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जीवनानुभवों से लैस कवि ही कविता में ख़तरे उठा सकता है, बाक़ी अपनी और दूसरों की बनाई लीक पर चलते रहते हैं और ख़ुश रहते हैं मगर लीलाधर मंडलोई सौभाग्य से उन कवियों में नहीं हैं। ‘लिखे में दुक्ख’ इसका प्रमाण है। मंडलोई के अब तक जो कविता संकलन आए हैं, वे हमारी स्मृति में अपनी छोटी कविताओं के कारण दर्ज़ नहीं हैं मगर इस संकलन के प्रकाशन से पूर्व जब ये कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं में यहाँ-वहाँ छपीं तो उन्होंने पाठकों के मन में एक अलग जगह बनाई। मंडलोई ने ये कविताएँ लिखकर और फिर उन्हें एक जगह संकलित करके फ़ॉर्म के स्तर पर उस मुक़ाम पर आकर ख़तरा उठाया है, जब कवि ख़तरे उठाना बंद करके पुरानी कमाई को भुनाने में लग जाते हैं। यह संकलन इसलिए और भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हो गया है कि जब इधर फिर से लम्बी (और अधिकतर अपठनीय) कविताओं का फैशन आ और छा चुका है, जब लगता है कि कवि भूल ही चुके हैं कि शब्दस्फीति बहुत कम स्थितियों में कविता की मदद करती है, तब मंडलोई ने धारा के एकदम विपरीत जाकर ये छोटी कविताएँ लिखीं। यह एक साहस की माँग करता है। लेकिन अपने आप में फ़ॉर्म और उससे जुड़े ख़तरे उठाना ही महत्त्वपूर्ण नहीं होता, आप कविता से करना और कहना क्या चाहते हैं? इस लिहाज से देखें तो मंडलोई की ये कविताएँ कई कारणों से हमारा ध्यान आकृष्ट करती हैं। इनमें स्मृतियाँ हैं, अपने आसपास के जीवन के कई सूक्ष्म पर्यवेक्षण हैं, गहरा अवसाद है, संयत आक्रोश और बेचैनी है, आत्मव्यंग्य है, एक क़िस्म का वैराग्यभाव भी है। ये कविताएँ आत्मकथ्य भी हैं और परकथन भी। कवि के शब्दों में कहें तो ये 'दीमक की भाषा में लिखी गई सुंदर मगर जटिल संरचनाएँ' हैं। इनमें उस झूठ से परहेज़ न करने का आग्रह भी है जो खेत में बिजूके की तरह खड़ा हो। इसमें पत्थर की कोमलता है और दरख़्त के रोने की आवाज़ भी है। इस कविता में दुक्ख है और सबका है। अपने दुख को सबके दुक्खों से जोड़ने और जाँचने की ऐसी विकलता है कि कवि यह चुनौतीपूर्ण ढंग से कहता है कि अगर उसकी कविता का दुक्ख सबका दुक्ख नहीं है तो उसके लिखे को आग लगे। इस कविता संकलन में निश्चित रूप से कवि अपनी बनी-बनाई मूर्ति को ढहाता है और नई गढ़ता है लेकिन उसे भी अगली बार तोड़ने की प्रतिज्ञा के साथ। —विष्णु नागर

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जीवनानुभवों से लैस कवि ही कविता में ख़तरे उठा सकता है, बाक़ी अपनी और दूसरों की बनाई लीक पर चलते रहते हैं और ख़ुश रहते हैं मगर लीलाधर मंडलोई सौभाग्य से उन कवियों में नहीं हैं। ‘लिखे में दुक्ख’ इसका प्रमाण है। मंडलोई के अब तक जो कविता संकलन आए हैं, वे हमारी स्मृति में अपनी छोटी कविताओं के कारण दर्ज़ नहीं हैं मगर इस संकलन के प्रकाशन से पूर्व जब ये कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं में यहाँ-वहाँ छपीं तो उन्होंने पाठकों के मन में एक अलग जगह बनाई। मंडलोई ने ये कविताएँ लिखकर और फिर उन्हें एक जगह संकलित करके फ़ॉर्म के स्तर पर उस मुक़ाम पर आकर ख़तरा उठाया है, जब कवि ख़तरे उठाना बंद करके पुरानी कमाई को भुनाने में लग जाते हैं। यह संकलन इसलिए और भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हो गया है कि जब इधर फिर से लम्बी (और अधिकतर अपठनीय) कविताओं का फैशन आ और छा चुका है, जब लगता है कि कवि भूल ही चुके हैं कि शब्दस्फीति बहुत कम स्थितियों में कविता की मदद करती है, तब मंडलोई ने धारा के एकदम विपरीत जाकर ये छोटी कविताएँ लिखीं। यह एक साहस की माँग करता है। लेकिन अपने आप में फ़ॉर्म और उससे जुड़े ख़तरे उठाना ही महत्त्वपूर्ण नहीं होता, आप कविता से करना और कहना क्या चाहते हैं? इस लिहाज से देखें तो मंडलोई की ये कविताएँ कई कारणों से हमारा ध्यान आकृष्ट करती हैं। इनमें स्मृतियाँ हैं, अपने आसपास के जीवन के कई सूक्ष्म पर्यवेक्षण हैं, गहरा अवसाद है, संयत आक्रोश और बेचैनी है, आत्मव्यंग्य है, एक क़िस्म का वैराग्यभाव भी है। ये कविताएँ आत्मकथ्य भी हैं और परकथन भी। कवि के शब्दों में कहें तो ये 'दीमक की भाषा में लिखी गई सुंदर मगर जटिल संरचनाएँ' हैं। इनमें उस झूठ से परहेज़ न करने का आग्रह भी है जो खेत में बिजूके की तरह खड़ा हो। इसमें पत्थर की कोमलता है और दरख़्त के रोने की आवाज़ भी है। इस कविता में दुक्ख है और सबका है। अपने दुख को सबके दुक्खों से जोड़ने और जाँचने की ऐसी विकलता है कि कवि यह चुनौतीपूर्ण ढंग से कहता है कि अगर उसकी कविता का दुक्ख सबका दुक्ख नहीं है तो उसके लिखे को आग लगे। इस कविता संकलन में निश्चित रूप से कवि अपनी बनी-बनाई मूर्ति को ढहाता है और नई गढ़ता है लेकिन उसे भी अगली बार तोड़ने की प्रतिज्ञा के साथ।
—विष्णु नागर

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2026
Weight
110 grams
ISBN-13
9789309020094
Pages
108
Reading time
~4 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21.5 cm
Language
Hindi

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