Mauryakaleen Bharat
(0)
Author:
Vivekanand Jha, Vipin Shukla, S. Irfan Habib, Irfan HabibPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
250
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Available
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इतिहास-पुस्तकों की चर्चित शृंखला ‘भारत का लोक-इतिहास’ की यह कड़ी ईसा पू. 350 से लेकर ईसा पू. तक के कालखंड पर केन्द्रित है। भारतीय और यूनानी स्रोतों से प्राप्त जानकारी और अद्यतन विश्लेषणों को आधार बनाकर लिखी गई पुस्तक ‘मौर्यकालीन भारत’ में सिकंदर के भारत पर आक्रमण और मौर्य साम्राज्य के इतिहास को समेटा गया है। सन्दर्भ सामग्री के रूप में अशोक के शिलालेखों के विश्लेषण के साथ उनकी अहमियत को भी रेखांकित किया गया है, साथ ही तत्कालीन अर्थव्यवस्था, समाज और संस्कृति का विस्तृत विवरण भी उपलब्ध कराया गया है ताकि पाठक को हाल की खोजों से अवगत कराया जा सके। मौर्यशासन के कालक्रम, अर्थशास्त्र, अभिलेख विज्ञान और अशोककालीन प्राकृत की बोलियों पर विशेष टिप्पणियाँ भी इस अध्ययन का हिस्सा है, अशोक के दस पूर्ण शिलालेखों और भारत तथा यूनान के कुछ महत्त्वपूर्ण स्रोतों के अंश भी इसमें शामिल हैं। सामान्य पाठकों और छात्रों के पाठ्यक्रम को ध्यान में रखकर तैयार की गई यह पुस्तक मौर्य साम्राज्य विषयक अध्ययन के लिए विशेष महत्त्व रखती है।
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इतिहास-पुस्तकों की चर्चित शृंखला ‘भारत का लोक-इतिहास’ की यह कड़ी ईसा पू. 350 से लेकर ईसा पू. तक के कालखंड पर केन्द्रित है। भारतीय और यूनानी स्रोतों से प्राप्त जानकारी और अद्यतन विश्लेषणों को आधार बनाकर लिखी गई पुस्तक ‘मौर्यकालीन भारत’ में सिकंदर के भारत पर आक्रमण और मौर्य साम्राज्य के इतिहास को समेटा गया है।
सन्दर्भ सामग्री के रूप में अशोक के शिलालेखों के विश्लेषण के साथ उनकी अहमियत को भी रेखांकित किया गया है, साथ ही तत्कालीन अर्थव्यवस्था, समाज और संस्कृति का विस्तृत विवरण भी उपलब्ध कराया गया है ताकि पाठक को हाल की खोजों से अवगत कराया जा सके।
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सामान्य पाठकों और छात्रों के पाठ्यक्रम को ध्यान में रखकर तैयार की गई यह पुस्तक मौर्य साम्राज्य विषयक अध्ययन के लिए विशेष महत्त्व रखती है।
Book Details
-
ISBN9789360868864
-
Pages208
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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लोकतंत्र कैसे ख़त्म होता है? अपने लोकतंत्र को बचाने के लिए हम क्या कर सकते हैं? इतिहास हमें क्या सिखाता है? इक्कीसवीं सदी में लोकतंत्र जितना ख़तरे में है, पहले कभी नहीं रहा। समूचे इतिहास से सबक लेते हुए—चिली में पिनोशे की ख़ूनी सत्ता से लेकर चुपचाप ढहते तुर्की में एर्दुआं की सरकार तक—हार्वर्ड के प्रोफ़ेसर स्टीवेन लेवित्सकी और डेनियल ज़िब्लाट यह समझाते हैं कि लोकतंत्र क्यों नाकाम हो जाते हैं, ट्रम्प जैसे नेता कैसे उसे नष्ट करते हैं और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए हम में से हर एक व्यक्ति क्या कर सकता है। विशेषज्ञों की राय जो भी लोकतंत्र के भविष्य को लेकर चिन्तित है उसे यह सहज, सरल किताब पढ़नी चाहिए। जो चिन्तित नहीं हैं, उन्हें तो ज़रूर पढ़नी चाहिए। दारोन एसेमोगलू ‘व्हाई नेशंस फ़ेल’ के लेखक और 2024 के नोबेल पुरस्कार विजेता लेवित्सकी और ज़िब्लाट ने कितनी कुशलता से यह दलील रखी है कि हम सबको इस देश के रुझानों पर चिन्तित होना चाहिए, अमेरिकी संविधान का ज़बर्दस्त प्रशंसक होने के नाते मेरे लिए यह पढ़ना हताशाजनक था। ‘यह यहाँ नहीं हो सकता’ वाली धारणा लेवित्सकी और ज़िब्लाट के विश्लेषण में नहीं टिकती...क्या शानदार लिखा है। डेनियल डब्ल्यू. ड्रेज़नर ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ उत्कृष्ट, विद्वत्तापूर्ण, पठनीय, चिन्ताजनक और सन्तुलित निक कोहेन ‘ऑब्ज़र्वर’
RSS : Kaya Aur Maya
- Author Name:
Devanura Mahadeva +1
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अब सौ साल का हुआ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दरअसल है क्या? इसकी काया के पीछे छुपी माया क्या है? अब जबकि संघ से जुड़ी एक पार्टी सत्ता पर मज़बूती से क़ाबिज़ है, यह भारत को किस दिशा में ले जा रहा है? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके ग़ौरतलब जवाब देवनूर महादेव ने आर.एस.एस. : काया और माया में दिए हैं। मिथकों को आधुनिकता के और लोकवार्ताओं को गहरी राजनीतिक अन्तर्दृष्टि के बरअक्स रखकर देखने-परखने से हासिल इन जवाबों को पेश करते हुए, अपने ख़ास अन्दाज़ में वे पाठकों से आग्रह करते हैं : जब आर.एस.एस. का मायावी दानव भेष बदलकर हमारे दरवाज़े पर आता है, तब हमें उसकी बातों में नहीं आना चाहिए। ‘आज नक़द कल उधार’ की तर्ज़ पर हमें भी ग्रामवासियों की तरह अपने दरवाज़ों पर ‘नाले बा’ (कल आना) लिख देना चाहिए! कन्नड़ सहित अनेक भाषाओं में बिक्री के कीर्तिमान बना चुकी यह असाधारण किताब सांस्कृतिक आलोचना और ऐतिहासिक व्याख्या के साथ-साथ राजनीतिक कार्रवाई का आह्वान भी है।
Sadak Se Sansad Tak
- Author Name:
Shivanand Tiwari +1
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लोहिया, जेपी, किशन पटनायक, रामानन्द तिवारी, कर्पूरी ठाकुर वाली परम्परा के ही नेता हैं शिवानंद तिवारी। जितना लम्बा उनका राजनीतिक जीवन है आज की राजनीति में कम लोगों का है। वे गैर-कांग्रेसी, गैर-भाजपाई राजनीति करते रहे हैं और सन् पैंसठ के पहले से सक्रिय हैं। बाबा के नाम से विख्यात शिवानन्द जी के पास अनुभव, किस्सों और प्रत्यक्ष देखी घटनाओं का सम्भवत: सबसे बड़ा खजाना है। वे साठ के दशक के आखिर में शुरू हुए अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन वाले दौर से सक्रिय रहे हैं और चौहत्तर के जेपी आन्दोलन के अगुआ लोगों में हैं। उन्होंने किशन पटनायक के साथ लोहिया विचार मंच और समता संगठन की राजनीति की और उनसे अलग होकर भी उनकी वैचारिक और व्यावहारिक राजनीति के पाठ से अलग नहीं हुए। इन भाषणों और टिप्पणियों से उनके चिन्तन का दायरा और दिशा झलकती है। साफ लगता है कि भूमंडलीकरण और साम्प्रदायिक राजनीति उनकी चिन्ता के केन्द्र में है। शिवानंद जी के इन भाषणों में किसानों की आत्महत्या, बुनकरों की भुखमरी और आत्महत्या, पेटेंट रीजीम से होने वाली मुश्किलों और उसकी कानूनी लड़ाई, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की स्थिति, अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश द्वारा गरीबों का भोजन बढ़ाने से महँगाई आने के कुतर्क की आलोचना, किसानों के खेती छोड़ने पर टिप्पणी है। और इसमें से काफी चीजों के लिए नई आर्थिक नीतियों को दोषी बताया गया है। यह आलोचना सही थी और यह किताब का महत्त्व है क्योंकि भूमंडलीकरण के पूरे दौर में कहीं से संसद के अन्दर इन नीतियों की आलोचना नहीं हुई।
Prarthna-Pravachan : Vols. 1-2
- Author Name:
Mohandas Karamchand Gandhi
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त्मा गांधी की हत्या दिल्ली में उनके प्रार्थना-सभा में जाते हुए हुई थी। लेकिन इस पर कम ध्यान दिया गया है कि गांधी जी ने प्रार्थना-सभा के रूप में अपने समय और स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान एक अनोखी नैतिक-आध्यात्मिक और राजनैतिक संस्था का आविष्कार किया था। थोड़े आश्चर्य की बात यह है कि आज भी यानी गांधी जी के सेवाग्राम छोड़े 70 से अधिक बरसों बाद भी वहाँ हर दिन सुबह-शाम प्रार्थना-सभा होती है : उसमें सभी धर्मों से पाठ होता है जिनमें हिन्दू, इस्लाम, ईसाइयत, बौद्ध, जैन, यहूदी, पारसी आदि शामिल हैं। दुनिया में, जहाँ धर्मों को लेकर इतनी हिंसा-दुराव-आतंक का माहौल है वहाँ कहीं और ऐसा धर्म-समभाव हर दिन नियमित रूप से होता हो, लगता या पता नहीं है। प्रार्थना-सभा में अन्त में गांधी जी बोलते थे। उनके अधिकांश विचार इसी अनौपचारिक रूप में व्यक्त होते थे। उनका वितान बहुत विस्तृत था। उन्हें दो खण्डों में प्रकाशित करना हमारे लिए गौरव की बात है। इसलिए भी रज़ा गांधी को भारत का बुद्ध के बाद दूसरा महामानव मानते थे। —अशोक वाजपे
Bharat Ka Samvidhan : Sankshipt Parichay
- Author Name:
Subhash Kashyap
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लोकतंत्र में हर नागरिक को अपने देश के संविधान को जानना चाहिए और समझना चाहिए कि हम किस प्रकार शासित हो रहे हैं। भारत के संविधान के मूल कर्तव्य सम्बन्धी भाग के अनुसार देश के हर नागरिक का सबसे पहला कर्तव्य है संविधान का पालन करना। परन्तु उसका पालन करने के लिए संविधान को जानना ज़रूरी है। दुर्भाग्यवश भारत में आज भी भयंकर संवैधानिक निरक्षरता है। ऐसी स्थिति में संविधान के बारे में बुनियादी जानकारी प्राप्त करने के लिए यह किताब अत्यन्त उपयोगी है। भारतीय संविधान के विश्वविख्यात विशेषज्ञ डॉ. सुभाष काश्यप ने सरल और सुगम शब्दों में पुस्तक तैयार की है इसका विशेष उद्देश्य यह है कि पाठक को भारतीय संविधान का संक्षिप्त परिचय मिले तथा वह इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, संविधान निर्माण की प्रक्रिया, तथा वह इसकी संविधान की आत्मा का समुचित ज्ञान प्राप्त सकते हैं।
वस्तुत: यह किताब आधुनिक भारत के इतिहास; एक लोकतंत्र के रूप में भारत के निर्माण और विकास तथा भारत के संविधान में दिलचस्पी रखने वाले हरेक छात्र और सामान्य पाठक के लिए समान रूप से उपयोगी है।
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