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Author:
Naresh 'Nadeem', S. Irfan Habib, Irfan HabibPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
350
₹ 280 (20% off)
Available
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प्रसिद्ध इतिहासकार इरफ़ान हबीब द्वारा सम्पादित यह पुस्तक ऐसे कई महत्त्वपूर्ण अध्ययनों को हमारे सामने रखती है, जिनमें अकबर, उसके साम्राज्य और तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक व आर्थिक वातावरण पर प्रकाश पड़ता है। मध्यकालीन भारतीय इतिहास के अधिकारी विद्वानों द्वारा लिखित इन गवेषणात्मक आलेखों से पाठक चार सदी पूर्व के भारत की राजनीति और सांस्कृतिक स्थिति की जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं। अकबरकालीन प्रशासनिक व्यवस्था, राजनीतिक इतिहास, धार्मिक रीति तथा विचार, विज्ञान और तकनीकी की स्थिति, समाजार्थिक स्थितियाँ आदि कुछ विषय हैं जिनके बारे में ये निबन्ध हमें प्रामाणिक तथ्य उपलब्ध कराते हैं तथा मौजूदा अवधारणाओं का परिष्कार करते हुए तत्कालीन इतिहास के क्षेत्र में नई चुनौतियों और क्षेत्रों को चिह्नित करते हैं। आज भारतीय जन-गण के लिए यह जानना भी बहुत ज़रूरी हो गया है कि एक राष्ट्र के रूप में हम एक संगठित राजनीतिक और सांस्कृतिक परम्परा के वारिस हैं। इस अर्थ में भी अकबर का राजनीतिक और सांस्कृतिक विज़न फ़ौरी तौर पर हमारे लिए अत्यन्त उपयोगी साबित हो सकता है।
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प्रसिद्ध इतिहासकार इरफ़ान हबीब द्वारा सम्पादित यह पुस्तक ऐसे कई महत्त्वपूर्ण अध्ययनों को हमारे सामने रखती है, जिनमें अकबर, उसके साम्राज्य और तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक व आर्थिक वातावरण पर प्रकाश पड़ता है। मध्यकालीन भारतीय इतिहास के अधिकारी विद्वानों द्वारा लिखित इन गवेषणात्मक आलेखों से पाठक चार सदी पूर्व के भारत की राजनीति और सांस्कृतिक स्थिति की जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं।
अकबरकालीन प्रशासनिक व्यवस्था, राजनीतिक इतिहास, धार्मिक रीति तथा विचार, विज्ञान और तकनीकी की स्थिति, समाजार्थिक स्थितियाँ आदि कुछ विषय हैं जिनके बारे में ये निबन्ध हमें प्रामाणिक तथ्य उपलब्ध कराते हैं तथा मौजूदा अवधारणाओं का परिष्कार करते हुए तत्कालीन इतिहास के क्षेत्र में नई चुनौतियों और क्षेत्रों को चिह्नित करते हैं।
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Book Details
-
ISBN9788126718283
-
Pages327
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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मौलाना अबुल कलाम आज़ाद स्वतंत्रता सेनानी, इस्लामी विद्वान, स्वतंत्र विचारक, अख़बारनवीस और आज़ाद भारत के पहले शिक्षामंत्री थे। उन्हें कोई औपचारिक तालीम तो नहीं मिली, लेकिन संस्कृति, दर्शन, भाषा और साहित्य के व्यापक स्वाध्याय से उन्होंने स्वयं कई विषयों में महारत हासिल की। बहुत कम उम्र में ही उन्होंने कई पत्रिकाएँ और अख़बार निकाले। गांधी जी के अहिंसक सविनय अवज्ञा आन्दोलन से वह बहुत प्रभावित थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल होने के बाद वह इसके सबसे युवा अध्यक्ष चुने गए। कांग्रेस के अध्यक्ष की हैसियत से, आज़ाद ने मुस्लिम लीग की विभाजनकारी राजनीति के साथ-साथ दमनकारी ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ भी लड़ाई लड़ी। आज़ाद की इस गहन और विस्तृत जीवनी में, इतिहासकार एस. इरफ़ान हबीब पाठकों को आज़ाद की ज़िन्दगी के सबसे निर्णायक क्षणों से रू-ब-रू कराते हैं। एक अध्याय में हम आज़ाद की ग़ैर-मामूली परवरिश, उनके रसूख़दार ख़ानदान, इस्लामी दुनिया में उथल-पुथल और ज़िन्दगी के प्रति आज़ाद के स्वतंत्र विचारों के शुरुआती संकेत देखते हैं। इसके बाद यह किताब मौलाना आज़ाद के आलोचनात्मक इस्लामी चिन्तन, अख़्लाक़ी सवालों और पैन-इस्लामी बहसों की पड़ताल करती है। यह वह दौर था जिसने आज़ाद के मज़हबी नज़रिये और राष्ट्रवाद के प्रति उनके दृष्टिकोण को स्वरूप दिया। ‘आज़ाद, इस्लाम और राष्ट्रवाद’ शीर्षक अध्याय आज़ाद की सियासी ज़िन्दगी और समग्र राष्ट्रवाद में उनके अटूट भरोसे और मुस्लिम लीग की फ़िरक़ा-परस्त सियासत के प्रति उनके कट्टर विरोध के ब्योरे पेश करता है। ‘ग़ुबार-ए-ख़ातिर : धर्म और राजनीति से आगे’ शीर्षक अध्याय 1940 की दहाई में अहमदनगर फ़ोर्ट जेल में उनकी क़ैद के दौरान ख़तों की शक़्ल में लिखे गए निबन्धों संग्रह के ज़रिये आज़ाद के दार्शनिक विचारों और निजी पसन्द-नापसन्द को उजागर करता है। और आख़िर में, ‘एक नए भारत का निर्माण : शिक्षा, संस्कृति, विज्ञान और बहुलवादी लोकाचार’ में प्राथमिक और प्रौढ़ शिक्षा की पहल के मार्फ़त देश की कमज़ोर शिक्षा प्रणाली को मज़बूत करने की आज़ाद की कोशिशों, देश की वैज्ञानिक और सांस्कृतिक तरक़्क़ी को लेकर उनकी दूरअन्देशी और अभी अभी आज़ाद हुए देश की कला और संस्कृति को सँजोने में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। ‘मौलाना आज़ाद : एक जीवनी’ भारत के महान विचारकों और राष्ट्र-निर्माताओं में से एक की निर्णायक जीवनी है।
Beeswin Shatabdi Mein Darshanshastra
- Author Name:
Suman Gupta +1
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‘दर्शनशास्त्र : पूर्व और पश्चिम’ शृंखला की इस सातवीं पुस्तक में डॉ. सुमन गुप्ता ने समकालीन दार्शनिक चिन्तन की दो मुख्य प्रवृत्तियों—भाषिक दर्शनशास्त्र और अस्तित्ववाद—का मार्क्सवादी दृष्टि से अध्ययन किया है। इन दोनों विचारधाराओं को उनके सही सामाजिक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रखते हुए, डॉ. गुप्ता ने इनकी प्रचलित व्याख्याओं पर प्रश्नचिह्न लगाया है। उनका तर्क है कि गूढ़ पारिभाषिक शब्दावली के आवरण में इन विचारधाराओं की अमूर्त तत्त्वमीमांसी प्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न लगाया है, जो एक सही विश्व-दृष्टि प्रस्तुत करने के स्थान पर यथार्थ को विरूपित करती है। भाषिक दर्शनशास्त्रियों और अस्तित्ववादियों के दृष्टिकोण के विपरीत, डॉ. सुमन गुप्ता ने एक ऐसा दृष्टिकोण अपनाया है, जो न केवल इन चिन्तनधाराओं के विविध पक्षों का एकीकरण करता है बल्कि उनके सामाजिक यथार्थ की जड़ों में भी जाता है। सुमन गुप्ता ने स्पष्ट रूप से दर्शाया है कि भाषिक दर्शनशास्त्रियों और अस्तित्ववादियों द्वारा प्रतिपादित मनुष्य की संकल्पना मनुष्य को एक ऐसे अमूर्त रूप में चित्रित करती है जो अपने सामाजिक क्रियाकलाप से अपना या अपने चारों ओर की दुनिया का रूपान्तरण करने में असमर्थ है। समकालीन दर्शन की इन दोनों प्रवृत्तियों की न केवल समीक्षा प्रस्तुत की है, बल्कि वह विश्व-दृष्टि भी सामने रखी है जिसे वे सही मानती हैं। सुमन गुप्ता ने भाषिक दर्शनशास्त्र और अस्तित्ववाद का विवेचन साधारण कुशलता से किया है लेकिन उनकी पद्धति निस्सन्देह विवादमूलक है, जिसके फलस्वरूप यह पुस्तक दर्शनशास्त्र के प्रति एक नई दृष्टि विकसित करने में सहायक होगी और जो पाठक दर्शनशास्त्र की सार्थकता को जीवन की यथार्थ समस्याओं से जोड़कर देखना चाहते हैं, उनके लिए यह निश्चय ही रोचक और पठनीय सिद्ध होगी।
Yadon Se Racha Gaon
- Author Name:
M.N. Shrinivas +2
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‘यादों से रचा गाँव’ अतीत के दुर्घटनाग्रस्त ब्यौरों को सामने लाने के रचनात्मक संकल्प का परिणाम है। एक हादसे में सारे काग़ज़ात जलकर राख हो जाने के बाद एम.एन. श्रीनिवास ने इस पुस्तक में पूरी तरह अपनी यादों के सहारे अपने क्षेत्रकार्य के अनुभवों की पुनर्रचना की है। प्रस्तुत पुस्तक में यूँ तो दक्षिण भारत के एक बहुजातीय ग्राम का नृतत्त्वशास्त्रीय अध्ययन दिया गया है, लेकिन एक बदलते ग्राम का प्रौद्योगिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और अन्तर्जातीय सम्बन्धों का जिस प्रकार विवेचन किया गया है, वह पूरे भारत के गाँवों की स्थिति को दर्शाता है। ‘यादों से रचा गाँव’ में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों, धर्म, परिवार, और कृषि से सम्बन्धित मामलों का भी व्यापक विश्लेषण है। वस्तुत: प्रस्तुत पुस्तक एक ऐसी कृति है जिसे मूल आँकड़ों के समुद्र में गोता लगाकर गाँव की अपनी शब्दावली में रचा गया है। रचनात्मक शैली इसका प्रमुख आकर्षण है। श्रीनिवास जी ने इस पुस्तक में बहुजातीय भारतीय समुदाय के क्षेत्र-अध्ययन का जिस ढंग से वैज्ञानिक विश्लेषण किया है, वह न केवल मानवशास्त्रियों, बल्कि दूसरे सामान्य पाठकों के लिए भी उपयोगी है।
Gandhi Aur Unke 'Satyagrah' Ki Yatra
- Author Name:
Heramb Chaturvedi
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जब तक मानव सभ्यता का अस्तित्व है तब तक गाँधी की प्रासंगिकता बनी रहेगी, क्योंकि गाँधी ने मानवता के साथ मानव सभ्यता के मौलिक मूल्यों और मानवता के आदर्शों, प्रतिमानों पर ही अपना दर्शन आधारित किया और उसे क्रियान्वित करते हुए अपना जीवन भी जी कर दिखा दिया। जब तक विश्व में युद्ध और युद्धपरक परिस्थितियाँ बनी रहेंगी, मानव-समाज और विश्व में उनके दर्शन का महत्त्व सदैव बना रहेगा। गाँधी मानवता, शान्ति, शान्तिपूर्ण अस्तित्व के साथ विकास के समर्थक थे और सत्य शाश्वत मूल्य अधारित हो अर्थात् सृष्टि, विश्व और समाज के मध्य भी सामंजस्य, सन्तुलन और सहभाग का भाव स्थायी हो, इसके इच्छुक थे। इसलिए किसी एक आयाम को लेकर गाँधी को समझने के लिए अध्ययन करना ख़तरा मोल लेना ही है। उनके व्यक्तित्व के समस्त आयामों के बिना उनका समावेशी अध्ययन सम्भव नहीं है। अत: गाँधी जी का हर अध्ययन उनकी जीवन-यात्रा का ही अध्ययन हो जाता है और इसलिए उन 'संस्कारों' और उनके व्यक्तित्व के मनोवैज्ञानिक विकास को भी विश्लेषित करना पड़ेगा तब हम उनको एवं उनके विचारों को समझ सकेंगे। बिना वांग्मय के अध्ययन के किसी लेखक, विचारक, ऐतिहासिक व्यक्तित्व को पूर्णता में समझा ही नहीं जा सकता। अत: गाँधी के 'सत्याग्रह' की यात्रा भी उनकी जीवन-यात्रा ही हो जाती है।
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