Radhakrishna Mulyankan Mala : Dhruvaswamini
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Author:
Ashish TripathiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
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जयशंकर प्रसाद का सम्पूर्ण कृतित्व हिन्दी के आकाश पर उस चन्द्रमा के समान प्रकाशित है जिसकी आभा कभी कम नहीं होगी। प्रसाद ने कविता के साथ नाटक भी लिखे और उनके नाटक सम्पूर्ण भारतीय साहित्य की उपलब्धि माने जाते हैं। आधुनिक स्त्री विमर्श के बहुत पहले 1933 में लिखे गए ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक को स्त्रीवादी रचना भी माना जाता है। अपने आत्मसम्मान के लिए जानी जाने वाली ध्रुवस्वामिनी इस नाटक की नायिका है जो अपने पति के विरोध में खड़ी हो जाती है। हिन्दी आलोचना और रंग आलोचना में जयशंकर प्रसाद अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति के साथ विवादित भी रहे हैं। उनके नाटकों की रंगमंचीयता के सम्बन्ध में अक्सर सवाल होते रहते हैं तथापि उनके पाठ के महत्त्व से किसी की असहमति नहीं। राधाकृष्ण मूल्यांकन माला की गौरवशाली परम्परा में ‘ध्रुवस्वामिनी’ पर यह आलोचना कृति हिन्दी के आधिकारिक विद्वानों और नई पीढ़ी के लेखकों के चिन्तन-मनन का सार्थक परिणाम है। हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों-शोधार्थियों के लिए इस मूल्यांकन माला के पुनर्नवा प्रारूप में अब कृतिकारों के साथ कृतियों पर भी मूल्यांकनपरक पुस्तकें उपलब्ध हैं। प्रसाद जी की अविस्मरणीय कृति को विभिन्न दृष्टियों से देखने-समझने का यह प्रयास हिन्दी आलोचना के लिए भी विश्वसनीय होगा।
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जयशंकर प्रसाद का सम्पूर्ण कृतित्व हिन्दी के आकाश पर उस चन्द्रमा के समान प्रकाशित है जिसकी आभा कभी कम नहीं होगी। प्रसाद ने कविता के साथ नाटक भी लिखे और उनके नाटक सम्पूर्ण भारतीय साहित्य की उपलब्धि माने जाते हैं। आधुनिक स्त्री विमर्श के बहुत पहले 1933 में लिखे गए ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक को स्त्रीवादी रचना भी माना जाता है। अपने आत्मसम्मान के लिए जानी जाने वाली ध्रुवस्वामिनी इस नाटक की नायिका है जो अपने पति के विरोध में खड़ी हो जाती है।
हिन्दी आलोचना और रंग आलोचना में जयशंकर प्रसाद अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति के साथ विवादित भी रहे हैं। उनके नाटकों की रंगमंचीयता के सम्बन्ध में अक्सर सवाल होते रहते हैं तथापि उनके पाठ के महत्त्व से किसी की असहमति नहीं।
राधाकृष्ण मूल्यांकन माला की गौरवशाली परम्परा में ‘ध्रुवस्वामिनी’ पर यह आलोचना कृति हिन्दी के आधिकारिक विद्वानों और नई पीढ़ी के लेखकों के चिन्तन-मनन का सार्थक परिणाम है। हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों-शोधार्थियों के लिए इस मूल्यांकन माला के पुनर्नवा प्रारूप में अब कृतिकारों के साथ कृतियों पर भी मूल्यांकनपरक पुस्तकें उपलब्ध हैं।
प्रसाद जी की अविस्मरणीय कृति को विभिन्न दृष्टियों से देखने-समझने का यह प्रयास हिन्दी आलोचना के लिए भी विश्वसनीय होगा।
Book Details
-
ISBN9789309020223
-
Pages192
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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नामवर सिंह न सीमित अर्थों में साहित्यकार हैं, न आलोचक। इसके बावजूद वे इन साक्षात्कारों में मुख्यत: आलोचक के रूप में उभरते हैं। नामवर जी का आलोचक समाज में बातचीत करते हुए, वाद-विवाद-संवाद करते, प्रश्न-प्रतिप्रश्न करते सक्रिय रहता है और विचार, तर्क और संवाद की उस प्रक्रिया से गुज़रता है जो आलोचना की बुनियादी भूमि है। आलोचना लिखित हो या वाचिक, उसके पीछे बुनियादी प्रक्रिया है—पढ़ना, विवेचना, विचारना। तर्क और संवाद। नामवर जी के साक्षात्कारों में इसका व्यापक समावेश है। इनसे गुज़रते हुए हम महसूस करते हैं कि वह किसी रचना को हमेशा नई और अपनी तरह से पढ़ने की कोशिश करते हैं और इस तरह ‘पढ़ते’ हुए वे लगातार नई तरह से ‘सोचते’ और ‘विचारते’ हुए सामने आते हैं। उनकी वाचिक आलोचना मूल्यांकन की ऊपरी सीढ़ी तक पहुँचती है। निकष बनाती है। प्रतिमानों पर बहस करती है। उसमें ‘लिखित’ की तरह की ‘कौंध’ मौजूद होती है। इस पुस्तक में संकलित साक्षात्कारों का विषय-क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है। मार्क्सवाद, समकालीन विश्व, पूँजीवाद, नवसाम्राज्यवाद, नवफ़ासीवाद और भारतीय लोकतंत्र के विरूपीकरण से लेकर कविता, कहानी, उपन्यास और निजी जीवन तक—साहित्य और देश-दुनिया की उनकी समझ का एक स्पष्ट प्रतिबिम्ब यहाँ मिलता है। उनकी विश्व-दृष्टि का रूपायन इनमें हुआ है।
Ramchandra shukla Rachanawali : Vol. 1-8
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Namvar Singh +3
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आचार्य शुक्ल कोरे साहित्य समालोचक नहीं थे। वे गम्भीर अर्थों में साहित्य के समालोचक थे, जहाँ साहित्य के अन्तर्गत जीवन की चिन्ता, समाज की चिन्ता और पूरी संस्कृति की चिन्ता रहती थी। यह हिन्दी आलोचना का सौभाग्य है कि उसकी प्रतिष्ठा एक ऐसे समालोचक द्वारा हुई जो शुद्ध साहित्यिक आलोचक नहीं था, सिर्फ़ अलंकार और रस की मीमांसा करनेवाला काव्य-विवेचक नहीं था, बल्कि साहित्य को व्यापक सामाजिक सन्दर्भों में देखनेवाला और साहित्य की सामाजिक सार्थकता की प्रतिष्ठा करनेवाला आलोचक था। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल दुनिया के अनेक महान आलोचकों के समान ही भारत के पहले गम्भीर समालोचक दिखाई पड़ते हैं। आचार्य शुक्ल अपना चिन्तन साहित्य की सामाजिक सार्थकता और साहित्य में ‘लोक मंगल’ के व्यापक सन्दर्भ में करते हैं, तो स्वभावतः उनके व्यापक, विराट व्यक्तित्व की ओर हमारा ध्यान जाता है। उनके समग्र कृतित्व का संकलन हिन्दी साहित्य की परम्परा के सर्वश्रेष्ठ के पुनर्जीवन की तरह है। आठ खंडों में प्रकाशित ‘रामचन्द्र शुक्ल रचनावली’ के पहले खंड में उनकी सर्वाधिक चर्चित और कालजयी कृति ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ संकलित है। रचनावली के सम्पादक नामवर सिंह ने इसकी भूमिका में आचार्य शुक्ल की इस कृति के महत्त्व और उसकी विशेषताओं पर विस्तार से चर्चा की है।
Tumhara Namvar
- Author Name:
Namvar Singh +2
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नामवर सिंह आधुनिक हिन्दी के सबसे बड़े संवादी थे। इस पुस्तक में संकलित पत्र उनके संवादी-भाव को समझने की एक नई दृष्टि देते हैं। ‘तुम्हारा नामवर’ के पहले खंड में परिजनों को लिखे पत्र हैं। मझले भाई रामजी सिंह को सम्बोधित पत्र अनेक दृष्टियों से विशिष्ट हैं। इन पत्रों में आधुनिक एवं पारम्परिक जीवन के द्वन्द्वों के दबावों की अनेक झलकें संकेत रूप में मौजूद हैं। सबसे छोटे भाई काशीनाथ सिंह को लिखे पत्र उन स्थितियों और जीवन-प्रसंगों पर रोशनी डालते हैं जिनमें नामवर सिंह का निर्माण हुआ। व्यक्तिगत पत्रों में बेटी समीक्षा को दार्जिलिंग से लिखे गए दस पत्रों का एक अलग ही महत्त्व है। अठहत्तर वर्ष की अवस्था में गहन भावनाओं से भरे हुए ये पत्र ‘चिट्ठी भी हैं और डायरी भी’। इन्हें हिन्दी की हँसमुख और दिलख़ुश गद्य परम्परा में सम्मान के साथ रखा जा सकता है। दूसरे खंड में साहित्य-सहचरों—केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध, राजेन्द्र यादव, विश्वनाथ त्रिपाठी, रवीन्द्र कालिया, कमला प्रसाद, नंदकिशोर नवल और महेन्द्रनाथ राय—को लिखे गए पत्र संकलित हैं। इन पत्रों में एक पाठक के रूप में नामवर जी अपने समय-साहित्य के विभिन्न मुद्दों पर न सिर्फ़ बातचीत की एक वृहद् ज़मीन तैयार करते दिखते हैं, बल्कि लेखक व सम्पादक के रूप में अपनी ज़िम्मेदारी भी निभाते नज़र आते हैं। तीसरे खंड में श्रीनारायण पांडेय के नाम लिखे गए पत्रों को व्यक्तिगत-पारिवारिक पत्रों की शृंखला में ही रखा जा सकता है। पांडेय जी 1952-1954 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में नामवर जी के छात्र रहे हैं। ये पत्र काशीनाथ सिंह के नाम पत्रों की ही तरह महत्त्वपूर्ण हैं। नामवर जी के व्यक्तित्व के छिपे हुए रूपों के साथ ही उनके राजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक विचारों की गम्भीर झलक इन पत्रों में मौजूद है। इस पुस्तक से बाहर भी अभी हज़ारों पत्र लोगों के निजी संग्रह में मौजूद होंगे। उन्हें भी प्राप्त होने के बाद अगले संस्करण में शामिल कर लिया जाएगा। बावजूद इसके ‘तुम्हारा नामवर’ में संकलित पत्र हिन्दी आलोचना में ‘दूसरी परम्परा की खोज’ करनेवाले नामवर सिंह के जीवन-अनुभव से निकला वह जीवन-दर्शन हैं जिनके आलोक में केवल अतीत, वर्तमान ही नहीं बल्कि भविष्य का भी बहुत कुछ पढ़ा, समझा और रचा जा सकता है।
Pratinidhi Kahaniyan : Swayam Prakash
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Swayam Prakash +1
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स्वयं प्रकाश की कहानियाँ भारतीय, विशेष रूप से हिन्दी मध्यवर्ग के जीवन की एक तस्वीर पेश करती हैं—मनुष्यता से लबरेज़ पर दब्बू और डरपोक मध्यवर्ग, छोटी-छोटी आकांक्षाओं के लिए भी संघर्षरत, अन्ततः उन्हें स्थगित करता मध्यवर्ग, स्वार्थों की अन्धी दौड़ में भागता-गिरता-पड़ता मध्यवर्ग, निम्नवर्गीय जनों से विराग रखता मध्यवर्ग। यूँ तो स्वयं प्रकाश का कथाफ़लक गाँव से शहर तक फैला है, परन्तु उसका केन्द्र मध्यवर्ग ही है। यह मध्यवर्ग स्वतंत्रता आन्दोलन के दौर का मध्यवर्ग नहीं है जिसमें निम्नवर्ग के प्रति एक सदाशयता और सहभाव मौजूद था। इसमें निम्नवर्ग के प्रति वितृष्णा और घृणा निर्णायक हद तक मौजूद है। इस मध्यवर्ग में एक छोटी संख्या, उन लोगों की भी है, जिनमें समाज को बदलने की इच्छा मौजूद है। ऐसे चरित्र स्वयं प्रकाश के यहाँ प्रमुखता से मौजूद हैं। स्वयं प्रकाश की गहरी सहानुभूति इनके साथ है। इसीलिए इनके प्रति एक तरह का आलोचनात्मक भाव भी मौजूद है। परिवर्तनकामी चेतना जब मध्यवर्गीय स्वार्थपरता, पर्सनाल्टी कल्ट, या थोथे आदर्शवाद से घिर जाती है, स्वयं प्रकाश इन चरित्रों के प्रति तीखे हो जाते हैं। उनकी कहानियों में भारतीय स्त्री के जीवन की गहरी आलोचनात्मक पड़ताल भी मौजूद है। वे स्त्री-चरित्रों को प्रायः एक टाइप की तरह नहीं, एक व्यक्ति की तरह अंकित करते हैं। ये स्त्री-चरित्र पुरुष-चरित्रों की तरह ही निजी विशिष्टताओं के मालिक हैं। उन पर सामाजिक संरचना के दबाव हैं, परन्तु वे उनके विरुद्ध जीते हुए अपनी तरह का संसार रचने को आतुर हैं। स्वयं प्रकाश ने कहानीपन की रक्षा करते हुए, उसे रोचक बनाते हुए एक ज्ञानी की तरह नहीं एक क़िस्सागो की तरह अपनी कहानियाँ कही हैं।
Hindi Sufi Kavya Ka Samgra Anushilan
- Author Name:
Shivsahay Pathak
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चौदहवीं शताब्दी ईसवी से लेकर 20वीं शताब्दी ईसवी तक के छह सौ वर्षों की सुदीर्घ अवधि में शताधिक सूफी काव्यों से हिन्दी-साहित्य समृद्ध हुआ है। साहित्य और संस्कृति की अनेकानेक धाराएँ हिन्दी सूफी काव्य में अनुस्यूत हैं। अनेक परम्पराओं, धर्म, दर्शनों, साधनाओं आदि ने सूफी काव्य को अनुप्राणित किया है। हिन्दी सूफी काव्य का अध्ययन स्वयं में अत्यन्त मनोरंजक और महत्त्वपूर्ण विषय है। सूफी संतों ने धर्म और मजहब से ऊपर मनुष्यत्व का परिचय दिया है। इनके काव्यों में प्रेम-पीर की स्निग्ध पुकार है, विरह की प्रशान्त-गम्भीर तड़प है, आत्मसमर्पण का परम पुनीत आग्रह है। इसीलिए ये काव्य हमारे हृदयों को सहज ही छूकर झंकृत कर देते हैं। इन संतों का उद्देश्य संकीर्णताओं से ऊपर उठकर आत्मशुद्धि और जनजीवन में प्रेम-सन्देश का सम्प्रसार था। इसी उद्देश्य का सुफल सूफी काव्य है। सूफीमतवाद की विशेषता रही है कि वह कभी जीवन की उपेक्षा करके नहीं चला। सूफी कवि सही अर्थों में जनकवि थे। उत्तरी हिन्दी के सूफी कवियों ने ठेठ अवधी– जनता की बोली को काव्य की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया है। पन्द्रहवीं शताब्दी ईसवी से बीसवीं शताब्दी ईसवी तक की जीवन्त अवधी भाषा इनके काव्य का आधार- शृंगार है। इस पुस्तक में एक नवीन दृष्टि से हिन्दी सूफी काव्यों पर विचार किया गया है। फारसी में लिखे गए प्रमुख सूफी काव्यों और अंग्रेजी-फारसी-उर्दू में लिखे गए इस विषय के प्रामाणिक ग्रन्थों के अध्ययन के अनन्तर ही लेखक ने इस शोध-कार्य को सम्पन्न किया। काव्य-परम्परा, प्रबन्ध-योजना, प्रतीक पद्धति, उपमान, कथानक-रूढ़ि, अध्यात्म और दर्शन आदि के फारसी, अरबी और भारतीय मूल प्रेरणास्रोतों का सन्धान करके और उन्हें दृष्टिपथ में रख करके किए गए इस अध्ययन (और निकाले गए निष्कर्षों) से हिन्दी सूफी काव्य-विषयक अनेक भ्रान्त धारणाओं का निराकरण भी लेखक ने किया है।
Sahitya Siddhant
- Author Name:
Rene Wellek +2
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प्रसिद्ध अमेरिकी आलोचकों ‘रेने वेलेक और आस्टिन वारेन’ की यह कृति अपने विषयगत वैज्ञानिक विवेचन एवं शैलीगत सहजता के कारण अभूतपूर्व लोकप्रियता प्राप्त कर चुकी है। विद्वान् लेखकों ने एक ओर तो काव्यशास्त्र और अलंकारशास्त्र (जिसकी परम्परा अरस्तू से शुरू होकर ब्लेयर, कैम्पबेल और केम्स तक आई हुई है) के विभिन्न पक्षों का सम्यक् विवेचन प्रस्तुत किया है और दूसरी ओर ललित साहित्य की विधाओं और शैलीशास्त्र तथा साहित्यालोचन के प्रमुख सिद्धान्तों से भी पाठकों को परिचित कराया है। इसके साथ ही अनुसन्धान, साहित्य का इतिहास, साहित्य का मूल्यांकन, कॉलेजों में साहित्य का अध्ययन जैसी ज्वलन्त समस्याओं का समाधान भी सुझाने का सफल प्रयास किया है। प्रस्तुत पुस्तक में ‘काव्यशास्त्र’ (या साहित्य-सिद्धान्त) और ‘आलोचना (साहित्य का मूल्यांकन) को पांडित्य (अनुसन्धान) और साहित्यिक इतिहास (सिद्धान्त और आलोचना के रूढ़पथ के विपरीत, साहित्य के गतिशील पक्ष) से भी जोड़ना चाहा है। शब्दावली, टोन और बल में निःसन्देह दोनों लेखकों में थोड़ी-बहुत असंगतियाँ रह गई हैं। परन्तु वे यह भी सोचते हैं कि इस कमी की पूर्ति इस रूप में हो जाती है कि दो व्यक्ति मूलत: एक ही निष्कर्ष पर पहुँचे हैं।
Vichar Ka Aina Kala Sahitya Sanskriti : Mahatma Gandhi
- Author Name:
Mahatma Gandhi +1
- Book Type:

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विचार का आईना शृंखला के अन्तर्गत ऐसे साहित्यकारों, चिन्तकों और राजनेताओं के ‘कला साहित्य संस्कृति’ केन्द्रित चिन्तन को प्रस्तुत किया जा रहा है जिन्होंने भारतीय जनमानस को गहराई से प्रभावित किया। इसके पहले चरण में हम मोहनदास करमचन्द गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, राममनोहर लोहिया, रामचन्द्र शुक्ल, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा, सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ और गजानन माधव मुक्तिबोध के विचारपरक लेखन से एक ऐसा मुकम्मल संचयन प्रस्तुत कर रहे हैं जो हर लिहाज से संग्रहणीय है। मोहनदास करमचन्द गांधी ऐसे जननेता हैं जो वैश्विक उपस्थिति रखते हैं। वे भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के ऐसे नायक हैं जिन्होंने इसे जनता का आन्दोलन बना दिया। औपनिवेशिक सत्ता का प्रतिरोध करते हुए उन्होंने सत्य और अहिंसा को अपनी लड़ाई का केन्द्रीय शिल्प बनाया। उन्होंने साध्य ही नहीं साधन की भी पवित्रता की बात की, बेलगाम उपभोग की संस्कृति का विरोध किया। सत्याग्रही के रूप में विरोधी के प्रति भी किसी तरह की कटुता न रखने की बात कही। अपने समय के शीर्ष लेखकों, चिन्तकों और कलाकारों पर गांधी के विचारों का गहरा असर रहा। वे लोगों से निरन्तर संवादरत रहे और अपने विचारों को मजबूती से रखते रहे। हमें उम्मीद है कि उनके कला, साहित्य और संस्कृति सम्बन्धी लेखन को पढ़ते हुए इस कठिन समकाल से जूझने की अनेक राहें रोशन होंगी।
Sher Behtar Kaise Hua?
- Author Name:
Akash Arsh
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"Sher Behtar Kaise Hua" is a documentation of the classical tradition in Urdu poetry, in which masters would guide their disciples by correcting flaws in their verses. Through this gradual process, the students were introduced to the finer nuances—both strengths and weaknesses—of poetic craft. This book is a compilation of such corrections (islaah) offered by great poets like Mir, Ghalib, Nasikh, and Daagh on the verses of their disciples. Through these curated islaahs and their interpretations, the book teaches readers how to recognise and refine errors in Urdu poetry. It serves as an essential reference for students, lovers, and aspiring poets of Urdu literature. Aakash ‘Arsh’ (Aakash Tiwari) was born on May 2, 2001, in Sultanpur, Uttar Pradesh. He received his early education in Jagraon, Punjab. He holds a deep interest in the literature of four languages—Urdu, Hindi, English, and Punjabi. Alongside writing poetry in Urdu and Punjabi, he is also actively engaged in translation and editorial work. Currently, he serves as an editor at the Rekhta Foundation.
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