Adhunik Vishwa Sahitya Aur Siddhant
Author:
Namvar SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 399.2
₹
499
Available
आधुनिक आलोचक का समकाल सिर्फ देशी या राष्ट्रीय परिदृश्य से ही परिभाषित नहीं होता। इसमें वैश्विक परिदृश्य भी शामिल होता है। सम्भवतः यही कारण है कि नामवर सिंह लगातार आधुनिक विश्व साहित्य और सिद्धान्तों के सम्पर्क में रहे। उनसे संवाद करते रहे। इस पुस्तक में ऐसे कुछ निबन्ध शामिल हैं, जिनसे इस संवाद की बुनियादी प्रवृत्तियों को समझा जा सकता है।</p>
<p>इनमें सबसे पहले तो यही बात ध्यान खींचती है कि नामवर जी ने ‘आधुनिक विश्व’ का अर्थ ‘यूरोप’ या ‘अमरीका’ तक सीमित नहीं किया है। ‘विश्व’ और ‘विश्व साहित्य’ को परिभाषित करते हुए उन्होंने जगह-जगह यूरोपीय राष्ट्रों की अमानवीय क्रूरताओं को संकेतित करनेवाले उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद जैसे पदों का प्रयोग किया है औरएशियाई, अफ्रीकी और लैटिन अमरीकी साहित्य के ब्योरे दिये हैं। जगह-जगह प्रमुख प्रवृत्तियों, लेखकों और रचनाओं का विशेष इन्दराज है और उन पर आत्मीय आलोचनात्मक टिप्पणियाँ हैं। प्रमुख लेखकों पर टिप्पणियाँ करते समय उन्होंने विश्व में उनकी लोकप्रियता या प्रभाव की तुलना में स्थानीय और राष्ट्रीय समाजों में उनके हस्तक्षेप को ज्यादा महत्त्व दिया गया है।</p>
<p>यह भी दिखाई देता है कि अनेक लोकप्रिय और मान्य लेखकों, आलोचकों और सिद्धान्तकारों की मान्यता और लोकप्रियता से वे अनाक्रान्त रहते हैं। भारतीय परम्परा और आधुनिक भारतीय लेखन की ठोस जमीन पर जमे उनके पाँव उन्हें ‘बाहरी’ को अपनाने और उसका मुग्धताहीन मूल्यांकन करने का विवेक और साहस देते हैं।</p>
<p>ये निबन्ध विश्व साहित्य और सिद्धान्तों से एक भारतीय विचारक-आलोचक का गहरा संवाद है। यह एक ऐसा भारत है जहाँ विश्व एक सच्चे साथी के रूप में मौजूद रहता है। यह भारत उस दुनिया का हिस्सा है, जहाँ कोई भी मुल्क, कोई भी समाज विश्व से अलग हो कर नहीं रह सकता। एक साथी विश्व है तो दूसरी ओर शोषक विश्व। एक ओर अपनेपन से भरा विश्व है तो दूसरी ओर पराया बनाये रखनेवाला विश्व। एक ओर जनवादी विश्व है तो दूसरी ओर जनशत्रु विश्व। हिन्दी में पगा-डूबा एक आलोचक जब ऐसे विश्व में उतरता है तो वह एकतान नहीं हो सकता। उसे प्रतिपल एक जटिल, बहुस्तरीय, बहुआयामी विश्व-यथार्थ से सामना करना पड़ता है। इन निबन्धों में हम ऐसे ही नामवर को देखते हैं।
ISBN: 9788119159147
Pages: 471
Avg Reading Time: 16 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: इस समय भाषा को लेकर बड़ा कोलाहल है। इसकी बड़ी वजह राजनीतिक पहचान की कामना में निहित जटिल संरचना है। जब-जब सत्ता का हिस्सा बंटने-बंटाने की गतिविधियां तेज होती हैं वे सारे तत्त्व खोजकर खड़े किए जाते हैं, जिनसे ‘अपने पक्ष’ का संघर्ष तेज हो सके। जैसे हिंदी को यों तो उर्दू के साथ मौसी की तरह कहते लोकप्रिय मंचों के मुहावरेकार तालियां लूटते हैं, लेकिन राजनीतिक लूट के वक्त यही वर्ग विशेष की पहचान निरूपित होने लगती है। चूंकि भाषा, मातृ भाषा, राष्ट्र भाषा जैसे प्रश्न भारत के संदर्भ में बहुत संवेदनशील रहे हैं, इसलिए हर कोई अपने अपने हिसाब से इन्हें सुलझाने का दावा करता है। क्षेत्रीय अस्मिताएं, स्थानीय राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं, अखिल भारतीय सांस्कृतिक स्वरूप, प्रशासनिक ताना बाना तथा इतिहास की छायाएं, सब मिलकर कभी कभी कारुणिक स्थिति बना देते हैं। ऐसे माहौल में जबकि राजा शिवप्रसाद और भारतेंदु से लेकर गांधी, लोहिया तक वैचारिक रूप से हमारे पास मौजूद हैं, फिलहाल कई तरह के वर्ग भाषा को लेकर सक्रिय हैं। एक वे हैं जो लुप्त होती भाषाओं के साथ उनकी सामाजिकी पर गहन शोध चिंतन कर रहे हैं। कुछ हैं जो ऊंची-ऊंची सभा-गोष्ठियों, मेलों, मंचों से शौर्यपूर्वक अपने पक्ष रेखांकित करते रहते हैं। कुछ वे हैं,जो समय-समय पर उठने वाले प्रश्नों को संबोधित कर उनकी जटिलताओं से आमजन को परिचित कराने की कोशिश करते हैं। उमेश चतुर्वेदी ने यह तीसरा रास्ता उचित ही चुना है। वे समय-समय पर हिंदी से जुड़ी ताजा हलचल का सत्य तलाशने की कोशिश करते हैं। इस तलाश में बड़ी स्थितियों के कारकों का परीक्षण हो जाता है और आम पाठक तक उलझी हुई रस्सी का सिरा भी खुल जाता है। जैसा कि सिद्ध है,आंदोलित कर देने वाली शब्दसेवा, आंदोलनकारी मुद्रा से हमेशा बेहतर होती है। उमेश चतुर्वेदी के हिंदी भाषा संबंधी आलेखों का यह संग्रह न सिर्फ इस उद्देश्य की पूर्ति करेगा, बल्कि उन सबको भी गहरा संतोष देगा जो आंदोलनकारी मुद्रा में नहीं, धरातल की सकर्मक क्रियाओं में आस्था रखते हैं। -यशवंत व्यास
Safdar : Vyaktitva aur krititva- Hard Cover
- Author Name:
Safdar Hashmi
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Description:
‘जन नाट्य मंच’ के संस्थापक सदस्य और सुविख्यात युवा रंगकर्मी सफ़दर हाशमी की स्मृति से जुड़ी यह पुस्तक साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में एक अलग तरह का महत्त्व रखती है। एक ओर जहाँ इसमें सफ़दर के कुछ नुक्कड़ नाटक, नुक्कड़ नाटक सम्बन्धी कुछ आलेख, गीत, कविताएँ तथा उनसे किया गया एक साक्षात्कार शामिल हैं, वहीं दूसरी ओर साहित्य और रंगमंच से जुड़े कई महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की क़लम से उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को विश्लेषित करनेवाले निबन्ध भी हैं।
सफ़दर एक जुझारू संस्कृतिकर्मी थे और इसके लिए उन्होंने नुक्कड़ नाटक को न सिर्फ़ एक विधा के तौर पर अपनाया, बल्कि जनवादी आन्दोलनों के पक्ष में एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया; उस पर सोचा, उसे रचा और फिर लाखों लोगों तक उसे ले गए। इसके माध्यम से उन्होंने वर्तमान दौर के अनेक ज्वलन्त सवालों और समस्याओं से सीधे-सीधे टकराते हुए उनके प्रति लाखों लोगों में एक नई वैचारिक जागरूकता और एक नया नज़रिया पैदा किया।
वे एक ऐसे बुद्धिजीवी थे, जो हर पल कर्म में घटित होते हैं और अपनी गतिशीलता से हर उस ठहराव को तोड़ते हैं जिसके कारण जीवन में कहीं भी सड़ाँध पैदा होती है। वस्तुतः सफ़दर का सम्पूर्ण जीवन, कर्म और कृतित्व वर्तमान जनवादी संघर्षों के सन्दर्भ में अपूर्व प्रेरणाओं से भरा हुआ रहा और यह कृति उनके प्रखर ऊर्जावान व्यक्तित्व तथा असमय समाप्त कर दी गई उनकी अकूत रचनात्मक क्षमता का संक्षिप्त, किन्तु दस्तावेज़ी साक्ष्य प्रस्तुत करती है।
Aalochana Ke Naye Pariprekshya
- Author Name:
Manoj Pandey
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- Description: Awating description for this book
Bharatiy Bhashanchi Anokhi Kahani
- Author Name:
Meghana Bhuskute +1
- Book Type:

- Description: पेगी मोहन वाचकाला भारतीय भाषांच्या दुनियेतल्या विलक्षण सफरीवर घेऊन जातात. भाषाविज्ञान आणि इतिहास या दोहोंची सांगड घालतात आणि गेल्या सहस्रकांमध्ये होत राहिलेल्या स्थलांतरांचा आपल्या बोलण्यावर आणि आपल्या बोलण्याच्या तऱ्हांवर कसकसा परिणाम होत गेला आहे, याचा शोध घेतात. ‘भारतीय भाषांची अनोखी कहाणी` हे पुस्तक समजायला सोपं तर आहेच, पण ते वाचणं आपल्या सगळ्यांसाठी आवश्यकही आहे. - टोनी जोसेफ अत्यंत स्वागतार्ह भर... मानवी समूहांच्या भाषा त्या समूहांइतक्याच गतिशील असतात... पेगी मोहन हा भारतीय उपखंडात झालेल्या प्राचीन स्थलांतरांचा वृत्तान्त भाषांच्या बदलत्या रूपाशी जोडून घेतात. शिवाय त्यांची नेमकी भाषिक निरीक्षणं... त्यातून या पुस्तकाला एखाद्या सुरस गोष्टीचं रूप येतं. तो एक आनंददायी अनुभव ठरतो. - माधव देशपांडे स्थलांतरं, नवीन प्रदेशात केलेल्या वस्त्या, मिश्र विवाह, आणि लोकांच्या सरमिसळीतून झालेला विविध भाषांचा जन्म या सगळ्याभोवती हे अतिशय विलक्षण पुस्तक फिरतं... इंडो-आर्यन लोकांच्या वसाहतींच्या भूलभुलैयामधून हिंडताना पेगी थेट शरलॉक होम्सप्रमाणे सूक्ष्म पुरावे गोळा करत जाते... भाषावैज्ञानिक इतिहासाबद्दलच्या पुस्तकांमधल्या सर्वाधिक वाचनीय पुस्तकांपैकी हे एक आहे. - अन्विता अब्बी Bharatiy Bhashanchi Anokhi Kahani | Peggy Mohan Translated By : Meghana Bhuskute भारतीय भाषांची अनोखी कहाणी : पेगी मोहन अनुवादकाचे नाव : - मेघना भुस्कुटे
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