Kavi ka shahar
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About the book
ग्राम, शहर, प्रकृति और प्रेम इन कविताओं में बराबर-बराबर मात्रा में है और उनकी अपनी-अपनी पीड़ाएँ भी। यानी कवि की आँख हर कहीं खुली है और कोई भी ऐसा दृश्य जो मानवीय विडम्बना को धारण किए हुए है—उनकी कलम से अछूता नहीं रहता। दुख हर कहीं है, देह में भी और धरती में भी। जितना खोदो, जहाँ तक खोदो, दुख ही दुख। ये कविताएँ इसी खुदाई में निकला खनिज हैं। कवि अगर इस दुनिया में उन लोगों को देख पाता है जो ‘मरने के काम पर हैं’ तो कहना चाहिए कि उन्हें मौजूदा सभ्यता के बहुत भीतर की किसी व्याधि का भी पता है, जिसने जीवन और संसार को यातना और मृत्यु की एक मशीन-भर बना छोड़ा है। ‘पुताई वाले लड़के’ कविता में भी उनकी यह तीक्ष्ण दृष्टि दिखाई पड़ती है। बेहद चित्रात्मक इस कविता में वे जब बताते हैं कि ‘घड़ी किसी के पास नहीं/पुताई के क्षेत्रफल से नापते हैं/समय’ तो यह जैसे हमारे इस समय की तमाम विद्रूपताओं पर एक टिप्पणी मालूम पड़ती है। ‘जब तक हम जान पाते/क्यों हुआ था पिछला युद्ध/उससे पहले ही शुरू हो जाता है। अगला युद्ध’—‘युद्ध’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ सभ्यता-समीक्षा की इसी प्रक्रिया को ही आगे बढ़ाती हैं जो राकेश मिश्र के इस नए संग्रह की लगभग सभी कविताओं का उद्देश्य है। ये कविताएँ अपनी विषयवस्तु में जीवन और सभ्यता के एक बड़े फलक को समेटती हैं, और हर बिन्दु से मानवीय मूल्यों के अभाव को रेखांकित करती हुईं हमें आत्मनिरीक्षण के लिए उकसाती हैं। एक कविता में वे चेताते भी हैं कि ‘नहीं बोलने की आदत/धीमे से छीन लेती है/सुनने की शक्ति भी।’
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About the Book
ग्राम, शहर, प्रकृति और प्रेम इन कविताओं में बराबर-बराबर मात्रा में है और उनकी अपनी-अपनी पीड़ाएँ भी। यानी कवि की आँख हर कहीं खुली है और कोई भी ऐसा दृश्य जो मानवीय विडम्बना को धारण किए हुए है—उनकी कलम से अछूता नहीं रहता। दुख हर कहीं है, देह में भी और धरती में भी। जितना खोदो, जहाँ तक खोदो, दुख ही दुख। ये कविताएँ इसी खुदाई में निकला खनिज हैं।
कवि अगर इस दुनिया में उन लोगों को देख पाता है जो ‘मरने के काम पर हैं’ तो कहना चाहिए कि उन्हें मौजूदा सभ्यता के बहुत भीतर की किसी व्याधि का भी पता है, जिसने जीवन और संसार को यातना और मृत्यु की एक मशीन-भर बना छोड़ा है। ‘पुताई वाले लड़के’ कविता में भी उनकी यह तीक्ष्ण दृष्टि दिखाई पड़ती है। बेहद चित्रात्मक इस कविता में वे जब बताते हैं कि ‘घड़ी किसी के पास नहीं/पुताई के क्षेत्रफल से नापते हैं/समय’ तो यह जैसे हमारे इस समय की तमाम विद्रूपताओं पर एक टिप्पणी मालूम पड़ती है।
‘जब तक हम जान पाते/क्यों हुआ था पिछला युद्ध/उससे पहले ही शुरू हो जाता है। अगला युद्ध’—‘युद्ध’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ सभ्यता-समीक्षा की इसी प्रक्रिया को ही आगे बढ़ाती हैं जो राकेश मिश्र के इस नए संग्रह की लगभग सभी कविताओं का उद्देश्य है।
ये कविताएँ अपनी विषयवस्तु में जीवन और सभ्यता के एक बड़े फलक को समेटती हैं, और हर बिन्दु से मानवीय मूल्यों के अभाव को रेखांकित करती हुईं हमें आत्मनिरीक्षण के लिए उकसाती हैं। एक कविता में वे चेताते भी हैं कि ‘नहीं बोलने की आदत/धीमे से छीन लेती है/सुनने की शक्ति भी।’
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2023
- Weight
- 1000 grams
- ISBN-13
- 9788119092628
- Pages
- 120
- Reading time
- ~4 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Language
- Hindi
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आदिवासी जनी (स्त्री) मन का धरातल बिलकुल दूसरी तरह का है। आदिवासियत के दर्शन पर खड़ा। समभाव जिसकी मूल प्रकृति है। प्राकृतिक विभेद के अलावा जहाँ इनसान अथवा सत्ता द्वारा कृत्रिम रूप से थोपा हुआ कोई दूसरा भेद नहीं है। हालाँकि कुछ बन्दिशें हैं, परन्तु सामन्ती क्रूरता और धार्मिक आडम्बरों के क़िले में आदिवासी स्त्री बिलकुल क़ैद नहीं है। ‘कवि मन जनी मन’ संकलन में वृहत्तर झारखंड के आदिवासी समुदायों की स्त्री-रचनाकारों की कविताएँ शामिल हैं। कवियों में से एक या दो को छोड़कर प्राय: सभी अपनी-अपनी आदिवासी मातृभाषाओं में लिखती हैं। परन्तु संकलन में शामिल कविताएँ मूल रूप से हिन्दी में रची गई हैं। कुछ का हिन्दी अनुवाद है जिसे कवयित्रियों ने स्वयं किया है। हिन्दी में आदिवासी स्त्री-कविताओं का मूल या अनुवाद लाना इसलिए ज़रूरी लगा कि यह समझ बिलकुल साफ़ हो जाए कि नसों में दौड़नेवाला लहू चाहे कितनी पीढ़ियों का सफ़र तय कर ले, अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ता। यानी रचने का, गढ़ने का और बचाने का स्वभाव। अपने लिए ही नहीं बल्कि सबके लिए सम्पूर्ण समष्टि की चिन्ता का स्वभाव। पहाड़ी नदी की तरह चंचल, पोखरे की तरह गम्भीर, घर के बीचोंबीच खड़ा मज़बूत स्तम्भ या कि आर्थिक-सांस्कृतिक पौष्टिकता लिये महुआ-सी महिलाएँ अपने समुदाय की रीढ़ हैं। ठीक वैसे ही उनका लेखन है। वे अपनी कविताओं से विमर्श करती हैं। उनके विमर्श में वर्चस्व की आक्रामकता नहीं बचाव के युद्धगीत हैं। और है रचने का दुर्दम्य आग्रह जिसका सबूत यह संकलन है।
Fiza Ke Samandar Mein
- Author Name:
Ramswaroop Kisan
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ग्रामीण जीवन के अनूठे चित्र और मनुष्य के संसार के ऐसे बिम्ब जिन पर सामान्यतः हमारी निगाह कम ही ठहरती है, रामस्वरूप किसान की कविताओं में बहुतायत से मिलते हैं। मिसाल के तौर पर इस संग्रह की पहली ही कविता-शृंखला ‘पीठ’ को लिया जा सकता है जिसमें कुल सोलह कविताएँ शामिल हैं। ‘पीठ एक कारुणिक क्षेत्र’ है जिसे देखकर कवि-मन बार-बार कभी अपने भीतर और कभी बाहर की ओर एक प्रश्नाकुल चिन्तन-यात्रा पर निकल जाता है। ‘फ़िज़ा के समन्दर में’ शीर्षक कविता-शृंखला की ग्यारह कविताएँ पुनः कवि की विशिष्ट दृष्टि का पता देती हैं जिसमें प्रेम के लिए घर से भागती हुई लड़की हमें और हमारे समाज को पुनः पुनः सवालों के घेरे में खड़ा कर देती है— यह रहा/तुम्हारा दूल्हा/साथ-साथ रहोगे तो/प्यार हो जाएगा/पापा ने कहा।...नहीं, ऐसा कहो पापा/यह रहा तुम्हारा प्यार/साथ-साथ रहोगे/तो दूल्हा हो जाएगा। संग्रह में शामिल अधिकांश कविताएँ इसी तरह पाठक को सहसा चौंका देती हैं और हमारी देखी जानी चीज़ों को नये ढंग से हमारे सामने ला देती हैं। आम जन-जीवन के दैनन्दिन दुखों, व्यवस्था-जनित असहायताओं और मनुष्य की आन्तरिक और बाह्य पीड़ाओं के साथ इन कविताओं की राजनैतिक चेतना भी मुखर रूप में सामने आती है— पब्लिक लड़ती है चुनाव—पैसों से/बातों से/लातों से/भालों-बन्दूक़ों-तलवारों से/ख़ून के फ़व्वारों से/और लड़ा-लड़ाया चुनाव/उनके गले में डाल देती है.../वे चुनाव नहीं लड़ते/वे तो पहनते हैं चुनाव।
Chand Ki Vartani
- Author Name:
Rajesh Joshi
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राजेश जोशी का यह कविता-संग्रह हिन्दी कविता का एक नया शिखर है। तीन दशकों से भी अधिक की काव्य-साधना एवं जीवन के लगभग साठ वसन्तों की हरीतिमा से दीप्त यह संग्रह अनेक स्वरों का विलक्षण पुंज है। राजेश ने न केवल अपने को बदला है, बल्कि अपने को बदलते हुए समस्त समकालीन काव्य में सर्वथा नए घूर्ण उत्पन्न कर दिए हैं। वे सारे गुण और स्वाद जिनके लिए राजेश जोशी जाने और माने जाते हैं, यहाँ अपनी पूर्णता एवं सौष्ठव के साथ उपस्थित हैं, साथ ही बहुत कुछ ऐसा भी है जो नितान्त अप्रत्याशित पर आह्लादकारी है और वह है जीवन को उसकी जटिलता में जाकर देखने का उपक्रम, सभी तहों-परतों को उलट-पुलट अनुभव के नामिक तक उत्खनन का धैर्य—‘दिखने में जो अक्सर आसान से दिखते हैं एक कवि को करने होते हैं ऐसे कई पेचीदा काम’। और इसके लिए राजेश तदनुरूप भाषा की खोज भी करते हैं, बनी-बनाई भाषिक आदतों को छोड़ते हुए वह अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाते हैं—‘ताप से भरे शब्दों’ को ढूँढ़ते दूर बीहड़ में जाते हैं और ‘आँसुओं के लिए’ भी ढूँढ़ लाते हैं वैसे ही ‘पारदर्शी शब्द’। राजेश की कविता हमारे समय का ऐसा संघनित दस्तावेज़ है कि केवल उसके आधार पर हम समकालीन भारत का एक दृश्य-लेख बना सकते हैं। इतने तात्कालिक ब्योरे हैं यहाँ, इतने प्रसंग, पात्र और राजनीतिक-सामाजिक उद्वेलन। साथ ही उनकी कविता जीवन के उन तन्तुओं की खोज करती है जहाँ उन उद्वेलनों का कम्प सबसे तीव्र है, और उन लोगों का यशोगान करती है जो निरन्तर संघर्ष करते हुए जीवन को बदलने का ताब रखते हैं। उनकी कविता साहस के साथ सत्ता के सभी पायदानों पर वार करती है, एक विराट सत्ता जो अर्थव्यवस्था से लेकर हमारी रसोई तक व्याप्त है। नागार्जुन और धूमिल के बाद सत्ता के तिलिस्म को उघाड़नेवाले सर्वाधिक सशक्त कवि राजेशी जोशी हैं। आख्यान, कथोपकथन, लोक-कथाओं के स्वप्न-वृत्तान्त, जातीय मिथक, अतियथार्थ के खम, सपाटबयानी, शब्दों के खेल और कल्पना-क्रीड़ा, फंतासी सब कुछ मिलकर एक नया रसायन बनाते हैं जो अन्यत्र दुलर्भ है। राजेश की कविता अब भाषा के नए उपकरणों एवं आयुधों का व्यवहार करती है तथा कविता को वहाँ ले जाती है जहाँ भाषा ‘अर्थ से अधिक अभिप्रायों में निवास करती है’। यह ठोस जगत् की, ठोस जीवन की कविता है उर्फ़ चाँद की वर्तनी नीले नभ पर। — अरुण कमल
Dhoop Ka Tukda
- Author Name:
Amrita Preetam +1
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अमृता प्रीतम की कविताओं में रमना, हृदय में कसकती व्यथा का घाव लेकर, प्रेम और सौन्दर्य की धूपछाँह-वीथी में विचरने के समान है, जहाँ वियोग तथा अतृप्ति के तीखे नुकीले काँटे भावना के सुकुमार चरणों को क्षत-विक्षत करते रहते हैं । ऐसी गहरी, दर्द में डूबी, प्राणिक संवेदनाओं के गीत कम ही देखने को मिलते हैं। अमृताजी धरती के जीवन के गीत भी गाती हैं । वह युग-संघर्ष के प्रति प्रबुद्ध होने के कारण प्रगतिशील भावधारा से प्रेरित हैं, किन्तु प्रेम के प्रति एकाग्र समर्पण ही उनकी जीवन-साधना तथा आत्म-विकास का एकान्त पथ है। अमृताजी की कविताओं के अनुवाद से हिन्दी काव्य भाव-धनी, स्वप्न-संस्कृत तथा शिल्प-समृद्ध बनेगा। इन कविताओं से यह सहज ही प्रमाणित हो जाता है कि अमृताजी का स्थान पंजाबी ही नहीं, समस्त भारतीय भाषाओं में भी प्रथम श्रेणी के योग्य है । इस संग्रह से हिन्दी के नये कवियों को विशेष प्रेरणा मिलेगी। जिस गहरी भाव-संवेदना, सामाजिक यथार्थ तथा युग मानव की व्यथा का सच्चा चित्रण अमृताजी ने अपनी नारी-हृदय की जादू-तूली से इन कविताओं में किया है, वह उनकी कृति को एक अत्यन्त उच्च तथा व्यापक स्तर पर उठा देती है। —सुमित्रानन्दन पंत
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