Aadivasi : Vikas Se Visthapan
(0)
Author:
Ramanika GuptaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
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आदिवासियों का पलायन और विस्थापन सदियों से होता रहा है और ये आज भी जारी है। आदिवासियों के जंगलों, ज़मीनों, गाँवों, संसाधनों पर क़ब्ज़ा कर उन्हें दर-दर भटकने के लिए मजबूर करने के पीछे मुख्य कारण हमारी सरकारी व्यवस्था रही है। वे केवल अपने जंगलों, संसाधनों या गाँवों से ही बेदख़ल नहीं हुए बल्कि मूल्यों, नैतिक अवधारणाओं, जीवन-शैलियों, भाषाओं एवं संस्कृति से भी वे बेदख़ल कर दिए गए हैं।</p> <p>हमारे मौलिक सिद्धान्तों के अन्तर्गत सभी को विकास का समान अधिकार है। लेकिन आज़ादी के बाद के पहले पाँच वर्षों में लगभग ढाई लाख लोगों में से 25 प्रतिशत आदिवासियों को मजबूरन विस्थापित होना पड़ा। विकास के नाम पर लाखों लोगों को अपनी रोज़ी-रोटी, काम-धंधों तथा ज़मीनों से हाथ धोना पड़ा। उनको मिलनेवाले मूलभूत अधिकार जो उनकी ज़मीनों से जुड़े थे, वे भी उन्हें प्राप्त नहीं हुए।</p> <p>आदिवासियों के प्रति सरकार तथा तथाकथित मुख्यधारा के समाज के लोगों का नज़रिया कभी संतोषजनक नहीं रहा। आदिवासियों को सरकार द्वारा पुनर्वसित करने का प्रयास भी पूर्ण रूप से सार्थक नहीं हो सका। अन्ततः अपनी ही ज़मीनों व संसाधनों से विलग हुए आदिवासियों का जीवन मरणासन्न अवस्था में पहुँच गया।</p> <p>21वीं सदी में पहुँचकर भी हमारे देश का आदिवासी समाज जहाँ विकास की बाट जोह रहा है। वहीं दूसरी तरफ़ सरकार की उदासीन नीतियों के कारण उनकी स्थिति ज्यों की त्यों ही है।</p> <p>विकास के नाम पर छले जा रहे आदिवासियों के पलायन और विस्थापन आदि समस्याओं पर केन्द्रित यह पुस्तक समाज और सरकार के सम्मुख कई सवाल खड़े करती है।
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आदिवासियों का पलायन और विस्थापन सदियों से होता रहा है और ये आज भी जारी है। आदिवासियों के जंगलों, ज़मीनों, गाँवों, संसाधनों पर क़ब्ज़ा कर उन्हें दर-दर भटकने के लिए मजबूर करने के पीछे मुख्य कारण हमारी सरकारी व्यवस्था रही है। वे केवल अपने जंगलों, संसाधनों या गाँवों से ही बेदख़ल नहीं हुए बल्कि मूल्यों, नैतिक अवधारणाओं, जीवन-शैलियों, भाषाओं एवं संस्कृति से भी वे बेदख़ल कर दिए गए हैं।</p>
<p>हमारे मौलिक सिद्धान्तों के अन्तर्गत सभी को विकास का समान अधिकार है। लेकिन आज़ादी के बाद के पहले पाँच वर्षों में लगभग ढाई लाख लोगों में से 25 प्रतिशत आदिवासियों को मजबूरन विस्थापित होना पड़ा। विकास के नाम पर लाखों लोगों को अपनी रोज़ी-रोटी, काम-धंधों तथा ज़मीनों से हाथ धोना पड़ा। उनको मिलनेवाले मूलभूत अधिकार जो उनकी ज़मीनों से जुड़े थे, वे भी उन्हें प्राप्त नहीं हुए।</p>
<p>आदिवासियों के प्रति सरकार तथा तथाकथित मुख्यधारा के समाज के लोगों का नज़रिया कभी संतोषजनक नहीं रहा। आदिवासियों को सरकार द्वारा पुनर्वसित करने का प्रयास भी पूर्ण रूप से सार्थक नहीं हो सका। अन्ततः अपनी ही ज़मीनों व संसाधनों से विलग हुए आदिवासियों का जीवन मरणासन्न अवस्था में पहुँच गया।</p>
<p>21वीं सदी में पहुँचकर भी हमारे देश का आदिवासी समाज जहाँ विकास की बाट जोह रहा है। वहीं दूसरी तरफ़ सरकार की उदासीन नीतियों के कारण उनकी स्थिति ज्यों की त्यों ही है।</p>
<p>विकास के नाम पर छले जा रहे आदिवासियों के पलायन और विस्थापन आदि समस्याओं पर केन्द्रित यह पुस्तक समाज और सरकार के सम्मुख कई सवाल खड़े करती है।
Book Details
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ISBN9788183612173
-
Pages156
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: भारत के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी द्वारा भारत के आर्थिक इतिहास में महत्त्वपूर्ण पलों का व्यावहारिक विश्लेषण और भावी वैश्विक संकट के समाधान का निर्णय कर सकनेवाले अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में बहुपक्षीयता का भविष्य। यह पुस्तक वी. श्रीनिवास भारत सरकार के विशिष्ट अपर सचिव, कार्यकारी निदेशक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पूर्व सलाहकार और भारत के वित्तमंत्री के निजी सचिव द्वारा 17 माह के शोध और साक्षात्कार के आधार पर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ भारत के संबंधों की अनेक बड़ी घटनाओं का व्यापक विश्लेषण है। इसमें अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के संस्थापक सदस्य के रूप में भारत की भूमिका का परिदृश्य है। यह भारत के 1966, 1981 और 1991 अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष कार्यक्रमों, 2010 में आई.एम.एफ. से भारत द्वारा स्वर्ण क्रय, जी20 के उदय और विश्व में तीव्र गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में भारत के उद्भव के बारे में अंतर्दृष्टि प्रदान करती है। वी. श्रीनिवास ने अंतिम ऋणदाता के रूप में आई.एम.एफ. की भूमिका, सदस्य देशों के साथ निपटने में असीमित शक्ति की एक संस्था के रूप में आई.एम.एफ. 2008 के बाद वैश्विक वित्तीय संकट में आई.एम.एफ. की वृहत्तर भूमिका और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा में चीन के उदय पर अंतर्दृष्टि प्रदान की है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ भारत के संबंध के परिप्रेक्ष्य में पहले 25 वर्षों पर व्यापक शोध है, जिसके बारे में गहन अध्ययन और शोध करके समस्त जानकारियाँ संकलित की गई हैं, जिन्होंने वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
General Knowledge Encyclopedia
- Author Name:
Dr. Sheo Gopal Mishra
- Book Type:

- Description: "यह कोश सामाजिक विज्ञानों—मानव विज्ञान, समाज विज्ञान, मनोविज्ञान, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, इतिहास एवं कला को अपने में समेटे हुए है। (विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी को अलग खंड के रूप में प्रस्तुत किया गया है।) इसमें हमने उन कतिपय महापुरुषों का संक्षिप्त जीवन-परिचय भी सम्मिलित किया है, जिन्होंने इतिहास तथा समाज को गति प्रदान की है। धार्मिक संप्रदायों, उनके मान्य ग्रंथों एवं उनके प्रवर्तकों के विषय में भी संक्षिप्त विवरण दिए गए हैं। इसमें आदि से अंत तक भारतीय योगदान को दृष्टि से ओझल नहीं होने दिया गया है। यह ‘सचित्र सामाजिक विज्ञान विश्वकोश’ कोशों की शैली और विषय-वस्तु से कुछ हटकर लगे तो कोई आश्चर्य की बात न होगी। हम उन अनेक पुस्तकों एवं संदर्भ ग्रंथों के लेखकों और संपादकों के प्रति अपना आभार व्यक्त करना चाहेंगे जिनसे प्रेरणा प्राप्त करके सामग्री का चयन, संकलन एवं लेखन पूरा किया गया है। आशा है, यह ‘सचित्र सामाजिक विज्ञान विश्वकोश’ इक्कीसवीं सदी के आबालवृद्ध-वनिताओं को ज्ञानवर्धक लगेगा। यदि इसमें यत्र-तत्र त्रुटियाँ मिलें तो पाठक जन उन्हें सुधारने की सदाशयता बरतेंगे। "
The Riligion Of The Forest
- Author Name:
Rabindranath Thakur
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- Book Type:

- Description: We stand before this great world. The truth of the life depends upon our attitude of mind toward it - an attitude which is formed by our habit of dealing with is according to the special circumstance of our surroundings and our temperaments. It guides our attempts to establish relations with the universe either by conquest or by union, either through the cultivation of power or through that of sympathy. And thus, in our realization of the truth of existence, we put our emphasis either upon the principle of unity.
Ha Desh Amacha Aahe
- Author Name:
Shrimant Mane
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- Description: 2024 च्या लोकसभा निवडणुकीत कोणताही राजकीय पक्ष स्पष्टपणे जिंकला नाही आणि कोणाचा पूर्ण पराभवदेखील झाला नाही. हे नेमके झाले तरी कसे आणि मग जिंकले तरी कोण? अर्थातच, भारतीय मतदार जिंकले. कोट्यवधी मतदारांनी चारशे जागांचे स्वप्न पाहणाऱ्या सत्ताधारी पक्षाला ‘आस्ते कदम` चा इशारा दिला, तर आधीच्या दोन निवडणुकांमध्ये हतोत्साही झालेल्या विरोधकांना मतदारांनी नवी उमेद व उर्जा दिली. या समतोल जनादेशातून मतदार जिंकले हा निष्कर्ष, हे अनुमान किंवा विधान भाबडेपणातून केले आहे का? अर्थातच नाही. खंडप्राय भारतातील या लोकसभा निवडणूक निकालाचा लघुत्तम साधारण विभाज्य म्हणजे लसावि सांगतो की, मोठा निर्णायक राष्ट्रीय मुद्दा निवडणुकीत नसल्यामुळे देशातील 28 राज्ये व 8 केंद्रशासित प्रदेश मिळून छत्तीस प्रांतांमध्ये स्थानिक समीकरणेच प्रभावी ठरली. सोबतच, राज्यघटना बदलण्याची भीती, शेतकरी व तरुण मतदारांमधील नाराजी, गरिबी व महागाई अशा जगण्यामरण्याच्या मुद्द्यांवर लोकांनी सत्ताधाऱ्याांच्या विरोधात मतदान केले. या मतदानाचे, निकालाचे हे तर्कशास्त्र, संख्याशास्त्राच्या आधारे विश्लेषण सांगते की, ही लढाई निवडणूक जिंकण्याचे तंत्र आणि लोक यांच्यात झाली. निवडणूक जिंकण्याचे तंत्र बदलले, सुधारले तरी लोकांचे पाय जमिनीवरच आहेत. लोकशाहीचा उत्सव असे ज्याचे वर्णन केले जाते त्या देशाच्या अठराव्या सार्वत्रिक निवडणुकीत मतदारांनी दिलेल्या संदेशाचा सार हा की, आम्हाला गृहीत धरू नका. हा देश, हे प्रजासत्ताक आमचे आहे. - श्रीमंत माने
Kosi Ke Vat Vriksh
- Author Name:
Pushya Mitra
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- Description: कोसी के वट वृक्ष उन बुजुर्गो की कहानी है जो 2008 के कुसहा त्रासदी के बाद न केवल तनकर खड़े हुए बल्कि दूसरों को भी संरक्षण भरी छांव दी । घुमंतु पत्रकार और लेखक पुष्य मित्र की यह किताब आपके अंदर बुढ़ापे को लेकर जमी सभी पुर्वाग्रहों को तोड़ने का काम करेगी । इस किताब के अंदर आपको बुजुर्गो के हौसले और हिम्मत की वो कहानी मिलेगी जो न केवल प्रेरक है बल्कि प्रेरणादाई भी है।
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