Alochana Anukramanika
(0)
Author:
Shailesh Kumar, Neelam SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
895
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Available
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स्वतंत्रता के बाद जिस तरह भारतीय समाज और राजनीति अपना रास्ता टटोल रहे थे; हिन्दी साहित्य की स्थिति बेशक वैसी नहीं थी। उसकी अपनी एक परम्परा थी जो ब्रिटिश भारत में भी विद्यमान और गतिशील रहती आई थी। लेकिन आजादी के बाद के नए भारत में उसके सामने कुछ नए कार्यभार थे; जिसमें सबसे अहम था भारतीय लोकतंत्र को एक सामूहिक बोध के रूप में स्थापित करना और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को आगे बढ़ाना।<br />इसके लिए सिर्फ साहित्य-सृजन की नहीं, एक वैचारिक नेतृत्व की भी जरूरत थी। हिन्दी समाज के लिए इस काम के लिए आलोचना सामने आई। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस त्रैमासिक पत्रिका का पहला अंक अक्तूबर 1951 में आया; और पहले ही अंक से उसने अपनी क्षमता और उद्देश्यों को स्पष्ट रूप में रेखांकित कर दिया।<br />आलोचना को सिर्फ साहित्यिक समीक्षाओं की पत्रिका नहीं होना था, और वह हुई भी नहीं। उसकी चिन्ता के दायरे में इतिहास, संस्कृति, समाज से लेकर राजनीति और अर्थव्यवस्था तक सभी कुछ था। विश्व के वैचारिक आन्दोलनों और अवधारणाओं को भी उसने बराबर अपनी निगाह में रखा। इसी विराट दृष्टि के चलते आलोचना हिन्दी मनीषा के लिए एक नेतृत्वकारी मंच के रूप में सामने आई, और धीरे-धीरे मानक बन गई।<br />आलोचना के सम्पादक बदले, लेकिन उसकी दृष्टि का दायरा और फोकस कभी नहीं बदला। आज भी, वह लोकतांत्रिक प्रगतिशील और समतावादी मूल्यों के पक्ष में साहसपूर्वक खड़ी हुई है। अक्टूबर 1951 में प्रकाशित पहले अंक से लेकर अप्रैल-जून 2019 में प्रकाशित ‘विभाजन के सत्तर साल’ विषयक अंक तक की सामग्री इसकी गवाह है, जिसका विवरण आप इस पुस्तक में देखेंगे। <br />इस पुस्तक में हर अंक की सामग्री का क्रमबद्ध विवरण है जो स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य की यात्रा का द्योतक भी है; और सामाजिक-सांस्कृतिक चिन्ताओं का भी।
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स्वतंत्रता के बाद जिस तरह भारतीय समाज और राजनीति अपना रास्ता टटोल रहे थे; हिन्दी साहित्य की स्थिति बेशक वैसी नहीं थी। उसकी अपनी एक परम्परा थी जो ब्रिटिश भारत में भी विद्यमान और गतिशील रहती आई थी। लेकिन आजादी के बाद के नए भारत में उसके सामने कुछ नए कार्यभार थे; जिसमें सबसे अहम था भारतीय लोकतंत्र को एक सामूहिक बोध के रूप में स्थापित करना और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को आगे बढ़ाना।<br />इसके लिए सिर्फ साहित्य-सृजन की नहीं, एक वैचारिक नेतृत्व की भी जरूरत थी। हिन्दी समाज के लिए इस काम के लिए आलोचना सामने आई। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस त्रैमासिक पत्रिका का पहला अंक अक्तूबर 1951 में आया; और पहले ही अंक से उसने अपनी क्षमता और उद्देश्यों को स्पष्ट रूप में रेखांकित कर दिया।<br />आलोचना को सिर्फ साहित्यिक समीक्षाओं की पत्रिका नहीं होना था, और वह हुई भी नहीं। उसकी चिन्ता के दायरे में इतिहास, संस्कृति, समाज से लेकर राजनीति और अर्थव्यवस्था तक सभी कुछ था। विश्व के वैचारिक आन्दोलनों और अवधारणाओं को भी उसने बराबर अपनी निगाह में रखा। इसी विराट दृष्टि के चलते आलोचना हिन्दी मनीषा के लिए एक नेतृत्वकारी मंच के रूप में सामने आई, और धीरे-धीरे मानक बन गई।<br />आलोचना के सम्पादक बदले, लेकिन उसकी दृष्टि का दायरा और फोकस कभी नहीं बदला। आज भी, वह लोकतांत्रिक प्रगतिशील और समतावादी मूल्यों के पक्ष में साहसपूर्वक खड़ी हुई है। अक्टूबर 1951 में प्रकाशित पहले अंक से लेकर अप्रैल-जून 2019 में प्रकाशित ‘विभाजन के सत्तर साल’ विषयक अंक तक की सामग्री इसकी गवाह है, जिसका विवरण आप इस पुस्तक में देखेंगे। <br />इस पुस्तक में हर अंक की सामग्री का क्रमबद्ध विवरण है जो स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य की यात्रा का द्योतक भी है; और सामाजिक-सांस्कृतिक चिन्ताओं का भी।
Book Details
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ISBN9789388183215
-
Pages264
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Avg Reading Time9 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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निबन्ध को निर्मल वर्मा ऐसी विधा मानते हैं जिसका मिज़ाज भले थोड़ा मनमौजी हो लेकिन उसमें विचारों और अनुभवों की एक बड़ी राशि की भूमि बनने की क्षमता होती है। इसके खुलेपन की वजह से वे उसे एक ग़ैर-अभिजात विधा मानते हैं।
‘शताब्दी के ढलते वर्षों में’ उनका बहुत पढ़ा जाने वाला संग्रह है। यहाँ शामिल निबन्धों में स्वयं अपने बारे में और साथ ही सांस्कृतिक अस्मिता के बारे में रचनाकार के आत्ममंथन की प्रक्रिया ने रूपाकार ग्रहण किया है। एक ऐसी पीड़ित किन्तु अपरिहार्य प्रक्रिया जो ‘अन्य’ के सम्पर्क में आने पर ही शुरू होती है।
निर्मल वर्मा के इन निबन्धों में यूरोप और पश्चिमी संस्कृति की उस ‘अन्यता’ की ऐसी पहचान दिखाई पड़ती है जो उनके लेखन के आरम्भिक वर्षों में उसी रूप में नहीं मिलती, जैसी वह उन्हें बाद के वर्षों में यूरोप प्रवास के दौरान प्रतीत हुई। इस ‘अन्य’ में साम्यवाद की यूरोपीय विचारधारा भी शामिल है, जिसके भीतर विघटन और विनाश के बीजों को निर्मल वर्मा ने पहली बार अपने निबन्धों में निरूपित किया था।
समाज, संस्कृति और धर्म के अलावा शुद्ध साहित्यिक प्रश्नों को तो इनकी विचार-परिधि में समेटा ही गया है, इसके अलावा कुछ विशिष्ट रचनाकारों के सृजन-कर्म पर भी निर्मल वर्मा ने दृष्टि केन्द्रित की है जिनमें प्रेमचंद, अज्ञेय, मलयज और चेख़व प्रमुख हैं। जीवन-जगत के इतने कगारों को उनकी व्यापकता में छूते हुए ये निबन्ध अपने पाट की चौड़ाई से ही नहीं, मोती निकाल लाने की लालसा में गहरे डूबने के प्रयास से भी पाठक को आकर्षित और प्रभावित करते हैं।
बीसवीं शताब्दी के वैचारिक उतार-चढ़ावों को पारदर्शी दृष्टि से अंकित करनेवाले ये निबन्ध स्वयं निर्मल वर्मा की लम्बी चिन्तन-यात्रा के विभिन्न पड़ावों को एक जगह प्रस्तुत करते हैं।
Yatharthwad Aur Uski Samasyayen
- Author Name:
Yashpal
- Book Type:

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बहसों और विवादों से यशपाल का गहरा नाता था। उनके सोचने का अपना ढंग था जो मार्क्सवादी विश्वदृष्टि से अनुशासित एवं नियंत्रित था। वे सवालों से बचकर निकलने में नहीं, उनसे टकराने में विश्वास करनेवाले लेखक थे। सामाजिक एवं राजनीतिक महत्त्व के जनता के जीवन से जुड़े मुद्दे और सवाल हमेशा उनकी चिन्ता के केन्द्र में रहे। साहित्य में कलावाद और व्यक्तिवाद का विरोध करके वे परिवर्तनकामी चेतना के वाहक थे। अपने लम्बे रचनाकाल में साहित्यिक एवं कलात्मक समस्याओं, लेखक के परिवेश और दायित्व आदि सवालों पर उन्होंने गम्भीरता से विचार किया है।
प्रस्तुत पुस्तक में सम्मिलित सामग्री कुछ तो सैद्धान्तिक सवालों और मुद्दों से सम्बन्धित है और कुछ विविध साहित्यिक प्रसंगों, विवादों या फिर अपने स्पष्टीकरण के रूप में लिखित लेखों एवं टिप्पणियों से बनी है। भाषा के प्रश्न पर उनकी अनेक टिप्पणियाँ और लेख हैं जिनमें हिन्दी-उर्दू विवाद के साथ पंजाबी भी शामिल है। आज उस सारी सामग्री के एक जगह होने पर इन सवालों पर यशपाल को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।
इधर मार्क्सवाद के संकट की चर्चा प्राय: होती रही है। सोवियत संघ के पतन के बाद उसकी देशज प्रकृति पर भी विचार किया जाता है। भूमंडलीकरण और आर्थिक उदारवाद ने सब कहीं मार्क्सवाद के लिए संकट पैदा किया। चीन की पूँजीवादी छलाँग से इस संकट को समझा जा सकता है। यहाँ साठ के दशक में लिखित और तब पर्याप्त विवादास्पद रहा लेख ‘मार्क्सवाद में पुनर्विचार’ भी सम्मिलित है। निश्चय ही यह संकलन चिन्तक यशपाल को समझने में उपयोगी और महत्त्वपूर्ण है।
Shri Arvind : Meri Dristi Main
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

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‘श्री अरविन्द : मेरी दृष्टि में’ रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की विराट मानसिकता का परिचय करानेवाली विचार-प्रधान कृति है।
दिनकर ने इस पुस्तक में योगिराज अरविन्द के विकासवाद, अतिमानव की अवधारणा एवं साहित्यिक मान्यताओं को बहुत ही सरलता से बताया है।
श्री अरविन्द केवल एक क्रान्तिकारी ही नहीं, उच्चकोटि के साधक भी थे। राष्ट्रकवि दिनकर के शब्दों में—“श्री अरविन्द की साधना अथाह थी, उनका व्यक्तित्व गहन और विशाल था और उनका साहित्य दुर्गम समुद्र के समान है।”
इस पुस्तक की एक विशेषता यह भी है कि यहाँ श्री अरविन्द की कालजयी चौदह कविताओं को भी संकलित किया गया है जो स्वयं राष्ट्रकवि दिनकर द्वारा अपनी विशिष्ट भाषा-शैली में अनूदित की गई हैं।
नई साज-सज्जा में प्रस्तुत यह कृति निश्चय ही हिन्दी साहित्य में रुचि रखनेवाले पाठकों के लिए उपादेय सिद्ध होगी।
Sundar Ke Swapn
- Author Name:
Dalpat Singh Rajpurohit
- Book Type:

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Description:
सुन्दरदास आरम्भिक आधुनिक हिन्दी के ऐसे कवि थे जिन्होंने संस्कृत के सुभाषितों, वेदान्त की दार्शनिक उक्तियों, ब्रह्म-वाक्यों और उत्तर भारत में प्रचलित विभिन्न बोलियों की कहावतों और मुहावरों का व्यापक प्रयोग अपनी कविता में किया। संस्कृत की शास्त्रीय परम्परा के साथ-साथ उनकी पकड़ ब्रजभाषा की रीति-कविता पर भी साफ़ दिखाई देती है लेकिन उसका प्रयोग उन्होंने अलग ढंग से किया।
उनके लिए आत्मानुभव किसी भी दर्शन से अधिक महत्त्वपूर्ण था। उनकी कविता विश्वव्यापी ब्रह्म-सत्य की खोज की कविता है, और उनकी भक्ति एक सतत यात्रा।
उनकी कविता इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि उसमें मारवाड़ क्षेत्र की वणिक संस्कृति के अत्यन्त सजीव बिम्ब हमें मिलते हैं। अकसर अकाल की ज़द में रहने वाले और बंजर मरुस्थली क्षेत्र को उन्होंने आध्यात्मिक आधार पर एक नवीन और विशिष्ट अर्थ दिया। प्रमाण उपलब्ध हैं कि उनकी कविता की पहुँच संत समुदाय से बाहर व्यापारी और दरबारी वर्ग तक थी। जयपुर के सिटी पैलेस म्यूज़ियम में संरक्षित उनकी एक पांडुलिपि पर मुग़ल बादशाह औरंगजेब की मुहर भी मिलती है।
यह पुस्तक दादूपंथ के इतिहास और उसके सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य के साथ-साथ सुन्दरदास के व्यक्तित्व और कृतित्व का विस्तृत और विचारोत्तेजक विवेचन करती है। उनके शिल्प, काव्य-दृष्टि और आध्यात्मिक विशिष्टताओं के विश्लेषण के अलावा इसमें भक्ति के लोकवृत्त और हिन्दी की आरम्भिक तथा अपनी आधुनिकता के तत्त्वों को भी रेखांकित किया गया है।
Jeene Ka Udaatta Aashay
- Author Name:
Pankaj Chaturvedi
- Book Type:

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Description:
युवा कवि और आलोचक पंकज चतुर्वेदी की यह पुस्तक हमारे समय के वरिष्ठ कवि कुँवर नारायण की कविता पर केन्द्रित है। किसी भी विचारधारा के प्रभुत्व को स्वीकार करते हुए उन्होंने सत्य को एक विस्तृत पटल पर एक द्वन्द्वात्मक तथा बहुस्तरीय अवधारणा के रूप में आत्मसात् किया है।
आदर्श और यथार्थ, ज्ञान और संवेदना, समय और इतिहास की द्वन्द्वात्मक संहति से कुँवर नारायण की कविता संश्लिष्ट, गहन और विचारोत्तेजक घटित हुई है। उससे हम अपनी आत्मा को आलोकित और समृद्ध कर सकते हैं; क्योंकि उसमें वाग्जाल नहीं, एक मार्मिक पारदर्शिता और जीवन-सत्य का दुर्लब विवेक है।
लेखक ने इस पुस्तक के पहले निबन्ध में कुँवर नारायण के विचारों और उनकी समग्र काव्य-यात्रा से चुनी हुई कविताओं के विश्लेषण के ज़रिए उनकी काव्य-दृष्टि को समझने और उसका एक स्वरूप निर्मित करने की चेष्टा की है। बाद के निबन्धों में क्रमशः उनकी सभी काव्य-कृतियों का गहन और व्यापक मूल्यांकन किया गया है। बकौल लेखक, ‘शायद इसकी कोई सार्थकता है तो यह रेखांकित करने में कि कुँवर नारायण विचारों की बहुलता, दार्शनिक बेचैनी, आत्मवत्ता, प्रेम, जीवन की समृद्धि, सौन्दर्य, अपरिग्रह और सत्य के प्रति अदम्य आस्था के कवि ही नहीं; ग़ुलामी और अन्याय के विभिन्न रूपों के प्रति युयुत्सा और प्रतिरोध से सम्पन्न, गहरे विडम्बना-बोध, करुणा, व्यंग्य और परिवर्तन एवं प्रगति की कामना के भी कवि हैं।’
Samay Aur Sahitya
- Author Name:
Vijay Mohan Singh
- Book Type:

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Description:
हर लेखक अपनी रचनात्मकता, अपनी समझ और अपनी सहमति-असहमति के
माध्यम से अपने समय के साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक प्रवाह में हस्तक्षेप भी करता है।
रचनाकार किसी भी विधा का हो, उसका यह पक्ष अपने दौर में उसकी स्थिति को समझाने-रेखांकित
करने में सहायक होता है।
विजयमोहन सिंह हमारे समय के सजग कथाकार और आलोचक हैं; इस पुस्तक में उनकी उन गद्य
रचनाओं को शामिल किया गया है जो बीच-बीच में उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं और संगोष्ठी-सेमिनारों
आदि के लिए लिखी थीं। इनमें कुछ निबन्ध हैं, कुछ पुस्तक-समीक्षाएँ हैं, कुछ समसामयिक विषयों
पर टिप्पणियाँ हैं; और कुछ श्रद्धांजलियाँ भी। ऐसा करने के पीछे एक उद्देश्य यह भी रहा है कि
सामान्य साहित्यिक संकलनों की तरह यह पुस्तक एकरस न लगे।
विजयमोहन सिंह के वैचारिक लेखन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अतिरिक्त और ओढ़ी हुई
गम्भीरता से पाठक को आतंकित नहीं करते। वे अपना मन्तव्य सहज भाव से व्यक्त करते हैं, लेकिन
बहुत ‘कन्विंसिंग’ ढंग से। बकौल उनके, ‘‘ये अपने समय तथा साहित्य के प्रति प्रतिक्रियाएँ हैं।’’
Kavita Aur Shuddha Kavita
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

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‘कविता और शुद्ध कविता’ ‘दिनकर’ के साहित्यिक निबन्धों का ही संग्रह नहीं है, बल्कि इसके सभी निबन्ध एक ही ग्रन्थ के विभिन्न अध्याय हैं और वे विभिन्न दिशाओं से एक ही विषय पर प्रकाश डालते हैं।
पुस्तक हमें बताती है कि कविता की चर्चा केवल कविता की चर्चा नहीं है, वह समस्त जीवन की चर्चा है। ईश्वर, कविता और क्रान्ति—इन्हें जीवन के समुच्चय में प्रवेश किए बिना नहीं समझा जा सकता। कविता अगर यह व्रत ले ले कि वह केवल शुद्ध होकर जिएगी, तो उस व्रत का प्रभाव कविता के अर्थ पर भी पड़ेगा, कवि की सामाजिक स्थिति पर भी पड़ेगा, साहित्य के प्रयोजन पर भी पड़ेगा।
नई कविता का आन्दोलन यूरोप में वर्षों से चल रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि वह अब भी पुराना नहीं पड़ा है। उसके भीतर से बराबर नए आयाम प्रकट होते जा रहे हैं। रोमांटिक युग तक कविता किसी निश्चित चौखटे में जड़ी देखी जा सकती थी; किन्तु उसके बाद से वह दिनों-दिन हर प्रकार के चौखटे से घृणा करती आई है। आज अन्तरराष्ट्रीय काव्य जहाँ खड़ा है, वहाँ केवल आसमान ही आसमान है, कहीं कोई क्षितिज दिखाई नहीं देता। इसीलिए पुराने आलोचकों को नई कविता को छूने में अप्रियता और कुछ संकोच का भी अनुभव होता है।
नए कलेवर में प्रस्तुत यह पुस्तक सभी कविता-प्रेमियों के लिए एक सुखद अनुभव लेकर आएगी, ऐसा हमारा विश्वास है।
Anuvad Ki Prakriya Taknik Aur Samasyayen
- Author Name:
Shrinarayan Sameer
- Book Type:

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अनुवाद भाषिक कला है और किसी भाषा-रचना को दूसरी भाषा में पुनर्सृजित करने का कौशल भी। पुनर्सृजन के इस कला-कौशल में भाषा की शर्तों का अतिक्रमण होता है। तथापि यह अतिक्रमण अराजक क़तई नहीं होता। सृजन की अकुलाहट के बावजूद यह सदैव सुन्दर और रुचिकर ही होता है।
किन्तु अनुवाद का दूसरा यथार्थ यह भी है कि भाषाविज्ञान से सम्बद्ध होकर मशीन से सम्भव होने के कारण अनुवाद आधुनिक समय में जितना कला है, उतना ही विज्ञान भी है। अनुवाद की यही फ़ितरत (फ़ित्रत) है, जो उसे किंचित् मुश्किल कर्म बनाती है। इस मुश्किल से पार पाने में अनुवाद की प्रक्रिया और तकनीक सहायता करती हैं। तभी सटीक, समतुल्य और संगत अनुवाद सम्भव हो पाता है।
अनुवाद की राह में समस्याओं के कई पठार भी आते हैं, जिन्हें अनुवादकर्ता को अपने ज्ञान और सूझबूझ से तोड़ना पड़ता है। ज़ाहिर है, अनुवाद की प्रक्रिया और तकनीक अपनी समस्त शर्तों एवं सावधानियों के द्वारा उसे परिपाक तक पहुँचाती हैं। समस्याएँ इसमें बाधक नहीं वरन् ताक़त बनकर उभरती हैं। अनुवाद के पुनर्सृजन अथवा अनुसृजन अर्थात् समानान्तर सृजन होने का यही राज है। अनुवाद के इस राज को प्रस्तुत पुस्तक में डॉ. श्रीनारायण समीर ने बड़ी बारीकी और धैर्य के साथ उद्घाटित किया है। इस उद्घाटन में भाषा की रवानी और ताज़गी एक सर्वथा नए आस्वाद की अनुभूति कराती है, जिसे पढ़कर ही महसूस किया जा सकता है।
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