Madhyakaleen Bharat Ka Aarthik Ithihas : Ek Servekshan
(0)
Author:
S. Irfan HabibPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
299
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इस पुस्तिका में सम्मिलित आलेख बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को दिए गए शारदा स्मृति व्याख्यान का परिवर्द्धित रूप हैं।</p> <p>पहले आलेख में देहली सल्तनत के आर्थिक महत्त्व सम्बन्धी सिद्धान्तों, नगरों, दस्तकारियों और वाणिज्य के विकास की प्रक्रिया, खेतिहर परिवर्तनों और भारत की मध्यकालीन अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषताओं पर प्रकाश डाला गया है।</p> <p>दूसरा अध्याय विजयनगर साम्राज्य की अर्थव्यवस्था पर एक सारगर्भित टिप्पणी के रूप में है।</p> <p>तीसरे अध्याय में मुग़ल भारत की अर्थव्यवस्था पर ‘कृषि और कृषि-क्षेत्र’; ‘राज्य और व्यवस्था’; ‘नगर और दस्तकारियाँ’; ‘आन्तरिक और विदेश व्यापार’ आदि शीर्षकों के तहत प्रकाश डाला गया है।
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इस पुस्तिका में सम्मिलित आलेख बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को दिए गए शारदा स्मृति व्याख्यान का परिवर्द्धित रूप हैं।</p>
<p>पहले आलेख में देहली सल्तनत के आर्थिक महत्त्व सम्बन्धी सिद्धान्तों, नगरों, दस्तकारियों और वाणिज्य के विकास की प्रक्रिया, खेतिहर परिवर्तनों और भारत की मध्यकालीन अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषताओं पर प्रकाश डाला गया है।</p>
<p>दूसरा अध्याय विजयनगर साम्राज्य की अर्थव्यवस्था पर एक सारगर्भित टिप्पणी के रूप में है।</p>
<p>तीसरे अध्याय में मुग़ल भारत की अर्थव्यवस्था पर ‘कृषि और कृषि-क्षेत्र’; ‘राज्य और व्यवस्था’; ‘नगर और दस्तकारियाँ’; ‘आन्तरिक और विदेश व्यापार’ आदि शीर्षकों के तहत प्रकाश डाला गया है।
Book Details
-
ISBN9788126701759
-
Pages67
-
Avg Reading Time2 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘माई’, ‘हमारा शहर उस बरस’, ‘तिरोहित’, ‘वैराग्य’ एवं ‘ख़ाली जगह’ जैसी विविध व सशक्त कृतियों की मार्फ़त पिछले पन्द्रह सालों में एक विशिष्ट पहचान बनी है गीतांजलि श्री की हिन्दी कथा-जगत में। ‘अनुगूँज’ में संकलित इन दस कहानियों से ही शुरू हुआ था इस पहचान का सिलसिला। एक नई संवेदना जो विद्रोह और प्रतिरोध को उजागर करते वक़्त भी उनको कमज़ोर बनाती हताशा को अनदेखा नहीं करती, इशारों और बिम्बों के सहारे चित्रण करनेवाला शिल्प, और शिक्षित वर्ग की आधुनिक मानसिकता को दिखाती उनकी बोलचाल की भाषा, ऐसे तत्त्वों से बनती है गीतांजलि श्री की लेखकीय पहचान।
यूँ तो इन कहानियों का केन्द्र लगभग हर बार—एक ‘दरार’ को छोड़कर—बनता है शिक्षित मध्यवर्गीय नारियों से, पर इनमें वर्णित होते हैं हमारे आधुनिक नागरिक जीवन के विभिन्न पक्ष। जैसे वैवाहिक तथा विवाहेतर स्त्री-पुरुष सम्बन्ध, पारिवारिक परिस्थितियाँ, सामाजिक रूढ़ियाँ, हिन्दू-मुस्लिम समस्या, स्त्रियों की पारस्परिक मैत्री इत्यादि। यहाँ सीधा, सपाट कुछ भी नहीं है। हर स्थिति, हर सम्बन्ध, हर संघर्ष में व्याप्त रहते हैं परस्पर विरोधी स्वर। यही विरोधी स्वर रचते हैं हरेक कहानी का एक अलग राग।
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