Aadi Dharam : Bhartiya Aadivasiyon Ki Dharmik aastayen
(0)
Author:
Ramdayal Munda, Ratan Singh MankiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
1495
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भारतीय संविधान ने देश के क़रीब 10 करोड़ आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe) के रूप में एक सामाजिक, आर्थिक पहचान दी है किन्तु जनगणना प्रक्रिया में आदिवासी आस्थाओं को प्रतिबिम्बित करनेवाले किसी निश्चित ‘कोड’ के अभाव में इस आबादी के बहुलांश को ‘हिन्दू जैसा’ मानकर हिन्दू घोषित कर दिया गया है। एक अनिश्चित कोड ज़रूर है ‘अन्य’, किन्तु भूले-भटकों के इस विकल्प में कोई जानबूझकर सम्मिलित होना नहीं चाहता। सभी धर्मों के साथ वृहत्तर दायरे में अल्पांश में मेल रहते हुए और सतही तौर पर आपसी वैभिन्न्य के रहते हुए भी आदिवासी आस्थाएँ अन्दर से जुड़ी हुई हैं। यह पुस्तक आदिवासी आस्थाओं की इन्हीं विशिष्टताओं को उजागर करती है और उन्हें ‘आदि धरम’ के अन्तर्गत चिन्हित करने और क़ानूनी मान्यता देने का प्रस्ताव करती है। वे विशिष्टताएँ हैं— परमेश्वर के ‘घर’ के रूप में किन्हीं कृत्रिम संरचनाओं पर ज़ोर न देकर प्रकृति के अवयवों (पहाड़, जंगल, नदियों) को ही प्राथमिकता देना। मृत्यु के बाद मनुष्य का अपने समाज में ही वापस आना और अपने पूर्वजों के साथ हमेशा रहना। इसलिए समाज सम्मत जीवन बिताकर पुण्य का भागी होना सर्वोत्तम आदर्श। समाज विरोधी होने को पापकर्म समझना। इसलिए स्वर्ग-नरक इसी पृथ्वी पर ही। अन्यत्र नहीं। आदि धरम सृष्टि के साथ ही स्वतःस्फूर्त है, किसी अवतार, मसीहा या पैगम्बर द्वारा चलाया हुआ नहीं। समुदाय की पूर्व आत्माओं के सामूहिक नेतृत्व द्वारा समाज का दिशा-निर्देश। आदि धरम व्यवस्था में परमेश्वर के साथ सीधे जुड़ने की स्वतंत्रता होना। किसी मध्यस्थ पुरोहित, पादरी की अनिवार्यता नहीं। सृष्टि के अन्य अवदानों के साथ पारस्परिक सम्पोषण (Symbiotic) सम्बन्ध का होना। आखेट एवं कृषि आधारित सामुदायिक जीवन के पर्व-त्योहारों के अनुष्ठानों एवं व्यक्ति संस्कार के अनुष्ठान मंत्रों द्वारा पुस्तक में इन्हीं आशयों का सत्यापन हुआ है। पुस्तक में इन अवसरों पर उच्चरित होनेवाले मंत्रों पर विशेष ज़ोर है क्योंकि वर्णनात्मक सूचनाएँ तो पूर्ववर्ती स्रोतों में मिल जाती हैं किन्तु भाषागत तथ्य बिरले ही मिलते हैं।
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भारतीय संविधान ने देश के क़रीब 10 करोड़ आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe) के रूप में एक सामाजिक, आर्थिक पहचान दी है किन्तु जनगणना प्रक्रिया में आदिवासी आस्थाओं को प्रतिबिम्बित करनेवाले किसी निश्चित ‘कोड’ के अभाव में इस आबादी के बहुलांश को ‘हिन्दू जैसा’ मानकर हिन्दू घोषित कर दिया गया है। एक अनिश्चित कोड ज़रूर है ‘अन्य’, किन्तु भूले-भटकों के इस विकल्प में कोई जानबूझकर सम्मिलित होना नहीं चाहता। सभी धर्मों के साथ वृहत्तर दायरे में अल्पांश में मेल रहते हुए और सतही तौर पर आपसी वैभिन्न्य के रहते हुए भी आदिवासी आस्थाएँ अन्दर से जुड़ी हुई हैं। यह पुस्तक आदिवासी आस्थाओं की इन्हीं विशिष्टताओं को उजागर करती है और उन्हें ‘आदि धरम’ के अन्तर्गत चिन्हित करने और क़ानूनी मान्यता देने का प्रस्ताव करती है। वे विशिष्टताएँ हैं—
परमेश्वर के ‘घर’ के रूप में किन्हीं कृत्रिम संरचनाओं पर ज़ोर न देकर प्रकृति के अवयवों (पहाड़, जंगल, नदियों) को ही प्राथमिकता देना।
मृत्यु के बाद मनुष्य का अपने समाज में ही वापस आना और अपने पूर्वजों के साथ हमेशा रहना। इसलिए समाज सम्मत जीवन बिताकर पुण्य का भागी होना सर्वोत्तम आदर्श। समाज विरोधी होने को पापकर्म समझना। इसलिए स्वर्ग-नरक इसी पृथ्वी पर ही। अन्यत्र नहीं।
आदि धरम सृष्टि के साथ ही स्वतःस्फूर्त है, किसी अवतार, मसीहा या पैगम्बर द्वारा चलाया हुआ नहीं। समुदाय की पूर्व आत्माओं के सामूहिक नेतृत्व द्वारा समाज का दिशा-निर्देश।
आदि धरम व्यवस्था में परमेश्वर के साथ सीधे जुड़ने की स्वतंत्रता होना। किसी मध्यस्थ पुरोहित, पादरी की अनिवार्यता नहीं।
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आखेट एवं कृषि आधारित सामुदायिक जीवन के पर्व-त्योहारों के अनुष्ठानों एवं व्यक्ति संस्कार के अनुष्ठान मंत्रों द्वारा पुस्तक में इन्हीं आशयों का सत्यापन हुआ है। पुस्तक में इन अवसरों पर उच्चरित होनेवाले मंत्रों पर विशेष ज़ोर है क्योंकि वर्णनात्मक सूचनाएँ तो पूर्ववर्ती स्रोतों में मिल जाती हैं किन्तु भाषागत तथ्य बिरले ही मिलते हैं।
Book Details
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ISBN9788126717514
-
Pages452
-
Avg Reading Time15 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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वृद्धावस्था में अनेक शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं आर्थिक बदलाव आते हैं जिनके साथ तालमेल बिठाना आवश्यक है। हर व्यक्ति की परिस्थितियों से तालमेल बिठाने की क्षमता भी अलग-अलग होती है। इस अवस्था में पग-पग पर अनिश्चितता भी होती है।
बुज़ुर्गों में स्वास्थ्य की समस्याएँ जटिल होती हैं। वे स्वयं अपनी स्वास्थ्य समस्याओं को ठीक से नहीं समझते हैं क्योंकि कई लोगों में एक से अधिक बीमारियाँ मौजूद होती हैं। इसलिए उनका इलाज भी कठिन होता है। अनेक औषधियों के सेवन से उनके दुष्प्रभाव भी उन बीमारियों में सम्मिलित हो जाते हैं। अनेक बुज़ुर्ग इलाज का ख़र्च वहन करने में अक्षम होते हैं, तब बुज़ुर्गों को और कठिनाइयाँ हो जाती हैं। नियमित एवं सादा खान-पान, स्वास्थ्य के प्रति चेतना, सुबह-शाम टहलना, योग, व्यायाम आदि में नियमित रहना रोग निराकरण में बहुत मददगार होता है। प्रत्येक बुज़ुर्ग को दूसरे बुज़ुर्गों की देखभाल के लिए समय भी निकालना चाहिए जिससे उनको राहत मिलेगी।
आपकी जीवन-संध्या सुखद होगी या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपने इस जीवन संध्या के लिए सार्थक योजना बनाई थी या नहीं।
इस पुस्तक लेखन का उद्देश्य यह है कि पाठकों में इस अवस्था के बारे में जागरूकता आए।
Born A Crime
- Author Name:
Trevor Noah +1
- Book Type:

- Description: भिन्न वंशाच्या-वर्गाच्या स्त्री-पुरुषांमध्ये घडणाऱ्या शरीर-संबंधांवर प्रतिबंध घालणारा एक कायदा एकेकाळी दक्षिण अफ्रिकेत अंमलात आणला होता. परिणामी अशा जोडप्यांची मुलं या कायद्यामुळे गुन्हेगार म्हणूनच जन्माला यायची. अशा परिस्थितीत एका आग्रही, व्यवस्थेला फाट्यावर मारणाऱ्या कृष्णवर्णीय तरुणीने आपल्या युरोपियन गोऱ्या प्रियकरासोबत एक निर्णय घेतला... मुलाला जन्म देण्याचा आणि ते मूल एकटीने वाढवायचा. तिने जाणतेपणी, ठरवून हा गुन्हा केला आणि त्यातून ‘ट्रेवर नोआ' जन्माला आला. अशा परिस्थितीत वाढतानाचे ट्रेवर नोआचे अनुभव आणि असं मूल पदरी असताना, त्याला वाढवतानाची त्याच्या आईची उडणारी त्रेधातिरपिट याची भेदक, मजेशीर, स्पष्ट कथा म्हणजे ‘बॉर्न अ क्राइम' हे हृदयस्पर्शी आत्मचरित्र होय. मुख्य म्हणजे दक्षिण आफ्रिकेतलं वातावरण कितीही क्रूर असलं तरी या दोघांच्या नात्यामुळे ही गोष्ट एका उंचीवर पोहोचते. वर्ग, वर्ण, लिंग याबद्दलची आपली समज अधिक गहिरी होते. म्हणूनच हे आत्मचरित्र प्रत्येकाने वाचलंच पाहिजे... Born A Crime | Trevor Noah Translated By : Aabha Patwardhan बॉर्न अ क्राइम | ट्रेवर नोआ | अनुवाद : आभा पटवर्धन
The Riligion Of The Forest
- Author Name:
Rabindranath Thakur
- Rating:
- Book Type:

- Description: We stand before this great world. The truth of the life depends upon our attitude of mind toward it - an attitude which is formed by our habit of dealing with is according to the special circumstance of our surroundings and our temperaments. It guides our attempts to establish relations with the universe either by conquest or by union, either through the cultivation of power or through that of sympathy. And thus, in our realization of the truth of existence, we put our emphasis either upon the principle of unity.
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