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Premchand Aur Bhartiya Samaj

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प्रेमचन्द स्वाधीनता-संग्राम में साधारण भारतीय जनता की जीवंतता, प्रतिरोधी शक्ति और आकांक्षाओं-स्वप्नों के अमर गायक। उपन्यास और कहानी जैसी, हिन्द में प्रायः लड़खड़ाकर चलना सीखती, विधाओं को ‘स्वाधीनता’ के इस महास्वप्न से जोड़कर रचनात्मक ऊँचाइयों के चरम पर ले जानेवाले परिकल्पक। रचनाशीलता को जनता के ठोस नित-प्रति भौतिक जीवन और उसके अवचेतन में मौजूद उसकी साधारण और असाधारण इच्छाओं को संयुक्त कर एक पूर्ण जीवन का आख्यान बनानेवाले युगदर्शी कथाकार। ‘यथार्थ’ की ठोस पहचान और ‘यथास्थिति’ के पीछे कार्य कर रही कारक शक्तियों की प्रायः एक वैज्ञानिक की तरह पहचान करनेवाले भविष्यदर्शी विचारक और बुद्धिजीवी। सम्भवतः इन्हीं कारणों से आधुनिक रचनाकारों में इकलौते प्रेमचन्द ही हैं जिनमें हिन्दी के शीर्ष स्थानीय मार्क्सवादी आलोचक प्रो. नामवर सिंह की दिलचस्पी निरन्तर बनी रही। प्रेमचन्द पर विभिन्न अवसरों पर दिए गए व्याख्यान एवं उन पर लिखे गए आलेख इस पुस्तक में एक साथ प्रस्तुत हैं। यहाँ शामिल निबन्धों एवं व्याख्यानों में प्रेमचन्द के सभी पक्षों पर विस्तार से बातचीत की गई है। प्रेमचन्द की वैचारिकता, जीवन-विवेक और उनकी रचनाओं के सम्बन्ध में प्रगतिशील आलोचना का स्पष्ट नज़रिया यहाँ अभिव्यक्त हुआ है। विशिष्ट सामाजिक परिप्रेक्ष्य में प्रेमचन्द की कहानियों और उपन्यासों का विवेचन यहाँ है और भारतीय आख्यान परम्परा के सन्दर्भ में प्रेमचन्द के कथा-शिल्प की विशिष्टता और उसकी भारतीयता पर गम्भीर विचार भी। साम्प्रदायिकता, दलित प्रश्न जैसे विशिष्ट प्रसंगों के परिप्रेक्ष्य में प्रेमचन्द की रचनात्मकता और उनके विचारों का मूल्यांकन हो या स्वाधीनता-संग्राम के सन्दर्भ में उनकी ‘पोजीशन’ का विवेचन—इन निबन्धों में नामवर जी अपनी निर्भ्रान्त वैचारिकता, आलोचकीय प्रतिभा और लोक-संवेदी तर्क-प्रवणता और स्पष्ट जनपक्षधरता से प्रेमचन्द को उनकी सम्पूर्णता में उपस्थित करते हैं।

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प्रेमचन्द स्वाधीनता-संग्राम में साधारण भारतीय जनता की जीवंतता, प्रतिरोधी शक्ति और आकांक्षाओं-स्वप्नों के अमर गायक। उपन्यास और कहानी जैसी, हिन्द में प्रायः लड़खड़ाकर चलना सीखती, विधाओं को ‘स्वाधीनता’ के इस महास्वप्न से जोड़कर रचनात्मक ऊँचाइयों के चरम पर ले जानेवाले परिकल्पक। रचनाशीलता को जनता के ठोस नित-प्रति भौतिक जीवन और उसके अवचेतन में मौजूद उसकी साधारण और असाधारण इच्छाओं को संयुक्त कर एक पूर्ण जीवन का आख्यान बनानेवाले युगदर्शी कथाकार। ‘यथार्थ’ की ठोस पहचान और ‘यथास्थिति’ के पीछे कार्य कर रही कारक शक्तियों की प्रायः एक वैज्ञानिक की तरह पहचान करनेवाले भविष्यदर्शी विचारक और बुद्धिजीवी।

सम्भवतः इन्हीं कारणों से आधुनिक रचनाकारों में इकलौते प्रेमचन्द ही हैं जिनमें हिन्दी के शीर्ष स्थानीय मार्क्सवादी आलोचक प्रो. नामवर सिंह की दिलचस्पी निरन्तर बनी रही। प्रेमचन्द पर विभिन्न अवसरों पर दिए गए व्याख्यान एवं उन पर लिखे गए आलेख इस पुस्तक में एक साथ प्रस्तुत हैं।

यहाँ शामिल निबन्धों एवं व्याख्यानों में प्रेमचन्द के सभी पक्षों पर विस्तार से बातचीत की गई है। प्रेमचन्द की वैचारिकता, जीवन-विवेक और उनकी रचनाओं के सम्बन्ध में प्रगतिशील आलोचना का स्पष्ट नज़रिया यहाँ अभिव्यक्त हुआ है। विशिष्ट सामाजिक परिप्रेक्ष्य में प्रेमचन्द की कहानियों और उपन्यासों का विवेचन यहाँ है और भारतीय आख्यान परम्परा के सन्दर्भ में प्रेमचन्द के कथा-शिल्प की विशिष्टता और उसकी भारतीयता पर गम्भीर विचार भी। साम्प्रदायिकता, दलित प्रश्न जैसे विशिष्ट प्रसंगों के परिप्रेक्ष्य में प्रेमचन्द की रचनात्मकता और उनके विचारों का मूल्यांकन हो या स्वाधीनता-संग्राम के सन्दर्भ में उनकी ‘पोजीशन’ का विवेचन—इन निबन्धों में नामवर जी अपनी निर्भ्रान्त वैचारिकता, आलोचकीय प्रतिभा और लोक-संवेदी तर्क-प्रवणता और स्पष्ट जनपक्षधरता से प्रेमचन्द को उनकी सम्पूर्णता में उपस्थित करते हैं।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2023
Weight
376 grams
ISBN-13
9788126730551
Pages
196
Reading time
~7 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14.5 × 22.5 cm
Language
Hindi

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