद इसके उसके बारे में भ्रम बना रहा और बौद्धिक-अकादमिक जगत में ‘इतिहास को नीचे से देखने’ का विचार पनपने के वर्षों बीत जाने के बाद तक सन्ताल हूल को भारतीय इतिहास की मुख्यधारा में समुचित स्थान नहीं दिया गया। इसी स्थिति के मद्देनजर आदिवासी इतिहास और संस्कृति के अधिकारी विद्वान डॉ. एस.पी. सिन्हा ने इस पुस्तक में सन्ताल हूल के बारे में उपलब्ध तमाम दस्तावेजों, परम्परागत और मौखिक स्रोतों को आधार बनाकर सन्तालों की अपनी व्यवस्था, अंग्रेजी व्यवस्था से उनके असन्तोष, हूल के नेताओं के व्यक्तित्व और नेतृत्व-क्षमता, हूल के उद्देश्य और आदर्श आदि के वास्तविक स्वरूप को सामने रखा है। यह पुस्तक एक ओर सन्ताल हूल सम्बन्धी पहले के अध्ययनों की समीक्षा करती है तो भावी अध्ययनों के लिए एक प्रासंगिक दिशा निर्देश भी प्रस्तावित करती है। सिदो, कानू, चाँद और भैरव जैसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आरम्भिक सूत्रधारों को उनका श्रेय प्रदान करते हुए यह पुस्तक इतिहास के अधूरे परिप्रेक्ष्य को पूरा करती है।
Aadivasi Darshan
- Author Name:
Amrita Priyanka Ekka +4
- Book Type:

- Description:
सभ्यता और संस्कृति के स्तर पर किसी भी समुदाय की जीवनीशक्ति मूलत: उस समुदाय के दार्शनिक चिन्तन में निहित होती है। जिज्ञासा इस चिन्तन का बीज है और कल्पना उसके अँखुआने के लिए आवश्यक जल। इस तरह जो यात्रा आरम्भ होती है वह दर्शन के दायरे में तब प्रवेश करती है जब कल्पना और कल्पनाशक्ति से आगे बुद्धि और विवेक प्रधान हो जाते हैं, तब अज्ञात की गुत्थी खोलने में अलौकिक माध्यमों का परित्याग कर दिया जाता है और अनुभव को तथ्यों की जाँच और व्याख्या का आधार बनाया जाता है। इस मामले में आदिवासी समुदाय भी अपवाद नहीं है। लेकिन दर्शन सम्बन्धी विचार-विमर्शों में आदिवासी समुदायों का सन्दर्भ अब तक प्राय: अनुपस्थित रहा है, जबकि पृथ्वी के प्राचीनतम बाशिन्दों के रूप में वे आदि जिज्ञासु और आदि चिन्तक रहे हैं। उनकी एक सुचिन्तित दर्शन-परम्परा है, जो उनके धर्म—जिन्हें आदि धर्म, सनातन धर्म, गोंडी धर्म, पूयेम धर्म जैसी कई संज्ञाओं से जाना जाता है—सम्बन्धी धारणाओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यह जरूर है कि इतर समुदायों के विपरीत आदिवासी समुदायों का दार्शनिक चिन्तन वाचिक रूप में ही रहा है। यह हिन्दी में किंचित पहली पुस्तक है जिसमें आदिवासी दर्शन के बुनियादी तत्त्वों का परिचय और विवेचन प्रस्तुत किया गया है। भारत के विभिन्न भागों-अनेक आदिवासी समुदायों के दर्शन-चिन्तन, सृष्टि-कथा, तत्त्व मीमांसा, सत्ता-मीमांसा, ज्ञान-मीमांसा आदि विषयक विचारोत्तेजक सामग्री इस पुस्तक में संकलित की गई है। इसकी एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इसमें आदिवासी दर्शन को प्रस्तुत करने वाले विद्धानों में गैर आदिवासी और विदेशी विद्वान भी शामिल हैं जिनके अनुभव, अध्ययन और चिन्तन-मनन ने इस विषय को व्यापकता प्रदान की है। संक्षेप में, इतर समुदायों की तरह मनुष्य या ईश्वर केन्द्रित न होकर प्रकृति केन्द्रित आदिवासी दार्शनिक चिन्तन के विविध पहलुओं को सामने लाने वाली यह कृति निश्चय ही पाठक को एक नई दृष्टि प्रदान करेगी।
Jharkhand : Disum Muktigatha Aur Srijan Ke Sapne
- Author Name:
Harivansh
- Book Type:

- Description:
झारखण्ड एक सांस्कृतिक-सामाजिक अवधारणा है। आन्दोलन के दीर्घकालिक इतिहास ने इसे विशिष्ट पहचान दी है। देशज सृजन एवं विचारों के सपने। जिन्दगी की सादगी। व्यवहार की सरलता। जिस तरह झरने पहाड़ों-जंगलों में गुनगुनाते हैं, उसी तरह झारखंडी आकांक्षाएँ प्राकृतिक साहचर्य का जीवन्त संवाद प्रेषित करती हैं। झारखंडी दिसुम की मुक्तिगाथा इन्हीं बोधों का दस्तावेज है। मानवीय सम्मान, देशज जनज्ञान और स्वशासन की अपराजेय चेतना झारखंड का मूल स्वर हैं। झारखण्ड स्त्री-पुरुष समानता, स्वशासी ग्राम-परम्परा, सामुदायिक जीवन, सम्पत्ति पर सामूहिक हक और सर्वानुमति मूलक जनतंत्र का जीवन्त जनबोध है। मानवीय सरोकारों की आदिम चेतना निरन्तर गतिशील व नवीनीकरण की प्रक्रिया से गुजरती भावी दुनिया के लिए अनेक उपहारों को सँजोए है और इनसे संघर्ष और निर्माण की दोहरी प्रक्रिया स्वाभाविक जीवन बनकर उभरती है। झारखण्ड प्रतिरोध संस्कृति का वह दिसुम (इलाका) है, जहाँ अस्मिता एवं स्वशासन एक गम्भीर विमर्श के रूप में सामूहिक चेतना का अभिन्न हिस्सा हैं। रचनात्मकता का एक नया क्षितिज दिखता है। श्रम की प्रतिष्ठा का अद्भुत केन्द्र। इस पुस्तक में झारखंडी दर्शन को व्यापक सन्दर्भ में देखने-समझने की कोशिश की गयी है। आदिवासी संस्कृति के मिथक एवं यथार्थ के विमर्श का विस्तृत फलक यहाँ प्रस्तुत है। समकालीन चुनौतियों एवं संकटों के बीच झारखंडी जनसमाज में अन्तर्निहित देशज विकल्प उम्मीदों से भरे रोशनदान हैं और अद्यतन विमर्श में एक नए अध्याय की तरह उपस्थिति दर्ज कराते हैं।
Aadivasi Kaun
- Author Name:
Ramanika Gupta
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आज अगर सबसे बड़ा ख़तरा आदिवासी जमात को है, तो वह है उसकी पहचान मिटने का। इक्कीसवीं सदी में उसकी पहचान मिटाने की साज़िश एक योजनाबद्ध तरीक़े से रची जा रही है। किसी भी जमात, जाति, नस्ल या कबीले अथवा देश को मिटाना हो तो उसकी पहचान मिटाने का काम सबसे पहले शुरू किया जाता है। ‘आदिवासी’ की पहचान और नाम छीनकर उसे ‘वनवासी’ घोषित किया जा रहा है ताकि वह यह बात भूल जाए कि वह इस देश का मूल निवासी यानी आदिवासी है—वह भूल जाए अपनी संस्कृति, भाषा और अपना मूल धर्म ‘सरना’। यह पुस्तक आदिवासियों के जीवन के कई ऐसे अनछुए पहलुओं को हमारे सामने लाती है जिनसे अभी तक हम अपरिचित थे। स्वयं आदिवासियों द्वारा क़लमबद्ध किए गए विचारों को यहाँ दिया गया है। आदिवासियों की दशा में परिवर्तन कैसे हो, उनकी शिक्षा कैसी हो व किस प्रकार उनके जीवन से जुड़ी सभी समस्याओं का निदान किया जाए, जैसे सवालों को भी यहाँ उठाया गया है। आदिवासियों के अस्तित्व की बानगी प्रस्तुत करती यह पुस्तक सभी के लिए महत्त्वपूर्ण है।
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