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Rakesh Mishra, PallavPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
200
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‘मैला आँचल’ फणीश्वरनाथ रेणु की प्रथम कृति थी जिसके प्रकाशित होते ही रेणु हिन्दी जगत के दुलारे कथाकार हो गए। ऐसे दुलारे कथाकार जो भारतीय समाज के सड़े-बँधे दृश्यों के मध्य भी जीवन के राग और रंग खोजना जानता है। रेणु ने लिखा भी था, “इसमें फूल भी है, शूल भी, धूल भी है, गुलाब भी है, गुलाब भी, कीचड़ भी है, चन्दन भी, सुन्दरता भी है, कुरूपता भी—मैं किसी से दामन बचाकर नहीं निकल पाया।” अपने प्रकाशन के सात दशक बाद भी इसे भारतीय समाज और जीवन को जानने-समझने के सबसे विश्वसनीय साहित्यिक पाठ के रूप में देखा जाता है। हिन्दी आलोचना के लिए ‘मैला आँचल’ एक चुनौती की तरह रहा जिसे अपने नये ढंग के शिल्प के कारण आलोचकों की टेढ़ी नजर भी मिली किन्तु यह रेणु की कथा-दृष्टि की नवीनता का ही चमत्कार है कि हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों की कोई भी सूची ‘मैला आँचल’ के बिना पूरी नहीं हो सकती। राधाकृष्ण मूल्यांकन माला की गौरवशाली परम्परा में ‘मैला आँचल’ पर यह आलोचना कृति हिन्दी के आधिकारिक विद्वानों और नई पीढ़ी के लेखकों के चिन्तन-मनन का सार्थक परिणाम है। हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों-शोधार्थियों के लिए इस मूल्यांकन माला के पुनर्नवा प्रारूप में अब कृतिकारों के साथ कृतियों पर भी मूल्यांकनपरक पुस्तकें उपलब्ध हैं। रेणु जी की अविस्मरणीय कृति को विभिन्न दृष्टियों से देखने-समझने का यह प्रयास हिन्दी आलोचना के लिए भी विश्वसनीय होगा।
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‘मैला आँचल’ फणीश्वरनाथ रेणु की प्रथम कृति थी जिसके प्रकाशित होते ही रेणु हिन्दी जगत के दुलारे कथाकार हो गए। ऐसे दुलारे कथाकार जो भारतीय समाज के सड़े-बँधे दृश्यों के मध्य भी जीवन के राग और रंग खोजना जानता है। रेणु ने लिखा भी था, “इसमें फूल भी है, शूल भी, धूल भी है, गुलाब भी है, गुलाब भी, कीचड़ भी है, चन्दन भी, सुन्दरता भी है, कुरूपता भी—मैं किसी से दामन बचाकर नहीं निकल पाया।” अपने प्रकाशन के सात दशक बाद भी इसे भारतीय समाज और जीवन को जानने-समझने के सबसे विश्वसनीय साहित्यिक पाठ के रूप में देखा जाता है।
हिन्दी आलोचना के लिए ‘मैला आँचल’ एक चुनौती की तरह रहा जिसे अपने नये ढंग के शिल्प के कारण आलोचकों की टेढ़ी नजर भी मिली किन्तु यह रेणु की कथा-दृष्टि की नवीनता का ही चमत्कार है कि हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों की कोई भी सूची ‘मैला आँचल’ के बिना पूरी नहीं हो सकती।
राधाकृष्ण मूल्यांकन माला की गौरवशाली परम्परा में ‘मैला आँचल’ पर यह आलोचना कृति हिन्दी के आधिकारिक विद्वानों और नई पीढ़ी के लेखकों के चिन्तन-मनन का सार्थक परिणाम है। हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों-शोधार्थियों के लिए इस मूल्यांकन माला के पुनर्नवा प्रारूप में अब कृतिकारों के साथ कृतियों पर भी मूल्यांकनपरक पुस्तकें उपलब्ध हैं।
रेणु जी की अविस्मरणीय कृति को विभिन्न दृष्टियों से देखने-समझने का यह प्रयास हिन्दी आलोचना के लिए भी विश्वसनीय होगा।
Book Details
-
ISBN9789309020162
-
Pages192
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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समकालीन हिन्दी कविता में भी प्रचुर मात्रा में प्रेम कविताएँ लिखी जा रही हैं। प्रेम अपने समूचे भाव-वैभव तथा वैविध्य के साथ उसमें रूपायित हो रहा है। ऐसे आपाधापी वाले परिवेश में ‘अटक गई नींद’ शीर्षक से कवि राकेश मिश्र की प्रेम कविताएँ प्रकाशित हो रही हैं। ये कविताएँ प्रेम जैसे अत्यन्त कोमल और एकान्तिक मनोभाव को एक नए तेवर और मुहावरे के साथ प्रस्तुत करती हैं— कहीं मुझमें ही हो तुम शारदीय नदी के जल में उगते सूरज की तरह किताबों के पन्नों में छिपी सार्थक बातों की तरह कहीं मुझमें ही हो तुम। सूने कैनवास पर उभरने वाले रंगों की तरह कहीं मुझमें ही हो तुम। इस तरह कवि अपने काव्य-कौशल के सहारे बड़ी सटीक और सूक्ष्म अन्तर्वृत्तियों का चित्रांकन करता है। प्रस्तुत संकलन का महत्त्व इस दृष्टि से भी है कि इसके द्वारा पाठक को भावनात्मक पोषण प्राप्त होता है। वह बुद्धि तथा भावना के सन्तुलन को साधता है। इस संकलन की भाषा अपनी अभिव्यंजना में बेहद सटीक और परिपक्व है। इसमें किसी तरह का छद्म नहीं है। वह अपनी सहजता से भी पाठक को मुग्ध करती है। —पुरोवाक् से
Zindagi Ek Kan Hai
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Rakesh Mishra
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Awating description for this book
Dharohar Kahaniyaan : Acharya Chatursen Shastri
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Acharya Chatursen +2
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चतुरसेन शास्त्री ने अपनी कहानियों का निर्माण कल्पना और इतिहास के इतने रोमानी धरातल से किया है कि ये कहानियाँ सदा अमर रहेंगी। इन कहानियों के कथानक निर्माण में क्रमबद्ध स्वाभाविक घटनाओं के घटने का प्रमुख हाथ है। इस संयोग से कथानक में नाटकीय विकास होता है। उनकी कथा-सृष्टि सौन्दर्य, प्रेम और बलिदान की रेखाओं से हुई है। उनकी सामाजिक कहानियों में भी इसी तरह कल्पना, नाटकीय स्थितियों, संयोग और आदर्श आदि तत्त्वों का आपस में अद्भुत तादात्म्य उपस्थित हुआ है। —लक्ष्मीनारायण लाल
Shabdon ka Desh
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Rakesh Mishra
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यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि सुप्रतिष्ठित कवि राकेश मिश्र का चतुर्थ काव्य-संग्रह शब्दों का देश प्रकाशित हो रहा है। इस संकलन में दो सौ के आस-पास कविताएं संकलित हैं, जो मिश्र जी के विकसित भाव-बोध और विश्व-बोध का सतर्क परिचय देती हैं। यहां कवि जिस तटस्थता से शब्दों एवं संवेदनाओं के संश्लेषण द्वारा जिंदगी और कविता को परस्पर अनुस्यूत करता है, उससे जीवन और जगत का वैविध्यपूर्ण-अनावृत यथार्थ पूरी मर्मस्पर्शिता तथा गहनता के साथ प्रस्तुत हुआ है। मिश्र जी अपने सुख-दुख, उदात्त प्रेम, जीवन-बोध, विश्व-बोध, उर्वर सहानुभूति, समय-समाज के बदलते संदर्भों, प्रकृति-पर्यावरण के प्रति चिंता और मानवीय सरोकारों को जिस मौलिकता और सहजता से चित्रित करते हैं, उससे इस संकलन की कविताएं एक विशिष्ट संवेदनात्मक गहराई और बौद्धिक उत्कर्ष प्राप्त करती हैं। इस संकलन का केन्द्रीय भाव-बोध और मूल प्रतिपाद्य यह है कि प्रकृति-पर्यावरण की तरह ही भौतिक-जीवन, वैयक्तिक अनुभव-स्मृतियाँ और वस्तु जगत मनुष्य की नियति को कैसे संचालित करता है तथा कैसे उसे घेरे रहता है, इसे आविष्कृत करने का दुष्कर और चुनौतीपूर्ण कार्य इस संग्रह की कविताओं द्वारा सम्पन्न हुआ है। इसमें प्रेम, सौंदर्य, आसपास के जीवनानुभव, गांव-शहर से लेकर वैश्विक घटनाओं तक का गत्यात्मक चित्रण हुआ है। शब्दों का देश अमानवीय स्थितियों के बीच मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाने के प्रयास की अभिव्यक्ति है, जिसमें कवि की दुर्निवार आस्था, संघर्ष चेतना की सही पहचान और अनुभव जगत का वैविध्यपूर्ण समारोह उपस्थित हुआ है। इसमें कवि की लघु, सामान्य और लंबी कविताओं का मनोरम विन्यास, भावों की उत्कटता, चित्रण की सूक्ष्मता एवं जीवनानुभूति की गहनता के साथ एक विशिष्ट औदात्य और वैभव से सम्पन्न हैं जो एक बड़ी संभावना की ओर बढ़ रहे कवि का निदर्शन कराती हैं। इस दृष्टि से संग्रह की सारी कविताएँ बेहद पठनीय, चिंतनीय और पाठक को संवेदन एवं बौद्धिक धरातल पर समृद्ध करने वाली हैं। —डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय
Chalte Rahe Raat Bhar
- Author Name:
Rakesh Mishra
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राकेश मिश्र की कविताएँ दैनिक जीवन में प्रयुक्त साधारण बिम्बों के द्वारा मानवीय संघर्ष की तस्वीरें खींचती हैं। कविता की छोटी-छोटी पंक्तियों में वे सामाजिक विसंगतियों एवं निरावृत सत्य का एक पूरा परिदृश्य अंकित करते हैं। इस दृष्टि से 'रोटियाँ’ शीर्षक कविता विशेष रूप से चिन्तनीय बन पड़ी है—'बाँध दो/सूखी रोटियाँ/कँटीले तारों से/पोत दो/मक्खन/सूखी रोटियाँ/नंगी हों/तो/दस्तावेज़ होती हैं/हमारी बेईमान आदमीयत की’। इस तरह मिश्र जी मनुष्य के मूलभूत संघर्ष, दु:ख-दर्द और उसकी नियति की सही पहचान रखते हैं। वे अपने आस-पास की सारी जानी हुई चीज़ों को बिलकुल साफ़-सुथरे और विश्वसनीय ढंग से व्यंजित करते हैं। इस ढंग की कविताओं में 'नारे’, 'चुप होती आवाज़’, 'हेलीकॉप्टर’, 'कंक्रीट की दीवारें’, 'आख़िर कब तक’, 'उदास बच्चे’, 'चलते रहे रात-भर’, 'कृष्ण विवर’, 'तस्वीर’, 'चौराहा’, 'शहर में रातें’, 'खिलारी’, 'गुरुजी’, 'शहर’, 'भूख’ तथा 'वह लड़की’ का समावेश किया जा सकता है। इससे यह माना जा सकता है कि मिश्र जी के लिए कविता सिर्फ़ कला-यात्रा नहीं है। वह सामाजिक दायित्वों को सजगता के साथ सम्पादित करने की विधा है। —पुरोवाक् से
Kavi ka shahar
- Author Name:
Rakesh Mishra
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ग्राम, शहर, प्रकृति और प्रेम इन कविताओं में बराबर-बराबर मात्रा में है और उनकी अपनी-अपनी पीड़ाएँ भी। यानी कवि की आँख हर कहीं खुली है और कोई भी ऐसा दृश्य जो मानवीय विडम्बना को धारण किए हुए है—उनकी कलम से अछूता नहीं रहता। दुख हर कहीं है, देह में भी और धरती में भी। जितना खोदो, जहाँ तक खोदो, दुख ही दुख। ये कविताएँ इसी खुदाई में निकला खनिज हैं। कवि अगर इस दुनिया में उन लोगों को देख पाता है जो ‘मरने के काम पर हैं’ तो कहना चाहिए कि उन्हें मौजूदा सभ्यता के बहुत भीतर की किसी व्याधि का भी पता है, जिसने जीवन और संसार को यातना और मृत्यु की एक मशीन-भर बना छोड़ा है। ‘पुताई वाले लड़के’ कविता में भी उनकी यह तीक्ष्ण दृष्टि दिखाई पड़ती है। बेहद चित्रात्मक इस कविता में वे जब बताते हैं कि ‘घड़ी किसी के पास नहीं/पुताई के क्षेत्रफल से नापते हैं/समय’ तो यह जैसे हमारे इस समय की तमाम विद्रूपताओं पर एक टिप्पणी मालूम पड़ती है। ‘जब तक हम जान पाते/क्यों हुआ था पिछला युद्ध/उससे पहले ही शुरू हो जाता है। अगला युद्ध’—‘युद्ध’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ सभ्यता-समीक्षा की इसी प्रक्रिया को ही आगे बढ़ाती हैं जो राकेश मिश्र के इस नए संग्रह की लगभग सभी कविताओं का उद्देश्य है। ये कविताएँ अपनी विषयवस्तु में जीवन और सभ्यता के एक बड़े फलक को समेटती हैं, और हर बिन्दु से मानवीय मूल्यों के अभाव को रेखांकित करती हुईं हमें आत्मनिरीक्षण के लिए उकसाती हैं। एक कविता में वे चेताते भी हैं कि ‘नहीं बोलने की आदत/धीमे से छीन लेती है/सुनने की शक्ति भी।’
Pratinidhi Kahaniyan : Omprakash Valmiki
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Omprakash Valmiki +1
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ओमप्रकाश वाल्मीकि को हिन्दी दलित साहित्यकारों की अग्रणी पंक्ति में गिना जाता है। उनकी आत्मकथा ‘जूठन’ ने दलित-वृत्तान्तों में एक क्लासिक का दर्जा हासिल किया और कई कहानियों और कविताओं को मानक रूप में स्वीकृत किया गया। उन्होंने दलित-साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र पर व्यवस्थित चिंतन किया जो वैचारिक उत्तेजना का कारण बना। उनकी कहानियों के इस प्रतिनिधि संकलन में उन कथा-रचनाओं को रखा गया है जिन्हें न सिर्फ दलित-चेतना बल्कि भाषा और शिल्प के स्तर पर भी जाति-आधारित समाज की सत्ता-संरचना को चुनौती देने वाला माना गया। जो जीवन उन्होंने जिया, और एक संवेदनशील लेखक के रूप में उसे जिस तरह समझा, वही इन कहानियों का आधार है। समाज को जाति-उत्पीड़न की भयावहताओं से अवगत कराने के साथ-साथ दलित-दमित जन को अपने सम्मान के प्रति सजग करना और प्रतिरोध का रास्ता दिखाना इन कहानियों की मूल प्रेरणा है। इन कहानियों को पढ़कर हम अपने समाज को भी समझ सकते हैं और ओमप्रकाश वाल्मीकि की कथा-सामर्थ्य को भी।
Pratinidhi Kahaniyan : Manoj Rupada
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Manoj Rupada +1
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मनोज रूपड़ा हमारे समय के ऐसे विलक्षण कथाकार हैं जिनकी कहानियाँ अतीत और वर्तमान के घातक टकराव के बीच किसी घटना की तरह सामने आती हैं। यथार्थ की जड़ता को ध्वस्त करने के लिए अमूमन वे अपने चरित्रों को किसी खास क्षण या मनःस्थिति में फ्रीज कर देते हैं और इसके बरक्स यथार्थ की गतिशीलता को बढ़ा देते हैं। कई बार यथार्थ और चरित्र दोनों ही गतिशील होते हैं पर परस्पर भिन्न दिशाओं में। वे अपने कथा-चरित्रों के बाहरी और भीतरी यथार्थ के बीच एक तनाव भरा गुंजलक रचते हैं जहाँ सब कुछ गुँथकर एक विस्फोट की तरह प्रकट होता है और तब ‘दफ़न’, ‘साज़-नासाज़’, ‘टॉवर ऑफ सायलेंस’ या ‘सेकेंड लाइफ’ जैसी कहानियाँ सामने आती हैं। स्मृति, स्वप्न, कल्पना और यथार्थ के सघन और मार्मिक तंतुओं से बुनी हुई उनकी कहानियों में दृश्य इतने चाक्षुस होकर सामने आते हैं कि पाठ के समय ये कहानियाँ कहीं भीतर दृश्यमान होकर अपने लिए एक नई ही अर्थवत्ता की तलाश करने लगती हैं।
Pratinidhi Kahaniyan : Asghar Wajahat
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Asghar Wajahat +1
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असग़र वजाहत बेचैन लेखक हैं। लगातार प्रयोग करना और नएपन की तलाश करना उन्हें प्रिय है। कहानी में उन्होंने जोख़िम की हद तक प्रयोग किए हैं। लघुकथाओं के विन्यास से लगाकर संवाद और एकालाप जैसी प्रचलित-अप्रचलित नई-नई प्रविधियों में लिखना उन्हें आवश्यक लगता है। भाषा पर उनका जबरदस्त अधिकार, बारीक़ व्यंग्य और भीतरी करुणा का सहकार इन कहानियों को आकार देता है। साम्प्रदायिकता जैसी समस्या हो या मध्य वर्ग का पाखंड, एक ऐसे लेखक के लिए जो विचारधारा को साहित्य के लिए ज़रूरी समझता है, मनुष्यता के पक्ष में आशा का दामन कभी नहीं छोड़ सकता। प्रगतिशील जनवादी लेखन की समझ रही है कि मध्यवर्ग का काईंयापन और पाखण्ड मनुष्य समाज के विकास में बड़ा अवरोध है। असग़र वजाहत के यहाँ इस पाखण्ड के उद्घाटन के अनेक चित्र हैं जो बदलते समय के साथ प्रभावी होते गए हैं। आपातकाल के दौर में प्रतीकों में लिखी गई उनकी लघुकथाओं सरीख़ी कहानियाँ हों या हालिया दौर में असहिष्णुता से बजबजाते कारनामे सुनाती नई प्रविधि की कथाएँ, वे मनुष्यता के पक्ष में अपना स्वर कभी धीमा नहीं होने देते।
Batein Hain Baton Ka Kya
- Author Name:
Kashinath Singh +1
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पिछले पचास साल की हिन्दी कहानी में अनेक बड़े लेखकों के साथ जिन कहानीकारों का नाम अग्रणी रहा और जिन्हें पाठकों ने लगातार पसन्द किया उनमें काशीनाथ सिंह प्रमुख हैं। काशीनाथ सिंह अपने लेखन के लिए लोक से ऊर्जा ग्रहण करते हैं। वे जीवन का महत्त्व समझने वाले कथाकार हैं। सीधी-सच्ची बात कहने के लिए कला की कृत्रिमता उन्हें कभी पसन्द न आई और तभी उनकी कलम से काशी का अस्सी जैसी कालजयी कृति भी सम्भव हुई। लेखक के संसार को जानने-समझने के लिए ही नहीं वरन् उसकी कला के रहस्य को भी समझने के लिए उससे किए गए संवादों का महत्त्व है। काशीनाथ सिंह से समय-समय पर किए गए संवादों के इस संग्रह को वस्तुत: बतकही की संज्ञा अधिक समीचीन होगी क्योंकि काशीनाथ सिंह उस लोक के कथाकार हैं जो विचारों की आवाजाही में विश्वास रखता है। यहाँ संकलित लगभग दो दर्जन संवाद काशीनाथ सिंह के व्यक्तित्व और उनके सृजन सरोकारों को उजागर करने वाले हैं। विचारधारा, राजनीति और समाज की व्यापक बहसें और सवाल इन संवादों को धार देते हैं तो गद्य की कला का मर्म भी इन संवादों को उल्लेखनीय बनाता है। उनके लेखन के उत्तरार्ध में आई अनेक कृतियों यथा रेहन पर रग्घू, महुआ चरित और उपसंहार पर यहाँ अनेक संवाद हुए हैं। इन सबसे अलहदा और ऊपर है बनारस की बोली-बानी में काशीनाथ सिंह की बतकही। सीधी-सच्ची बातें और न हुआ तो दरेरा देकर कह देने का आत्मविश्वास। यह बतकही हमारे संवादहीनता से भरे समय में आत्मीय गपशप का विरल सुख है। इस गपशप में कथाकार अपने साथ पाठक को वैसे ही साथ लिए बैठा है जैसे गाँव में बर्फीली हवाओं में अलाव तापते हुए लोग सुख-दुःख की बात करते हैं। आइए, इस बतकही में शामिल होते हैं और बातों का आनन्द लेते हैं।
Pratinidhi Kahaniyan : Mrinal Pande
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Mrinal Pande +1
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मृणाल पाण्डे सत्तर के दशक से कहानी-लेखन में सक्रिय हैं, और उन्होंने बिना किसी आन्दोलन का हिस्सा हुए कथाकार के रूप में एक विशिष्ट पहचान अर्जित की है। उनकी कहानियों की दुनिया स्त्रियों, पहाड़ी जीवन के सुख-दुख और आधुनिक समाज में बढ़ते सम्बन्धगत तनावों से बनती है; और उस भाषा से जो अपनी स्वाभाविकता, सम्प्रेषणीयता और पारदर्शिता से पाठक के मन पर अमिट प्रभाव छोड़ जाती है। इस संकलन में शामिल कहानियाँ उनके कथाकार की लगभग सभी विशेषताओं को रेखांकित करते हुए उनके वैचारिक और सामाजिक सरोकारों को भी स्पष्ट करती हैं। इस चयन से गुज़रते हुए पाठकगण न सिर्फ़ इन कहानियों की पठनीयता के क़ायल होंगे, बल्कि पात्रों की ऐसी श्रेणी से साक्षात्कार भी करेंगे जो अपनी ज़मीन और अपने ताने-बाने में बेहद प्रामाणिक और वास्तविक है।
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