Bharatiya Arthvyavastha
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‘भारत का लोक इतिहास’ शृंखला की इस पुस्तक ‘भारतीय अर्थव्यवस्था’ में 1857 के विद्रोह से लेकर पहले विश्व युद्ध तक की अवधि के दौरान भारत की अर्थव्यवस्था का जायज़ा लिया गया है। यह वह दौर था जब औपनिवेशिक शासन भी अपने उरूज पर था और भारतीय जन-गण भी अपनी सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक स्वाधीनता को लेकर तेज़ी से सचेत हो रहा था। जिन विषयों को इस पुस्तक में ख़ासतौर पर रेखांकित किया गया है उनमें जनसंख्या, सकल उत्पाद, कीमतें, साम्राज्यवादी मुक्त व्यापार, रेलवे का निर्माण, कृषि की स्थिति, किसानों की आय, खेती का व्यवसायीकरण, बैंकिंग एवं वित्त, राजकोषीय प्रणाली और टैक्स आदि प्रमुख हैं। संकलित सामग्री और सूचनाओं के लिए तत्कालीन रिपोर्टों, टिप्पणियों और अन्य स्रोतों के अंश भी पुस्तक में शामिल किए गए हैं ताकि सभी प्रासंगिक तथ्य प्रामाणिक रूप में सामने आ सकें। सभी अध्ययनों के साथ प्रासंगिक ग्रन्थ सूची भी संलग्न की गई है ताकि इच्छुक पाठक छात्र एवं अध्येतागण सम्बन्धित विषय पर अपने अध्ययन को विस्तार दे सकें। औपनिवेशिक दौर में भारत की अर्थव्यवस्था का यह विश्लेषण पठनीय तो है ही संग्रहणीय भी है।
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‘भारत का लोक इतिहास’ शृंखला की इस पुस्तक ‘भारतीय अर्थव्यवस्था’ में 1857 के विद्रोह से लेकर पहले विश्व युद्ध तक की अवधि के दौरान भारत की अर्थव्यवस्था का जायज़ा लिया गया है। यह वह दौर था जब औपनिवेशिक शासन भी अपने उरूज पर था और भारतीय जन-गण भी अपनी सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक स्वाधीनता को लेकर तेज़ी से सचेत हो रहा था।
जिन विषयों को इस पुस्तक में ख़ासतौर पर रेखांकित किया गया है उनमें जनसंख्या, सकल उत्पाद, कीमतें, साम्राज्यवादी मुक्त व्यापार, रेलवे का निर्माण, कृषि की स्थिति, किसानों की आय, खेती का व्यवसायीकरण, बैंकिंग एवं वित्त, राजकोषीय प्रणाली और टैक्स आदि प्रमुख हैं। संकलित सामग्री और सूचनाओं के लिए तत्कालीन रिपोर्टों, टिप्पणियों और अन्य स्रोतों के अंश भी पुस्तक में शामिल किए गए हैं ताकि सभी प्रासंगिक तथ्य प्रामाणिक रूप में सामने आ सकें।
सभी अध्ययनों के साथ प्रासंगिक ग्रन्थ सूची भी संलग्न की गई है ताकि इच्छुक पाठक छात्र एवं अध्येतागण सम्बन्धित विषय पर अपने अध्ययन को विस्तार दे सकें। औपनिवेशिक दौर में भारत की अर्थव्यवस्था का यह विश्लेषण पठनीय तो है ही संग्रहणीय भी है।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2025
- Weight
- 240 grams
- ISBN-13
- 9789360862589
- Pages
- 208
- Reading time
- ~7 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 21.5 cm
- Language
- Hindi
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चाणक्य कूटनीतिज्ञ होने के साथ-साथ एक अर्थशास्त्री भी थे। उनके ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ में एक राज्य के आदर्श अर्थतंत्र का विशद विवरण है और उसी में राजशाही के संविधान की रूपरेखा भी है। शायद विश्व में चाणक्य का ‘अर्थशास्त्र’ विधि-विधानपूर्वक लिखा गया राज्य का पहला संविधान है। चाणक्य ने राजनीति को अर्थ दिया, कूटनीति का समावेश किया, दाँव-पेंच के गुर सिखाए, समाज को एक दिशा दिखाई तथा नागरिकों को आचार-संहिता दी। टुकड़ों में बँटे देश को एक विशाल साम्राज्य बनाया तथा सिकंदर के विश्व-विजय के सपने को भारत में ही दफना दिया और एक साधारण व्यक्ति को राह से उठाकर मगध का सम्राट् बनाकर देश की समृद्धि में श्रीवृद्धि की। चाणक्य विश्व के प्रथम मैनेजमेंट गुरु थे। उन्होंने जीवन के हर क्षेत्र में कुशल प्रबंधन का रास्ता दिखाया। उनके बताए सूत्रों और जीवन-मंत्रों के आधार पर आज भी कैसे अपने जीवन का सही प्रबंधन करके हम सफल हो सकते हैं, इसी बात को इस पुस्तक के जरिए बताने का प्रयास किया गया है। शासन, राज्य, परिवार, समाज, वित्त, सुरक्षा—सभी विषयों पर प्रस्तुत हैं महान् आचार्य चाणक्य के मैनेजमेंट सूत्र, जो आपकोे जीवन के संघर्षों से जूझने की शक्ति प्रदान करेंगे।
Bharat Mein Garibi
- Author Name:
Santosh Mehrotra
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भारत में आजादी के बाद सामान्य जीवन स्तर में जहां काफी सुधार दिखता है, और मध्यवर्ग का विस्तार भी उल्लेखनीय स्तर पर हुआ है, वहीं यह भी एक हकीकत है कि न तो हमारी गिनती अमीर और विकसित देशों में की जा सकती है, और न ही वास्तविक धरातल पर वह सुख-समृद्धि कहीं दिखाई देती है, जो किसी भी विकसित देश में होनी चाहिए। इसके अनेक कारण रहे हैं, सिर्फ जनसंख्या इसकी वजह नहीं है जैसा कि अक्सर कह दिया जाता है। यह किताब उन्हीं वास्तविक कारणों पर उंगली रखती है जिनके चलते हम विकासशील की श्रेणी से चाहकर भी नहीं निकल पा रहे हैं। विकास की प्रभावशीलता को कमजोर करने वाले एक घटक के रूप में लेखक यहां अर्थव्यवस्था में असंगठित क्षेत्र की बहुतायत और श्रम-बल में सामाजिक सुरक्षा का अभाव को रेखांकित करते हैं। वे कहते हैं कि गरीबी में कमी, मानव क्षमताओं में वृद्धि और निरन्तर आर्थिक विकास के बीच पारस्परिक रूप से एक मजबूत सम्बन्ध है। लेखक के अनुसार किसी भी विकासशील देश में गरीबों के बहुत कम शिक्षित, या पूर्णतः निरक्षर होने की सम्भावना होती है। इस प्रकार, हम भारत के सामने मौजूद शैक्षिक संकट की गहराई को समझे बिना भारत में गरीबी को नहीं समझ सकते। भारत में बच्चों और वयस्कों में कुपोषण का स्तर दुनिया में सबसे ऊँचे स्तरों पर है, फिर भी ऐतिहासिक रूप से इस पर उस तरह का नीतिगत ध्यान नहीं दिया गया, जैसा दिया जाना चाहिए। ऐसे तमाम कारणों पर विस्तार से बात करते हुए इस पुस्तक में इनके निवारण पर भी गहराई से विचार किया गया है।
Kautilya Arthshastra
- Author Name:
Anil Kumar Mishra
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‘अर्थशास्त्र’ कौटिल्य यानी चाणक्य द्वारा रचित संस्कृत वाड्.मय का एक अद्भुत ग्रंथ है। इसका पूरा नाम ‘कौटिलीय अर्थशास्त्र’ है। चाणक्य सम्राट् चंद्रगुप्त मौर्य के महामंत्री थे। उन्होंने चंद्रगुप्त के प्रशासकीय उपयोग के लिए इस ग्रंथ की रचना की थी। यह मुख्यतः सूत्र-शैली में लिखा हुआ है। यह शास्त्र अनावश्यक विस्तार से रहित, समझने और ग्रहण करने योग्य सरल शब्दों में रचा गया है। ‘अर्थशास्त्र’ में समसामयिक राजनीति, अर्थनीति, विधि, समाजनीति तथा धर्मादि पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। अभी तक इस विषय के जितने भी ग्रंथ उपलब्ध हैं, वास्तविक जीवन का चित्रण करने के कारण उनमें यह सबसे अधिक मूल्यवान् है। इस शास्त्र के प्रकाश में न केवल धर्म, अर्थ और काम का प्रणयन तथा पालन होता है अपितु अधर्म, अनर्थ तथा अवांछनीय का शमन भी होता है। राजनीतिक, आर्थिक, विधि आदि सिद्धांतों को जानने-समझने और व्यवहार में लाने के लिए एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कृति।
Bharat Main Laghu Udyog : Vikas Evam Sambhavnayen
- Author Name:
Arun Prakash
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Awating description for this book
Ulti Ginti
- Author Name:
Anshuman Tiwari +1
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कोविड महामारी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को ऐसे समय तहस-नहस कर दिया जब यह पहले से ही गहरे ढाँचागत मन्दी से जूझ रही थी। करोड़ों लोगों के रोजगार गँवा देने और उनके सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने गाँव लौटने के बीच शेयर बाजार न केवल तेजी से पटरी पर लौटा बल्कि जल्दी ही ऊँचाइयों पर पहुँच गया। 2020 के भारत में चरम आर्थिक असमानता जिस तरह प्रमुखता से दिखाई दे रही है, वैसी पहले कभी नहीं देखी गई। बेहद सख्त लॉकडाउन थोपे जाने का सिलसिला शुरू होने के एक साल बाद, ‘उलटी गिनती’ इस आपदा के आर्थिक परिणामों/प्रभावों की समझ बनाने की कोशिश करती है और इसकी पड़ताल करती है कि क्या भारत सुधार-प्रक्रिया की कुछेक अहम उपलब्धियों यानी प्रतियोगिता और गरीबी में तेज गिरावट को, उलटने के करीब है। भारत के लिए समय तेजी से निकलता जा रहा है। यहाँ तक कि बढ़त के सर्वोत्तम सालों के दौरान, भारत पर्याप्त रोजगार पैदा करने या मानव विकास की दिशा में ठोस प्रगति करने में विफल रहा। अब जनसांख्यिकी लाभांश के दौर के अन्तिम दशक में, भारत की अर्थव्यवस्था को दोबारा गति देने के लिए एक साहसिक नजरिए की जरूरत है। ‘उलटी गिनती’ सतत सुधार के लिए एक खाका पेश करती है जो भारत को तेज बढ़त की पटरी पर वापस ला सकता है और न्यूनतम सम्भव समय में उसकी युवा आबादी के लिए करोड़ों रोजगार पैदा कर सकता है।
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