Mauryakaleen Bharat
(0)
Author:
S. Irfan HabibPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
795
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Available
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इतिहास-पुस्तकों की चर्चित शृंखला ‘भारत का लोक-इतिहास’ की यह कड़ी ईसा पू. 350 से लेकर ईसा पू. तक के कालखंड पर केन्द्रित है। भारतीय और यूनानी स्रोतों से प्राप्त जानकारी और अद्यतन विश्लेषणों को आधार बनाकर लिखी गई पुस्तक ‘मौर्यकालीन भारत’ में सिकंदर के भारत पर आक्रमण और मौर्य साम्राज्य के इतिहास को समेटा गया है। सन्दर्भ सामग्री के रूप में अशोक के शिलालेखों के विश्लेषण के साथ उनकी अहमियत को भी रेखांकित किया गया है, साथ ही तत्कालीन अर्थव्यवस्था, समाज और संस्कृति का विस्तृत विवरण भी उपलब्ध कराया गया है ताकि पाठक को हाल की खोजों से अवगत कराया जा सके। मौर्यशासन के कालक्रम, अर्थशास्त्र, अभिलेख विज्ञान और अशोककालीन प्राकृत की बोलियों पर विशेष टिप्पणियाँ भी इस अध्ययन का हिस्सा है, अशोक के दस पूर्ण शिलालेखों और भारत तथा यूनान के कुछ महत्त्वपूर्ण स्रोतों के अंश भी इसमें शामिल हैं। सामान्य पाठकों और छात्रों के पाठ्यक्रम को ध्यान में रखकर तैयार की गई यह पुस्तक मौर्य साम्राज्य विषयक अध्ययन के लिए विशेष महत्त्व रखती है।
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इतिहास-पुस्तकों की चर्चित शृंखला ‘भारत का लोक-इतिहास’ की यह कड़ी ईसा पू. 350 से लेकर ईसा पू. तक के कालखंड पर केन्द्रित है। भारतीय और यूनानी स्रोतों से प्राप्त जानकारी और अद्यतन विश्लेषणों को आधार बनाकर लिखी गई पुस्तक ‘मौर्यकालीन भारत’ में सिकंदर के भारत पर आक्रमण और मौर्य साम्राज्य के इतिहास को समेटा गया है।
सन्दर्भ सामग्री के रूप में अशोक के शिलालेखों के विश्लेषण के साथ उनकी अहमियत को भी रेखांकित किया गया है, साथ ही तत्कालीन अर्थव्यवस्था, समाज और संस्कृति का विस्तृत विवरण भी उपलब्ध कराया गया है ताकि पाठक को हाल की खोजों से अवगत कराया जा सके।
मौर्यशासन के कालक्रम, अर्थशास्त्र, अभिलेख विज्ञान और अशोककालीन प्राकृत की बोलियों पर विशेष टिप्पणियाँ भी इस अध्ययन का हिस्सा है, अशोक के दस पूर्ण शिलालेखों और भारत तथा यूनान के कुछ महत्त्वपूर्ण स्रोतों के अंश भी इसमें शामिल हैं।
सामान्य पाठकों और छात्रों के पाठ्यक्रम को ध्यान में रखकर तैयार की गई यह पुस्तक मौर्य साम्राज्य विषयक अध्ययन के लिए विशेष महत्त्व रखती है।
Book Details
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ISBN9789360869953
-
Pages208
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Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: गुजराती अस्मिता और गौरव को मैं हिन्दू गुजराती मानस से जोड़ रहा हूँ। यह उस तरह की क्षेत्रीय चेतना या राष्ट्रवाद नहीं है जिससे हम देश के विभिन्न हिस्सों में परिचित हैं। यह विशुद्ध हिन्दू चेतना है। गुजराती हिन्दू चेतना। इसमें गुजरात के मुसलमान या ईसाई गुजराती होकर भी अपने नहीं हैं, पराए हैं। इसी गुजरात में रचना जैसे भी लोग हैं। रचना माने सरूप ध्रुव। प्रख्यात कवि, रंगकर्मी, एक्टिविस्ट। हिन्दू, गुजराती औरत और इनसान! सभी रूपों में गुजरात 2002 से आहत। कुछ वैसी ही मन:स्थिति में, जिसमें बँटवारे से पहले ही फूट पड़ी साम्प्रदायिक हिंसा से बौराए गांधी ने क्षुब्ध होकर कहा था—“बिहार में हमने औरतों के साथ क्या नहीं किया। हिन्दुओं ने किया यानी मैंने किया। यह शर्मिन्दा होने की बात है।” लगभग 40-45 गाँवों–क़स्बों और शहरों में जाकर सरूप बहन ने विभिन्न वर्गों के पीड़ित मुसलमानों से उनकी आपबीती सुनी। वह राहत शिविरों में गईं, नई बसाहटों में गईं और उन इलाक़ों में भी गईं जहाँ मुसलमान अपने पुराने घरों में या वहीं आस-पास बना दिए गए घरों में लौट आए हैं। हर उम्र के आदमियों और औरतों से मिलने के साथ-साथ वह बच्चों से भी मिलीं। ऐसे हिन्दू और सवर्ण हिन्दू आदमी-औरतों से भी उन्होंने बातें कीं, जिन्होंने जोखिम उठाकर मुसलमानों को पनाह दी और उन्हें सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने की भरसक कोशिश की। आँख-कान कितने ही सतर्क हों, बग़ैर खुले दिमाग़ के ऐसी जटिल स्थिति समझना क़तई मुमकिन नहीं। एक एक्टिविस्ट के रूप में सरूप ध्रुव के जो भी सैद्धान्तिक आग्रह हों, उम्मीद की इन कहानियों में उन्होंने असामान्य वैचारिक-भावनात्मक खुलापन दिखाया है। —सुधीर चन्द्र
Gram Swarajya
- Author Name:
Mohandas Karamchand Gandhi
- Book Type:

- Description: ग्राम स्वराज्य—महात्मा गांधी, यह सोचना गलत है कि गांधीजी आज के उद्योगीकरण के बारे में बहुत पुराने विचार रखते थे। सच पूछा जाए तो वे उद्योगों के यंत्रीकरण के विरुद्ध नहीं थे। गाँवों के लाखों कारीगरों को काम दे सकनेवाले छोटे यंत्रों में जो भी सुधार किया जाए, उसका वे स्वागत करते थे। गांधीजी बड़े-बड़े कारखानों में विपुल मात्रा में माल पैदा करने के बजाय देश के विशाल जन-समुदायों द्वारा अपने घरों और झोंपड़ों में माल का उत्पादन करने की हिमायत करते थे। वे भारत के प्रत्येक सबल व्यक्ति को पूरा काम देने के बारे में बहुत अधिक चिंतित रहते थे और मानते थे कि यह ध्येय तभी सिद्ध होगा जब गाँवों में सुचारु रूप से ग्रामोद्योगों तथा कुटीर उद्योगों का संगठन और संचालन किया जाएगा। महात्मा गांधी ग्राम-पंचायतों के संगठन द्वारा आर्थिक और राजनीतिक सत्ता के विकेंद्रीकरण का जोरदार समर्थन करते थे। दुर्भाग्य से आर्थिक जीवन के नैतिक और आध्यात्मिक पहलू की हमेशा उपेक्षा की गई है, जिसके फलस्वरूप सच्चे मानव-कल्याण को बड़ी हानि पहुँची है। आधुनिक अर्थशास्त्री अब इस महत्त्वपूर्ण आवश्यकता पर जोर देने लगे हैं कि यदि हमें विशाल पैमाने पर तीव्र गति से आर्थिक विकास साधना है तो ‘वस्तुओं की गुणवत्ता’ बढ़ाने के साथ ‘मनुष्यता की गुणवत्ता’ भी बढ़ानी चाहिए। अतः वर्तमान परिस्थिति में गांधीजी के ‘ग्राम स्वराज्य’ की अवधारणा के पठन-पाठन की महती आवश्यकता है।
Uttar Taimoorkaleen Bharat : Vol. 2
- Author Name:
Saiyad Athar Abbas Rizvi
- Book Type:

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Description:
इस पुस्तक में 1399 से 1526 ई. तक के देहली के सुल्तानों के इतिहास से सम्बन्धित समस्त प्रमुख समकालीन एवं बाद के फ़ारसी के ऐतिहासिक ग्रन्थों का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया गया है। पहला भाग देहली के सुल्तानों के राज्य से सम्बन्धित है और दूसरा भाग उन प्रान्तीय राज्यों से जिनका प्रादुर्भाव फ़ीरोज़ तुग़लक़ की मृत्यु के उपरान्त ही धीरे-धीरे होने लगा था और जो तैमूर के आक्रमण के उपरान्त पूर्णतः स्वतंत्र हो गए।
सैयद वंश के इतिहास से सम्बन्धित यहया बिन अहमद बिन अब्दुल्लाह सिहरिन्दी की ‘तारीख़े मुबारकशाही’ एवं ख़्वाजा निज़ामुद्दीन अहमद की ‘तबक़ाते अक़बरी’ भाग-1 के उद्धरणों का अनुवाद किया गया है। दूसरे भाग में अफ़ग़ानों के सुल्तानों के इतिहास के अनुवाद सम्मिलित किए गए हैं। इनमें शेख़ रिज़्कुल्लाह मुश्ताक़ी की ‘वाक़ेआते मुश्ताक़ी’, ख़्वाजा निज़ामुद्दीन अहमद की ‘तबक़ाते अकबरी’, अब्दुल्लाह की ‘तारीख़े दाऊदी’, अहमद यादगार की ‘तारीख़े शाही’ एवं मुहम्मद कबीर बिन शेख़ इस्माइल की ‘अफ़सानए-शाहाने हिन्द’ के उद्धरण शामिल हैं।
भाग-2 के इतिहासकारों में ख़्वाजा निज़ामुद्दीन अहमद के अतिरिक्त सभी अफ़ग़ान इतिहासकार हैं। अहमद यादगार का इतिहास 1930 ई. में प्रकाशित हुआ था और ‘तारीख़े दाऊदी’ 1954 ई. में। इनके अतिरिक्त ‘वाक़ेआते मुश्ताक़ी’ और ‘अफ़सानए-शाहाने हिन्द’ अभी तक प्रकाशित नहीं हुए हैं और इनकी हस्तलिखित प्रतियाँ भी भारतवर्ष में उपलब्ध नहीं हैं, अतः आवश्यक अंशों का अनुवाद करते समय तत्सम्बन्धी पूरे-पूरे इतिहासों का अनुवाद कर दिया गया है। इस कारण एक ही घटना की कई बार पुनरावृत्ति अनुपेक्षणीय हो गई है। इतिहासकारों तथा उनकी कृतियों का परिचय अनुवाद के प्रारम्भ में प्रस्तुत किया गया है।
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