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Aalochana Aur Vichardhara

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‘आलोचना और विचारधारा’ डॉ. नामवर सिंह के व्याख्यानों का संग्रह है। इन व्याख्यानों के केन्द्र में ‘आलोचना’ है। संकलित 22 व्याख्यान किसी निश्चित परियोजना के तहत नहीं दिए गए हैं। इसीलिए इनमें कोई पूर्व निश्चित सिलसिला नहीं है। इन व्याख्यानों का समय भी दो दशक से अधिक तक फैला हुआ है। बावजूद इसके इनमें एक आन्तरिक एकता और सुसम्बद्धता है। नामवर जी के व्याख्यानों की यह दूसरी पुस्तक है। ये व्याख्यान नामवर जी के उत्तरवर्ती समय की वैचारिकता की स्पष्ट झलक देते हैं। पूर्ववर्ती लेखन में वैचारिक संघर्ष के क्रम में समय-समय पर वे ‘आलोचना’ के बारे में अपनी राय रखते रहे, परन्तु आलोचना में स्वीकृत अवधारणाओं की विस्तृत समीक्षा करने और हिन्दी आलोचना की पूरी परम्परा पर एक साथ विचार करने के अवसर कम ही आए। इन व्याख्यानों में व्यक्त विचार वस्तुतः नामवर जी के सम्पूर्ण रचनात्मक जीवन के सार की तरह देखे जा सकते हैं। यह एक तरह से ‘मधु कोष’ है। पुस्तक चार खंडों में बँटी हुई है। पहले खंड में संकलित दोनों व्याख्यान ‘नामवर के निमित्त’ के कार्यक्रमों में दिए गए थे। इधर के वर्षों में एक आलोचक के रूप में उनकी सभी प्रमुख चिन्ताएँ यहाँ एक साथ मौजूद हैं। दूसरे खंड के व्याख्यान नामवर जी की आलोचना की मूल दृष्टि को स्पष्ट करने में मदद करते हैं। इनका परिप्रेक्ष्य स्पष्टतः वैचारिक और अवधारणात्मक है। तीसरे खंड के व्याख्यानों का सम्बन्ध हिन्दी की आलोचना विशेषतः उसके समकालीन परिदृश्य से है। आलोचना के समक्ष मौजूद संकटों को पहचानने की कोशिश करते ये व्याख्यान ज़रूरी विवादों के परिप्रेक्ष्य में अपना पक्ष मज़बूती से रखते हैं। चौथे खंड में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. रामविलास शर्मा और राहुल सांकृत्यायन पर केन्द्रित व्याख्यान हैं। आचार्य द्विवेदी पर एक शृंखला में दिए गए तीन व्याख्यानों में पहली बार उनकी रचनात्मकता की विशिष्टता का प्रकटन होता है। नामवर जी की परवर्ती आलोचना में राहुल सांकृत्यायन के विचारों की एक अनुगूँज सुनी जा सकती है। डॉ. रामविलास शर्मा से संस्कृति सम्बन्धी विवादों का एक सिरा यहाँ तक भी जाता हुआ, स्पष्टतः देखा जा सकता है।

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About the Book

‘आलोचना और विचारधारा’ डॉ. नामवर सिंह के व्याख्यानों का संग्रह है। इन व्याख्यानों के केन्द्र में ‘आलोचना’ है। संकलित 22 व्याख्यान किसी निश्चित परियोजना के तहत नहीं दिए गए हैं। इसीलिए इनमें कोई पूर्व निश्चित सिलसिला नहीं है। इन व्याख्यानों का समय भी दो दशक से अधिक तक फैला हुआ है। बावजूद इसके इनमें एक आन्तरिक एकता और सुसम्बद्धता है।

नामवर जी के व्याख्यानों की यह दूसरी पुस्तक है। ये व्याख्यान नामवर जी के उत्तरवर्ती समय की वैचारिकता की स्पष्ट झलक देते हैं। पूर्ववर्ती लेखन में वैचारिक संघर्ष के क्रम में समय-समय पर वे ‘आलोचना’ के बारे में अपनी राय रखते रहे, परन्तु आलोचना में स्वीकृत अवधारणाओं की विस्तृत समीक्षा करने और हिन्दी आलोचना की पूरी परम्परा पर एक साथ विचार करने के अवसर कम ही आए। इन व्याख्यानों में व्यक्त विचार वस्तुतः नामवर जी के सम्पूर्ण रचनात्मक जीवन के सार की तरह देखे जा सकते हैं। यह एक तरह से ‘मधु कोष’ है।

पुस्तक चार खंडों में बँटी हुई है। पहले खंड में संकलित दोनों व्याख्यान ‘नामवर के निमित्त’ के कार्यक्रमों में दिए गए थे। इधर के वर्षों में एक आलोचक के रूप में उनकी सभी प्रमुख चिन्ताएँ यहाँ एक साथ मौजूद हैं। दूसरे खंड के व्याख्यान नामवर जी की आलोचना की मूल दृष्टि को स्पष्ट करने में मदद करते हैं। इनका परिप्रेक्ष्य स्पष्टतः वैचारिक और अवधारणात्मक है।

तीसरे खंड के व्याख्यानों का सम्बन्ध हिन्दी की आलोचना विशेषतः उसके समकालीन परिदृश्य से है। आलोचना के समक्ष मौजूद संकटों को पहचानने की कोशिश करते ये व्याख्यान ज़रूरी विवादों के परिप्रेक्ष्य में अपना पक्ष मज़बूती से रखते हैं। चौथे खंड में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. रामविलास शर्मा और राहुल सांकृत्यायन पर केन्द्रित व्याख्यान हैं। आचार्य द्विवेदी पर एक शृंखला में दिए गए तीन व्याख्यानों में पहली बार उनकी रचनात्मकता की विशिष्टता का प्रकटन होता है।

नामवर जी की परवर्ती आलोचना में राहुल सांकृत्यायन के विचारों की एक अनुगूँज सुनी जा सकती है। डॉ. रामविलास शर्मा से संस्कृति सम्बन्धी विवादों का एक सिरा यहाँ तक भी जाता हुआ, स्पष्टतः देखा जा सकता है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
2nd
Publication year
2012
Weight
494 grams
ISBN-13
9788126722532
Pages
284
Reading time
~9 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

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