Namvar Ke Notes
Author:
Namvar SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 396
₹
495
Available
आज के विमर्शवादी दौर में नामवर जी के कक्षा-व्याख्यान शास्त्र-निर्माण की भारतीय परम्परा के चिह्न की तरह हैं।</p>
<p>भारतीय आचार्यों के प्रति उनका अनाक्रान्त भाव विस्मित करता है। वे स्वाभाविक रूप से उन स्थानों को बताते हैं जहाँ काव्यशास्त्र की परम्परा में उलट-फेर हुआ है। दूसरे जहाँ बचकर निकलते हैं, नामवर जी वहीं रुकते हैं।</p>
<p>पश्चिम में इंडोलॉजी के प्रति आकर्षण रहा है। इसमें काव्यशास्त्र भी एक है। इस आकर्षण के वस्तुगत कारण कौन से हैं? विचार करने पर स्पष्ट होता है कि वहाँ काव्यशास्त्र सम्बन्धी कुछ प्रस्तावनाएँ, आनुषंगिक चर्चाएँ ही रही हैं। भारतवर्ष में काव्यशास्त्र एक विधिवत् शास्त्र रहा है।</p>
<p>भारतीय काव्यशास्त्र शास्त्र-निर्माण की एकान्तिक साधना का फल नहीं है।</p>
<p>संस्कृत काव्यशास्त्र पर विभिन्न अनुशासनों का प्रभाव और अपने को असाधारण सिद्ध करने की बेचैनी दोनों प्रत्यक्ष हैं।</p>
<p>—इसी पुस्तक से
ISBN: 9788126726844
Pages: 135
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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आदमी को लेकर एक निस्संकोच अपनापन और करुणा भगवत रावत की कविता के केन्द्र में है, इसीलिए जब वे याद दिलाते हैं कि इस समय दुनिया को ढेर सारी करुणा चाहिए तो वे भावुक नहीं हो रहे होते हैं, बल्कि निर्वैयक्तिकता, तटस्थता आदि के मूलत: मानव-विरोधी मूल्यों के ख़िलाफ़ एक अमोघ नकार दर्ज करते हैं।
भारतीय साहित्य की एक महान् परम्परा पर कभी भी ध्यान नहीं दिया गया है और वह है मित्रता के चित्रण की। ‘महाभारत’ और ‘रामायण’ की मैत्रियाँ भी भारतीय मानवीयता का एक अनिवार्य तत्त्व हैं और बीसवीं शताब्दी में जिस वैश्विक मानवीय प्रतिबद्धता की बात की जाती है, उसके मूल में यही वह स्वाभाविक दोस्ताना है जो इनसानों में हमेशा मौजूद रहता है। मुक्तिबोध के बाद भगवत रावत आज के पहले हिन्दी कवि हैं जिनके यहाँ दोस्ती का जज़्बा, किसी मित्र की प्रतीक्षा, सखा के आने की ख़ुशी, बल्कि किसी भी राह चलते को दोस्त बनाने की चाहत इतनी शिद्दत से मौजूद है। जब हर अपने जैसा इनसान दोस्त है तो बेशक वसुधा भी कुटुम्ब है। यह आकस्मिक नहीं है कि भगवत रावत ने कुछ कविताएँ अपने कवि-कलाका र मित्रों पर भी लिखी हैं। दोस्ती का यह जज़्बा उस समय और भी सम्पूर्ण तथा सार्थक हो जाता है, जब भगवत रावत उसकी ज़द में प्रकृति और पर्यावरण को भी ले आते हैं।
भगवत रावत की ये कविताएँ भारतीय जीवन के ऐसे कई चित्र हिन्दी कविता में पहली बार लाती हैं जो शायद पहले कभी देखे नहीं गए। यदि प्रेमचन्द ने ‘क़फन’ में दलितों के मर्मांतक यथार्थ का चित्रण किया था तो ‘अतिथि कथा’ में भगवत रावत उसी बिरादरी का एक ऐसा स्निग्ध दृश्य उपस्थित करते हैं जो आत्मा को जगमगा जाता है। ‘यह तो अच्छा हुआ’, ‘सोच रही है गंगाबाई’, ‘मानव-संग्रहालय’ (जो निराला की ‘तोड़ती पत्थर’ का समसामयिक संस्करण है) आदि में उनकी कविता संसार के सबसे बड़े सर्वहारा वर्ग—स्त्रियों की कथाएँ खोज लेती है। उनकी ‘कचरा बीननेवाली लड़कियाँ’ हिन्दी की इस तरह की बेहतरीन समूहपरक कविताओं में भी अपनी निगाह और वात्सल्य के लिए बेमिसाल स्वीकार की जानी चाहिए। यदि भगवत रावत की व्यापक आस्था और पक्षधरता को लेकर किसी भी दुविधा की गुंजाइश नहीं है तो यह भी सच है कि उसमें कोई अतिमानवीय, सुनियोजित, यंत्रचालित आशावाद तथा आत्माभिनन्दन भी नहीं है। कई कविताओं में पराजय की अकातर स्वीकृति है, अपनी और अपने जैसों की भूल-ग़लतियों, ख़ामियों और ग़फ़लतों का इक़बाल भी है। लेकिन इनमें आत्मदया और विलाप नहीं है, बल्कि उस तरह का मूल्यांकन है जो हर मुक़ाबले के बाद शाम को शिविरों में किया जाता है ताकि अगली सुबह फिर आगे बढ़ा जा सके। ‘मेरा चेहरा’, ‘सच पूछो तो’, ‘ठहरा हूँ जब-जब छाया के नीचे’, ‘क्या इसीलिए धारण की थी देह’, ‘मौत’ तथा ‘आग पेटी’ जैसी अत्यन्त निजी कविताओं में अपने एकान्त, पारिवारिक और सामाजिक जीवन से कई क़िस्म की मुठभेड़ें हैं, आत्म-स्वीकृतियाँ हैं, यथार्थ से निर्मम मुक़ाबले हैं लेकिन निराशा या पस्ती कहीं नहीं है।
भगवत रावत की काव्य-प्रौढ़ता का एक विलक्षण पहलू उनका शिल्प-वैविध्य है। ‘सम्भव नहीं’, ‘और अन्त में’ तथा ‘हम जो बचे रह गए’ सरीखी कविताएँ सिद्ध करती हैं कि छन्द पर भी उनका सहज अधिकार है जबकि कुछ लम्बी कविताओं में उन्होंने सिर्फ़ एक विचार-स्थिति को निबाहा है और कुछ में वे सफल कथा-निर्वाह कर ले गए हैं। छोटी रचनाओं को उन्होंने उक्ति, सुभाषित, शब्द-चित्र या व्यंग्य नहीं बना दिया है, बल्कि, उनमें जायज़ कविता मौजूद है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात शायद यह है कि इन कविताओं में अधिकांश में भगवत रावत भाषा की एक ऐसी विरल सादगी हासिल कर पाए हैं जो अपनी सम्प्रेषणीयता में किसी तंतुवाय से जगाए गए सुदूर लेकिन गहरे संगीत की तरह है। भाषा को शिल्प, और इन दोनों को कथ्य से अलग करके देखना हिमाकत है, इसलिए यह माने बिना काम नहीं चलता कि सच पूछो तो भगवत रावत की कविता अपने सारे आयामों में हिन्दी में ऐसी जगह बना चुकी है जिसकी उपेक्षा कविता की अपनी समझ पर प्रश्नचिन्ह लगाकर ही की जा सकती है।
Thanega Pranam
- Author Name:
Manju Preetham
- Rating:
- Book Type:

- Description: The best poetry collection
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