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कविताओं को/बचाकर रखा है मैंने/ताकि देर-सवेर ही सही/याद रहे कि/जीवन/होने के लिए बना है/ढोने के लिए नहीं। मुख्यत: आलोचनात्मक गद्य में सक्रिय शैलेश कुमार की ये कविताएँ उनके इस अदेखे लेकिन अत्यन्त प्रेम तथा आग्रह के साथ संरक्षित कवि-मन की अभिव्यक्तियाँ हैं जो अपने जीवन-जगत्, घर-परिवार और जगहों को बेहद अपनेपन के साथ जीता है, भीतर-भीतर उनसे संवाद करता है। ये कविताएँ उसी सजीव संवाद की कड़ियाँ हैं। संग्रह की पहली ही कविता ‘ज़िन्दा शहर’ में अपने शहर पटना की आत्म-विश्वस्त स्थानीयता को वे इतने सटीक और सहज बिम्बों में पकड़ते हैं कि हर पढ़ने वाला अपने शहर को उसी ढंग से देखने को उद्विग्न हो उठे— देखता हूँ यह शहर/ज़िन्दा है एक अदम्य विश्वास से/मगही में कहें तो के कर लेतइ/भोजपुरी में कहें तो के का कर लेही हो/और हिन्दी रूपान्तरण में कहें तो/कोई ज़ोर लगा ले चाहे जितना भी/बदल नहीं सकता है हमें। कवि को अपने शहर की यह मानवीय ज़िद अच्छी लगती है। लेकिन शहरों, और सामान्यत: आधुनिक जीवन के उन बदलावों पर भी उसकी पैनी निगाह है जो एक तरह से छीजती जा रही मनुष्यता का कारण बन रहे हैं। अत्यन्त सरल और संवादधर्मी भाषा में ये कविताएँ हमारी जटिल दैनिकता को समझने में मदद करती हैं और चाहती हैं कि हमारा होना उतना ही सरल हो जैसे रिश्ते होते हैं—वे चाहे परिवार के हों या संसार से हों। शैलेश कुमार का कवि जुड़ाव को एक ज़रूरी और मनुष्योचित क्रिया मानता है, और इसी से अपनी कविताओं को सम्भव करता है। यह उनकी काव्य-यात्रा का ‘पहला पन्ना’ है। पाठक निश्चय ही उस पर ठहरना चाहेगा।
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कविताओं को/बचाकर रखा है मैंने/ताकि देर-सवेर ही सही/याद रहे कि/जीवन/होने के लिए बना है/ढोने के लिए नहीं।
मुख्यत: आलोचनात्मक गद्य में सक्रिय शैलेश कुमार की ये कविताएँ उनके इस अदेखे लेकिन अत्यन्त प्रेम तथा आग्रह के साथ संरक्षित कवि-मन की अभिव्यक्तियाँ हैं जो अपने जीवन-जगत्, घर-परिवार और जगहों को बेहद अपनेपन के साथ जीता है, भीतर-भीतर उनसे संवाद करता है।
ये कविताएँ उसी सजीव संवाद की कड़ियाँ हैं। संग्रह की पहली ही कविता ‘ज़िन्दा शहर’ में अपने शहर पटना की आत्म-विश्वस्त स्थानीयता को वे इतने सटीक और सहज बिम्बों में पकड़ते हैं कि हर पढ़ने वाला अपने शहर को उसी ढंग से देखने को उद्विग्न हो उठे—
देखता हूँ यह शहर/ज़िन्दा है एक अदम्य विश्वास से/मगही में कहें तो के कर लेतइ/भोजपुरी में कहें तो के का कर लेही हो/और हिन्दी रूपान्तरण में कहें तो/कोई ज़ोर लगा ले चाहे जितना भी/बदल नहीं सकता है हमें।
कवि को अपने शहर की यह मानवीय ज़िद अच्छी लगती है। लेकिन शहरों, और सामान्यत: आधुनिक जीवन के उन बदलावों पर भी उसकी पैनी निगाह है जो एक तरह से छीजती जा रही मनुष्यता का कारण बन रहे हैं।
अत्यन्त सरल और संवादधर्मी भाषा में ये कविताएँ हमारी जटिल दैनिकता को समझने में मदद करती हैं और चाहती हैं कि हमारा होना उतना ही सरल हो जैसे रिश्ते होते हैं—वे चाहे परिवार के हों या संसार से हों। शैलेश कुमार का कवि जुड़ाव को एक ज़रूरी और मनुष्योचित क्रिया मानता है, और इसी से अपनी कविताओं को सम्भव करता है। यह उनकी काव्य-यात्रा का ‘पहला पन्ना’ है। पाठक निश्चय ही उस पर ठहरना चाहेगा।
Book Details
-
ISBN9789377370794
-
Pages252
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Ek Charwahe Ka Geet
- Author Name:
Ketan Yadav
- Book Type:

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वे न मनु थे न आदम/ग्रन्थों की गढ़ी हुई छवियों के बाहर/वे केवल और केवल चरवाहे थे। यह एक चरवाहे का गीत है जो सभ्यता के समानान्तर बजते हुए एक अपनी दुनिया का दावा पेश कर रहा है—उस सभ्यता के बरक्स जिसमें चारागाह दफ़्न होते जा रहे हैं। यह सभ्यता की आलोचना नहीं बल्कि प्रकृति के साहचर्य में जीती उस दुनिया का स्मरण है जो अगर अपने ही रास्ते आगे बढ़ती तो वैसी न होती जैसी आज हमारी यह दुनिया है। इन कविताओं को पढ़ते हुए अग्रगामिता की किसी वैकल्पिक सरणि का अभाव हमें लगातार विचलित करता है। हिंसा के नवीनतम दृश्यों की आदी होती आँखें जो कुछ भी देखने की तैयारी कर चुकी हैं, हमारे वर्तमान की आँखें हैं, जिनके लिए अद्यतित होने का अर्थ है और अधिक संवेदनशून्य होना, और भी भीषण को पचा लेने को प्रस्तुत रहना। ये कविताएँ इस प्रक्रिया को अलग-अलग कोणों से देखती हैं, और कहीं अपनी सावधानी को ढीला नहीं होने देतीं। तकनीक के आधुनिक युवा संसार की सत्ता को लेकर भी ये कविताएँ कम सजग नहीं हैं— मेरे मनुष्य के सामने तुमसे बड़ी चुनौतियाँ हैं, पुरखा कवियो!/यहाँ मनुष्य बनाम मनुष्य नहीं, मशीन है। ऐन्द्रीय स्पर्श के दिन-ब-दिन संकीर्ण और सपाट होते जाने के मुकाबले प्रेम यहाँ एक उम्मीद की तरह आता है, लेकिन क्या वह भी हमारी पहुँच में है, मशीनों की इस्पाती निस्पन्द धवल चौंध को चीरकर क्या उस तक हमारा वह आर्त स्वर पहुँच पाता है जिसके सामने ‘कभी सूर्योदय न होनेवाली रात’ किसी भी दिन आ खड़ी होगी! आशंका जो मौजूदा समय की निर्मिति के अभिन्न हिस्से के रूप में हमारे चारों ओर उपस्थित है, इन कविताओं में बार-बार लौटती है। यह इस युवा कवि की सूक्ष्म संवेदना का प्रमाण है और सामाजिक-राजनीतिक बोध का भी जिसका एक सिरा जरूरी तौर पर तकनीक के आतंक से जा जुड़ता है जो अब मनुष्य को सामने से नहीं, ऊपर से देख रही है—देवता की तरह। पेड़ों, पशुओं और पत्तियों की भाषा से लेकर मशीनों की चीख तक को सुनतीं ये कविताएँ पाठक को निःसन्देह एक भिन्न धरातल पर ले जाएँगी।
Fiza Ke Samandar Mein
- Author Name:
Ramswaroop Kisan
- Book Type:

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ग्रामीण जीवन के अनूठे चित्र और मनुष्य के संसार के ऐसे बिम्ब जिन पर सामान्यतः हमारी निगाह कम ही ठहरती है, रामस्वरूप किसान की कविताओं में बहुतायत से मिलते हैं। मिसाल के तौर पर इस संग्रह की पहली ही कविता-शृंखला ‘पीठ’ को लिया जा सकता है जिसमें कुल सोलह कविताएँ शामिल हैं। ‘पीठ एक कारुणिक क्षेत्र’ है जिसे देखकर कवि-मन बार-बार कभी अपने भीतर और कभी बाहर की ओर एक प्रश्नाकुल चिन्तन-यात्रा पर निकल जाता है। ‘फ़िज़ा के समन्दर में’ शीर्षक कविता-शृंखला की ग्यारह कविताएँ पुनः कवि की विशिष्ट दृष्टि का पता देती हैं जिसमें प्रेम के लिए घर से भागती हुई लड़की हमें और हमारे समाज को पुनः पुनः सवालों के घेरे में खड़ा कर देती है— यह रहा/तुम्हारा दूल्हा/साथ-साथ रहोगे तो/प्यार हो जाएगा/पापा ने कहा।...नहीं, ऐसा कहो पापा/यह रहा तुम्हारा प्यार/साथ-साथ रहोगे/तो दूल्हा हो जाएगा। संग्रह में शामिल अधिकांश कविताएँ इसी तरह पाठक को सहसा चौंका देती हैं और हमारी देखी जानी चीज़ों को नये ढंग से हमारे सामने ला देती हैं। आम जन-जीवन के दैनन्दिन दुखों, व्यवस्था-जनित असहायताओं और मनुष्य की आन्तरिक और बाह्य पीड़ाओं के साथ इन कविताओं की राजनैतिक चेतना भी मुखर रूप में सामने आती है— पब्लिक लड़ती है चुनाव—पैसों से/बातों से/लातों से/भालों-बन्दूक़ों-तलवारों से/ख़ून के फ़व्वारों से/और लड़ा-लड़ाया चुनाव/उनके गले में डाल देती है.../वे चुनाव नहीं लड़ते/वे तो पहनते हैं चुनाव।
Chand Ki Vartani
- Author Name:
Rajesh Joshi
- Book Type:

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राजेश जोशी का यह कविता-संग्रह हिन्दी कविता का एक नया शिखर है। तीन दशकों से भी अधिक की काव्य-साधना एवं जीवन के लगभग साठ वसन्तों की हरीतिमा से दीप्त यह संग्रह अनेक स्वरों का विलक्षण पुंज है। राजेश ने न केवल अपने को बदला है, बल्कि अपने को बदलते हुए समस्त समकालीन काव्य में सर्वथा नए घूर्ण उत्पन्न कर दिए हैं। वे सारे गुण और स्वाद जिनके लिए राजेश जोशी जाने और माने जाते हैं, यहाँ अपनी पूर्णता एवं सौष्ठव के साथ उपस्थित हैं, साथ ही बहुत कुछ ऐसा भी है जो नितान्त अप्रत्याशित पर आह्लादकारी है और वह है जीवन को उसकी जटिलता में जाकर देखने का उपक्रम, सभी तहों-परतों को उलट-पुलट अनुभव के नामिक तक उत्खनन का धैर्य—‘दिखने में जो अक्सर आसान से दिखते हैं एक कवि को करने होते हैं ऐसे कई पेचीदा काम’। और इसके लिए राजेश तदनुरूप भाषा की खोज भी करते हैं, बनी-बनाई भाषिक आदतों को छोड़ते हुए वह अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाते हैं—‘ताप से भरे शब्दों’ को ढूँढ़ते दूर बीहड़ में जाते हैं और ‘आँसुओं के लिए’ भी ढूँढ़ लाते हैं वैसे ही ‘पारदर्शी शब्द’। राजेश की कविता हमारे समय का ऐसा संघनित दस्तावेज़ है कि केवल उसके आधार पर हम समकालीन भारत का एक दृश्य-लेख बना सकते हैं। इतने तात्कालिक ब्योरे हैं यहाँ, इतने प्रसंग, पात्र और राजनीतिक-सामाजिक उद्वेलन। साथ ही उनकी कविता जीवन के उन तन्तुओं की खोज करती है जहाँ उन उद्वेलनों का कम्प सबसे तीव्र है, और उन लोगों का यशोगान करती है जो निरन्तर संघर्ष करते हुए जीवन को बदलने का ताब रखते हैं। उनकी कविता साहस के साथ सत्ता के सभी पायदानों पर वार करती है, एक विराट सत्ता जो अर्थव्यवस्था से लेकर हमारी रसोई तक व्याप्त है। नागार्जुन और धूमिल के बाद सत्ता के तिलिस्म को उघाड़नेवाले सर्वाधिक सशक्त कवि राजेशी जोशी हैं। आख्यान, कथोपकथन, लोक-कथाओं के स्वप्न-वृत्तान्त, जातीय मिथक, अतियथार्थ के खम, सपाटबयानी, शब्दों के खेल और कल्पना-क्रीड़ा, फंतासी सब कुछ मिलकर एक नया रसायन बनाते हैं जो अन्यत्र दुलर्भ है। राजेश की कविता अब भाषा के नए उपकरणों एवं आयुधों का व्यवहार करती है तथा कविता को वहाँ ले जाती है जहाँ भाषा ‘अर्थ से अधिक अभिप्रायों में निवास करती है’। यह ठोस जगत् की, ठोस जीवन की कविता है उर्फ़ चाँद की वर्तनी नीले नभ पर। — अरुण कमल
Aakash Dharti Ko Khatkhataata Hai
- Author Name:
Vinod Kumar Shukla +1
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विनोद कुमार शुक्ल समकालीन कविता के संसार में उन थोड़े से ऐसे कवियों में शुमार हैं जिन्होंने समकालीन कविता की दिशा और दृष्टि को काफ़ी हद तक नियंत्रित किया है। उनकी इस हैसियत को हिन्दी में लगभग सभी कवियों ने स्वीकार किया है। काव्याभिव्यक्ति में मित कथनों का जितना सार्थक प्रयोग वे करते हैं, उतना शमशेर ही कर पाते थे। शब्दों को कम से कम ख़र्च करके कैसे अर्थ के भंडार को समेटा जाए इसे सीखने के लिए विनोद कुमार शुक्ल की कविता काम की चीज़ है। उनकी कविता नितांत समसामयिक होकर भी समयातीत लगती है। वह पीछे भी देखती है और आगे भी, पर उल्लेखनीय बात यह है कि वह अपने समय में धँसी होने के बावजूद अपने समय में फँसती नहीं है। उनके काव्यबोध में जो अचूक क़िस्म की पारदर्शी सूक्ष्मता है, वह कई लोगों को जटिलता, रूपवाद, कलावाद का अवतार लगती है लेकिन रूपवादी कविता है नहीं। काव्य-प्रयोगों के लिए उनसे बड़ा कवि आज कम से कम हिन्दी में दिखाई नहीं देता वे विचारधारा के पुल से होकर रास्ता तय करने वाले कवि नहीं हैं, बल्कि वे कविता की नदी को ख़ुद तैर कर पार करने वाले कवि हैं। कम से कम उनके लम्बे कवि-कर्म का संघर्ष यही प्रतिमान हमारे सामने रखता है। वे हिन्दी कविता के संसार में उन थोड़े से कवियों में हैं जिन्होंने चालू मुहावरे को तोड़कर अपनी कविता में संवेदना और काव्य-शिल्प के लिए अनोखा आयाम चुना है। अपनी काव्यभाषा के चुनाव में वे जितने विरल, संयमी और जागरूक कवि हैं, उतने कम ही कवि रहे हैं। यह उनकी चुनिन्दा कविताओं का संकलन है।
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