Jharkhand : Disum Muktigatha Aur Srijan Ke Sapne
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झारखण्ड एक सांस्कृतिक-सामाजिक अवधारणा है। आन्दोलन के दीर्घकालिक इतिहास ने इसे विशिष्ट पहचान दी है। देशज सृजन एवं विचारों के सपने। जिन्दगी की सादगी। व्यवहार की सरलता। जिस तरह झरने पहाड़ों-जंगलों में गुनगुनाते हैं, उसी तरह झारखंडी आकांक्षाएँ प्राकृतिक साहचर्य का जीवन्त संवाद प्रेषित करती हैं। झारखंडी दिसुम की मुक्तिगाथा इन्हीं बोधों का दस्तावेज है। मानवीय सम्मान, देशज जनज्ञान और स्वशासन की अपराजेय चेतना झारखंड का मूल स्वर हैं। झारखण्ड स्त्री-पुरुष समानता, स्वशासी ग्राम-परम्परा, सामुदायिक जीवन, सम्पत्ति पर सामूहिक हक और सर्वानुमति मूलक जनतंत्र का जीवन्त जनबोध है। मानवीय सरोकारों की आदिम चेतना निरन्तर गतिशील व नवीनीकरण की प्रक्रिया से गुजरती भावी दुनिया के लिए अनेक उपहारों को सँजोए है और इनसे संघर्ष और निर्माण की दोहरी प्रक्रिया स्वाभाविक जीवन बनकर उभरती है। झारखण्ड प्रतिरोध संस्कृति का वह दिसुम (इलाका) है, जहाँ अस्मिता एवं स्वशासन एक गम्भीर विमर्श के रूप में सामूहिक चेतना का अभिन्न हिस्सा हैं। रचनात्मकता का एक नया क्षितिज दिखता है। श्रम की प्रतिष्ठा का अद्भुत केन्द्र। इस पुस्तक में झारखंडी दर्शन को व्यापक सन्दर्भ में देखने-समझने की कोशिश की गयी है। आदिवासी संस्कृति के मिथक एवं यथार्थ के विमर्श का विस्तृत फलक यहाँ प्रस्तुत है। समकालीन चुनौतियों एवं संकटों के बीच झारखंडी जनसमाज में अन्तर्निहित देशज विकल्प उम्मीदों से भरे रोशनदान हैं और अद्यतन विमर्श में एक नए अध्याय की तरह उपस्थिति दर्ज कराते हैं।
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झारखण्ड एक सांस्कृतिक-सामाजिक अवधारणा है। आन्दोलन के दीर्घकालिक इतिहास ने इसे विशिष्ट पहचान दी है। देशज सृजन एवं विचारों के सपने। जिन्दगी की सादगी। व्यवहार की सरलता। जिस तरह झरने पहाड़ों-जंगलों में गुनगुनाते हैं, उसी तरह झारखंडी आकांक्षाएँ प्राकृतिक साहचर्य का जीवन्त संवाद प्रेषित करती हैं। झारखंडी दिसुम की मुक्तिगाथा इन्हीं बोधों का दस्तावेज है। मानवीय सम्मान, देशज जनज्ञान और स्वशासन की अपराजेय चेतना झारखंड का मूल स्वर हैं। झारखण्ड स्त्री-पुरुष समानता, स्वशासी ग्राम-परम्परा, सामुदायिक जीवन, सम्पत्ति पर सामूहिक हक और सर्वानुमति मूलक जनतंत्र का जीवन्त जनबोध है। मानवीय सरोकारों की आदिम चेतना निरन्तर गतिशील व नवीनीकरण की प्रक्रिया से गुजरती भावी दुनिया के लिए अनेक उपहारों को सँजोए है और इनसे संघर्ष और निर्माण की दोहरी प्रक्रिया स्वाभाविक जीवन बनकर उभरती है।
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Book Details
-
ISBN9788126704033
-
Pages396
-
Avg Reading Time13 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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21वीं सदी में पहुँचकर भी हमारे देश का आदिवासी समाज जहाँ विकास की बाट जोह रहा है। वहीं दूसरी तरफ़ सरकार की उदासीन नीतियों के कारण उनकी स्थिति ज्यों की त्यों ही है।
विकास के नाम पर छले जा रहे आदिवासियों के पलायन और विस्थापन आदि समस्याओं पर केन्द्रित यह पुस्तक समाज और सरकार के सम्मुख कई सवाल खड़े करती है।
Hatya Aur Atamhatya Ke Beech Mariya
- Author Name:
Veriar Elwin +1
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- Description:
इस किताब का आधारभूत उद्देश्य हिंसा अपराधों के पीछे छिपे मनोविज्ञान को समझना है जो सबसे कम बिगड़े तथा भारतीय आदिवासियों में श्रेष्ठ प्रजाति के लोगों द्वारा किए जाते हैं, तथा वे परिस्थितियाँ जो यहाँ के आदमी, औरतों को आत्महत्या करने के लिए उकसाती हैं।
ऐसी कृति तथा शोधकार्य उन आदिवासियों को, जो जजों तथा मजिस्ट्रेटों द्वारा अपराधी करार दिए जाते हैं, सावधानी तथा बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से समझने तथा उनके साथ सलूक करने के लिए मार्गदर्शन दे सकते हैं। यह कृति निश्चित रूप से दंडित करने तथा आदिवासी कैदियों के साथ जेल में किए जानेवाले व्यवहार पर भी प्रश्न उठाती है। इस किताब के शुरुआती पृष्ठों में मारिया जीवन की विविधता को सारांश में बतलाया गया है। इस संक्षिप्तता में ही उनके अनेक विविध पक्षों को उजागर किया गया है। यह किताब अपराधों के अध्ययन की अपेक्षा सामाजिक नृतत्त्व विज्ञान के लिए एक अमूल्य योगदान है।
Lachhami Jaggar
- Author Name:
Harihar Vaishnav
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- Description:
‘लछमी जगार’ की कथा की भाव-भूमि का सम्बन्ध धान उत्पादन-प्रक्रिया के विस्तारित प्रसंग से है, अत: इसका गठन उसी के अनुरूप है। पाठक इस तथ्य की स्वत: पड़ताल के लिए आमंत्रित हैं। निम्न प्रतीकों की जानकारी जो हल्बी भाषी समुदाय के लिए तो स्पष्ट है, किन्तु उनसे इतर पाठकों के लिए इस कथा के सामान्य परिदृश्य को समझने हेतु आवश्यक जान पड़ती है : मेंग का अर्थ वर्षा है तो माहालखी हैं धान और इक्कीस रानियाँ हैं विभिन्न दलहनी-तिलहनी और अन्य मोटे अनाज। इसी तरह गोपपुर है खेत। इस कथा के नायक नरायन राजा की तुलना सूर्य से की जा सकती है जबकि माहादेव (शिव) को बीज-पुरुष के रूप में देखना चाहिए।
यहाँ यह जानना भी आवश्यक होगा कि दण्डकारण्य का पठार धान उत्पादक पूर्व एवं गौण अन्न उत्पादक पश्चिम की सीमा पर स्थित है। गौण अन्न का उत्पादन पहाड़ी भूमि पर तो किया जा सकता है, किन्तु धान के उत्पादन के लिए सम एवं सिंचित भू-भाग का होना आवश्यक है। इसलिए धान उत्पादन ने अपने-आपको मुख्य भूमि में स्थापित किया, जबकि गौण अन्न गाँव की सीमा पर चले गए। नरायन राजा का विवाह पहले गौण खाद्यान्नों (इक्कीस रानियों) के साथ हुआ और उसके बाद धान (माहालखी) के साथ। मिथकीय दृष्टि से यह कथा इस क्षेत्र का जनपदीय इतिहास सिद्ध होती है। और जैसे ही हम कथा के इस बिन्दु को आत्मसात् कर लेते हैं, वैसे ही इस कथा में आए पत्नी-पीड़क प्रसंगों और धान की मिंजाई के प्रसंग के बीच के अन्तर्सम्बन्धों को भी पकड़ने में सफल हो सकते हैं।
इस महाकाव्य का आयोजन बस्तर की महिलाओं के लिए एक पवित्र अनुष्ठान है। वस्तुत: ‘लछमी जगार’ चर्चा की नहीं अपितु महसूस करने की चीज़ है। यह महसूसना इसके भीतर के विभिन्न संस्कारों और उनसे जुड़े विश्वास, जो विभिन्न संस्कारों में सन्निहित भिन्न-भिन्न भूमिकाओं में देखे जा सकते हैं, के साथ एकात्म होकर सहभागी होने में है। कथा में वर्णित कुछ एक घटनाओं का सजीव चित्रण उनकी अभिनय प्रस्तुति के साथ किया जाता है, जिनकी मुख्य भूमिकाओं में स्वयं आयोजक ही होते हैं। इन अनुष्ठानों/संस्कारों को मुख्य एवं गौण, दो श्रेणियों में बाँटकर देखा जा सकता है। भिमा-विवाह (अध्याय 16), आम-विवाह (अध्याय 21) एवं माहालखी का विवाह। (अध्याय 32) इस महाकाव्य की प्रमुख घटनाएँ हैं जो विपुल जन-समुदाय को आकर्षित करती हैं।
Dalit-Vimarsh Aur Hindi Sahitya
- Author Name:
Deepak Kumar Pandey
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हिन्दी में दलित रचनाकारों की रचनाएँ लगभग तभी से मिलती हैं, जब से हिन्दी साहित्य का आरम्भ होता है। सिद्धों-नाथों की बानियों से लेकर सन्त साहित्य तक दलित रचनाकारों द्वारा रचित विपुल साहित्य हिन्दी की अमूल्य सम्पदा है। आधुनिक युग में समता, न्याय और सामाजिक सम्मान के लिए अम्बेडकरवादी वैचारिक प्रेरणा से लिखे गए सामाजिक बदलाव के साहित्य को ‘दलित साहित्य’ की संज्ञा प्राप्त हुई। सचेत अम्बेडकरवादी प्रेरणा का साहित्य हिन्दी से पहले ही मराठी आदि अन्य भारतीय भाषाओं में लिखा गया। पिछली सदी में 1980 के दशक से हिन्दी का दलित लेखन परिमाण और गुणवता, दोनों ही स्तरों पर अपनी सुस्पष्ट स्वतंत्र पहचान बनाता है। दलित साहित्य अखिल भारतीय परिघटना है। हिन्दी में पिछले चार दशक से सक्रिय दलित रचनाकारों की अनेक पीढ़ियों के प्रतिनिधि स्वरों से रचा गया यह संकलन वक़्त की माँग है।
Vaachikata : Aadivasi Darshan, Sahitya Aur Saundaryabodh
- Author Name:
Vandana Tete
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आदिवासी दर्शन प्रकृतिवादी है। आदिवासी समाज धरती, प्रकृति और सृष्टि के ज्ञात-अज्ञात निर्देश, अनुशासन और विधान को सर्वोच्च स्थान देता है। उसके दर्शन में सत्य-असत्य, सुन्दर-असुन्दर, मनुष्य-अमनुष्य जैसी कोई अवधारणा नहीं है, न ही वह मनुष्य को उसके बुद्धि-विवेक अथवा ‘मनुष्यता’ के कारण 'महान' मानता है। उसका दृढ़ विश्वास है कि सृष्टि में जो कुछ भी सजीव और निर्जीव है, सब समान है। न कोई बड़ा है, न कोई छोटा है। न कोई दलित है, न कोई ब्राह्मण। सब अर्थवान है एवं सबका अस्तित्व एकसमान है—चाहे वह एक कीड़ा हो, पौधा हो, पत्थर हो या कि मनुष्य हो। वह ज्ञान, तर्क, अनुभव और भौतिकता को प्रकृति के अनुशासन की सीमा के भीतर ही स्वीकार करता है, उसके विरुद्ध नहीं। अन्वेषण, परीक्षण और ज्ञान को आदिवासी दर्शन सुविधा और उपयोगिता की दृष्टि से नहीं देखता, बल्कि धरती, प्रकृति और समस्त जीव-जगत के साथ सहजीवी सामंजस्य और अस्तित्वपूर्ण संगति के बतौर देखता है। मानव की सभी गतिविधियों और व्यवहारों को, समूची विकासात्मक प्रक्रिया को प्रकृति व समष्टि के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसके पूरक के रूप में देखता है। उन सबका उपयोग वह वहीं तक करता है, जहाँ तक समष्टि के किसी भी वस्तु अथवा जीव को, प्रकृति और धरती को कोई गम्भीर क्षति नहीं पहुँचती हो। जीवन का क्षरण अथवा क्षय नहीं होता हो। आदिवासी साहित्य इसी दर्शन को लेकर चलता है।
Vaachikata : Aadivasi Darshan, Sahitya Aur Saundaryabodh
Vandana Tete
20% off₹ 199
₹ 159.2
Available
Bastar Ki Aadivasi Evam Lok Hastshilp Parampara
- Author Name:
Harihar Vaishnav
- Book Type:

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कोई भी शिल्प या कला केवल शिल्प या कला नहीं होती, वह इतिहास को भी अपने भीतर समेटे होती है और वर्तमान को भी उसी तरह सामने रखती है, उसे प्रतिबिम्बित करती है। इतना ही नहीं, हम उसमें सम्बन्धित समाज का भविष्य भी देख-पढ़ सकते हैं। कहना ग़लत न होगा कि आदिवासी एवं लोक हस्तशिल्पों में उनका कल्पना-लोक बहुत ही प्रभावशाली ढंग से रूपायित होता और अहम् भूमिका निभाता दिखलाई पड़ता है। बस्तर अंचल के हस्तशिल्प, चाहे वे आदिवासी हस्तशिल्प हों या लोक हस्तशिल्प, दुनिया-भर के कलाप्रेमियों का ध्यान आकृष्ट करने में सक्षम रहे हैं! कारण, इनमें इस आदिवासी बहुल अंचल की आदिम संस्कृति की सोंधी महक बसी रही है। यह शिल्प-परम्परा और उसकी तकनीक बहुत पुरानी है। शिल्प का यह ज्ञान बहुत पुराना और पारम्परिक है, किन्तु इस ज्ञान का लिखित स्वरूप अब तक नहीं मिल पाया था। यही कारण है कि बस्तर अंचल में जन्मे, पले, बढ़े और सतत जिज्ञासु साहित्यकार-लेखक और संस्कृतिकर्मी हरिहर वैष्णव को यह लगा कि न केवल बस्तर, अपितु देश के अन्य भागों में विभिन्न हस्तशिल्प विधाओं से जुड़े शिल्पियों के पास शिल्प और उसकी परम्परा से सम्बन्धित जो मौखिक ज्ञान है, वह किसी-न-किसी तरह अगली पीढ़ी तक हस्तान्तरित होना चाहिए। श्री वैष्णव के पास यहाँ के आदिवासी एवं लोक हस्तशिल्पियों से सम्बद्ध विभिन्न लोगों से बातचीत के दौरान पहले से एकत्र थोड़ी-बहुत सामग्री तो थी और कच्ची भी। अपनी इस नहीं के बराबर और कच्ची जानकारी को उन्होंने सम्बन्धित शिल्पियों से कई-कई बार मिलकर तथा सहभागी अवलोकन आदि के द्वारा और अधिक समृद्ध करने का प्रयास किया। विश्वास है कि बस्तर के आदिवासी एवं लोक हस्तशिल्प तथा इसकी परम्परा में रुचि रखनेवाले कलाप्रेमियों तथा अध्येताओं के लिए यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी।
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