Hingwa Ghat Mein Pani Re
(0)
Author:
Chandrakishore JaiswalPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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भनटा को मालूम था कि हिंगवा घाट पर पुल नहीं बनेगा, फिर भी वह अपने खीसे के चार रुपये चन्दे में दे आया। भला क्यों? क्योंकि उसे लगा कि नेताजी लोग दिल्ली से आए हैं, बोल रहे हैं पुल बनेगा, तो दे दिया चन्दा। पेट भरने के लिए आदमी क्या-क्या नहीं करता! लेकिन सच बात ये है कि यह उसने इसलिए कहा कि लोग मजाक न बनाएँ। तब तो उसे यकीन हो ही गया था कि पुल बनेगा। भारतीय ग्रामीण जीवन के बहुआयामी यथार्थ की व्यापक समझ रखने वाले चन्द्रकिशोर जायसवाल ग्राम्य जन के मनोविज्ञान को भी बखूबी समझते हैं और उसे अपनी कहानियों-उपन्यासों में सम्प्रेषणीय ढंग से पुनर्रचित करते हुए ग्रामीण समाज की एक पूरी तसवीर हमारे सामने रखते हैं। ‘हिंगवा घाट में पानी रे’ उनकी ऐसी ही चर्चित कहानियों का संकलन है जिनमें उन्होंने गाँव के गरीबों और अमीरों के बीच के जटिल ताने-बाने के साथ उनके मनो-मस्तिष्क की संरचना को भी एक साहित्यिक की सहानुभूति और एक समाजविज्ञानी जैसी तटस्थता से बयान किया है। संग्रह की ‘चौदह अगस्त’ अपनी ज़बान, बयान और कथ्य में एक बड़े क़द की कहानी है। भारत की गुलामी के आखिरी चौदह अगस्त की ये कहानी आजादी बाद के भारत की विडम्बना को थोड़े अलग ढंग से रेखांकित करती है। संग्रह में इसके अलावा संकलित कहानियाँ हैं — ‘बाँट-बखरा’, ‘परदा’, ‘पिया-दुलरी’ और ‘अपहरण’, जो अपने-अपने पात्रों और परिवेश के साथ पाठकों को अत्यन्त प्रिय रही हैं।
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भनटा को मालूम था कि हिंगवा घाट पर पुल नहीं बनेगा, फिर भी वह अपने खीसे के चार रुपये
चन्दे में दे आया। भला क्यों? क्योंकि उसे लगा कि नेताजी लोग दिल्ली से आए हैं, बोल रहे हैं पुल
बनेगा, तो दे दिया चन्दा। पेट भरने के लिए आदमी क्या-क्या नहीं करता! लेकिन सच बात ये है
कि यह उसने इसलिए कहा कि लोग मजाक न बनाएँ। तब तो उसे यकीन हो ही गया था कि पुल
बनेगा।
भारतीय ग्रामीण जीवन के बहुआयामी यथार्थ की व्यापक समझ रखने वाले चन्द्रकिशोर जायसवाल
ग्राम्य जन के मनोविज्ञान को भी बखूबी समझते हैं और उसे अपनी कहानियों-उपन्यासों में
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‘हिंगवा घाट में पानी रे’ उनकी ऐसी ही चर्चित कहानियों का संकलन है जिनमें उन्होंने गाँव के
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रही हैं।
Book Details
-
ISBN9789347265044
-
Pages176
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है। ‘ज्ञानदान’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘ज्ञानदानֺ’, ‘एक राज़’, ‘गण्डेरी’, ‘कुछ समझ न सका’, ‘दु:ख का अधिकार’, ‘पराया सुख’, ‘80/100’, या ‘सांई सच्चे!’, ‘ज़बरदस्ती’, ‘हलाल का टुकड़ा’, ‘मनुष्य’, ‘बदनाम’ और ‘अपनी चीज़’।
Prawas Men Aaspaas
- Author Name:
Hansa Deep
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