Santal Hool Santal-Vidroh : 1854-55
(0)
Author:
S.P. Sinha, Monika Rani Tuti, Ranendra, Rakesh Ranjan Oraon, Amrita Priyanka Ekka, Dr. S.P. SinhaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
395
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सन्ताल हूल झारखंड में हुए महान उपनिवेश-विरोधी विद्रोह के वास्तविक स्वरूप और भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास में उसके समुचित स्थान को रेखांकित करनेवाली पुस्तक है। भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आदिवासी प्रतिरोध का लम्बा सिलसिला रहा है। छोटानागपुर और सन्ताल परगना के आदिवासियों ने पहाड़ियों और घने जंगलों के अपने गढ़ में अंग्रेजों को कभी भी चैन से नहीं रहने दिया। वे ईस्ट इंडिया कम्पनी की शोषणकारी नीति और भेदभावपूर्ण व्यवस्था से असन्तुष्ट थे। उन्हें उसकी अधीनता स्वीकार नहीं थी। वे अपना राज चाहते थे, इसलिए उन्होंने बार-बार विद्रोह किया। उन्हीं विद्रोहों में से एक था सन्ताल हूल, जो 1857 के बहुचर्चित प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के ठीक पहले 1854-55 में हुआ था। इस विद्रोह के नेता थे सिदो, कानू, चाँद और भैरव। सन्ताल हूल का–जैसा कि अन्य आदिवासी विद्रोहों में भी दिखता है—उपनिवेशवाद विरोधी तेवर और स्वाधीनता का उद्देश्य स्पष्ट था। उसके नेताओं और भागीदारों की शहादत भी असंदिग्ध थी। बावजूद इसके उसके बारे में भ्रम बना रहा और बौद्धिक-अकादमिक जगत में ‘इतिहास को नीचे से देखने’ का विचार पनपने के वर्षों बीत जाने के बाद तक सन्ताल हूल को भारतीय इतिहास की मुख्यधारा में समुचित स्थान नहीं दिया गया। इसी स्थिति के मद्देनजर आदिवासी इतिहास और संस्कृति के अधिकारी विद्वान डॉ. एस.पी. सिन्हा ने इस पुस्तक में सन्ताल हूल के बारे में उपलब्ध तमाम दस्तावेजों, परम्परागत और मौखिक स्रोतों को आधार बनाकर सन्तालों की अपनी व्यवस्था, अंग्रेजी व्यवस्था से उनके असन्तोष, हूल के नेताओं के व्यक्तित्व और नेतृत्व-क्षमता, हूल के उद्देश्य और आदर्श आदि के वास्तविक स्वरूप को सामने रखा है। यह पुस्तक एक ओर सन्ताल हूल सम्बन्धी पहले के अध्ययनों की समीक्षा करती है तो भावी अध्ययनों के लिए एक प्रासंगिक दिशा निर्देश भी प्रस्तावित करती है। सिदो, कानू, चाँद और भैरव जैसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आरम्भिक सूत्रधारों को उनका श्रेय प्रदान करते हुए यह पुस्तक इतिहास के अधूरे परिप्रेक्ष्य को पूरा करती है।
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सन्ताल हूल झारखंड में हुए महान उपनिवेश-विरोधी विद्रोह के वास्तविक स्वरूप और भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास में उसके समुचित स्थान को रेखांकित करनेवाली पुस्तक है। भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आदिवासी प्रतिरोध का लम्बा सिलसिला रहा है। छोटानागपुर और सन्ताल परगना के आदिवासियों ने पहाड़ियों और घने जंगलों के अपने गढ़ में अंग्रेजों को कभी भी चैन से नहीं रहने दिया। वे ईस्ट इंडिया कम्पनी की शोषणकारी नीति और भेदभावपूर्ण व्यवस्था से असन्तुष्ट थे। उन्हें उसकी अधीनता स्वीकार नहीं थी। वे अपना राज चाहते थे, इसलिए उन्होंने बार-बार विद्रोह किया। उन्हीं विद्रोहों में से एक था सन्ताल हूल, जो 1857 के बहुचर्चित प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के ठीक पहले 1854-55 में हुआ था। इस विद्रोह के नेता थे सिदो, कानू, चाँद और भैरव। सन्ताल हूल का–जैसा कि अन्य आदिवासी विद्रोहों में भी दिखता है—उपनिवेशवाद विरोधी तेवर और स्वाधीनता का उद्देश्य स्पष्ट था। उसके नेताओं और भागीदारों की शहादत भी असंदिग्ध थी। बावजूद इसके उसके बारे में भ्रम बना रहा और बौद्धिक-अकादमिक जगत में ‘इतिहास को नीचे से देखने’ का विचार पनपने के वर्षों बीत जाने के बाद तक सन्ताल हूल को भारतीय इतिहास की मुख्यधारा में समुचित स्थान नहीं दिया गया।
इसी स्थिति के मद्देनजर आदिवासी इतिहास और संस्कृति के अधिकारी विद्वान डॉ. एस.पी. सिन्हा ने इस पुस्तक में सन्ताल हूल के बारे में उपलब्ध तमाम दस्तावेजों, परम्परागत और मौखिक स्रोतों को आधार बनाकर सन्तालों की अपनी व्यवस्था, अंग्रेजी व्यवस्था से उनके असन्तोष, हूल के नेताओं के व्यक्तित्व और नेतृत्व-क्षमता, हूल के उद्देश्य और आदर्श आदि के वास्तविक स्वरूप को सामने रखा है। यह पुस्तक एक ओर सन्ताल हूल सम्बन्धी पहले के अध्ययनों की समीक्षा करती है तो भावी अध्ययनों के लिए एक प्रासंगिक दिशा निर्देश भी प्रस्तावित करती है। सिदो, कानू, चाँद और भैरव जैसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आरम्भिक सूत्रधारों को उनका श्रेय प्रदान करते हुए यह पुस्तक इतिहास के अधूरे परिप्रेक्ष्य को पूरा करती है।
Book Details
-
ISBN9789360865979
-
Pages88
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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आदिवासी समाज को ज्यादातर रोमांटिक दृष्टि से देखा गया है। सिर्फ उनके हितैषी गैर-आदिवासी कार्यकर्ताओं और विद्वानों द्वारा ही नहीं, बल्कि खुद कुछ आदिवासियों द्वारा भी। कुछ आदिवासी साहित्यकार अपने विमर्श में आदिवासी समाज का जैसा सुन्दर, सर्वांगपूर्ण चित्र खींचते हैं, उस चित्र का खुद उन्हीं के द्वारा लिखी हुई कहानियों और उपन्यास में व्यक्त यथार्थ से कोई मेल नहीं बैठता; दोनों के बीच दूरी और अन्तर्विरोध दिखाई देता है। विमर्श में यह दावा किया जाता है कि दुनिया की सारी समस्याओं का हल आदिवासी समाज दर्शन से ही निकलेगा जबकि आदिवासी खुद कई समस्याओं से घिरे हुए हैं और अपनी ही समस्याओं को हल नहीं कर पा रहे हैं। ऐसा आदिवासी-विमर्श भी एक अतिवाद ही है। जैसे एक अतिवाद यह है कि हमें आदिवासियों का उद्धार करना है, वैसे ही दूसरा अतिवाद यह है कि आदिवासी से ही सबका उद्धार होगा। आदिवासी दर्शन के प्रवक्ता आदिवासी समाज की उन वास्तविकताओं को नहीं देखते, उन कमजोरियों को नहीं देखते जिनके खिलाफ लड़कर आदिवासियों को सचेत करने की जरूरत है। उलटे कभी-कभी ये कमियाँ भी उनकी नजर में गौरवपूर्ण बन जाती हैं। यह एक तरह की मनोवैज्ञानिक क्षतिपूर्ति है। उदाहरण के लिए कुछ लोग कहते हैं कि श्रम आदिवासी जीवन का बहुत बड़ा मूल्य है। यह बात दलितों के प्रसंग में भी कुछ विद्वानों ने कही है। सचाई यह है कि आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से जितने भी कमजोर और पिछड़े हुए समाज हैं—जिनमें आदिवासी और दलित भारत में मुख्य हैं—उन सबमें श्रम करने का लगभग सारा बोझ स्त्रियों के सिर पर डाल दिया गया। श्रम उनके पुरुषों को भी करना पड़ता है, लेकिन पुरुषों के जिम्मे सिर्फ कुछ एक महत्त्वपूर्ण काम होते हैं तथा उनका बहुत-सा समय सोने, तमाखू पीने, दारू पीने, जुआ खेलने या स्थानीय राजनीति करने जैसे कामों में खर्च होता है। चाहे बर्मा की सीमा पर बसे मिजो आदिवासियों का समाज हो अथवा तिब्बत की सीमा पर बसे भोटियों का समाज हो—सभी आदिवासी समाजों में स्त्रियों को ज्यादा-से-ज्यादा काम करना पड़ता है। —इसी पुस्तक से
Garha Ka Gond Rajya
- Author Name:
Suresh Mishra
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गढ़ा का गोंड राज्य' पुस्तक भारत के मध्य भाग के इतिहास के एक विस्मृत अध्याय को और गोंडों के गौरवशाली अतीत को उजागर करनेवाला एक दस्तावेज़ है। गढ़ा का गोंड राज्य बहुधा मुग़ल सम्राट अकबर की सेना से लोहा लेनेवाली वीरांगना रानी दुर्गावती के सन्दर्भ में ही याद किया जाता है और शेष इतिहास एक धुँधले आवरण से आवृत रहा है। यह आश्चर्य की बात है कि केवल दो सौ साल पहले समाप्त होनेवाले इस विशाल देशी राज्य के बारे में अभी तक बहुत कम जानकारी रही है। इस कृति में लेखक ने फ़ारसी, संस्कृत, मराठी, हिन्दी और अंग्रेज़ी स्रोतों के आधार पर गढ़ा राज्य का प्रामाणिक एवं क्रमबद्ध इतिहास प्रस्तुत किया है। वे सभी कड़ियाँ जोड़ दी गई हैं, जो अभी तक अज्ञात थीं। पुस्तक बताती है कि पन्द्रहवीं सदी के प्रारम्भ में विंध्य और सतपुड़ा और विन्ध्याचल के अंचल में गोंड राजाओं ने जिस राज्य की स्थापना की वह क्रमशः गढ़ा, गढ़ा-कटंगा और गढ़ा-मंडला के नाम से विख्यात हुआ। गढ़ा का गोंड राज्य यद्यपि सोलहवीं सदी में मुग़लों के अधीन हो गया, तथापि न्यूनाधिक विस्तार के साथ यह अठारहवीं सदी तक मौजूद रहा। सोलहवीं सदी में अपने चरमोत्कर्ष काल में यह राज्य उत्तर में पन्ना से दक्षिण में भंडारा तक और पश्चिम में भोपाल से लेकर पूर्व में अमरकंटक के आगे लाफागढ़ तक फैला हुआ था और 1784 में मराठों के हाथों समाप्त होने के समय भी यह वर्तमान मंडला, डिंडोरी, जबलपुर, कटनी और नरसिंहपुर ज़िलों और कुछ अन्य क्षेत्रों में फैला था। यह विस्तृत राज्य पौने तीन सौ वर्षों तक लगातार अस्तित्व में रहा, यह स्वयं में एक उल्लेखनीय बात है। राजनीतिक विवरण के साथ ही यह कृति उस काल की सांस्कृतिक गतिविधियों का परिचय देते हुए बताती है कि आम धारणा के विपरीत गोंड शासक साहित्य, कला और लोक कल्याण के प्रति भी जागरूक थे।
Kavi Man Jani Man :Aadivasi Stri Kavitayen
- Author Name:
Vandana Tete
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आदिवासी जनी (स्त्री) मन का धरातल बिलकुल दूसरी तरह का है। आदिवासियत के दर्शन पर खड़ा। समभाव जिसकी मूल प्रकृति है। प्राकृतिक विभेद के अलावा जहाँ इनसान अथवा सत्ता द्वारा कृत्रिम रूप से थोपा हुआ कोई दूसरा भेद नहीं है। हालाँकि कुछ बन्दिशें हैं, परन्तु सामन्ती क्रूरता और धार्मिक आडम्बरों के क़िले में आदिवासी स्त्री बिलकुल क़ैद नहीं है। ‘कवि मन जनी मन’ संकलन में वृहत्तर झारखंड के आदिवासी समुदायों की स्त्री-रचनाकारों की कविताएँ शामिल हैं। कवियों में से एक या दो को छोड़कर प्राय: सभी अपनी-अपनी आदिवासी मातृभाषाओं में लिखती हैं। परन्तु संकलन में शामिल कविताएँ मूल रूप से हिन्दी में रची गई हैं। कुछ का हिन्दी अनुवाद है जिसे कवयित्रियों ने स्वयं किया है। हिन्दी में आदिवासी स्त्री-कविताओं का मूल या अनुवाद लाना इसलिए ज़रूरी लगा कि यह समझ बिलकुल साफ़ हो जाए कि नसों में दौड़नेवाला लहू चाहे कितनी पीढ़ियों का सफ़र तय कर ले, अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ता। यानी रचने का, गढ़ने का और बचाने का स्वभाव। अपने लिए ही नहीं बल्कि सबके लिए सम्पूर्ण समष्टि की चिन्ता का स्वभाव। पहाड़ी नदी की तरह चंचल, पोखरे की तरह गम्भीर, घर के बीचोंबीच खड़ा मज़बूत स्तम्भ या कि आर्थिक-सांस्कृतिक पौष्टिकता लिये महुआ-सी महिलाएँ अपने समुदाय की रीढ़ हैं। ठीक वैसे ही उनका लेखन है। वे अपनी कविताओं से विमर्श करती हैं। उनके विमर्श में वर्चस्व की आक्रामकता नहीं बचाव के युद्धगीत हैं। और है रचने का दुर्दम्य आग्रह जिसका सबूत यह संकलन है।
Jab Aadivasi Gata Hai
- Author Name:
Jamuna Bini
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जब आदिवासी गाता है की कविताओं में आदिम और आधुनिक, परम्परा और परिवर्तन, प्यार और प्रतिरोध तथा संगीत और सिसकी एक साथ उपस्थित हैं। पूर्वोत्तर के अरुणाचली-आदिवासी समाज और संस्कृति की नैसर्गिक धड़कन इन कविताओं में आसानी से महसूस की जा सकती है, साथ ही वह सोच भी जो कथित मुख्यधारा से परे, अब तक अलक्षित-उपेक्षित पड़े हाशिये के समाजों में अस्मिता की बढ़ती चेतना के साथ मुखर होती गई है। इन कविताओं का एक छोर प्रकृति से सुदीर्घ साहचर्य, और सहस्राब्दियों के अनुभव और यत्न से निर्मित संस्कृति के प्रति कवि के सहज गौरवबोध से बना है, जबकि दूसरा छोर उन सवालों से जो पूरी दुनिया को केवल मुनाफ़े की नज़र से देखने वाली शक्तियों को सम्बोधित हैं। जमुना बीनी की रचनात्मकता का यह वितान, वस्तुतः समकालीन हिन्दी कविता का एक नया प्रस्थान है।
Lachhami Jaggar
- Author Name:
Harihar Vaishnav
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‘लछमी जगार’ की कथा की भाव-भूमि का सम्बन्ध धान उत्पादन-प्रक्रिया के विस्तारित प्रसंग से है, अत: इसका गठन उसी के अनुरूप है। पाठक इस तथ्य की स्वत: पड़ताल के लिए आमंत्रित हैं। निम्न प्रतीकों की जानकारी जो हल्बी भाषी समुदाय के लिए तो स्पष्ट है, किन्तु उनसे इतर पाठकों के लिए इस कथा के सामान्य परिदृश्य को समझने हेतु आवश्यक जान पड़ती है : मेंग का अर्थ वर्षा है तो माहालखी हैं धान और इक्कीस रानियाँ हैं विभिन्न दलहनी-तिलहनी और अन्य मोटे अनाज। इसी तरह गोपपुर है खेत। इस कथा के नायक नरायन राजा की तुलना सूर्य से की जा सकती है जबकि माहादेव (शिव) को बीज-पुरुष के रूप में देखना चाहिए। यहाँ यह जानना भी आवश्यक होगा कि दण्डकारण्य का पठार धान उत्पादक पूर्व एवं गौण अन्न उत्पादक पश्चिम की सीमा पर स्थित है। गौण अन्न का उत्पादन पहाड़ी भूमि पर तो किया जा सकता है, किन्तु धान के उत्पादन के लिए सम एवं सिंचित भू-भाग का होना आवश्यक है। इसलिए धान उत्पादन ने अपने-आपको मुख्य भूमि में स्थापित किया, जबकि गौण अन्न गाँव की सीमा पर चले गए। नरायन राजा का विवाह पहले गौण खाद्यान्नों (इक्कीस रानियों) के साथ हुआ और उसके बाद धान (माहालखी) के साथ। मिथकीय दृष्टि से यह कथा इस क्षेत्र का जनपदीय इतिहास सिद्ध होती है। और जैसे ही हम कथा के इस बिन्दु को आत्मसात् कर लेते हैं, वैसे ही इस कथा में आए पत्नी-पीड़क प्रसंगों और धान की मिंजाई के प्रसंग के बीच के अन्तर्सम्बन्धों को भी पकड़ने में सफल हो सकते हैं। इस महाकाव्य का आयोजन बस्तर की महिलाओं के लिए एक पवित्र अनुष्ठान है। वस्तुत: ‘लछमी जगार’ चर्चा की नहीं अपितु महसूस करने की चीज़ है। यह महसूसना इसके भीतर के विभिन्न संस्कारों और उनसे जुड़े विश्वास, जो विभिन्न संस्कारों में सन्निहित भिन्न-भिन्न भूमिकाओं में देखे जा सकते हैं, के साथ एकात्म होकर सहभागी होने में है। कथा में वर्णित कुछ एक घटनाओं का सजीव चित्रण उनकी अभिनय प्रस्तुति के साथ किया जाता है, जिनकी मुख्य भूमिकाओं में स्वयं आयोजक ही होते हैं। इन अनुष्ठानों/संस्कारों को मुख्य एवं गौण, दो श्रेणियों में बाँटकर देखा जा सकता है। भिमा-विवाह (अध्याय 16), आम-विवाह (अध्याय 21) एवं माहालखी का विवाह। (अध्याय 32) इस महाकाव्य की प्रमुख घटनाएँ हैं जो विपुल जन-समुदाय को आकर्षित करती हैं।
Aadivasi : Shaurya Evam Vidroh
- Author Name:
Ramanika Gupta
- Book Type:

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सर्वप्रथम हमें पूर्वोत्तर के इतिहास में जाना ज़रूरी है, जिससे यह पता चलता है कि वे अंग्रेज़ों, ज़ुल्मी राजाओं या किसी भी अन्याय के ख़िलाफ़ लड़े। इस पुस्तक में हमने अलग-अलग भाषा व राज्यों के वीर नायकों व नायिकाओं की कथाओं के अतिरिक्त पूर्वोत्तर के भिन्न राज्यों में हुए विद्रोहों, प्रतिरोधात्मक आन्दोलनों पर शोधपरक गाथाएँ व सामग्री प्रस्तुत की है। ये सभी गाथाएँ—लिजिन्द्रियाँ, लोककथाएँ या लोकगीत व टिप्पणियाँ पूर्वोत्तर के ही लेखकों द्वारा लिखी गई हैं। हमने इनका चयन कर हिन्दी में अनूदित कर प्रस्तुत किया है। इनके चयन और सम्पादन में काफ़ी समय लगा। चूँकि अनूदित सामग्री की भाषा को परिष्कृत भी करना पड़ा। हमने हिन्दी में कुछ गाथाएँ पूर्वोत्तर में उपलब्ध भिन्न ग्रन्थों व दस्तावेज़ों में दर्ज टिप्पणियों के आधार पर तैयार करके भी प्रस्तुत की गई हैं। एक ही नायक पर भिन्न-भिन्न लेखकों ने अपने-अपने क्षेत्र में उपलब्ध सामग्री (लोकगीत, किंवदंतियों, लोककथाएँ, ऐतिहासिक दस्तावेज आदि) से लेकर अपने-अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत की है। हमने सभी को सम्मानित करने का प्रयास किया है, ताकि पूर्वोत्तर में घटित इस इतिहास को गहराई तक समझा और जाना जा सके और शेष भारत उनसे अपना दर्द का रिश्ता जोड़ कर संवाद क़ायम करे। —‘सम्पादकीय’ से
Tani Kathayein : Arunachal Ke Taani Aadivasi Samaj Ki Vishvadrishti
- Author Name:
Joram Yalam Nabam
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किसी समाज में प्रचलित लोककथाएँ उसकी सभ्यता-संस्कृति की जड़ों तक पहुँचने का सूत्र होती हैं। अतीत में प्रत्येक पीढ़ी अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी से सुनकर और परवर्ती पीढ़ी को सुनाकर समाज के अनुभव और ज्ञान की इस संचित निधि को सुरक्षित रखती आई। लेकिन आधुनिक तौर तरीकों के प्रसार के साथ-साथ आम जनजीवन जैसे-जैसे बदलता गया वैसे-वैसे सदियों पुरानी यह परम्परा कमजोर पड़ती गई। ऐसे में लोककथाओं को वाचिक के भरोसे छोड़ देने के बजाय लिखित रूप में संग्रहीत-प्रकाशित करना आवश्यक हो गया। इस संदर्भ म युवा लेखकजोराम यालाम नाबाम की किताब ‘तानी कथाएँ : अरुणाचल के तानी आदिवासी समाज की विश्वदृष्टि’ एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। जोराम ने न केवल अरुणाचल प्रदेश के तानी समाज की लोककथाओं को इकट्ठा किया है बल्कि उनको आधार बनाकर इस आदिवासी समाज के विश्वासों, परम्पराओं, आचार-विचार, खान-पान आदि पक्षों का युक्तिसंगत विश्लेषण कर तानी समाज के जीवन-दर्शन को प्रस्तुत किया है। जोराम बतलाती हैं कि प्रकृति के समस्त चराचर के साथ अभिन्नता का भाव तानियों की विश्वदृष्टि की विशेषता है जो उनके दैनंदिन जीवन में सहज दिखाई देती है। जिसे अधिकतर गैर आदिवासी समाजों में देख पाना मुश्किल है। इन कथाओं से तानी समाज के धार्मिक विश्वासों का संकेत भी मिलता है जिनमें प्रकृति को प्रमुखता दी गयी है। धर्म को सांगठनिक या सांस्थानिक स्वरूप देने से परहेज किया गया है। पूरी प्रकृति पूजनीय है इसलिए अलग से किसी के लिए मंदिर निर्माण या पूजा आदि का विधान नहीं बनाया गया। तानी समाज की ये बातें न सिर्फ जानने योग्य हैं बल्कि मानव सभ्यता के संकटग्रस्त वर्तमान के संदर्भ में एक विश्वसनीय विकल्प का आधार तैयार करने वाली हैं। एक अत्यंत पठनीय और विचारणीय किताब!
Tani Kathayein : Arunachal Ke Taani Aadivasi Samaj Ki Vishvadrishti
Joram Yalam Nabam
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Charitani Rajgondanaam
- Author Name:
Shivkumar Tiwari
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इस पुस्तक में गोंड राजाओं के प्रेरणादायी जीवन-प्रसंगों को रेखांकित किया गया है जिन्होंने अपने समय की तमाम धार्मिक, राजनैतिक और सामाजिक व्यवस्थाओं को आत्मसात् करके, इतिहास के हाशिए से उठकर अपना एक अनूठा साम्राज्य क़ायम किया। यह पुस्तक हमें राजगोंडों की अद्वितीय जिजीविषा के बारे में विस्तार से बताती है। एक तरफ़ यहाँ अगर गढ़ा-कटंगा के राजा संग्रामशाह की दूरदृष्टि व कूटनीतिज्ञता की झलक मिलती है तो दूसरी तरफ़ शक्तिशाली मुग़ल साम्राज्य से लोहा लेनेवाली रानी दुर्गावती की धर्मपरायणता व साहसिकता भी हमें प्रेरित करती है। राजगोंड राजाओं के जीवट से देदीप्यमान कहानियों के साथ-साथ यह पुस्तक हमें उनकी मानवीय संवेदना, ज्ञानपिपासा, चारित्रिक दृढ़ता, धर्मनिरपेक्षता, विश्वास, रूढ़ियों और रुचियों के बारे में भी क्रमबद्ध ढंग से बताती है, कुछ इस तरह कि पाँच शताब्दी पूर्व के गोंडों का इतिहास हमारे सामने साकार हो उठता है। रोचक उतार-चढ़ावों से लबालब और सरल भाषा में सँजोयी गई यह पुस्तक ज्ञानपिपासुओं और इतिहास के गर्त में कुछ ढूँढ़ने का प्रयत्न करनेवाले शोधकर्ताओं के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
Bastar Ki Aadivasi Evam Lok Hastshilp Parampara
- Author Name:
Harihar Vaishnav
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कोई भी शिल्प या कला केवल शिल्प या कला नहीं होती, वह इतिहास को भी अपने भीतर समेटे होती है और वर्तमान को भी उसी तरह सामने रखती है, उसे प्रतिबिम्बित करती है। इतना ही नहीं, हम उसमें सम्बन्धित समाज का भविष्य भी देख-पढ़ सकते हैं। कहना ग़लत न होगा कि आदिवासी एवं लोक हस्तशिल्पों में उनका कल्पना-लोक बहुत ही प्रभावशाली ढंग से रूपायित होता और अहम् भूमिका निभाता दिखलाई पड़ता है। बस्तर अंचल के हस्तशिल्प, चाहे वे आदिवासी हस्तशिल्प हों या लोक हस्तशिल्प, दुनिया-भर के कलाप्रेमियों का ध्यान आकृष्ट करने में सक्षम रहे हैं! कारण, इनमें इस आदिवासी बहुल अंचल की आदिम संस्कृति की सोंधी महक बसी रही है। यह शिल्प-परम्परा और उसकी तकनीक बहुत पुरानी है। शिल्प का यह ज्ञान बहुत पुराना और पारम्परिक है, किन्तु इस ज्ञान का लिखित स्वरूप अब तक नहीं मिल पाया था। यही कारण है कि बस्तर अंचल में जन्मे, पले, बढ़े और सतत जिज्ञासु साहित्यकार-लेखक और संस्कृतिकर्मी हरिहर वैष्णव को यह लगा कि न केवल बस्तर, अपितु देश के अन्य भागों में विभिन्न हस्तशिल्प विधाओं से जुड़े शिल्पियों के पास शिल्प और उसकी परम्परा से सम्बन्धित जो मौखिक ज्ञान है, वह किसी-न-किसी तरह अगली पीढ़ी तक हस्तान्तरित होना चाहिए। श्री वैष्णव के पास यहाँ के आदिवासी एवं लोक हस्तशिल्पियों से सम्बद्ध विभिन्न लोगों से बातचीत के दौरान पहले से एकत्र थोड़ी-बहुत सामग्री तो थी और कच्ची भी। अपनी इस नहीं के बराबर और कच्ची जानकारी को उन्होंने सम्बन्धित शिल्पियों से कई-कई बार मिलकर तथा सहभागी अवलोकन आदि के द्वारा और अधिक समृद्ध करने का प्रयास किया। विश्वास है कि बस्तर के आदिवासी एवं लोक हस्तशिल्प तथा इसकी परम्परा में रुचि रखनेवाले कलाप्रेमियों तथा अध्येताओं के लिए यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी।
Aadivasi Kaun
- Author Name:
Ramanika Gupta
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आज अगर सबसे बड़ा ख़तरा आदिवासी जमात को है, तो वह है उसकी पहचान मिटने का। इक्कीसवीं सदी में उसकी पहचान मिटाने की साज़िश एक योजनाबद्ध तरीक़े से रची जा रही है। किसी भी जमात, जाति, नस्ल या कबीले अथवा देश को मिटाना हो तो उसकी पहचान मिटाने का काम सबसे पहले शुरू किया जाता है। ‘आदिवासी’ की पहचान और नाम छीनकर उसे ‘वनवासी’ घोषित किया जा रहा है ताकि वह यह बात भूल जाए कि वह इस देश का मूल निवासी यानी आदिवासी है—वह भूल जाए अपनी संस्कृति, भाषा और अपना मूल धर्म ‘सरना’। यह पुस्तक आदिवासियों के जीवन के कई ऐसे अनछुए पहलुओं को हमारे सामने लाती है जिनसे अभी तक हम अपरिचित थे। स्वयं आदिवासियों द्वारा क़लमबद्ध किए गए विचारों को यहाँ दिया गया है। आदिवासियों की दशा में परिवर्तन कैसे हो, उनकी शिक्षा कैसी हो व किस प्रकार उनके जीवन से जुड़ी सभी समस्याओं का निदान किया जाए, जैसे सवालों को भी यहाँ उठाया गया है। आदिवासियों के अस्तित्व की बानगी प्रस्तुत करती यह पुस्तक सभी के लिए महत्त्वपूर्ण है।
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