Radhakrishna Mulyankan Mala : Teesri Kasam Urf Mare Gaye Gulfam
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किसी भी भाषा में कभी-कभी ऐसा होता है कि एक कहानी या एक कविता को पाठकों का इतना अधिक प्रेम मिले कि वह कालजयी हो जाती है। अपने मूल कलारूप के साथ अन्य कलारूपों में भी उसे देखने-समझने के प्रयास होते हैं। फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम’ ऐसी ही रचना है जो एक लघु पत्रिका में छपी और धीरे-धीरे उसे हिन्दी की सबसे अधिक लोकप्रिय कहानियों में गिना जाने लगा। उस पर फिल्म बनी, उस पर नाटक खेले गए और उस पर कवियों ने कविताएँ भी लिखीं। ‘तीसरी कसम’ की ऐसी व्यापक लोकप्रियता का कारण उसमें अभिव्यक्त जीवन के सबसे सच्चे, सबसे कोमल और सबसे पवित्र क्षणों का मार्मिक उद्घाटन ही होना चाहिए। रेणु की इस कहानी को फिल्म जगत ने भी ऊँचाई दी जहाँ कहा जा सकता है कि निर्देशक ने रचना की आत्मा को फिल्म में हूबहू उतार दिया। यह भी हमारी कला-संस्कृति की दुर्लभ घटना ही है। आकस्मिक नहीं कि इस कहानी और इस पर बनी फिल्म पर बार-बार आलोचकों-समीक्षकों का ध्यान गया और इस पर व्यापक चर्चा होती रही। राधाकृष्ण मूल्यांकन माला की गौरवशाली परम्परा में ‘तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम’ पर यह आलोचना कृति हिन्दी के आधिकारिक विद्वानों और नई पीढ़ी के लेखकों के चिन्तन-मनन का सार्थक परिणाम है। हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों-शोधार्थियों के लिए इस मूल्यांकन माला के पुनर्नवा प्रारूप में अब कृतिकारों के साथ कृतियों पर भी मूल्यांकनपरक पुस्तकें उपलब्ध हैं। रेणु जी की अविस्मरणीय कृति को विभिन्न दृष्टियों से देखने-समझने का यह प्रयास हिन्दी आलोचना के लिए भी विश्वसनीय होगा।
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किसी भी भाषा में कभी-कभी ऐसा होता है कि एक कहानी या एक कविता को पाठकों का इतना अधिक प्रेम मिले कि वह कालजयी हो जाती है। अपने मूल कलारूप के साथ अन्य कलारूपों में भी उसे देखने-समझने के प्रयास होते हैं। फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम’ ऐसी ही रचना है जो एक लघु पत्रिका में छपी और धीरे-धीरे उसे हिन्दी की सबसे अधिक लोकप्रिय कहानियों में गिना जाने लगा। उस पर फिल्म बनी, उस पर नाटक खेले गए और उस पर कवियों ने कविताएँ भी लिखीं।
‘तीसरी कसम’ की ऐसी व्यापक लोकप्रियता का कारण उसमें अभिव्यक्त जीवन के सबसे सच्चे, सबसे कोमल और सबसे पवित्र क्षणों का मार्मिक उद्घाटन ही होना चाहिए। रेणु की इस कहानी को फिल्म जगत ने भी ऊँचाई दी जहाँ कहा जा सकता है कि निर्देशक ने रचना की आत्मा को फिल्म में हूबहू उतार दिया। यह भी हमारी कला-संस्कृति की दुर्लभ घटना ही है। आकस्मिक नहीं कि इस कहानी और इस पर बनी फिल्म पर बार-बार आलोचकों-समीक्षकों का ध्यान गया और इस पर व्यापक चर्चा होती रही।
राधाकृष्ण मूल्यांकन माला की गौरवशाली परम्परा में ‘तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम’ पर यह आलोचना कृति हिन्दी के आधिकारिक विद्वानों और नई पीढ़ी के लेखकों के चिन्तन-मनन का सार्थक परिणाम है। हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों-शोधार्थियों के लिए इस मूल्यांकन माला के पुनर्नवा प्रारूप में अब कृतिकारों के साथ कृतियों पर भी मूल्यांकनपरक पुस्तकें उपलब्ध हैं।
रेणु जी की अविस्मरणीय कृति को विभिन्न दृष्टियों से देखने-समझने का यह प्रयास हिन्दी आलोचना के लिए भी विश्वसनीय होगा।
Book Details
-
ISBN9789309020254
-
PagesN/A
-
Avg Reading TimeN/A
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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पर हो रहे आघातों को वे अपनी कविताओं का विषय बनाते हैं। मनुष्य की स्वाधीनता में उन्हें धर्म जहाँ भी बाधक लगता है वे उसका मुँहतोड़ प्रतिकार करते हैं। इस बिन्दु पर वे बड़े सेक्युलर (सांसारिक) हो जाते हैं जो निर्भय होकर किसी भी सत्ता से भिड़ना जानता है। राजनीति वह क्षेत्र है जहाँ से नंद बाबू का कवि ऊर्जा ग्रहण करता है। वे आततायी राजनीति का चेहरा उघाड़ते हैं और मनुष्यधर्मी राजनीति की प्रस्तावना भी करते हैं। उनका स्वाधीन भारत के समाजवादी दलों से सीधा जुड़ाव भी रहा और वे किसी कार्यकर्ता की तरह आन्दोलनों, रैलियों और चुनावों में भागीदारी करते रहे। उनके ये जीवनानुभव जब कविताओं में रूपान्तरित होकर आते हैं तब नॉस्टेल्जिया उनकी कविताओं की रूढ़ि नहीं शक्ति प्रतीत होता है। युवा आलोचक पल्लव ने परिश्रमपूर्वक रचनावली का सम्पादन किया है। उनकी भूमिका कवि के कृतित्व को गहराई से जानने-समझने के लिए आकृष्ट करती है। Vol. 2 नंद चतुर्वेदी की काव्य यात्रा केवल कविताएँ लिखने तक सीमित नहीं थी। इस काव्य यात्रा में प्रभूत गद्य भी लिखा गया है। यह गद्य मोटे तौर पर दो प्रकार का है। चिन्तन-आलोचना-समीक्षा का गद्य और स्मृतियों का गद्य। ‘रचनावली’ के दूसरे खंड में चिन्तन-आलोचना-समीक्षा का गद्य संकलित कर लिया गया है। इस गद्य को पढ़ना नंद बाबू के काव्य सरोकारों को समझने का रास्ता देता है। ‘सप्त किरण’ शीर्षक से उन्होंने राजस्थान के कवियों की एक पुस्तक का सम्पादन भी किया था और इसे वे अस्तित्व रक्षा की संज्ञा देते थे। तो कहना न होगा कि अस्तित्व रक्षा के साथ प्रारम्भ हुआ आलोचना, सम्पादन और समीक्षा का यह सिलसिला पूरी शताब्दी तक नंद बाबू को सक्रिय बनाए रखता है। उन्होंने राजस्थान के हिन्दी कवियों के एक बड़े चयन का सम्पादन भी किया। गद्य लेखन नंद बाबू के लिए जीवनपर्यन्त आपद धर्म बना रहा। वे कवि थे और कविता के सम्बन्ध में निरन्तर विचार करना उन्हें प्रिय था। नंद बाबू कवि होने के साथ सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विचार के समर्थक भी हैं। वे साहित्य को लोक शिक्षण का सस्ता औजार भले न मानते रहे हों तब भी उन्हें लोक रुचियों के विविध पक्षों पर लिखना जरूरी लगता था। उनके ऐसे ही निबन्धों की किताब ‘यह हमारा समय’ में उनके दो दर्जन से अधिक निबन्ध संकलित हैं जो हमारे जीवन और समय के विविध समकालीन पक्षों पर विचार करते हैं। नंद बाबू के इन निबन्धों में प्रवाह और ताजगी तो है ही भाषा की सुन्दर छवियाँ भी हैं। मनुष्य की मुक्ति उनकी चिन्ताओं का सबसे बड़ा केन्द्र है और उसके लिए वे समता को आवश्यक शर्त मानते हैं। गैर-बराबरी से अधिक मनुष्य विरोधी उन्हें शायद कुछ नहीं लगता और इस विषय पर वे अनेक बार लिखते हैं। नंद बाबू ने ‘धर्मयुग’ जैसी पत्रिका के लिए लिखा तो लघु पत्रिकाओं और लघु समाचार-पत्रों के लिए भी लिखा। उनके इस गद्य लेखन में जहाँ काव्य की सौन्दर्यपक्षीय चिन्ताएँ हैं वहीं काव्य के उपयोगपक्ष की वस्तुनिष्ठ चिन्ताओं पर भी लगातार जिरह भी। कवि का यह गद्य उनके काव्य संसार को बेहतर ढंग से समझने का रास्ता देता है, मनुष्यता के रास्तों का संधान करता है तो इसे पढ़ना प्रसन्न गद्य को पढ़ना भी है। Vol. 3 ‘रचनावली’ के तीसरे खंड में नंद चतुर्वेदी के कथेतर लेखन को सहेजा गया है जिसमें संस्मरण, डायरी, पत्रों के साथ व्याख्यान और साक्षात्कार भी हैं। वे इस गद्य लेखन में अपने समय और समाज की छोटी बड़ी तमाम व्याधियों पर नज़र दौड़ाते हैं और राजनीति व राजनेताओं के सम्बन्ध में भी दो-टूक लिखने में संकोच नहीं करते। एक लेखक के रूप में उन्होंने समाजवादी विचारधारा का पक्ष चुना है लेकिन उनकी विचारधारा किसी गिरोहबन्दी से जन्म नहीं लेती। राजस्थान में सक्रिय रहे प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच के साथ उनका संवाद रहा। वे लघु पत्रिकाओं के लिए लिखते रहे और उन्हें पढ़कर एक सजग पाठक के रूप में अपनी प्रतिक्रिया भी देते रहे। उनके संस्मरण प्राय: राजस्थान के साहित्य से जुड़े उन लोगों पर होते थे जिनके अवदान से नई पीढ़ी अनभिज्ञ है। जिनमें पंडित गिरिधर शर्मा नवरत्न, हाड़ौती के कवि भैरूलाल कालाबादल, कवि प्रकाश आतुर के साथ-साथ जैनेन्द्र, श्यामाचरण दुबे, शिवमंगल सिंह सुमन, अश्क दम्पती, यशपाल, देवीलाल सामर, आलम शाह खान, युगलकिशोर चतुर्वेदी, कवि चित्रकार रामगोपाल विजयवर्गीय, भागीरथ भार्गव, कल्याणमल लोढ़ा और क़मर मेवाड़ी जैसे लेखक-साहित्यकार शामिल हैं। नंद बाबू राजस्थान में समाजवादी आन्दोलन के जमीनी सिपाहियों में रहे हैं। अपने साथियों पर लिखते हुए सम्बन्धों की ऊष्मा की आँच नंद बाबू पाठकों तक पहुँचाते हैं। हीरालाल जैन और नरेंद्रपाल सिंह जैसे अपने स्थानीय साथियों के अलावा देश में समाजवादी आन्दोलन के अगुआ रहे जयप्रकाश नारायण और डॉ. राममनोहर लोहिया पर भी उन्होंने लिखा। उनकी डायरी और अपने पत्रों में वे अपने निजी दायरे सार्वजनिक करते हैं। दो-टूक टिप्पणियाँ और निर्भीक कथन। इनमें बहुधा आत्मीयता का रस भी है तो बेहद निजी निराशाएँ भी। कथेतर की विभिन्न विधाओं में संकलित इस खंड में नंद चतुर्वेदी की रचनाशीलता के अनेक रूप विद्यमान हैं जो कवि के व्यापक दाय का प्रमाण बन गए हैं। Vol. 4 ‘नंद चतुर्वेदी रचनावली’ के चौथे और अन्तिम खंड में मुख्यत: कवि का अनुवाद कर्म है। नंद बाबू ने कविता और गद्य दोनों का अनुवाद किया। माना जाता है कि काव्यानुवाद बहुत मुश्किल साहित्य कर्म है क्योंकि अनुवादक ऐसा ही व्यक्ति होना चाहिए जो दोनों भाषाओं को ठीक से जानता हो। नंद बाबू ने साहित्यिक पत्रिकाओं के आग्रह पर काव्यानुवाद किये। ये काव्यानुवाद बहुत पुरानी प्राकृत की कविताओं के थे जो हाल कवि की गाथा सप्तशती से अंग्रेजी के रास्ते आए थे। ठीक इसी तरह कुछ संथाली कविताओं का अनुवाद भी उन्होंने किया जिन्हें अंग्रेजी में कवि सीताकांत महापात्र ने प्रस्तुत किया था। इन दोनों काव्यानुवादों में नंद बाबू की अपनी मेधा दिखाई देती है जो इन कविताओं की मूल संवदेना तक पाठकों को पहुँचाने में समर्थ है। इससे पहले उन्होंने अपनी पत्रिका बिंदु और उस दौर की अनेक पत्रिकाओं के लिए साहित्य शास्त्र तथा साहित्य के अन्य प्रासंगिक विषयों पर लिखे प्रसिद्ध अंग्रेजी निबंधों का अनुवाद भी किया। इस खंड में नंद बाबू द्वारा अनुवादित दो सम्पूर्ण कृतियाँ भी पढ़ी जा सकती हैं। ए. अप्पादुराई की एक अत्यन्त विचारोत्तेजक और महत्त्वपूर्ण किताब को उन्होंने अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद के लिए चुना। लगभग सवा दो सौ पृष्ठों की इस किताब का नाम था ‘भारतीय राजनीतिक चिन्तन’ जिसका अनुवाद नंद बाबू ने रघुवर दयाल के साथ मिलकर किया। 1990 में आई इस पुस्तक की गम्भीर सामग्री को जिस सहज और प्रभावी हिन्दी में नंद बाबू ने अनुवादित किया वह उनकी अद्भुत भाषिक क्षमता का उदाहरण है। दूसरी पुस्तक ‘दहेज पीड़ित महिलाएँ : एक अध्ययन’ लेखिका रंजना कुमारी की है जो भारत में महिला आन्दोलन में अग्रणी रही हैं। मुजफ्फरपुर, बिहार से 1991 में छपी इस छोटी-सी किताब में उस दौर की दहेज समस्या का गम्भीरता से अध्ययन किया गया था। ये दोनों पुस्तकें हिन्दी अनुवाद के बाद और चर्चित हो गईं। अपने जीवन के उत्तरार्ध में भी वे अनुवाद करते रहे। कभी कला प्रयोजन के सम्पादक हेमन्त शेष के आग्रह पर तो कभी और किसी पत्रिका के कहने पर। असल बात यही है कि साहित्य में जिस जीवन दृष्टि के लिए नंद बाबू संकल्पवान थे उसे बनाए रखने और गति देने के लिए अनुवाद भी एक जरूरी रास्ता लगता था।
Sahitya Siddhant
- Author Name:
Rene Wellek +2
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प्रसिद्ध अमेरिकी आलोचकों ‘रेने वेलेक और आस्टिन वारेन’ की यह कृति अपने विषयगत वैज्ञानिक विवेचन एवं शैलीगत सहजता के कारण अभूतपूर्व लोकप्रियता प्राप्त कर चुकी है। विद्वान् लेखकों ने एक ओर तो काव्यशास्त्र और अलंकारशास्त्र (जिसकी परम्परा अरस्तू से शुरू होकर ब्लेयर, कैम्पबेल और केम्स तक आई हुई है) के विभिन्न पक्षों का सम्यक् विवेचन प्रस्तुत किया है और दूसरी ओर ललित साहित्य की विधाओं और शैलीशास्त्र तथा साहित्यालोचन के प्रमुख सिद्धान्तों से भी पाठकों को परिचित कराया है। इसके साथ ही अनुसन्धान, साहित्य का इतिहास, साहित्य का मूल्यांकन, कॉलेजों में साहित्य का अध्ययन जैसी ज्वलन्त समस्याओं का समाधान भी सुझाने का सफल प्रयास किया है। प्रस्तुत पुस्तक में ‘काव्यशास्त्र’ (या साहित्य-सिद्धान्त) और ‘आलोचना (साहित्य का मूल्यांकन) को पांडित्य (अनुसन्धान) और साहित्यिक इतिहास (सिद्धान्त और आलोचना के रूढ़पथ के विपरीत, साहित्य के गतिशील पक्ष) से भी जोड़ना चाहा है। शब्दावली, टोन और बल में निःसन्देह दोनों लेखकों में थोड़ी-बहुत असंगतियाँ रह गई हैं। परन्तु वे यह भी सोचते हैं कि इस कमी की पूर्ति इस रूप में हो जाती है कि दो व्यक्ति मूलत: एक ही निष्कर्ष पर पहुँचे हैं।
Vichar Ka Aina Kala Sahitya Sanskriti : Mahatma Gandhi
- Author Name:
Mahatma Gandhi +1
- Book Type:

- Description:
विचार का आईना शृंखला के अन्तर्गत ऐसे साहित्यकारों, चिन्तकों और राजनेताओं के ‘कला साहित्य संस्कृति’ केन्द्रित चिन्तन को प्रस्तुत किया जा रहा है जिन्होंने भारतीय जनमानस को गहराई से प्रभावित किया। इसके पहले चरण में हम मोहनदास करमचन्द गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, राममनोहर लोहिया, रामचन्द्र शुक्ल, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा, सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ और गजानन माधव मुक्तिबोध के विचारपरक लेखन से एक ऐसा मुकम्मल संचयन प्रस्तुत कर रहे हैं जो हर लिहाज से संग्रहणीय है। मोहनदास करमचन्द गांधी ऐसे जननेता हैं जो वैश्विक उपस्थिति रखते हैं। वे भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के ऐसे नायक हैं जिन्होंने इसे जनता का आन्दोलन बना दिया। औपनिवेशिक सत्ता का प्रतिरोध करते हुए उन्होंने सत्य और अहिंसा को अपनी लड़ाई का केन्द्रीय शिल्प बनाया। उन्होंने साध्य ही नहीं साधन की भी पवित्रता की बात की, बेलगाम उपभोग की संस्कृति का विरोध किया। सत्याग्रही के रूप में विरोधी के प्रति भी किसी तरह की कटुता न रखने की बात कही। अपने समय के शीर्ष लेखकों, चिन्तकों और कलाकारों पर गांधी के विचारों का गहरा असर रहा। वे लोगों से निरन्तर संवादरत रहे और अपने विचारों को मजबूती से रखते रहे। हमें उम्मीद है कि उनके कला, साहित्य और संस्कृति सम्बन्धी लेखन को पढ़ते हुए इस कठिन समकाल से जूझने की अनेक राहें रोशन होंगी।
Hindi Sufi Kavya Ka Samgra Anushilan
- Author Name:
Shivsahay Pathak
- Book Type:

- Description:
चौदहवीं शताब्दी ईसवी से लेकर 20वीं शताब्दी ईसवी तक के छह सौ वर्षों की सुदीर्घ अवधि में शताधिक सूफी काव्यों से हिन्दी-साहित्य समृद्ध हुआ है। साहित्य और संस्कृति की अनेकानेक धाराएँ हिन्दी सूफी काव्य में अनुस्यूत हैं। अनेक परम्पराओं, धर्म, दर्शनों, साधनाओं आदि ने सूफी काव्य को अनुप्राणित किया है। हिन्दी सूफी काव्य का अध्ययन स्वयं में अत्यन्त मनोरंजक और महत्त्वपूर्ण विषय है। सूफी संतों ने धर्म और मजहब से ऊपर मनुष्यत्व का परिचय दिया है। इनके काव्यों में प्रेम-पीर की स्निग्ध पुकार है, विरह की प्रशान्त-गम्भीर तड़प है, आत्मसमर्पण का परम पुनीत आग्रह है। इसीलिए ये काव्य हमारे हृदयों को सहज ही छूकर झंकृत कर देते हैं। इन संतों का उद्देश्य संकीर्णताओं से ऊपर उठकर आत्मशुद्धि और जनजीवन में प्रेम-सन्देश का सम्प्रसार था। इसी उद्देश्य का सुफल सूफी काव्य है। सूफीमतवाद की विशेषता रही है कि वह कभी जीवन की उपेक्षा करके नहीं चला। सूफी कवि सही अर्थों में जनकवि थे। उत्तरी हिन्दी के सूफी कवियों ने ठेठ अवधी– जनता की बोली को काव्य की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया है। पन्द्रहवीं शताब्दी ईसवी से बीसवीं शताब्दी ईसवी तक की जीवन्त अवधी भाषा इनके काव्य का आधार- शृंगार है। इस पुस्तक में एक नवीन दृष्टि से हिन्दी सूफी काव्यों पर विचार किया गया है। फारसी में लिखे गए प्रमुख सूफी काव्यों और अंग्रेजी-फारसी-उर्दू में लिखे गए इस विषय के प्रामाणिक ग्रन्थों के अध्ययन के अनन्तर ही लेखक ने इस शोध-कार्य को सम्पन्न किया। काव्य-परम्परा, प्रबन्ध-योजना, प्रतीक पद्धति, उपमान, कथानक-रूढ़ि, अध्यात्म और दर्शन आदि के फारसी, अरबी और भारतीय मूल प्रेरणास्रोतों का सन्धान करके और उन्हें दृष्टिपथ में रख करके किए गए इस अध्ययन (और निकाले गए निष्कर्षों) से हिन्दी सूफी काव्य-विषयक अनेक भ्रान्त धारणाओं का निराकरण भी लेखक ने किया है।
Sher Behtar Kaise Hua?
- Author Name:
Akash Arsh
- Book Type:

- Description:
"Sher Behtar Kaise Hua" is a documentation of the classical tradition in Urdu poetry, in which masters would guide their disciples by correcting flaws in their verses. Through this gradual process, the students were introduced to the finer nuances—both strengths and weaknesses—of poetic craft. This book is a compilation of such corrections (islaah) offered by great poets like Mir, Ghalib, Nasikh, and Daagh on the verses of their disciples. Through these curated islaahs and their interpretations, the book teaches readers how to recognise and refine errors in Urdu poetry. It serves as an essential reference for students, lovers, and aspiring poets of Urdu literature. Aakash ‘Arsh’ (Aakash Tiwari) was born on May 2, 2001, in Sultanpur, Uttar Pradesh. He received his early education in Jagraon, Punjab. He holds a deep interest in the literature of four languages—Urdu, Hindi, English, and Punjabi. Alongside writing poetry in Urdu and Punjabi, he is also actively engaged in translation and editorial work. Currently, he serves as an editor at the Rekhta Foundation.
Urdu Shabdon Ka Guldasta
- Author Name:
Azra Naqvi
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उर्दू अपनी खूबसूरती, नफ़ासत और बेहतरीन शब्द-भंडार के लिए जानी जाती है। "उर्दू शब्दों का गुलदस्ता" रेख़्ता फ़ाउंडेशन की एक अनोखी पहल है, जो आपको मज़ेदार और आसान तरीके से उर्दू शब्द सीखने में मदद करती है। पारंपरिक शब्दकोश के बजाय, यह किताब कहानियों के ज़रिए उर्दू शब्द पेश करती है, जिससे शब्द सीखना और भी मज़ेदार हो जाता है। शब्दों को संदर्भ के अनुसार बांटा गया है ताकि सीखने वाले एक ही मूल शब्द से जुड़े दूसरे शब्द भी सीख सकें। हर अध्याय के आखिर में जल्दी दोहराने के लिए अभ्यास दिए गए हैं। यह किताब उर्दू शायरी में आम तौर पर इस्तेमाल होने वाले शब्दों और बातचीत के बुनियादी हुनर में महारत हासिल करने के लिए एक बेहतरीन गाइड है। कृपया इस किताब के बारे में अपनी राय और सुझाव दें। 'वर्ड पावर मेड ईज़ी' की तर्ज़ पर बनी यह किताब आपको तेज़ी से अपना उर्दू शब्द-भंडार बढ़ाने और बेहतर बनाने में मदद करती है। इसमें कई तरह के विषय शामिल हैं, जैसे अभिवादन, प्यार, ज्ञान, रिश्ते, लोग, घर की चीज़ें, कपड़े, स्वाद, रंग, शरीर के अंग, बाज़ार, यात्रा, पेशे, शायरी, मयख़ाने, बाग़-बगीचे और प्रकृति। अध्यायों के दौरान, आप आम गलतियों, सही उच्चारण और वर्तनी के बारे में जानेंगे, और शब्दों के मूल रूप, उनके अलग-अलग रूप और बहुवचन बनाने के नियम समझेंगे। साथ ही, आप अलग-अलग मौकों पर अभिवादन करने, मेहमाननवाज़ी करने और आभार व्यक्त करने के तरीके भी सीखेंगे। आसान व्याख्या, बुनियादी व्याकरण और अध्याय-वार अभ्यास के साथ, यह किताब उर्दू बोलने में आपका आत्मविश्वास बढ़ाती है। आखिर में, यह किताब आपको उर्दू भाषा और तहज़ीब की बेहतर समझ विकसित करने में मदद करेगी।
Urdu Shayari Ka Shabd Sansar
- Author Name:
Azra Naqvi
- Book Type:

- Description:
उर्दू कई तहज़ीबों और भाषाओं के मेल से बनी है और शायरी की रिवायत (काव्य-परम्परा) में फ़ारसी, अरबी, संस्कृत और तुर्की के रंग शामिल हैं। ये किताब एक शब्दकोश न हो कर उर्दू शायरी में आने वाले विभिन्न विषयों पर ख़ूबसूरत शेरों के संकलन पर आधारित है। शायरी की दुनिया की सैर कराते हुए ये किताब आपको नए-नए शब्दों और उनके उपयोग की बारीकियों के बारे में बताती है और शायरी में इस्तेमाल होने वाले अहम लफ़्ज़ों, तरकीबों और तल्मीहात के मानी और उनके विभिन्न सन्दर्भों को विस्तार से समझाया गया है। ये किताब शायराना लफ़्ज़ों के कलात्मक इस्तेमाल और उनके गहरे अर्थों को समझने में मददगार होगी, और उर्दू शायरी के अथाह ख़ज़ाने का भरपूर लुत्फ़ उठाने का मौक़ा देगी।
Saat Bhumikayen
- Author Name:
Mahadevi Verma +1
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छायावाद की यशस्वी रचनाकार महादेवी वर्मा का लेखन किसी न किसी रूप में पाठकों व आलोचकों को आन्दोलित करता आया है। कभी उनकी रचनाओं में उनके जीवन के बिखरे सूत्र रेखांकित किए जाते हैं तो कभी उनके जीवन में रचनाओं के स्रोत खोजे जाते हैं। महादेवी द्वारा लिखित प्रत्येक शब्द स्वयं को ध्यान से पढ़े जाने का आग्रह करता है। सात भूमिकाएँ’ में ‘रश्मि’, ‘सांध्यगीत’, ‘आधुनिक कवि’, ‘दीपशिखा’, ‘बंग–दर्शन’, ‘सप्तपर्णा’ एवं ‘हिमालय’ कविता–संग्रहों की भूमिकाएँ हैं। महादेवी वर्मा लिखित इन भूमिकाओं का ऐतिहासिक महत्त्व है। ये भूमिकाएँ उनकी तत्कालीन मन:स्थिति को प्रकट करने के साथ उनके समग्र लेखन पर एक ‘अन्त:साक्ष्य’ की भाँति हैं। ‘सात भूमिकाओं’ के सम्पादक दूधनाथ सिंह का सम्पादकीय ‘छायावाद : व्यथा का सवेरा’ अत्यन्त विचारोत्तेजक है। अपनी विशिष्ट ‘तर्कसंगत पद्धति’ से दूधनाथ सिंह ने महादेवी के रचनाकर्म को विवेचित किया है—‘उनके वाक्य स्पष्ट, पारदर्शी व निर्भ्रान्त हैं, ‘महादेवी की आलोचनाएँ शब्द–अलंकृति अधिक हैं, आलोचनाएँ कम। उनका सारा वैचारिक गद्य–लेखन लगभग ऐसा ही है। उनमें तर्क और विश्लेषण का अभाव है। अपनी हर अगली बात के लिए महादेवी तर्क की जगह कोई प्रतीक–बिम्ब ढूँढ़ने लगती हैं।’ दूधनाथ सिंह के सम्पादकीय के प्रकाश में महादेवी की इन सात भूमिकाओं को पढ़ना एक आलोचनात्मक अनुभव है। तब और भी जब महादेवी के चुटीले ‘सुरक्षात्मक वाक्य’ उनकी प्रत्येक भूमिका में हैं। ‘रश्मि’ संग्रह की ‘अपनी बात’ का पहला ही वाक्य, ‘अपने विषय में कुछ कहना प्राय: बहुत कठिन हो जाता है, क्योंकि अपने दोष देखना अपने आपको अप्रिय लगता है और इनको अनदेखा कर जाना औरों को...।’ एक संग्रहणीय पुस्तक।
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